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कहानी

एक शाम न जाने किस के नाम
ममता शर्मा


कमरे में कुल चार लोग थे बा, सुराज जेनी और रमण। यह घर बा और सुराज का है जेनी और रमण यहाँ शामें गुजारने आए हैं। अक्सर यह चारों लोग यही करते हैं; कभी बा और सुराज जेनी और रमण के पास चले जाते हैं तो कभी जेनी और रमण यहाँ बा और सुराज के पास चले आते हैं। इसके अलावा कभी-कभी शहर के किसी सुकून भरे रेस्तराँ में भी इन चारों को साथ-साथ देखा जाता है। यह इन चारों के समय गुजारने के अलग-अलग तरीके हैं। चार अलग-अलग पर्सनैलिटी और अलग-अलग मिजाज के इन लोगों के एक साथ जुड़ने की खास वजह है। इसमें एक अच्छी बात यह है कि जिंदगी के इस मुकाम पर जब इन्हें साथ की जरूरत थी, जब इनके गम कुछ ऐसे थे जिन्हें हर दूसरा इनसान नहीं समझ सकता था तब ये चारों एक-दूसरे को देने के लिए समय निकाल लेते थे। उन चार अलग-अलग पर्सनैलिटी के लोगों के बीच एक ऐसा तार था जो उन्हें बड़े खूबसूरत तरीके से जोड़ता था इस जुड़ाव से एक ऐसा सुर प्रवाहित होता था जिसमें वे चारों सुकून पाते थे यह कुछ ऐसा था मानो कोई खूबसूरत तान छेड़ दी गई हो और हर श्रोता अपनी-अपनी अवस्था में अपने अपने हिस्से का आनंद ले रहा हो।

कॉल बेल की आवाज सुनकर सुराज ने बा को पुकारा। बा अब तक रसोई में जा चुकी थी क्योंकि घड़ी की सुई पाँच पर थी। बा को पता था कि अब जब भी कॉल बजेगी दरवाजे पर जेनी और रमण ही होंगे। जेनी घर के अंदर जाने के बाद बा को रसोई में टिकने नहीं देगी क्योंकि जेनी को शामें रसोई में गुजारना पसंद नहीं है।

"बहुत हो चुकी फॉर्मेलिटी अब हमें ये सब कुछ बंद करना चाहिए..."

"जैसे क्या कुछ..." बा ने प्रश्न किया।

"जैसे घिसे-पिटे सीन की तरह मेहमानों के आने पर किचन में चाय या शरबत या ऐसे ही किसी काम के लिए खटपट बंद कर देनी चाहिए।"

"लेकिन जेनी चाय के बिना सब कुछ अधूरा जैसा लगता है..." बा के चेहरे पर सवाल था।

"बात तो सही है तुम्हारी यह चाय ही तो है जो हमें एनर्जी देती है इन शाम से चाय को निकाल दो तो कुछ नहीं बचेगा... यह तो हो सकता है कि चाय पहले से बनाकर रख ली जाए।" जेनी कुछ विचार की मुद्रा में बोली।

बात बा को पसंद आ गई और तब से जैसे ही ड्राइंगरूम में टँगी घड़ी पाँच बजाती है बा रसोई का रुख करती है चाय; बनाकर केतली में रख ली जाती है बा पारुल की बनाई हुई एक पुरानी टीकोजी निकालती है और उसे केतली पर डाल देती है। उस टीकोजी के साथ बा की कुछ पुरानी यादें जुड़ी हुई हैं, जैसे बारिश का मौसम रिक्शे में आधे भीगते हुए उस टीकोजी को बनाने का सामान जुटाने के लिए उसकी और पारुल की शहर की तंग गलियों में भटकन; रात-रात भर जागकर उन दोनों का उसे तैयार करना; पारुल का आधी कच्ची, आधी पकी चाय बनाकर लाना और आखिर में पारुल को क्राफ्ट में 10 में से 9 नंबर मिल जाना। पिछले पाँच बरस से टिकोजी एक बक्से में रखी हुई थी। टिकोजी अब बा के लिए पारुल को अपने आसपास महसूस करने का एक जरिया बन चुकी थी।

