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कहानी

ऊँचाई
दिनेश कर्नाटक


थकान की वजह से पहले तो देर रात तक नींद नहीं आई। और जब नींद आई तो सुबह-सुबह घंटियों और कुत्ते के भौंकने की आवाज से चैंककर उठने पर 'कहाँ हूँ,' 'किस हाल में हूँ' कुछ समझ में नहीं आया था। बाहर अँधेरा था, जिसे देखकर मैं फिर से तानकर सो गया।

अगली बार जब आँख खुली तो बाहर उजाला हो चुका था।

वे गुफा के बगल में बने चबूतरे में ध्यानमग्न होकर बैठे थे।

तभी जोर की गर्जना हुई थी। जैसे पहाड़ टूटकर नदी में गिरा हो। मैं तेजी से बिस्तर से निकलकर आवाज की दिशा की ओर को दौड़ा। नदी का पानी काफी ऊपर उठने के बाद नीचे की ओर लौट रहा था। सामने के पहाड़ से मिट्टी के साथ पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े नदी में गिर रहे थे।

उस गर्जना ने मेरे साथ चले आए शोर को मिटा दिया था।

अचानक एक अजीब सी शांति ने घेर लिया।

और मैं सामने के पहाड़ और नीचे बहती हुई गोरी को देखने लगा।

लग रहा था जैसे किसी ने सिनेमा के परदे से चादर हटा दी हो।

पहले कोहरा नदी के ऊपर उठता हुआ दिखा। फिर पहाड़ के गालों को सहलाते हुए बर्फ से ढकी चोटियों में समा गया। धीरे-धीरे घाटी का धुँधलापन समाप्त हो गया और वह रोशनी से दमक उठी। तब जो दृश्य दिखा वह अपूर्व था। बर्फ जैसे सफेद बादल, नीला आसमान... बिल्कुल साफ और नीला! ऐसा आसमान मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा था। पागलों की तरह उसे निहारता रह गया।

'हो सकता है, इससे पहले आसमान ने कभी ऐसा रूप ही न धरा हो।' मैंने सोचा था। फिर लगा, ऐसा कैसे हो सकता है कि आसमान ने कभी पहले ऐसा रूप न धरा हो?

सच तो यह है कि मुझे आसमान की ओर देखना कभी जरूरी ही नहीं लगा था।

देखते ही देखते काले बादलों ने सफेद बादलों को खदेड़ दिया। काले बादल झुंड की शक्ल में चारों दिशाओं से आकर घाटी के ऊपर फौजियों की तरह इकट्ठा हो रहे थे। अचानक अँधेरा घिर आया। बादलों ने सूर्य को निगल लिया था। हल्की-हल्की... रिमझिम-रिमझिम बारिश होने लगी थी।

फिर मैं सामने पहाड़ के सीने में झालरों की तरह लटके हुए दूधिया झरनों की ओर देखने लगा। उनका जल... उछलता-कूदता... गोरी के गेरुए पानी में गिरकर विलीन होता जा रहा था। गोरी कभी चट्टान से टकराती, कभी एकाएक सामने आए ढलान पर झरने की तरह गिरती तो कभी लहरों की तरह ऊँचा उछलती!

अचानक पीछे से उनकी 'चाय!' की आवाज से मैं चौक उठा था।

वह एक पुरानी और खटारा किस्म की जीप थी, जिसमें भूसे की तरह लोग ठुँसे हुए थे। जीप की हालत देखकर मैं घबरा गया था। मुझे टैक्सी स्टैंड में पहुँचने में देर हो गई थी। यह वहाँ के लिए पहली जीप थी। ड्राइवर मेरी मनःस्थिति को समझ गया और इशारा करके मुझे अपनी ओर बुलाने लगा। मैं दुविधा में जहाँ था, वहीं का वहीं रह गया। मैंने मन ही मन सोचा, जल्दी क्या है दूसरी जीप में चला जाऊँगा। कम से कम ऐसी हालत में तो नहीं जाऊँगा।' फिर मुझे उसका इस तरह इशारे करके बुलाना भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसे मेरी परेशानी समझने में ज्यादा समय नहीं लगा।

वह मेरे करीब आकर बोला, 'आप को घुघत्याड़ी जाना है?'

'गुफा महादेव!'

'हाँ-हाँ उसके लिए आपको घुघत्याड़ी जाना होगा फिर वहाँ से चार-पाँच किमी का पैदल रास्ता है!'

'वो तो मुझे पता है लेकिन तुम्हारी जीप में जगह कहाँ है?'

'जीपें तो सभी ऐसी मिलेंगी। वहाँ के लिए तीन ही जीपें हैं। रास्ता खराब है, इसलिए और कोई वहाँ जाना नहीं चाहता। आपके लिए तो अभी जाना ही ठीक रहेगा। बाद वाली में वहाँ पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो जाएगा। एक बार बैठकर देख लो! ठीक लगे तो चलना वरना जैसी आपकी मर्जी!'

