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व्यंग्य

साहित्य और सफेदी
प्रेम जनमेजय


राजा दशरथ को, एक दिन दर्पण में मुखड़ा देखते समय, जब कानों के पास सफेद बाल दिखाई दिया तो उन्होंने निर्णय लिया कि राम को राजपाट सौंपकर वानप्रस्थ आश्रम की ओर प्रस्थान करेंगे। हमारे आज के दशरथ पहले तो दर्पण में मुखड़ा देखते ही नहीं, देख भी लें तो पहचानते नहीं, पहचान भी लें तो उनके कान में जनता की जूं तक नहीं रेंगती है। सफेद बाल की क्या औकात कि वह रेंगे। उनकी सारी सफेदी पहनावे में होती है और बालों से लेकर शरीर के अंदरूनी तक, सभी तरह की सफेदी, वे काले रंग में रंगते जाते हैं। उनकी सारी वास्तविकता धीरे-धीरे कालिमा के सौदर्य से वैसे ही सुशोभित होती है जैसे पगुरा रही भैंस का सौदर्य।

तो मित्रो, मैंने भी आधुनिक दशरथों से प्रेरणा ग्रहण कर उस एकमात्र सफेद बाल को काला कर दिया। वैसे भी मेरे पास अपने पुत्र को राज पाट देने की बात तो, राजनीति में नैतिकता-सी दूर, एक कंप्यूटर तक खरीद कर देने की औकात नहीं थी। वह निरंतर इसकी माँग उठाता और मैं उसकी माँग आश्वासन की रद्दी टोकरी में डाल देता। दूसरे, एकमात्र बाल को सफेद रहने का मौका देकर मैं अपनी नारी सौंदर्य दृष्टि पर कुठाराघात नहीं करना चाहता था। अब कोई बाल धूप के कारण सफेद हो गया हो तो इसका मतलब यह तो नहीं कि आप सुंदरियों की दृष्टि में केशव बाबा हो जाएं।

जैसे चुनाव में नेता आश्वासन देना नहीं छोड़ता है, मैंने सफेद बालों को नहीं छोड़ा और उन्हें चुन-चुन कर काला करता रहा। सौंदर्य रक्षण के मामले में मेरी पत्नी अति पतिव्रता है। मैं माह में एक बार बाल काले करता तो वह प्रति सप्ताह करती। बाल करते हुए हमारा पूर्ण प्रयत्न होता कि मुंह काला न हो क्योंकि बाल तो अधिकांशतः इस नीयत के साथ ही काले किए जाते हैं कि कहीं मुंह मारने का सुअवसर प्राप्त हो सके और मुहं मारन प्रक्रिया में मुंह के काले होने की संभावनाएं वैसी ही बनी होती हैं जैसे काजल की कोठरी में अथवा पुलिस विभाग में।

पर एक दिन ऐसा आया कि चेहरा तो बुढ़ापे की झुर्रियों से भर गया और काले रंग से रंगी बालों की जवानी वैसे ही लगने लगी जैसे न्यायालय में गीता के सामने सच कहूंगा और सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा जैसा काला सच लगता है। मैं दुविधा या सुविधा, किसी में होऊं , गुरुदेव के पास चला जाता हूं। दशरथ अपने कुलगुरु वसिष्ठ के पास जाते थे, मैं अपने साहित्यिक कुलगुरु के पास इस दुविधा के निराकरण के लिए गया।

मैं गुरुदेव के दरबार में हाजिर हुआ। आप तो जानते ही हैं कि गुरु वह होता है जिसके शिष्य होते हैं और शिष्य वह होता है जिसका गुरु होता है। जितने अधिक शिष्य होते हैं उतना ही गुरु महान होता है। कहते हैं कि जहां गुड़ होता है वहां चीटियां जाती हैं और जहां भ्रष्टाचार होता है भ्रष्टाचारी भी वहीं जाते हैं। जिसके पास भ्रष्टाचार के जितने सुअवसर होते हैं जनता के सेवक उसी के पास जाते हैं। वे मेरे साहित्यिक गुरु हैं और उनके पास पद, पुरस्कार, यश, साहित्य की मुख्य धारा में खेने वाली नाव आदि सब कुछ है। वे खेवनहार हैं इसलिए उनके गले में विभिन्न पुष्पों से युक्त हार सुशोभित होते रहते हैं।

जैसे दशरथ की श्वेतकेश चर्चा सुनकर गुरु वसिष्ठ प्रसन्न हुए थे वैसे ही मेरे गुरु हुए। गुरु सभी एक से होते हैं। आपको कब फंसवा दें, पता नहीं। गुरु वसिष्ठ ने राम के अभिषेक का मुहूर्त निकाल कर दशरथ को ऐसा फँसाया कि बेटा राम तो वनवास गया ही, खुद भी स्वर्ग को चल दिए। गुरु की इस महिमा के बावजूद भी शिष्य तब तक फंसा रहता है जब तक उसे कोई दूसरा गुरु नहीं मिलता। गुरु बिना गत नहीं। वैसे आजकल के चेले भी बड़े गुरु हो गए हैं, द्रोणाचार्य का अंगूठा काटने की फिराक में रहते हैं।

