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कहानी

मेफ्लाइ सी जिंदगी
ममता शर्मा


बस्ती शहर के दक्खिनी छोर पर बसी थी। एक समय यहाँ जंगल था; जंगल माने बीहड़ जंगल आर-पार जाने वाला जंगल नहीं एक कतार वाला जंगल भी नहीं; जंगल माने जहाँ वीभत्स शांति हो और दिन दहाड़े सूरज भी चमकने को तरस जाए; साँप-बिच्छू वाला जंगल जिसमें सियार बोला करते भुतहा जंगल और एक तालाब। पुकली के बाबा तब तालाब से मछली मार कर लाते और पुकली की माँ निशि वासर में मछली बेचने जाती साथ में बर्तन बासन भी मल कर आती दो पैसे हाथ लग जाते। पुकली तब नन्हीं-सी थी माँ की साड़ी का छोर पकड़े-पकड़े कभी-कभी वह भी निशि वासर जाती। ऐसे ही एक दिन बंगले में राय साहब के नाती बकुल ने पुकली के हाथ में एक पेंसिल थमा दी और पुकली हाथ में पेंसिल थामे घर आ गई तो बाबा के भीतर अरमान जाग गया कि पुकली पढ़ाई करेगी और इसके बाद पुकली सरकारी स्कूल जाने लग गई थी। पुकली की जिंदगी में सब कुछ ऐसे ही किसी पल के फैसले से हो जाता है, कुछ भी किसी सोची-समझी योजना के तहत नहीं होता। बस्ती में तब चार घर थे और आज बस्ती में चालीस घर हैं। खाली जगह आड़ी-तिरछी बेतरतीब इमारतों से भर गई है। तब शहर माने था राँची घंटा भर में लंबी दूरी से आने वाली गाड़ी पकड़ कर जाने वाला शहर या फिर पैदल जाने वाला शहर और अब तो मिनट मिनट में गाड़ी पकड़ो। शहर अब दानव हो गया हाथ पैर पसार कर खुद तुम्हारे पास चला आएगा। बस्ती में सौ अफसाने हैं तो बस्ती में दीवाने भी ऐसे हैं कि क्या होली क्या सरहुल और क्या मंडा। परब त्यौहार में बस्ती में जात परजात सब एक है। इस बार तो हद हो गई बस्ती में वैलेंटाइन की ही गुफ्तगू हो गई 'प्यार कर तोहफा' संतोषी ने पुकली को लाल फूल के साथ एक कागज में लिखवा कर भेजा। न संतोषी खुद लिख पाया न पुकली लिखा हुआ पढ़ पाई; तब पहली दफा दोनों ने संग-संग पढ़ाई छूटने का मातम मनाया। "सातवाँ पास करेगी तो राँची में बड़का सरकारी स्कूल में दाखिला होगा क्या समझे इसलिए पुकली के लिए थोड़ा तकलीफ करना मगर पढ़ाई कभी मत छुड़ाना पढ़ाई में पुतली अच्छी है।" स्कूल की दीदी ने पुकली के बाबा को नसीहत के अंदाज में कहा था। तब बाबा ने हाथ जोड़कर इस नसीहत के प्रति कृतज्ञता जाहिर की थी। लेकिन बस्ती का तलाब एक दिन लाल रंग में रंग गया और पुकली नहीं पढ़ पाई दो दिन दो रात गायब रहा पुकली का बाबा फिर सुबह मुँह अँधेरे बदहवास महेंदर दौड़ता हुआ आया...

"लहास लहास"

