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आलोचना

अर्धकथानक : हिंदी की पहली आत्मकथा
अखिलेश कुमार दुबे


'अर्धकथानक' हिंदी भाषा की पहली आत्मकथा है। यह आत्मकथा सन् 1641 ई. में 'बनारसी दास जैन' द्वारा लिखी गई है। ये संवत् 1643 वि. में उत्पन्न हुए थे। इन्होंने संवत 1698 वि. तक का अपना जीवन-वृत्त अपनी आत्मकथा में बहुत ही व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया है। इस संबंध में हिंदी साहित्य के मूर्धन्य इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की टिप्पणी उद्धरणीय है - ''ये जौनपुर के रहने वाले एक जैन जौहरी थे, जो आमेर में भी रहा करते थे। इनके पिता का नाम 'खड्गसेन' था। ये संवत् 1643 में उत्पन्न हुए थे। इन्होंने संवत् 1698 तक का जीवन-वृत्त, 'अर्धकथानक' नामक ग्रंथ में दिया है। पुराने हिंदी साहित्य में यही एक आत्मचरित मिलता है, इससे इसका महत्व बहुत अधिक है।'' 1 इस प्रकार आचार्य शुक्ल ने इसे निर्विवाद रूप से हिंदी साहित्य में आत्मकथा की विधा की पहली किताब मानते हुए इसका महत्व स्वीकार किया है। इतना ही नहीं आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास में बनारसी दास जैन को फुटकल कवियों की सूची में अठारहवाँ स्थान दिया है और लगभग एक पृष्ठ खर्च किया है। उन्होंने इनकी तुलना हिंदी के प्रसिद्ध निर्गुण संत कवि सुंदरदास से की है और एक प्रौढ़ रचनाकार के रूप में इन्हें मान्यता प्रदान की है। इतना ही नहीं आचार्य शुक्ल ने बनारसीदास जैन की आत्मकथा में सूफी प्रेमाख्यानकों के मधुमालती और मृगावती के उल्लेख के आधार पर यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि पद्मावत के पूर्व 'मधुमालती' की अत्यधिक ख्याति थी - ''पद्मावत के पहले 'मधुमालती' की बहुत अधिक प्रसिद्धि थी। जैन कवि बनारसीदास ने अपने आत्मचरित्र में संवत् 1660 के आस-पास की अपनी इश्कबाजी वाली जीवनचर्या का उल्लेख करते हुए लिखा है कि - उस समय में हाट-बाजार में जाना छोड़ घर में पड़े-पड़े 'मृगावती' और 'मधुमालती' नाम की पोथियाँ पढ़ा करता था -

''तब घर में बैठे रहैं, नाहिन हाट बाजार।

मधुमालती, मृगावती, पोथी दोय उचार।।'' 2

अपनी आत्मकथा लिखने एवं उसका 'अर्धकथानक' नाम रखने के पीछे, बनारसीदास जैन ने एक रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है, जिसमें वे लिखते हैं कि मनुष्य की आयु एक सौ दस वर्ष मानी जाती है और मैं अभी अपनी आधी आयु पूरी कर चुका हूँ, यानी पचपन वर्ष। उन्होंने निश्चय किया कि मैं अपनी आधी जिंदगी का सच लिख डालूँ, आगे की बात आगे समझी जाएगी। उन्होंने अपनी आत्मकथा में बहुत ही स्पष्ट रूप से अपने कुल, गोत्र, धर्म आदि का उल्लेख करते हुए इसके नामकरण के तर्क की भी चर्चा की है -

''नजर आगरे में बसे, जैन धर्म श्रीमाल।

बानारसी बिहोलिया, अध्यातमी रसाल।।'' 3

"ताके मनआई यहु बात। अपनौ चरित्र कहौं बिख्यात।

तब तिनि बरस पंच पचास। परमिति दसा कही मुख भास।।'' 4

''आगे जो कछु होइगी और। तैसी समुझेंगे तिस ठौर।।

बरतमान नर आउ बखान। बरस एक सौ दस परवान।।'' 5

''तातै अरध कथान यहु, बनारसी चरित्र।

दुष्ट जीव सुनि हँसहिंगे, कहहिं, सुनिहिंगे मित्र।।'' 6

जैन कवि बनारसीदास को अपनी विख्यात कथा कहने का मन हुआ और तब उन्होंने व्यतीत जीवन का भोगा हुआ यथार्थ प्रकट कर दिया। उन्हें अपने जीवन के उतार-चढ़ाव, नफा-नुकसान, यश-अपयश आदि की कोई चिंता नहीं है। वे अपने जीवन की उपलब्धियों के प्रति आश्वस्त हैं। उन्हें किसी तरह का अपराध-बोध नहीं है, किंतु उन्हें इस बात का ज्ञान अवश्य था कि, मैं जो कुछ भी अपने बारे में प्रकाशन करूँगा। वह दुष्ट प्रकृति के लोगों के लिए हास्यास्पद होगा, लेकिन मित्रों या अच्छी प्रकृति के मनुष्यों के लिए यह प्रेरक, मार्गदर्शक और मूल्यवान होगा, इसमें उन्हें कोई संदेह नहीं था।