मैं उसकी सेल्समैनशिप से प्रभावित हुआ और उसके पीछे हो लिया।

'जगह कहाँ है?' मैंने उससे पूछा।

उसने आगे की सीटों पर बैठे हुए लोगों को खिसकाकर मुझे अपने बगल में बैठने को कहा।

'मगर जगह कहाँ है?' मैंने उसकी सूरत देखते हुए कहा था।

'बैठो तो सही! इतनी जगह पर तो दो आदमी बैठते हैं!' वह हार मानने को तैयार नहीं था।

जीप के अंदर बैठै हुए लोगों को शायद मेरे सवाल पसंद नहीं आ रहे थे, तभी वे सब मुझे अजीब नजरों से देख रहे थे। बहरहाल ड्राइवर जो-जो कहता रहा मैं वैसा-वैसा करता गया।

'अब बताइए ठीक है, ना! इससे अच्छी व्यवस्था मैं नहीं कर सकता। ज्यादा आराम चाहिये तो आपको गाड़ी किराए में लेनी होगी!'

अकेले जाने के लिए गाड़ी किराए में लेने में मुझे कोई तुक नजर नहीं आ रहा था। वैसे ही घर से निकले हुए यह मेरा दूसरा दिन था। दिनभर के सफर के बाद शाम को पिथौरागढ़ पहुँचा था। टेढ़े-मेढ़े, ऊँचे-नीचे रास्ते में सीट पर उछलते-कूदते हुए शरीर ने जवाब दे दिया था।

जिस जीप में तिल रखने की जगह नहीं थी, उसमें मेरे लिए भी जगह निकल चुकी थी।

ड्राइवर सीट से आधा बाहर निकला हुआ था।

मैं पहाड़ में होने वाली दुर्घटना की खबरों के बारे में सोचने लगा था, जो प्रायः अखबारों में आया करती थी। 'इन फटीचर जीपों में इसी तरह सवारियों को भरा जाएगा तो इन लोगों का भगवान ही मालिक है!'

मैं दोनों ओर से दबा हुआ था। फिलहाल मुझे कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। इसकी वजह शायद यह थी कि मैंने परिस्थितियों को सहर्ष स्वीकार कर लिया था। यह भी समझ में आ गया था कि अगर इन जीपों से जाना है तो ऐसे ही जाना होगा।

एक-दो को छोड़कर सभी सवारियाँ घुघत्याड़ी की थी। कोई खरीददारी करके तो कोई लाला-बनिए से अपनी उपज का हिसाब करके तो कोई किसी को अस्पताल में दिखा कर ला रहा था। सभी आपस में इस तरह मिलने से खुश थे और एक-दूसरे के हालचाल पूछने तथा रोजमर्रा की बातों में मशगूल थे।

चार-पाँच किमी के बाद कोई न कोई छोटी-मोटी आबादी वाला गाँव नजर आ जाता था। कई जगह रोड के किनारे चाय और राशन की दुकानों से आस-पास गाँवों के होने का अंदाज होता था। काफी दूरी तय करने और एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ की ओर ले जाती सर्पाकार सड़क को पीछे छोड़ने के बाद जीप कच्ची और संकरी सड़क की ओर मुड़ गई थी। रोड पर जगह-जगह गड्ढे थे, जिनसे बचते हुए ड्राइवर बड़ी कुशलता से जीप को दौड़ाए लिए जा रहा था। देर तक गोरी के किनारे सीधी रोड पर चलने के बाद जीप ऊँचाई की ओर चढ़ने लगी। दूर-दूर तक आबादी का कोई चिह्न नजर नहीं आ रहा था। जीप हरी-भरी वनस्पतियों तथा घने पेड़ों से आच्छादित जंगल से गुजर रही थी। रोड के एक ओर पहाड़ तो दूसरी ओर गहरी खाई थी। कुछ ही समय में हम काफी ऊँचाई में पहुँच गए थे। दूर-दूर तक विपरीत दिशा से आने वाली दो जीपों के पास होने के लिए जगह नहीं थी। अचानक कोई गाड़ी आगे आ जाए तब क्या होगा? सोचकर मैं मन ही मन घबरा उठा था।

ड्राइवर आराम से जीप को दौड़ाए जा रहा था। जबकि मेरा डर के मारे बुरा हाल था। पहिया दो-तीन फीट दाहिनी तरफ को खिसका नहीं कि समझो हो गया खेल खत्म। नीचे की ओर देखने पर काफी गहराई में पीछे छूटी हुई सड़क नजर आ रही थी। लग रहा था जैसे पहाड़ के पेट को चीरकर कोई रेखा खींच दी गई हो।

एक जैसी स्थिति में बैठे हुए शरीर दर्द करने लगा था। हिलने-डुलने की बिल्कुल भी गुंजाइश नहीं थी। आखिरकार ड्राइवर ने जब जीप को एक खोमचे के पास लाकर रोका तो बड़ी राहत महसूस हुई।

'आप को पहले कभी नहीं देखा...?' ड्राइवर ने उतरते समय पूछा था।

'मैं यहाँ पहली बार आ रहा हूँ! क्या तुम यहाँ आने वाले सभी लोगों को जानते हो?'