और सारी बस्ती उठ-उठ कर तालाब की ओर जाने लगी। पुकली के बाबा की सड़ी-गली लाश फूल कर बदरंग देह पानी पर तैर रही थी लाश की सड़ांध से सारा इलाका गमकने लग गया था। भीड़ के बीच से झाँक-झाँक कर नन्हीं पुकली समझने की कोशिश करती रही क्या हो गया; माँ को चीखते-चिल्लाते देखा फिर देखा माँ चुप हो गई मौत की मातमपुर्सी भी सुविधा का विषय है। पुकली की माँ ने पहले ईंटा भट्ठा जाने का मन बनाया फिर बस्ती वालों ने समझाया अकेली औरत के लिए ईंट भट्ठा नरक है नरक। सुखन की जवान बीवी उसके मरने के बाद ईंटा भट्ठा गई सो सात साल गुजर गए नहीं लौटी। दो साल तक घरवाले याद करके मजदूरी करके लौटने वालों से पूछते रहे पर हर लौटने वाला उसके नाम पर एक रहस्य की चुप्पी लगा गया और सुखन की जवान बीवी का नाम वक्त की गर्द में गुम हो गया और अब कोई भी उसके बारे में कुछ नहीं कहता पुकली की माँ बस्ती में ही थम कर रेजा काम करने लगी। बस्ती में रहकर काम की कमी नहीं। आधी से ज्यादा बस्ती की लड़कियाँ डेरा काम करके अपना खर्चा निकाल लेती है। शांति और मगदली डेरा काम करके मंगल बाजार में सब्जी भी बेच आती हैं और कुछ नहीं तो हड़िया दारू बेचकर ही पैसे ले आती हैं। लानत तो बस्ती के मरद लोगों की है दस में से तीन ही ऐसे होंगे तो ढंग की जिंदगी जीते हैं बाकी सब के सब बिना काम के घर की औरत के सर पर दंगा करने के लिए हैं। दारू हड़िया के लिए पर अब त्यौहार कम हैं क्या मगर बोले कौन यहाँ तो ताकत दिखाने के लिए फकत औरत की देह ही है। बस्ती का एक अफसाना यह भी है कि दक्खिनी छोर के हर गली मोहल्ले की चोरी का खामियाजा बस्ती के बाशिंदों को झेलना पड़ता। महीने में एक बार यह कवायद हो ही जाती पुलिस की जीप पर सवार सिपाही बेसाख्ता टोली में आकर बीचों-बीच छापा मारने लग जाते। सारा घटनाक्रम इतनी तेजी से होता कि आधे लोग तो जान भी नहीं पाते जो जान गया वह भाग गया और जो जान न पाया गिरफ्त में आ गया। इस बार पुलिस आई तो मंगल की बीवी तो किवाड़ खुला छोड़ कर बस्ती से ही निकल गई; मंगल भी नहीं टाटा गया है काम पर, सप्ताह बाद लौटेगा दो दिन पहले ही मंगल ने संतोषी से सात सौ रुपए में कलर टीवी खरीदा था; मंगल तो ठीक से देख भी नहीं पाया टीवी आधी रात तक मंगल के घर फिल्म चलती है। यह कोई शहरी अपार्टमेंट तो है नहीं कि केवल मियाँ बीवी और बच्चा बैठकर टीवी देखेगा। यहाँ तो बस्ती का बच्चा बूढ़ा मरद औरत सब एक साथ बैठ कर देखते हैं सिनेमा हॉल जैसा। हीरो हीरोइन का प्यार देखो क्या अंदाज है... क्या डायलॉग है ...हम तो बस बस्ती का कीड़ा है कीड़ा और यहीं सड़ कर मरेंगे कोई नाम भी लेने वाला नहीं। पुकली के मन पर फिल्म का असर कुछ ज्यादा होता है; संतोषी को हीरो मान लेती है; ख्वाब देखने लगती है। मेला आया तो संतोषी सिनेमा का टिकट ले आया पूरी बस्ती मेले में है। रात भर पूरी बस्ती में नाच गाना होगा सिनेमा से लौटकर दोनों का मन बाग-बाग हो जाता है। पुकली की माँ भोर से पहले घर नहीं आएगी। संतोषी पुकली को बाँहों में भर लेता है ...मेरा संतोषी कोई पर्दे पर दिखने वाला हीरो से कम है।

ढोल बाजे माँदर बाजे...

चल गुइयाँ संग खेले...