'अर्धकथानक' हिंदी की पहली आत्मकथा है, इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्व तो अवश्य है, किंतु इसके साथ ही यह पुस्तक अद्भुत विशेषताओं से संपन्न है। यह पुस्तक आत्मकथा विधा के लिए सुनिश्चित सभी मानकों पर खरी उतरती है। यदि यह कहा जाए कि 'अर्धकथानक' आत्मकथा का व्याकरण तैयार करती है, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। यहाँ इसकी कुछ विशेषताओं का उल्लेख करना आवश्यक है। इनकी पहली और सबसे बड़ी खूबी है, 'सत्य' के स्वीकार का साहस। आत्मकथाकार ने प्रायः अपनी 'प्रेमचर्या' के उल्लेख किए हैं। उसने अपनी पिछली जिंदगी में की हुई आशिकबाजी के बारे में खुलकर बात रखी है और ऐसा असावधानी से किया गया नहीं लगता है, क्योंकि वे अक्सर अपनी इश्क-मिजाजी की बात लिखते हैं, बिना शर्म/संकोच के। यह बात हम सब मानेंगे कि आज भी 'प्रेम' के स्वीकार की बात या अपनी लंपटई की स्वीकृति आसान कदापि नहीं है। यह मसला, सीधे-सीधे व्यक्ति की निजता और उसकी छवि से जुड़ा हुआ है। ऐसा स्वीकार करने पर सामाजिक प्रतिष्ठा की हानि एकदम तय है, किंतु बनारसी दास ने स्पष्ट रूप से कहा है कि -

''तजि कुल कान लोक की लाज।

भयौ बनारसि आसिखबाज।'' 7

कुल और लोक की मर्यादा त्याग कर बनारसीदास, 'आशिकी' करने लगे थे। उन्हें अपने इस काम पर किसी तरह का पश्चाताप नहीं था। उन्होंने अपनी युवावस्था में स्वयं के भटक जाने के चित्र उपस्थित किए हैं -

''कबहुँ आई सबद उर धरै। कबहूँ जाई आसिखी करैं।

पोथी एक बनाई नई। मित हजार दोहा-चौपई।।'' 8

नई बनाई पोथी में बनारसीदास ने नवरसों में रचनाएँ की हैं, लेकिन इसमें अधिक बल 'श्रृंगार-वर्णन' पर ही था -

''तामै नवरस रचना लिखी। पै विसेस बरनन आसिखी।

ऐसे कुकवि बनारसी भए। मिथ्या ग्रंथ बनाए नए।।'' 9

बनारसीदास की आत्मकथा में इस पोथी का स्पष्ट उल्लेख है, किंतु ज्यादा विस्तार नहीं है। हाँ, इतना तो जरूर ज्ञात होता है कि एक दिन स्वयं कवि ने गोमती नदी के ऊपर बने पुल से पुस्तक को नदी में फेंक दिया था।

आत्मकथाकार ने स्वयं के व्यतीत-जीवन के बेबाक चित्र खींचे हैं। यह बेबाकी, उन्हें विशिष्ट बनाती है। उन्होंने प्रायः अपनी लंपटता के उल्लेख किए हैं -

''कै पढ़ना के आसिखी, मगन दुहुँ रसमाहिं।।

खान-पान की सुध नहीं, रोजगार किछु नाहिं।।'' 10

पढ़ाई (विद्या-व्यसन) और प्रेमचर्या ये दो कार्य मनपसंद थे, बनारसीदास को। इन व्यसनों में इस तरह तल्लीन होते थे कि खाने-पीने का भी ध्यान नहीं रख पाते थे और व्यवसाय तो चला ही नहीं पाते थे। इस स्थिति में वे अपने पिता के लिए भार स्वरूप हो गए थे।

कुसंगति और व्यसनों के परिणाम-स्वरूप बनारसीदास व्याघि-ग्रस्त हो गए थे और उनके पूरे शरीर में असंख्य फोड़े हो गए। स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि कोई भी सगा-संबंधी साथ बैठकर खाना नहीं खाता था। शरीर से दुर्गंध आती थी। इस संबंध में आत्मकथाकार स्पष्ट रूप से लिखता है कि -