'यहाँ की आबादी ही कितनी है साहब! फिर लोगों से बातों ही बातों में जान-पहचान हो जाती है।'

'क्या त्यौहारों के अलावा भी लोग गुफा महादेव जाते हैं?'

'बस! गिने-चुने आठ-दस। वो भी जब से बाबाजी वहाँ रहने लगे हैं!'

'तुम बाबाजी को जानते हो?'

'हाँ, उनको यहाँ कौन नहीं जानता! रोज शाम के समय घुघत्याड़ी तक आते हैं! आप उनसे ही तो मिलने जा रहे हैं?'

'हाँ!' कहकर मैं पानी के धारे की ओर चल दिया।

स्रोत के ठंडे पानी ने छूते ही जादू का सा असर दिखाया था। मुँह-हाथ धोकर, पानी पीने के बाद मैं पहले जैसा नहीं रह गया था।

कुछ लोग खोमचे में बैठकर चाय पी रहे थे। रोड के किनारे चबूतरेनुमा जगह पर धूप और बारिस से बचने के लिए पुवाल की छत के नीचे ग्राहकों के बैठने के लिए कुछ बेंचे रखी हुई थी। खोमचा चारों ओर से खुला हुआ था। साफ लग रहा था, दुकानदार किसी पास के गाँव से आकर रोज दुकान सजाता होगा। भट्टी के बगल में मिट्टी और पत्थर से बनाए गए काउंटर में लोहे की कढ़ाई में आलू के गुटखे और जस्ते के डेक में छोले के अलावा कुछ सीसे के गिलास तथा बर्तन रखे हुए थे। खंभे में टंगे पालिथीन के थैलों में बन, बिस्कुट, गुटखे और बीड़ियाँ नजर आ रही थी। धुएँ से काली हो चुकी छत बारिस होने पर दुकानदार और उसके ग्राहकों को कितना बचाती होगी इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था।

चाय की काफी तलब महसूस हो रही थी लेकिन चाय में धुएँ की महक घुली हुई थी। एक-दो घूँट से ज्यादा नहीं पी सका।

सभी सवारियों के बैठने के बाद जब फिर से जीप ने आगे के सफर की शुरूआत की तो सभी सवारियों से परिचय जैसा हो गया था।

'जब से बाबाजी आए हैं उन्होंने गुफा महादेव को बदल कर रख दिया है। पहले गुफा के आस-पास की जगह घास-पात से भरी रहती थी। उस ओर जाने में डर लगता था। अब तो उन्होंने आने-जाने वालों के लिए एक कमरा और गुफा के आस-पास की उजाड़ जगह में सब्जी और फूलों की क्यारियाँ बना दी हैं। आबादी की ओर आते समय थैले में कुछ न कुछ रखकर ले आते हैं। चढ़ावे में आने वाले रुपये-पैसे मंदिर में लगाने के बाद आस-पास के गाँवों के गरीब बच्चों के कापी-किताबों में खर्च देते हैं। बेचारों का दिल बड़ा ही कोमल है। बच्चों और औरतों के फटे कपड़े देखकर तो उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं, किसी से मँगाकर या खुद ही लाकर चुपचाप उनको सौंप जाते हैं। लड़कियों की शादी में घर वालों की तरह किसी चीज की जिम्मेदारी ले लेते हैं।

'अपनी माँ की मौत की खबर सुनकर बेचारे बहुत दिनों तक दुखी रहे। कह रहे थे, माँ को कभी सुख नहीं दे पाया।' जीप के फिर से चलने के बाद पीछे की सीट में बैठी हुई एक बूढ़ी औरत ने बताया था।

'उनकी ही बात हो रही है या वहाँ कोई और रहने लगा है!' उनके बारे में यह सब सुनकर अचरज सा हुआ था।

सभी के पास उनका कोई न कोई किस्सा था।

पीछे की सीट में बैठा हुआ शराब पिया हुआ एक युवक जो काफी देर से अस्पष्ट सी आवाज में कुछ बड़बड़ा रहा था। अब जोर से बोलने लगा था - 'सब चालाकी है उसकी... पाखंडी है... कौन नहीं जानता है उसे... अल्मोड़े में जाकर किसी से पूछ लो उसके बारे में... शराब पीकर सड़कों में पड़ा रहता था... झगड़ा... गुंडा-गर्दी... बड़ा आया महात्मा बनने वाला... मेरे सामने मुँह नहीं खोलता... मैंने साफ कह दिया उससे... सबको चूतिया बना सकता है मुझे नहीं...!'