प्रेमगीत की थाप पर औरत मरद बेसुध नाच रहे हैं। बस्ती में जीवन एक-एक पल का है। संतोषी के मजबूत पाश में एक पुकली सब कुछ बिसार देती है। मंगल को अचानक ठेकेदार टाटा लेकर चला गया। मंगल का मन नहीं होता था जाने का; नया-नया सामान घर में आया है मना किया तो बीवी ने समझाया एक बार नहीं जाने पर ठेकेदार अगली बार बुलाने भी नहीं आएगा; उसको क्या गरज किसी और को ले जाएगा। फिर टीवी का सात सौ भी तो कोई घर में थोड़े ही रखा है। सामान जब्त हो गया तो मंगल की बीवी थाने से जाकर टीवी छोड़ा लाई। थोड़ा पैसा देना पड़ा वक्त बेवक्त के लिए मंगल से छुपाकर रखे गए रुपए काम आ गए। लेकिन मंगल को गर पता चल गया कि थाने गई थी बीवी, पता नहीं क्या करेगा उसकी आँखों में खून उतरते देर नहीं लगती। सब संतोषी का किया धरा है ना चोरी का सामान बेचता न बस्ती वाले खरीदते और ना पुलिस छापा मारती। बस्ती में सब कुछ ही अनवांटेड है आदमी से लेकर पेट का बच्चा तक। संतोषी के बिजनेस को बस्ती वालों ने यू नहीं सर पर चढ़ाया मोबाइल तो आधी बस्ती के पास आ गया है, इसके अलावा पंखा टीवी बर्तन कपड़ा और ना जाने क्या-क्या सुख के सारे साजो-सामान। पहला मोबाइल आया तो संतोषी के अगल-बगल भीड़ लगी लग गई लगे कोई मदारी का तमाशा हो जैसे; भीड़ देखकर कुत्ते भी इसी अनिष्ट की आशंका से भौंकने लग गए। बाजार में मिलेगा फोन 2000 का और संतोषी का कमाल देखो सिर्फ 500 में दिलाया। अब संतोषी का धंधा कैसे न चले संतोषी को मना कौन करे हर कोई उससे बचकर ही रहना चाहता है। इक्कीस शुक्रवार उपवास करके संतोषी की माँ ने यह सोच-सोचकर औलाद नहीं माँगी कि लौंडा बड़ा होकर चोरी का ऐसा धंधा करेगा और 10 साल बाद जब संतोषी पेट में आया तो संतोषी के बाप ने संतोषी की माँ का चौक की डाकटरिन से इलाज कराया; कौन कराता है बस्ती में डाकटरिन से इलाज या तो जिसको पैसा है या फिर जो औरत मरने वाली है सौ रुपया नकद लेती है, दवा का ऊपर से। माँ ने नाम रख दिया संतोषी सब संतोषी माँ का ही तो आशीर्वाद है; पर अब ना तो संतोषी का बाप यह देखने के लिए बचा है ना माँ 10 बरस भी पूरे नहीं हुए कि माँ-बाप दोनों चल बसे प्यार नहीं मिला संतोषी को। वैसे भी प्यार मोहब्बत जैसे जज्बाती शब्दों का बस्ती में क्या काम? यहाँ तो देह ही सबसे बड़ा सच है ना उससे आगे कुछ न ही उसके पीछे कुछ। संतोषी पुकली के सामने दिल की बात खोल कर रख देता है; चाहे कोई कुछ कहे पर संतोषी है बड़ा नरम दिल। पर सामान चोरी का है या ईमान का संतोषी को क्या किसी के घर से तो उठाकर लाया नहीं अब कोई आकर माल सस्ते में बेचे तो संतोषी उस को परेशान नहीं करता। संतोषी ने किसी के घर में घुसकर पराए समान को कभी हाथ नहीं लगाया हाँ हम चोर है चोरी नहीं करते मगर चोर का बिजनेस चलाते हैं सफेद चोर तो नहीं है ना। संतोषी की इसी सीनाजोरी पर पुकली फिदा हो जाती है बिल्कुल डॉन लगता है संतोषी उसे। अब बस्ती का तो करम भी अनवांटेड और धरम भी अनवांटेड कम से कम पीठ के पीछे छुरा तो नहीं भोंकता संतोषी। पुकली की आँखों में बाबा की सड़ी-गली बदरंग लाश घूम जाती है। माँ तो बाबा के बारे में कभी कोई बात नहीं करती बस्ती में मरे हुए लोगों के बारे में कोई बात नहीं करता है। पुकली को प्यार का मतलब तो संतोषी से ही आया मजाल है। संतोषी के आगे कोई उसको आँख उठाकर देखें मजनू जैसा आदमी भी नहीं है संतोषी। मजनू बस्ती का एक और अफसाना है बस्ती में हर कोई मजनू को पागल समझता है; पर बस्ती की एक-एक लड़की जानती है मजनू लफंगा है उसको लड़कियों को नंगे बदन घूरने की आदत है। सब तो यही जानते हैं कि मजनू तो अपनी औरत के गम में पागल है, दिन भर केवाड़ लगाकर पड़ा रहता है कोई खाने को दे दे तो खा लेता है; चिक्कट कपड़े पहनता है; जब से बीवी मरी है