यह एक अच्छी बात थी कि बा को चाय के साथ शक्कर न या शक्कर हाँ की मशक्कत नहीं करनी पड़ती। सीधे पानी और दूध मिलाया चार चम्मच चीनी, चाय पत्ती, सुगंध के लिए इलायची और चाय तैयार।

उन चारों की मुलाकातें सुनिश्चित है जिनके सुनिश्चित वार्तालाप है और सुनिश्चित परिणाम है। उन वार्तालापों में नया कहने को कुछ भी नहीं; रोज वही सवाल रोज वही जवाब और रोज वही मायूसी और बीच-बीच में चाय का दौर मन को बहलाने की 2-4 हलकी-फुलकी बातें। मगर वे चारों एक जगह बैठकर हर रोज उन पुराने सवालों में ही कुछ नया तलाश कर लिया करते थे। हर रोज की तरह आज भी वे चारों बैठक खाने में बैठे हैं जहाँ रोशनी कहीं ना कहीं से छनकर आ रही है। बैठक खाने में पुराने स्टाइल का एक सोफा है सोफे के पास टेबल पर नए स्टाइल का एक टेबल लैंप है। बैठक खाने के एक-दूसरे कोने को शाल के एक स्टडी टेबल ने घेर रखा है जिस पर पारुल की एक हँसती हुई सी तस्वीर रखी है जो कई दिनों से रखी रहने के कारण अपने होने का अर्थ खो बैठी है पर फिर भी कभी-कभी मायूस माहौल में अपनी उपस्थिति का एहसास दर्ज करती है। टेबल के साथ एक बुक शेल्फ है जिसमें किताबें अटी पड़ी हैं जिन्हें देखकर लगता है मानो उन्हें न छूने की हिदायत दे दी गई हो क्योंकि उनमें तरतीब का बेइंतहा अभाव है। बुकशेल्फ की ऊपरी सतह पर अलबत्ता धूल का एक भी कतरा नहीं नजर आता है जो इस बात का सबूत है कि शेल्फ के बाहरी हिस्सों की बिला नागा सफाई की जाती है।

इन चारों की मुलाकातों का केंद्र अमूमन पारुल और संजना हुआ करते हैं। पारुल बा और सुराज की इकलौती संतान है और उधर संजना भी जेनी और रमण की एकमात्र संतान है। दोनों पिछले ही साल से हॉस्टल में है और इनकी शामें इन्हीं दोनों की छोटी-बड़ी कभी जरूरी और कभी मामूली सी बातों से गुलजार हैं।

"आज कितनी बार फोन किया।" जेनी ने बा से पूछा।

"ज्यादा नहीं एक बार सुबह सवेरे, वह समझो अलार्म के लिए उस समय तो बात कहाँ हो पाती है फिर दोपहर में लंच के समय और फिर शाम में एक बार।"

बा यह सारा ब्यौरा रुक-रुक कर देती है और जेनी ऐसे सुनती है मानो बा ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य खोल रही हो।

"तो मतलब कुल 3 बार हुआ ना?" जेनी पूछती है

"नहीं कुल 4 बार ...बीच में एक बार और कर लिया था।" बा और जेनी दोनों ही रोज करीब-करीब 2 से 4 बार बच्चों को फोन कर लिया करती हैं। इन टेलीफोनी वार्ताओं से उनके पास इतनी बातें इकट्ठा हो जाती है जो उनकी शामों को भरने के लिए काफी होती है।