'क्यों रे, अभी तक पराई जगह में आवाज नहीं खुल रही थी... घर के नजदीक आकर भौंकने लगा...!' एक बुजुर्ग ने उसे डाँटा था।

'पहले अपने रंग-ढंग देख, फिर औरों की बात करना... समझा... गलती कौन नहीं करता... आदमी वो है जो अपनी गलती को मानकर... सुधरने की कोशिश करे...!' गाँव की अनपढ़ औरत से समझदारी की ऐसी बात सुनकर मुझे झटका सा लगा।

'काकी, तेरे हाथ में भी थमा दिए होंगे... उसने कुछ नोट-सौट... तभी उसका इतना गुण़गान कर रही है!' उसने कहा।

'फिर तेरे को दारू पीने के लिए पैसे थोड़ा देंगे वो!'

जीप घुघत्याड़ी में जाकर रुक गई थी। वहाँ पहुँचकर ऊँचाई में शिखरों के बीच में होने का एहसास हो रहा था। नीचे घाटी की ओर सड़क को देखते हुए यकीन नहीं हो रहा था, जीप वहीं से होते हुए यहाँ तक आई है। मैं देर तक सामने के नजारे को देखता रह गया था। सामने ही एक दुकान थी, जिसके आस-पास कई लोग इकट्ठा थे। पास ही पानी का एक धारा था। बैग को एक ओर रखकर सबसे पहले प्यास बुझाने का निर्णय लिया। दुकान में खड़े लोग ध्यान से मेरी ओर देख रहे थे। इससे पहले की मैं किसी के पास जाकर आगे के रास्ते के बारे में पूछता। भीड़ से निकलकर कोई अचानक से मेरे सामने आकर खड़ा हो गया था। मैं कुछ समझता इससे पहले वह बोला था, - 'अरे चंदू, मुझे पहचान नहीं रहा है!'

दुबला-पतला शरीर, गेरुए वस्त्र और छाती तक लहरा रही घनी दाढ़ी के पीछे छिपे चेहरे को गौर से देखते हुए मैं चौंक गया था, - 'अरे दाजू, तुम हो! तुम तो बिल्कुल भी पहचाने नहीं जा रहे हो। कितने कमजोर हो गए हो!'

मैं उनके पैरों में झुक गया था।

'घर में सब ठीक हैं?' उन्होंने भारी आवाज में पूछा था। शायद वो भावुक हो गए थे।

लोगों के जरिए पता चला था कि संन्यास लेने के बाद अब वे कभी घर नहीं आएँगे। लेकिन रिश्तों को क्या इतनी आसानी से भुलाया जा सकता है? मैंने भी तो तय किया था, उनसे कभी बात नहीं करूँगा। लेकिन क्या आज मैं खुद ही उनके पास चला नहीं आया था?

इस बीच वे दुकान में चले गए थे। लोगों ने उनको घेर लिया था। उन्होंने उनको मेरे बारे में बता दिया होगा। छोटी जगह में किसी आदमी का आना ही कितने कौतुहल का विषय बन जाता है। लोग फिर से मेरी ओर देखने लगे थे।

'कुछ लेना तो नहीं है?' उन्होंने वहीं से मुझसे पूछा था।

'नही तो, आपको कुछ लेना है!' मैं बटुए से पैसे निकालकर उनके करीब चला गया था। उन्होंने पैसे लेने से इंकार कर दिया था।

'चलो!' उन्होंने कहा तो एक लड़के ने आकर मेरा बैग पकड़ लिया था।

'यहाँ से कितना होगा?' मैंने उनसे पूछा था।

'यहीं कोई चार किलोमीटर!'

वे हमेशा की तरह तेज कदमों से चले जा रहे थे। पगडंडी कभी, सुनसान पहाड़ से गुजरती तो कभी किसी के घर के पीछे से होते हुए क्यारियों के किनारे-किनारे खेतों की ओर को जाने लगती थी। वे मुझसे दूर होते जा रहे थे। उनके करीब जाने के लिए कई बार मुझे दौड़ना पड़ रहा था।

वर्षों के अबोले को हम दोनों ने तोड़ दिया था। पहले भी कभी अबोला होने पर मैं उनसे किसी न किसी बहाने से बोल जाया करता था। मुझे लगता था, बातचीत के जरिए हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। लेकिन इसके लिए खुले दिमाग के साथ दूसरे की सही बातों को मानने की हिम्मत भी होनी चाहिए। उन दिनों जब आए दिन उनका पिता के साथ किसी न किसी बात पर विवाद हो जाता था तो मैं उनसे कितना कुछ कह देता था। 'पिताजी, तुमसे तुम्हारी भलाई के लिए ही तो कहते हैं। तुम ऐसा कर सकते हो... तुम वैसा कर सकते... उस काम में कितनी संभावना है!'