तब से ऐसे ही रहता है, इसीलिए तो नाम घर आया है मजनू; पर मुँह अँधेरे साँकल की आवाज सुन लेता है; मजनू लड़कियों के कदम भी मजनू सूँघ लेता है; पोखर के पास के पेड़ पर तब तक बैठा रहता है जब तक किसी को पोखर में नहाते हुए नहीं देख लेता। एक दिन समिति में सौ रुपया इकठ्ठा हुआ कि अब बस्ती में शौचालय होगा उसमें भी पैसा सब लड़कियों ने लाकर दिया डेरा से कमाया हुआ पैसा। मरद जात तो जहाँ जी आए बैठ जाए ना लाज ना सरम जहमत तो लड़की जात को है, अब गाँव देहात तो है नहीं कि जंगल में जाकर निपट लो। यह तो न शहर न देहात एक भी झाड़ जंगल नहीं बचा जिधर देखो बिल्डिंग खड़ी है जिधर जाओ एक न एक मजनू बैठा है। पैसा इकट्ठा हुआ तो लड़कियाँ खुश की पोखर से पीछा छूटेगा पर हुआ कुछ नहीं; समिति वाली बहन जी बोली कोई जमीन देने को तैयार नहीं है कहाँ बनेगा शौचालय सौ रूपया अलग गया; मतलब पोखर की लुकाछिपी से कोई छुटकारा नहीं। पुकली काम से आई तो पेट में दर्द उठा एक झटका लगा और खाया पिया सब बाहर। किस से कहे पुकली को माँ पर तो भरोसा नहीं माँ साँझ को आएगी और कोठरी में घुसकर लाश की तरह चौखट के पास ही गिर जाएगी किसी के भी घर में घुसकर तब तक बैठी रहेगी तब तक पुकली घसीटकर लाएगी नहीं पुकली। मगर माँ को कुछ नहीं कहती 20 बरस हो गए बाबा को मरे तब माँ जवान थी पर कभी किसी मर्द के चक्कर में नहीं लगी अब हड़िया दारू भी ना करें तो हाड़ मांस का शरीर कैसे चलेगा। शांति संगीता मगदली सब आपस में बैठकर बतियाती हैं; कभी सुबह कभी शाम को दो दिन से काम भी छूट गया है। पुकली डाकटरिन के पास जाएगी तो बस्ती में बात फैलते मिनट नहीं लगेगा। फैसला हुआ कि देहात की दवा को ही आजमा कर देखेगी पुकली। पर पुकली को सोचना नहीं पड़ा संतोषी ने पुकली को जरा तकलीफ नहीं होने दी शहर में सब कुछ आराम से हो गया सब अँग्रेजी दवा का कमाल है; दो दिन में पुकली फिर चमक गई। बहुत दिन बाद पुकली को बाबा का धुँधला चेहरा याद आया, बाबा का हाथ थामे जंगल-जंगल घूमना याद आया स्कूल की सुंदर मास्टरिन याद आई जिसके पास जाने से खुशबू उठती थी; पुकली को लगता है जिंदगी माने वैसी ही खुशबू सीलन भरी कोठरी तब उसको जेल जैसी लगती। संतोषी का प्यार भी कोई प्यार है; ब्याह की बात करते समय दूर गाँव देहात से लड़की देखता है, अब उसकी देह को छूता है तो पुकली को मजनू का चेहरा याद आता है छुपकर औरत की देह पर ताक झाँक करने वाला मजनू। पुकली ने मन बना लिया है वह कोलकाता चली जाएगी हमेशा के लिए; राय साहब का नाती बकुल अब बड़ा आदमी हो गया है। निशिवासर में मालकिन हमेशा कहती थी पुकली को कोलकाता भेज दो, जवान जहान लड़की को बस्ती में मत रखो उसका बाप भी नहीं है। अब खुश हो जाएगी मालकिन, बकुल के दो बच्चों को भी पुकली ही देख लिया करेगी; बकुल की बीवी भी तो काम पर जाती है। पुकली से तो बस्ती कभी छूटती ही नहीं थी जब-जब माँ कहती पुकली साफ मना कर देती। बस्ती लेकिन बहुत याद आएगी साथी ने याद आएँगी, शांति और मगदली के साथ इमली बिछना और मेला घूमना याद आएगा, पलाश का जंगल और बस्ती की शाम याद आएगी। बस्ती लेकिन जैसी भी थी अपनी थी; संतोषी लेकिन इतना लंपट निकलेगा पुकली नहीं सोचती थी। हावड़ा तक जाने वाली नीलांबर एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर दो पर आने वाली है, जी धक-धक करने लगा सब छूटता-सा लगने लगा।

'पुकली-पुकली...' किसी ने पुकारा ट्रेन आ गई है।

'पुकली ऐ पुकली...' पोखर के लिए जाने जैसे भोर को साथिनें आवाज देती थीं।

पाँच साल की पुकली रेल फाटक पर बाबा के साथ रेलगाड़ी को एकटक देखती रहती और फिर डर कर बाबा से चिपट जाती; बाबा गोद में उठा लेते।

ट्रेन धीरे-धीरे स्टेशन छोड़ रही थी।


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