"हॉस्टल का खाना सही नहीं है" बा ने बातों की कड़ी को जोड़ा।

"लेकिन तुम तो अभी उस दिन बहुत तारीफ कर रही थी कि खाना बड़ा अच्छा है" नी ने कहा।

"वही तो ...पारुल कह रही थी शुरू में इंप्रेस करने के लिए ऐसा करते हैं फिर वही ढाक के तीन पात, वही पानी भरी सब्जियाँ पानी भरी दालें; पारुल तो हँस कर कहती थी बाकी सारी चीजें कम है बस पानी की कोई कमी नहीं।"

जेनी और बा दोनों हँस पड़ी। उनके वार्तालापों में हँसने के अवसर कम ही मिला करते। बा कुछ सोचने लग गई उसे पुराने दिनों का एक वार्तालाप याद आ गया।

"आज खाने में क्या है?" हमेशा की तरह उस दिन भी फोन उठाते ही बा ने पूछा

"लौकी की सब्जी।" बा को पूरा भरोसा हो गया कि पारुल ने लौकी की सब्जी देखकर ही खाना छोड़ दिया होगा।

"तुम चिंता मत करना मैंने कैंटीन से रोल मँगवा लिया था और माँ वैसे भी तुम अब खाने की चिंता मत किया करना यह तो रोज का धंधा है कभी मन का होगा कभी मन का नहीं होगा कभी स्वाद के लिए बाहर खा लेंगे कभी कुछ भी नहीं खाएँगे ...हम यहाँ खाने के लिए थोड़ी ही आए हैं।" पारुल कितनी समझदार हो गई है और एक वह दिन थे जब प्लेट में चीजों का मुआयना करने के बाद पारुल चुपचाप खिड़की से रोटी और सब्जी गिरा दिया करती; खाली पेट रह जाया करती पर मन का ही खाना खाती।

"हाँ यह तो तुम ठीक कह रही हो।" जेनी की आवाज से बा की तंद्रा टूटी। संजना भी शुरुआती दिनों में खाने की ही बातें किया करती ऐसा लगता कि अब तक जो खा रही थी वह सब बेकार था और स्वाद का खाना तो उसे अब जाकर मिलने लगा है। दोनों कुछ देर मौन रहे, अपनी-अपनी सोच में गुम उनके वार्तालापों की यह एक खास बात थी इन वार्तालापों के बीच लंबे-लंबे मौन होते जो वार्तालाप से अधिक मुखर थे।

"पर बा खाने में हर तरह की आदत बच्चों में होनी चाहिए तुम्हें ऐसा नहीं लगता।" बा ने सिर्फ सर हिला दिया और सोचने लग गई कि जेनी शायद खुद को मजबूत करने के लिए यह सब कह रही है। उसे याद आ गया था कि महज दो दिन पहले ही संजना के जन्मदिन पर जेनी ने कुरियर से हाथ से बनी हुई मिठाइयाँ भिजवाई थी। उस वक्त बा को लगा था कि जेनी ऊपर से जितनी बोल्ड लगती है अंदर से उतनी ही कमजोर है। बा को लगता है कि संजना के जाने के बाद जेनी की पर्सनैलिटी खंडित हो गई है और इसी वजह से उसकी बातों में विरोधाभास झलकता है अक्सर वह अपनी भावनाओं को छिपाने के प्रयास में बेहद इन प्रैक्टिकल हो उठती है। संजना उसकी बेटी ही नहीं उसकी अजीज दोस्त भी है वह उसे आसपास देखने की आदी हो गई थी और अब जब वह दूर है तो जेनी अपने भीतर गहरे में कहीं इस अकेलेपन से लड़ रही है।

"खाने की क्या बात है मुझे तो लगता है हमें कुछ दिन के लिए फोन भी करना बंद कर देना चाहिए क्यों भाई साहब।" यह सब कहते हुए जेनी अब सुराज की ओर मुखातिब हो गई थी। लेने की इस बात पर सब मौन हो गए, जैसे हर कोई अपने खिलाफ खड़ा होकर खुद को इस बात के बरअक्स टटोल रहा हो और खुद से सवाल कर रहा हो; मसलन यह कैसे संभव है या फिर कि क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ या कर सकती हूँ और यह भी कि बच्चों के बगैर हम कितने अधूरे हैं वगैरा-वगैरा...