गुरु बोले, हे वत्स, यह अच्छा है कि तू इन काले बालों से छुटकारा लेने की सोच रहा है। तू वयोवृद्ध तो था ही, अब बालवृद्ध भी हो जा। अब तक तेरा शरीर दुर्बल हो चुका है, इंद्रियां शिथिल हो चुकी हैं, पर जानता हूं कि तेरा मन जवान है। तेरी वायवी दृष्टि मद्धम पड़ गई है पर नारी सौंदर्य को परखने वाली तेरी दृष्टि मेरी तरह एक्स-रे दृष्टि है। तू किसी भी दृष्टि से देख, सफेद बाल सुंदर नारी को भ्रमित रखते हैं और वह भी आवश्यक्तानुसार उनका पान करती है। यदि उसने तेरी दृष्टि के सौंदर्य को परख लिया तो वह साहित्य में अपने विकास के लिए तेरे शयनकक्ष की शोभा बढ़ाएगी अन्यथा चरण छूकर आशीर्वाद ले लेगी। काले बाले वाले से आशीर्वाद लेना असंगत लगता है। सफेद बाल साहित्य गोष्ठियों मे अध्यक्ष पद और किसी पुरस्कार समिति की अध्यक्षता सरलता से दिलवाते हैं। तू श्वेतकेश प्रक्रिया में संलग्न हो जा और मैं तुझे इस पथ पर प्रेरित करने के लिए छंगीकुमारी, मंगीकुमारी पुरस्कार समिति की अध्यक्षता प्रदान करता हूं।

- हे गुरुदेव, इस अध्यक्षता का क्या लाभ होगा?

- मुझे खेद है कि तुझे अभी तक साहित्यिक बाजार की समझ नहीं आई ?

- गुरुदेव, इसका मुझे भी खेद है कि बाजार के मामले में मैं अभी भी जड़ मूर्ख हूं। अब मैं श्वेतकेशी होने जा रहा हूं, मुझे ज्ञान दें।

- हे बालक, तू तो जानता ही है कि आज बाजार हर जगह हावी हो गया है, इतना हावी हो गया है कि उसके सामने सभी कुछ हल्का हो गया है। इंसान तक हल्का लगने लगा है। इंसान वस्तु नहीं है, पर इंसानियत वस्तु हो गई है जो मुखौटों के रूप में बिक रही है। चुनाव के दौरान तो इसकी माँग बहुत बढ़ जाती है। अब जिस व्यवस्था में धर्म, नैतिकता और शिक्षा जैसी ‘वस्तुएं’ होल सेल में बिक रही हों। उसमें इंसानियत तो बिकेगी ही। और जब इंसानियत बिकेगी तो उसकी चिंता करने वाला साहित्य क्यों नही बिकेगा। आजकल बाजार अपने यौवन पर है। यौवन जब हावी होता है तो उसके सामने माता-पिता, समाज आदि सभी हल्के हो जाते हैं और यदि भारी कोई होता है तो केवल प्रिय। तू भी साहित्य को ऐसा ही प्रिय जान और उसे बेच-खरीद। अब ये तो हो नहीं सकता कि लेखक जिस समाज की चिंता करता है वह मॉल संस्कृति तथा बॉर बालाओं का आनंद ले रहा हो, काले धन से अपना जीवन उज्ज्वल कर रहा हो और लेखक किसी झोपड़ी में बैठा ढिबरी की रोशनी में साहित्य रचना कर रहा हो। अब तो हे वत्स, हिंदी साहित्य और भाषा डॉलर और पाउंड का ठप्पा लगाए घूम रहे हैं और तू इक्कनी-दवन्नी के युग में जी रहा है।

इतने में एक युवा साहित्यकार ने दरबार में प्रवेश किया, उसके साथ एक सुंदर बाला भी थी। वह सीधे गुरुदेव के पास पहुंचा, स्वयं तो चरण नहीं छुए पर चरणों पर स्कॉच की दो बोतलें रख दीं। गुरुदेव की बांछें खिल गईं और जब बाला ने समीप पहुंच कर हाथ मिलाया तो गुरुदेव के हाथ समेत सभी अंग खिल गए।

जैसी दृष्टि पार्टी की हाई कमांड की होती है वैसी ही तिरछी दृष्टि गुरुदेव ने बाला की ओर एवं मुस्कान युवा साहित्यकार की ओर बिखेरते हुए कहा - तुम पहली बार दरबार में आए हो पर तुम्हारा आत्मविश्वास कह रहा है कि तुम इसके रगो-रेशे से वैसे ही वाकिफ हो जैसे अमेरिका हर देश के रगो-रेशे से वाकिफ है। इसलिए बिना भूमिका के अपना मकसद कहो।