वे मुझे डपट दिया करते थे, 'तू मेरा बाप बनकर मुझे समझाया मत कर!'

उनकी डाँट सुनकर, मैं खिसिया जाया करता था।

'तुम्हारे भले के लिए ही तो कह रहा हूँ!

'अपने भले की सोचा कर! बड़ा आया मेरे भले की चिंता करने वाला!' वे मुझे हड़काकर चुप करा दिया करते थे।

उनको लगता था, न तो मैं उनकी बातों को समझने के लायक हूँ और न ही उनको सलाह देने के लायक। हालाँकि सलाह वे किसी की भी नहीं मानते थे। जो करते थे, जल्दी ही उससे उकता जाते थे। कितनी नौकरियाँ और कितने तरह के काम करके उन्होंने बीच में छोड़ दिए थे। फिर उसी दौरान शराब पीने लगे थे। पहले माँ और बाबूजी का लिहाज किया करते थे। धीरे-धीरे वह भी खतम हो गया। बाद में तो अपनी असफलताओं के लिए पूरे परिवार को दोशी मानने लगे थे।

बाद में मैं जब नौकरी के लिए बाहर चला गया तो माँ मुझे घर की खबर देते रहती थी, 'तेरे बड़े भाई की वजह से हर समय घर में तनाव और बहस का माहौल बना रहता है। समझ में नहीं आता क्या करें? हम उससे जो कहना चाहते हैं वो उसकी समझ में नहीं आता और जो वो कहता है हमारी समझ में नहीं आता। हमारे वहाँ तो कभी कोई लड़ने-झगड़ने वाला नहीं रहा, फिर इसमें किसका असर पड़ा होगा? कौन इसको हम लोगों के खिलाफ भड़का रहा होगा?'

मैंने माँ को लिखा था, 'अब इस समस्या का इलाज यही है कि आप लोग उनसे बहस करना बंद कर दो।'

हर बार घर आकर मैं उनसे बातें करता। उनके पास काम छोड़ने और लोगों के घटियापन की अनगिनत शिकायतें होती थी। मैं उनसे कहता, जीवन हमारी जिद और सोच के हिसाब से नहीं चलता, जीने के लिए हमें कई समझौते करने पड़ते हैं। वे मुझे 'तू मुझे मत समझा हाँ!' वाली नजरों से देखते और मैं चुप लगा जाता। कई बार मैं उनके लिए अपने आस-पास नौकरियाँ खोजकर लाता था, जो उन्होंने हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर खारिज कर दी थी।

जब वे बंबई में एक नौकरी में स्थिर हो गए लगे थे तो पिताजी ने उनकी शादी की बात चलाई थी। उनको लगा था, शादी करने के बाद बीवी-बच्चों की जिम्मेदारी पड़ने पर वे सुधर जाऐंगे। हम दोनों लड़की देखने गए थे। उनकी शादी के बारे में सोचकर मैं काफी खुश हो रहा था। लड़की के घर जाने से पहले मुझे चाय की एक दुकान में बैठाकर वे कुछ देर के लिए कहीं गायब हो गए थे। लौटे तो लड़खड़ा रहे थे। बदबू को छिपाने के लिए हमेशा की तरह उन्होंने पान खाया हुआ था।

'दाज्यू, ऐसे उनके वहाँ जाना ठीक होगा क्या?'

'कैसे जाना ठीक होगा, क्या हो गया?'

'लड़की वाले क्या सोचेंगे?'

'तू अपना मुँह बंद कर!'

लड़की के घर में पहुँचकर हमारी खूब आव-भगत हुई। घर में लड़की की बूढ़ी माँ और कुछ बच्चे थे। मैंने काफी राहत महसूस की थी। जल्दी ही मैं उन बच्चों के साथ घुल-मिल गया था। और तो और अंदर वाले कमरे में तैयार हो रही लड़की को भी देख आया था। जोश में आकर उससे 'भाभी' भी कह दिया था।

लेकिन जब चाय-पानी के दौरान बुढि़या और लड़की से उनका आमना-सामना हुआ तो उनके व्यवहार से मुझे काफी शर्मिंदगी महसूस हुई थी। उनके सवालों के जवाब या तो वे दे ही नहीं रहे थे, अगर दे भी रहे थे तो कुछ ऐसे अंदाज में मानो शादी के लिए लड़की देखने न आकर झगड़ने के लिए आए हों! मेरी हालत ऐसी हो रही थी कि धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊँ!