"छोड़िए ना जेनी फोन ही तो करते हैं नए जमाने की सुविधा है उसका फायदा उठाते हैं बस और क्या, आज से 10-15 बरस पहले जो बच्चे हॉस्टल में जाते थे तो हम भी वैसे ही हो जाते बच्चों को 6 महीनों के लिए पूरी तरह से भूल जाते फिर मिलते फिर भूल जाते।" सुराज की इस बात से सभी ने राहत की साँस ली सबके चेहरों पर मुस्कान लौट आई जैसे किसी गैरजरूरी मशक्कत से बचा लिए गए हों।

"पकोड़े तो बढ़िया हैं आज कोई खास दिन है क्या?"

रमण ने टेबल पर पड़ी प्लेट से पकौड़े उठाते हुए बात को नया मोड़ दिया।

"असल में पारुल का जन्मदिन है।" बा ने संकोच के साथ कहा।

"फिर तो यह अन्याय है सिर्फ पकौड़े में ही काम चला लिया यह तो सरासर ज्यादती है।"

"अरे नहीं असल में उसे पनीर के पकोड़े पसंद है।" बा ने अपनी सफाई पेश की।

"ओहो तो ऐसा कहिए ना वही तो मैंने सोचा जन्मदिन और पकौड़ों का क्या तालमेल हो सकता है।"

"पारुल तो इतना पसंद करती है कि एक बार खुशबू मिलनी चाहिए कि आज पनीर के पकौड़े बने हैं प्लेट लेकर किचन में खड़ी हो जाएगी मजाल है किसी और तक पकौड़े पहुँच जाएँ; इन बच्चों का तो ऐसा हिसाब है भाई साहब पेट नहीं देखते भूख नहीं देखते स्वाद से खाते हैं स्वाद मिले तो 10 रोटियाँ खा जाए और स्वाद ना मिले तो एक दाना मुँह में ना डालें उसके जाने के बाद हमने पनीर क्या कोई भी पकौड़ा खाना बंद कर दिया। सुबह-सुबह मुबारकबाद देने के लिए फोन किया तो मैंने बताया कि आज शाम की बैठक में हम तुम्हारी पसंद का कुछ खाएँगे और जन्मदिन सेलिब्रेट करेंगे।"

सबने बा की बातों को महसूस किया सब मौन थे; कमरे की नीरव शांति में मुँह में चबाने की आवाज और दिमाग में घुमड़ते विचारों का शोर था।

"सोचा था बच्चे हॉस्टल जाएँगे तो जिंदगी की आधी भाग-दौड़ खत्म हो जाएगी कुछ ऐसा करेंगे जो इतने दिनों में नहीं कर पाए।" रमण ने कहा।

"जैसे..." सुराज ने पूछा

"जैसे कुछ ऐसा जो दिल के बेहद करीब हो।" रमण ने पकोड़े को लाल सास में लपेटते हुए कहा

"तो भागदौड़ तो खत्म हो ही गई है ना..."

"वही तो मुश्किल है भागदौड़ तो खत्म हो गई है पर अब तो लग रहा है जिंदगी के किसी मोड़ पर शुरू हुई है यह भागदौड़ कब हमारे खून में रच-बस गई और हमें मालूम ही नहीं चल पाया जब तक भागदौड़ थी हम सही थे और अब जब वह नहीं है तो उसी की तलब होती है।" यह रमण कह रहा था।

"यह बात तो है यार एक अजीब सा खालीपन है आसपास लोग हैं, दोस्त हैं, काम का प्रेशर है पर एक खालीपन तब भी नहीं चिपका हुआ है जैसे रह-रहकर अपनी उपस्थिति का एहसास कराने वाला खालीपन दफ्तर में मेज की दराज खोलो तो वहीं नजर आ जाने वाला खालीपन..."