- आप निश्चित ही गुरु होने योग्य हैं। आपके पास उस डॉक्टर की दृष्टि है जो मरीज की जेब को एक नजर में परख लेता है और उसके आधर पर ही इलाज करता है। मैं अमेरिका में पिछले दस वर्ष से रहा हूं और जैसे ईश्वर का दिया होता है वेसे ही अमेरिका का दिया मेरे पास बहुत कुछ है। मैं कविता, कहानी लिखता हूं पर मेरे लिखे को लोग मजाक की तरह लेते हैं। मैं आपके माध्यम से साहित्य की मुख्य धारा में आना चाहता हूं।

- हूँ... गुरुदेव ने बाला की ओर देखते हुए कहा, और ये कौन है तुम्हारे साथ - तुम्हारी पत्नी या प्रेयसी...

- दोनो में से कोई नहीं, यह मेरी प्रशंसिका है। और आप तो जानते ही हैं कि पत्नी और प्रेयसी बहुत डिमांडिंग होती हैं और प्रशंसिका आत्मसर्मपिता होती है। मैं केलिफोर्निया से जब भी भारत आता हूं यह साये की तरह मेरे साथ होती है और इसका पति टूर पर होता है। यह वर्ष में एक बार अमेरिका यात्रा करती है। मैंने पत्नी जैसा रोग नहीं पाला हुआ है।

गुरुदेव की आंखों में वैसी ही चमक थी जैसी धनाढ्य मुवकिल्ल को देखकर वकील की होती है। वे बोले, तुम्हारा वर्णन बहुत रसपूर्ण है, तुम अपनी अन्य योग्यताओं का भी वर्णन करो।

- मैं बहुत शीघ्र ही अमेरिका में हिंदी साहित्य एवं साहित्यकारों को समृद्ध करने के लिए 1000 डॉलर का पुरस्कार आंरभ करने जा रहा हूं। पुरस्कार विजेता एक सप्ताह तक हमारे खर्चे पर अमेरिका यात्रा करेगा। उसके साहित्यक योगदान को रेखांकित करने के लिए यहां से दो विद्वान जाएंगे। इसकी पुरस्कार समिति के अध्यक्ष की तलाश है, और...

-- बस, बस हे प्रतिभावान युवक, मैं तुम्हारी प्रतिभा को पहचान गया हूं। तुम्हारे जैसे युवा का मुख्य धारा में आना हिंदी साहित्य को समृद्ध करेगा। यह कुमार संपादक हैं जो जल्दी ही तुम पर केंद्रित अंक निेकालेंगे, यह कुमार आलोचक हैं जो तुम पर आलेखों का प्रबंध करेंगे, यह कुमार प्रकाशक हैं जो तुम्हारी पुस्तक प्रकाशित करेंगें और यह कुमार आयोजक हैं जो इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में रंसरंजनपूर्ण साहित्यिक आयोजन में तुम्हारी पुस्तक का लोकार्पण करवाएंगे।

एक मुनीम-से व्यक्ति की ओर संकेत कर गुरुवर ने कहा, ‘यह कुमार हिसाबी-किताबी हैं जिन्हें तुम स्पांसर राशि जमा करवा देना। अब जाओ और अपने समान युवाओं को किसी प्रेस क्लब में ले जाओ और इनके आनंद का प्रबंध करो। ये ही तुम्हारे भविष्य के साथी हैं और तुम्हारी गोष्ठियों को अपनी उपस्थिति से समृद्ध करने वाले।’

दरबार बर्खास्त हो गया।

मैं बाहर आया तो एक युवा मेरे पास आया और बोला, बधाई हो, आप पुरस्कार समिति के अध्यक्ष बन गए हैं। अगला पुरस्कार तो आप मुझे दिलवा ही सकते हैं।’

मैंने उसका नख शिख दर्शन करते हुए पूछा - तुम्हारी मुख्य योग्यता क्या है?’

- मैं विदेश मंत्रालय में हिंदी अधिकारी नियुक्त हुआ हूं। आप विदेशों में हिंदी की सेवा मेरे माध्यम से जितनी चाहें कर सकते है।’

मैंनें पुनः उसका नख शिख दर्शन किया, वह सुदर्शन लग रहा था। मैंने पूछा, तुम्हारा साहित्यिक योगदान?’

- आप पुरस्कार पक्का करें, साहित्यिक योगदान मैं दूं या अपने नाम से किसी से करवाऊं, वह मेरी जिम्मेदारी है।

मैं मुस्कराया, श्वेतकेशी मुकुट का मन ही मन आभार माना और कहा - तथास्तु!


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