''मास एक जब भयो बितीत। पौष मास सित पखरितु सीत।

पूरब करम उदै संजोग। आकसमात बात कौ रोग।।

भयौ बनारसिदासतन कुष्ठ रूप सरबंग।

हाड़-हाड़ उपजी बिथा, केस रोम भुब-भंग।

विस्फोटक अगनित भए, हस्त-चरन-चौरंग।

कोऊ नर साला-ससुर, भोजन करइ न संग।।''11

खुशहाल जीवन भोगने के बावजूद अपनी खराब प्रवृत्तियों की वजह से आत्मकथाकार बनारसीदास जैन को लांछित और अपमानित होना पड़ा था। उन्होंने स्वयं लिखा है कि मेरी लंपटता दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी, मैं लोगों (शुभचिंतकों) के समझाने पर भी अपनी खराब आदतों से बाज नहीं आ रहा था -

''फिरि पौसाल भानपै पढ़ै, आसिखबाजी दिन-दिन बढ़ै।।

काहू कह्यो न मानै कोई, जैसी गति, तैसी मति होय।।''

जैन कवि के पिता, उनके आचरण और असफल व्यापारिक जीवन से बहुत दुखी हैं। वे साफ-साफ इस असफलता के पीछे के भाव से आहत थे। अपने पिता की स्वयं के बारे में की गई प्रतिक्रिया को दर्ज करते हुए आत्मकथाकार ने साफ-साफ लिखा है कि -

''कहा हमारा सब थया, भया भिखारी पूत।

पूँजी खोई बेहया, गया बनज का सूत।।'' 12

किसी भी व्यापारी पिता के लिए उसके संतान की व्यापार में घोर असफलता, उसके लिए बड़े सदमे से कम नहीं है। बनारसीदास अपनी व्यापारिक असफलता को छिपाकर, अपने महिमा मंडन का प्रयास कदापि नहीं करते हैं। बहुत बार वे अपनी असफलताओं की चर्चा खुलकर करते हैं। ऐसा नहीं था कि वे अपने व्यवसाय में कम मेहनत करते थे, जिसके फलस्वरूप उन्हें मनोनुकूल परिणाम प्राप्त नहीं होते थे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि -

''जो पाया सो खाया सर्ब, बाकी कछु न बांच्या दर्ब।।

करी मसक्कति गई अकाथ, कौड़ी एक न लागी हाथ।।''13

बहुत कठिन परिश्रम भी उन्हें इच्छित लाभ नहीं दिला पाता था और उन्हें अपने जीवन में ढेरों आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।

'अर्धकथानक' का महत्व सिर्फ हिंदी आत्मकथा की विधा की पहली पुस्तक होने से ही नहीं अपितु उसके महत्व के अन्य मूल्यवान कारण भी मौजूद हैं, जैसे 'अर्धकथानक' में सत्रहवीं शताब्दी के भारत के काफी बड़े भूभाग के सामाजिक-सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक वास्तविकताओं से संबद्ध ढेरों जानकारियाँ उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर प्रामाणिक इतिहास लिखा जा सकता है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि यह एक ऐसे व्यक्ति का 'जिंदगीनामा' है जो आग्रहमुक्त होकर सब कुछ स्पष्ट रूप से दर्ज कर रहा था। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ, इन तीन बादशाहों का राज्य, आत्मकथाकार ने स्वयं देखा था। बनारसीदास ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि बादशाह की मौत हो जाने पर राज्य में अजीब सा भय व असुरक्षा का माहौल बन जाता था -

''संवत् सोलह सै बासठा। आयौ कातिक पावस नठा।

छत्रपति अकबर साहि जलाल। नगर आगरे कीनौं काल।।

आई खबर जौनपुर माह। प्रजा अनाथ भई बिनु नाह।।

पुरजन लोग भए भयभीत। हिरदे व्याकुलता मुख पीत।।''14

अकबर की मृत्यु सन् 1605 ई. में होना, यह प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य है। बनारसीदास ने इस असुरक्षा व भय के परिवेश को तब तक सक्रिय बताया है, जब तक नया बादशाह सत्ताशीन नहीं हो जाता है। अकबर की मृत्यु के बाद पैदा हुई परिस्थितियाँ (भय व असुरक्षा की) ज्यादा समय तक नहीं बनी रहीं। जैसे ही अकबर का पुत्र जहाँगीर सिंहासन पर विधिवत बैठा, उसी समय से शांति और सुव्यवस्था क़ायम हो गई -

''अकबर कौ नंदन बड़ौ, साहिब साहि सलेम।

नगर आगरे में तखत, बैठो अकबर जेम।।

नाउं धरायो नूरदीं, जहाँगीर सुल्तान।

फिरी दुहाई मुलक में, बरती जहँ-तहँ आन।।'' 15

मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने बाईस वर्षों तक राज्य किया था और उसकी काश्मीर से लौटते समय अकस्मात मृत्यु हो गई थी। यह प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्य है। यह आत्मकथा में उल्लिखित है -