इसका तो उपाय है मेरे पास रमण ने गंभीर मुखाकृति के साथ कहा।

'वह क्या है' के अंदाज में आँखों की पुतलियाँ रमण की ओर घूम गईं।

"किसी कारपेंटर को बुलाकर दराज ही हटवा डालो।" चारों एक साथ हँस पड़े मानो हँसने की राह तलाश रहे हों और वह मिल गई हो।

"एक बात कहूँ सुराज..." रमण ने फिर नए सिरे से बात का पल्ला पकड़ा "हम कहते हैं बहुत काम है, बहुत काम है यह करना है, वह करना है! समय नहीं मिलता दफ्तर और घर के बीच बँटे रहते हैं बच्चों की भागदौड़ ट्यूशन उनकी रोज-रोज की जरूरतें वगैरह-वगैरह फिर एक मोड़ पर आकर सब कुछ थम सा गया बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ गया और उन्होंने हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए आप की ओर देखना बंद कर दिया ऐसा लगा जैसे एक सफर था और हम सब एक सुर लय में थे उनके कदम और आपके कदम फिर उनके कदम आपके कदमों से तेज हो गए वे कब आपका साथ छोड़कर आगे बढ़े आपको पता ही नहीं चल पाया क्यों ठीक कह रहा हूँ ना हम जिस तरह यहाँ बैठकर उनके खाने को उनके एक एक निवाले को डिस्कस करते हैं उनकी बीती हुई पुरानी बातें याद करते हैं यह सब बस हमारे लिए ही है उन्हें क्या कोई फर्क पड़ता है।"

"देखो रमण यह तो जिंदगी का उसूल है तुम इसे इस तरह समझो कि यह सब हम बच्चों के लिए नहीं कर रहे यह सब खुद के लिए कर रहे हैं ...क्या हम सब एक बार और चाय पी सकते हैं" सुराज ने माहौल की गंभीरता को कम करने की गरज से कहा।

"बिल्कुल..." जेनी भी इस चर्चा से निकलने की राह तलाश रही थी।

"लेकिन मेरी भी एक शर्त है।"

"वह क्या?" बा ने पूछा

"इस बार चाय मेरे हाथों से..."

किसी ने कोई आपत्ति नहीं की।

जेनी और बा एक साथ किचन में चली गई। वार्तालाप के अब दो बिंदु हो गए, जेनी और बा किचन में और सुराज और रमण ड्राइंगरूम में। यह जरूरी भी था इसलिए क्योंकि ऐसे वार्तालाप में जेनी बहुत बार अकेले रहना ज्यादा मुनासिब समझती थी क्योंकि एक तो उसे ऐसा महसूस होता था कि कभी-कभी सुराज और रमण की चर्चा बहुत सैद्धांतिक हो जाया करती और दूसरे वैसे तो सुराज और रमण भी बच्चों की चर्चा में आनंद पाते पर उन्हें अपने तथाकथित पौरुष का प्रदर्शन भी आवश्यक लगता था; मसलन उन्हें यह चाहत होती कि दिन में चार-पाँच बार न सही तो कम से कम एक बार बच्चों को फोन जरूर करें, उनकी आवाज सुनें या कहें कि उनके न होने के एहसास को कम करने की गरज से एक बार बच्चों से बात हो जाए, पर बा और जेनी जब कहतीं कि आज कितनी बार फोन किया तो रमण और सुराज एक-दूसरे की ओर मंद मुस्कान फेंकते हुए कुछ ऐसा भाव प्रकट करते कि 'देखो इन्हें ये कितनी कमजोर दिल हैं' ...शुरू शुरू में तो जेनी ऐसे भावों को भाँपते ही चिढ़ जाती और बहस पर उतारू हो जाती।