बहरहाल शादी का जो होना था वो हुआ!

लेकिन वहाँ बात न बन सकने का सारा दोष उन्होंने मेरे ऊपर डाल दिया था।

लड़की वाला की ओर से कोई भी पूछताछ न होने के बाद वे फिर से पुरानी लय में लौट आए थे।

तभी मेरे पास वह खबर आई थी, जिससे मैं स्तब्ध रह गया था। किसी बातचीत में पिताजी के डपटने पर अपना आपा खोकर उन्होंने पिताजी पर हमला कर दिया था। बीच-बचाव करने के लिए आगे आई माँ को धक्का दे दिया था, जिससे उसका सिर पत्थर से जा लगा था।

इसके बाद से उन्होंने घर में आना छोड़ दिया था। कभी आते भी थे तो कोई उनसे बात नहीं करता था। उन दिनों जबकि सब उनसे नाराज थे, मैं उनको ढूँढ़-खोजकर घर लिवा लाता था। उस दौरान मैंने उनसे कभी भी किसी पिछली घटना के बारे में बात नहीं की थी। एक-दो दिन रहकर वे फिर से अपनी दुनिया में लौट जाया करते थे।

घर में उनके प्रति किसी के मन में किसी भी तरह का लगाव नहीं बचा था। सभी को लगता था किसी भी दिन कहीं से भी उनके बारे में किसी भी तरह की खबर आ सकती है। हम सबने अपने आप को उस दिन के लिए तैयार कर लिया था।

तभी वह खबर आई थी जिसने हम सबको चौंकाकर रख दिया था।

उन्होंने संन्यास ले लिया था और हिमालय से निकलने वाली गोरी नदी के सामने गुफा महादेव को अपना बसेरा बनाया था।

लंबे समय से उनसे मिलने के लिए बेचैन था, लेकिन कभी मौका नहीं बन पाया था।

अजीब जगह थी यह! जहाँ पहुँचने के लिए पहले पहाड़ की चोटी में जाओ फिर घाटी की ओर उतरो। पहाड़ के पीछे की ओर पहुँचकर लग रहा था, मानो किसी और ही दुनिया में पहुँच गया हूँ।

ज्यों-ज्यों हम आगे बढ़ते जा रहे थे, रास्ता खतरनाक होता जा रहा था। छोटी सी भूल का अर्थ था, नीचे बह रही गोरी नदी में जल समाधि!

'रात को नींद आई की नहीं... ठंडा लगा होगा!'

'थकान थी... नींद बाद में आ गई थी!'

'कुछ दिन रुकेगा!' उन्होंने प्रश्न किया था।

'कल सुबह चला जाऊँगा। घर अकेले ही आया था। सोचा लगे हाथ आप से भी मिल आऊँगा!'

'सुबह जल्दी निकलना होगा। पिथौरागढ़ समय से पहुँचने पर अल्मोड़ा के लिए कोई साधन मिल सकता है।'

वे गुफा से लगे हुए कमरे की ओर चले गए थे। उसी में उनकी रसोई थी। कमरा उस जगह के लिहाज से ठीक-ठाक था। दरी और कंबल की व्यवस्था थी, जो रात में जाड़े से बचने के लिए नाकाफी साबित हुए थे। कंबलों को कसकर ओड़ने के बावजूद ज्यों-ज्यों रात गहराती गई थी, ठंड अधिक से अधिक हमलावर होने लगी थी। हालाँकि उन्होंने गुफा में जलती हुई धूनी के करीब सो जाने को कहा था, लेकिन उस संकरी सी जगह में मुझे घुटन सी महसूस हुई थी और मैं दिए को जलाकर उसी कमरे में सो गया था।

गाँव वाले ठीक कह रहे थे। उन्होंने गुफा के आस-पास की जगह को रहने लायक और सुंदर बना दिया था। हर तरफ साफ-सफाई थी। रसोई में तेल का एक पूरा कनस्तर था, जो उन्होंने बताया, किसी भक्त ने भिजवा दिया था। बरतन और खाने-पीने की चीजें पर्याप्त मात्रा में नजर आ रही थी। रसोई लीपी हुई थी। सामने के बाड़े में खीरे और कद्दू की बेलें नजर आ रही थी।

'पहले कुछ नाश्ता बना देता हूँ, बाद में खाना खा लेगा!'