''छत्रपति जहाँगीर दिल्लीस। कीनो राज बरस बाईस।

कासमीर के मारग बीच। आवत हुई अचानक मीच।।'' 16

जहाँगीर की मृत्यु के कुछ समय बाद शाहजहाँ गद्दी पर बैठा और संपूर्ण ऐश्वर्य के साथ उसने दीर्घकाल तक शासन किया। इसे बनारसीदास ने अपनी आत्मकथा में गंभीरता से रेखांकित किया है -

मासि चार अंतर परवान। आयौ साहिजहाँ सुल्तान।

बैठ्यो तखत छत्र सिर तानि। चहूँ चक्क में फेरी आन।।

सोरह सै चौरासिए, तखत आगरे थान।

बैठ्यो नाम धराय प्रभु, साहिब साहि किरान।।'' 17

आत्मकथा मध्यकालीन भारत में व्यापार की समृद्धि के स्पष्ट संकेतों से भरी पड़ी है। चूँकि आत्मकथाकार स्वयं व्यापारी है, इसलिए वह अपने बहाने तत्कालीन भारत के आर्थिक परिदृश्य के चित्र भी खींचता जाता है। आत्मकथा से भारत के व्यापारिक रूप से समृद्ध अनेक नगरों की जानकारियाँ मिलती हैं। जौनपुर, पटना, काशी, प्रयागपुर (इलाहाबाद), फतेहपुर, इटावा, आगरा, मेरठ, कोल (अलीगढ़), अयोध्या, मथुरा, खैराबाद, फिरोजाबाद, सांगानेर, सहिजादपुर, रोहतकपुर, दिल्ली आदि कुछ प्रमुख नगर हैं, जिनकी प्रायः व्यापार व उनकी भौतिक समृद्धि के संदर्भ में चर्चा हुई है। जौनपुर की खुशहाली का उल्लेख करते हुए, जैन कवि ने उसे बहुत समृद्ध बताया है, जहाँ ढेरों सराय बाजार और मंडियाँ थीं, जिनसे व्यापार सुगमता से होता था -

जहाँ बावन सराइ पुरकने। आसपास बावन परगने।।

नगर माँहि बावन बाजार। अरु बावन मंडई उदार।।'' 18

मध्यकाल में जौनपुर अत्यंत विकसित एवं समृद्ध नगर था। यह बात इतिहास-सिद्ध है। बनारसीदास ने जौनपुर की आर्थिक समृद्धि की महिमा का गान करते हुए थोड़ी अधिक उदारता अवश्य बरत दी है, मसलन किसी नगरमें 52 सराय, 52 परगनें, 52 बाजार व 52 मंडिया कुछ ज्यादा हैं। यहाँ आत्मकथाकार ने उत्साहाधिक्य दिखाया है, फिर भी उनके उल्लेख से यह तो अवश्य पता चलता है कि जौनपुर नगर काफी समृद्ध व व्यापार की दृष्टि से उन्नत रहा होगा।

संक्षेप में 'अर्धकथानक' हिंदी की पहली आत्मकथा होने के साथ ही साथ मध्यकालीन भारतीय इतिहास से संबंधित अनेक बहुमूल्य जानकारियों/तथ्यों का समृद्ध कोष है। इसमें उपलब्ध प्रामाणिक सूचनाओं के आधार पर आसानी से मध्यकालीन भारतीय समाज के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। क्योंकि बनारसीदास जैन तटस्थ दृष्टि संपन्न, संवेदनशील एवं प्रखर बौद्धिक रचनाकार थे। उनका लेखन किसी प्रायोजित परियोजना का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्व भर नहीं है, बल्कि उससे कहीं बहुत अधिक है।

संदर्भ :

1. हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ.सं.-123, ना.प्र. सभा, काशी, सं. 2060 वि.

2. हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ.सं. 54, ना.प्र.सभा, काशी, सं. 2060 वि.

3. अर्धकथानक, सं.-श्री नाथूराम प्रेमी, पद सं.- 671

4. वही, पद सं.- 672

5. वही, पद सं. 673

6. वही, पद सं. 674

7. वही, पद सं. 170

8. वही, पद सं. 170

9. वही, पद सं. 179

10. वही, पद सं. 180

11. वही, पद सं. 184, 185, 186

12. वही, पद सं. 331

13. वही, पद सं. 364

14. वही, पद सं. 246-247

15. वही, पद सं. 258-259

16. वही, पद सं. 615

17. वही, पद सं. 246

18. वही, पद सं. 30, 31


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