'क्यों आपको नहीं जी करता अपने बच्चों से फोन पर बात करने का' या फिर 'हमें क्या पता यह दफ्तर से कितनी बार फोन करते हैं' ...वगैरा-वगैरा। बा जेनी को समझाती कि यह तो मर्दों को दिखाने की बात है सच्चाई तो यह है जेनी कि बच्चों के मामले में मर्द हम औरतों से ज्यादा कमजोर दिल होते हैं। पर फिर भी जेनी ऐसी बातों पर भी बिफरना नहीं भूलती थी।

जेनी अब चाय बनाने में व्यस्त थी। ड्राइंगरूम में सुराज और रमण अब भी चर्चा में थे।

"सच कहूँ सुराज मैं काफी सीरियस हूँ इस बारे में, मुझे कभी-कभी लगता है हमें खु़द को बदलना होगा या कहो अब तो अक्सर लगता है कि बच्चे हमें भूलते जा रहे हैं क्यों तुम्हारा क्या ख्याल है?"

"बस यूँ ही..."

"यह क्या बात हुई कुछ तो सोचते होगे तुम... कुछ तुमने भी महसूस किया ही होगा... मैं ठीक कह रहा हूँ या नहीं..."

"मतलब मुझे इसमें कोई बुराई वैसे नजर नहीं आती यह वक्त की माँग है अलबत्ता, इनकी लाइफ ही ऐसी हो गई है क्या करें, इसमें उनका कोई कसूर नहीं।"

"लेकिन हकीकत तो है ही कि बच्चे ज्यादा वो कहते हैं न प्रैक्टिकल हो गए हैं, जहाँ जरूरत महसूस करते हैं वहाँ भावनाएँ प्रदर्शित करते हैं और जहाँ गैरजरूरी समझते हैं ...क्यों तुम्हें क्या लगता है?" रमण ने सुराज की ओर सवालिया दृष्टि से देखा।

"सच पूछो तो मैंने भी पिछले कुछ महीनों में पारुल के जाने की बाद की स्थितियों पर करीब से गौर किया कुछ कुछ वैसा ही महसूस हुआ जैसा तुमने कहा पर मैंने यह सोचकर चर्चा नहीं की न बा से और न तुम लोगों से कि कहीं यह मेरे अकेले का अनुभव न हो या फिर कुछ अटपटा सा लगे सुनने में..."

"क्या हम इसे जनरेशन गैप कह सकते हैं?" रमण ने कुछ सोचते हुए कहा।

"याद है रमण तुम कहा करते थे हमारे बीच जनरेशन गैप जैसी कोई चीज नहीं होगी"

"याद है... लेकिन यहाँ बातचीत का मुद्दा यह नहीं है कि हम सही हैं या गलत..."

अचानक से बजी फोन की घंटी आवाज ने रमण की बात को बीच में ही भंग कर दिया

"लगता है बिटिया का फोन है..." रमण ने मुस्तैदी के साथ पॉकेट में सेल फोन टटोलते हुए कहा।

"संजना का होगा तो मुझे भी एक जरूरी बात करनी थी..." उधर जेनी ने भी किचन से निकलते हुए कहा।

"ओह..." रमण ने फोन का नंबर देखकर कहा।

"क्या हुआ?" जेनी ने करीब आकर पूछा।

"नहीं कुछ नहीं..." संजू का नहीं है।

पल भर को कमरे में मौन पसर गया जेनी आकर रमण के पास ही सोफे पर बैठ गई। रमण सर के पीछे हाथ बाँधे अतीत में लौट गया। सुराज लंबी साँसे खींचकर रसोई में चला गया।

"बा चाय तैयार है क्या?"

"फोन किसका था?" ...बा ने पूछा

"किसी का नहीं...।" सुराज ने कहा

आज की शाम का आखिरी दौर आ पहुँचा था। प्यालियों पर लगती चम्मच की आवाज मौन को तरंगित कर रही थी।


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