'खाना ही बना दो... दो-दो चीजों के लिए परेशान क्यों होते हो!' और मैं निवृत्त होने के लिए पास के पानी के स्रोत की ओर चला गया था।

खाना-खाने के बाद मुझ पर नशा सा छा गया और मैं लेट गया। वे पास की ऊँची-नीची जगह को समतल बनाने के काम में लग गए थे। कुछ ही देर में मुझे नींद आ गई थी। यह नींद काफी अच्छी थी। उठा तो वे आस-पास नहीं थे। आँगन के एक ओर पत्थरों से बनायी गई मुंडेरनुमा जगह पर बैठ गया।

अँधेरा होते-होते मैं उस जनविहीन जगह से ऊब चुका था। शायद लगातार लोगों के बीच रहने की आदत से ऐसा हुआ होगा। जबकि वे अकेले उस जगह में रह रहे थे। साथ के नाम पर टॉमी उनके साथ था। दोनों के बीच एक खास तरह की अंतरंगता थी, जिसका एहसास मुझे वहाँ पहुँचने के कुछ ही समय बाद हो गया था। टॉमी 'चूँ... चूँ' करके उनसे अपनी बात कह दिया करता था, जिसे वे समझ जाया करते थे। उसको समय से खाना-पीना देने के अलावा वे उसके साथ न जाने क्या-क्या बातें करते रहते थे? उन्होंने बताया था, जाते समय वे उसे वहाँ की रखवाली के लिए छोड़ जाया करते थे। काम करते समय वे उसे चैन से बाँध दिया करते थे। बंधन से मुक्त होते समय उसकी खुशी देखते ही बनती थी। वह कुछ देर तक तेजी से इधर-उधर दौड़ता फिर लौटकर उनके इर्द-गिर्द आकर बैठ जाता।

'टॉमी, पानी पी ले!' वे उससे कहते और वह सचमुच पानी पीने चले जाता था।

वे उसके पानी पीते समय मुस्कराकर मेरी ओर देखते थे।

'आपकी सारी बातें समझता है!'

हाँ, कुत्ते और इनसान का भी कमाल का रिश्ता होता है।'

'क्या यहाँ आपके साथ कोई और नहीं रह सकता!'

'कुछ लोग आए थे लेकिन हर आदमी अपनी तरह से जीना चाहता है। साथ बन नहीं पाता!'

'अब तो आपकी यहाँ की साधना पूरी हो गई होगी। घर के आस-पास भी तो रहा जा सकता है!'

'इतने समय अकेले रहने के बाद मालूम हुआ है, अकेले रहने का क्या आनंद है? कभी शहर की ओर जाता हूँ तो वहाँ समय काटना मुश्किल हो जाता है। सब कुछ बनावटी-बनावटी सा लगता है!'

'यहाँ के लोगों की आपके बारे में बड़ी अच्छी राय है। बड़ी तारीफ करते हैं आपकी!'

'तू तो मेरे बारे में सब जानता है। मैंने उनको भी अपने बारे में सब बता दिया है। त्यौहार के मौकों में यहाँ दूर-दूर से लोग आते हैं। शुरू में लोगों को लगा था, मैं इस जगह पर कब्जा जमाने की मंशा से यहाँ आया हूँ। अपनी जरूरत के अलावा मुझे और क्या चाहिए? एक बार एक जरूरतमंद के हाथ में मैंने कुछ पैसे रख दिए, उसके बाद मैंने अपने प्रति लोगों का व्यवहार काफी बदला-बदला सा देखा। तभी से यह शुरूआत हुई। समझ में आया कि जिंदगी में देना कितना जरूरी होता है।'

'कब्जा तो आपने यहाँ जमा ही लिया है। सच कहूँ तो जब मैंने आपके इस कदम के बारे में सुना तो मुझे अच्छा लगा। इस तरह से गिरते हुए संभल जाना मामूली बात नहीं है।'

'अब तक मैं भटकता रहा, अब एक जगह टिककर रहना चाहता हूँ! मैं नहीं जानता मेरी यह कोशिश सफल होगी की नहीं!'

'बदलाव तो इनसान की फितरत में है और यह कोई बुरी चीज नहीं है। दिशा और दृश्टि हो तो बदलाव अच्छा रहता है, वरना...!' अचानक मुझे याद आया उन्हें मेरा 'स्पेशलिस्ट कमेंट' देना पसंद नहीं है।

मैंने बातों का विषय बदल दिया और हम आस-पास के गाँवों तथा लोगों के बारे में बात करने लगे। घर के बारे में न उन्होंने ही कोई जिज्ञासा प्रकट की और न मैंने ही कुछ कहा। मैंने गौर किया, घर की बातें उनको असहज कर रही थी। उन्होंने बताया, इस गुफा से शिव का नाम इसलिए जुड़ा है क्योंकि लोगों में मान्यता है कि हिमालय से आते-जाते शिव इसी गुफा में ठहरा करते थे।

'हमारे वहाँ लोगों को किसी जगह खींचने का यह सबसे अच्छा तरीका है!' मैं कहने से अपने को रोक नहीं सका।

'तू अभी भी नहीं बदला! तभी तुझे जब देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ था कि तेरे जैसा आदमी यहाँ कैसे पहुँच गया!' उनकी बात में तल्खी थी।

'मैं यहाँ आपसे मिलने आया हूँ न कि अपना परलोक सुधारने!'

मेरी बात के पहले हिस्से से उन्हें खुशी हुई थी, बाकि बातों की प्रतिक्रिया में उन्होंने टॉमी को आवाज देना शुरू कर दिया। उनकी पुकार सुनते ही टॉमी जोर-जोर से 'चूँ-चूँ' करने लगा।

सुबह उन्होंने मुझे जल्दी उठा दिया। हमारे चलते समय चारों ओर अँधेरा पसरा था। पूरव की ओर से किसी पहाड़ी के पीछे हल्का सा उजाला फूटता हुआ दिख रहा था। मुझे सँभलकर चलने की ताकीद देकर वे मेरे आगे-आगे चले जा रहे थे। कुछ दूर तक सीधे चलने के बाद चढ़ाई चढ़ना मुश्किल लगा था। कई बार तो मैं काई लगे पत्थरों से गिरते-गिरते बचा था।

विदा लेते समय मैंने उनके हाथ में कुछ रुपये रख दिए थे।

'ये आपके काम आएँगें!'

'मैंने तुम सब की सुख-शांति और समृद्धि के लिए पाठ कर दिया है और वैसे भी ये सब मैं घर के लिए कर रहा हूँ!' रुपयों को जेब में रखते हुए उन्होंने कहा था।

उनकी बात सुनकर मैं चौंका था। उनके कहे के जवाब में बहुत कुछ कहने का मन हो रहा था लेकिन मैंने चुप रहना ही ठीक समझा था।

'मेरे लायक कोई और काम हो तो बताना!'

'यात्रियों के लिए पानी का टैंक और ठहरने के लिए एक कमरा और बनाना चाहता हूँ। वैसे तो कई लोगों ने सहयोग का भरोसा दिया है। तुम जो कर सको!'

'मैंने यात्रियों नहीं आपके बारे में पूछा था!'

'रोशनी की दिक्कत हो जाती है। सोच रहा था, एक गैस का पैट्रोमैक्स हो जाए तो आराम हो जाता!'

'मेरा यहाँ आना अब न जाने कब हो। आप मँगा लेना!' मैंने जेब से कुछ और रुपये निकालकर उनकी ओर बढ़ा दिए।

लौटते हुए ज्यो-ज्यों मैं शिखरों से उतरता जा रहा था, रास्ते भर दिमाग में कई बातें आ-जा रही थी। मैं सोच रहा था, कुछ समय बाद मैं फिर से भागते-दौड़ते, पसीना बहाते, लड़ते-झगड़ते दूसरे को पछाड़ने में लगे लोगों की भीड़ में शामिल हो जाऊँगा जबकि वे हम सब से अलग अकेले उस ऊँचाई में रह जाएँगे।

घर पहुँचा तो पिता ने उनके बारे में जानने में कोई विशेष उत्साह प्रकट नहीं किया था। घर वाले मेरी यात्रा के बारे में सवाल कर रहे थे। माँ होती तो सबसे पहले उनके बारे में पूछती। उसका पहला सवाल उनके खाने-पीने के बारे में होता। 'क्या खाता है, खाता भी है कि नहीं! राशन-पानी की व्यवस्था कैसे होती है?'

'वहाँ भी वो ही रंग-ढंग होंगे। पराई जगह है कोई मार-मूर रखेगा किसी दिन!' रात को खाते समय उनके बारे में बताने के दौरान पिता ने रूखे अंदाज में कहा था।

'वहाँ के लोग उनकी काफी इज्जत करते हैं। कुछ ही सालों में उन्होंने वो मुकाम हासिल कर लिया है जिसे हमारे जैसे लोग पूरी उम्र बिताकर भी प्राप्त नहीं कर सकते।'

उन्हें यकीन नहीं हुआ - 'अच्छा!'

फिर कुछ सोचकर बोले - 'कुछ ही दिन की बात है, फिर से अपनी असलियत में आ जाएगा!'

'वो आगे क्या करेंगे हम अभी से कैसे कह सकते हैं?'

'जिंदगी भर तो हमको रुलाता रहा। अब चला है महात्मा बनने! हमारी नाक कटाने!' उन्होंने कहा।

'आप तो खुद को बड़ा धार्मिक मानते हो... और... संत-महात्माओं का खूब सम्मान करते रहे हो। फिर उनका संन्यास लेना नाक कटाना कैसे हो गया?' हमेशा की तरह मैं अपने को सवाल करने से रोक नहीं सका था।

'तू अपना ज्ञान अपने पास रख!' वे नाराज हो गए थे।

उनके नाराज होते ही अनायास मुझे भाई साहब सहित वे सब लोग याद आ गए, जो ऐसे ही मेरे सवालों से नाराज हो जाया करते थे।


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