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उपन्यास

कैनवास पर प्रेम
विमलेश त्रिपाठी


सत्यदेव शर्मा के लिए - जो झूठ होकर भी सच और सच होकर भी झूठ हैं।

शुरुआत के लिए कुछ बातें जरूरी होती हैं। मसलन एक समय की बात है या किसी एक शहर कस्बे या गाँव में कोई एक आदमी या लड़का या कोई लड़की रहती थी।

और फिर ऐसा कहते हुए कथा की शुरुआत करने की एक सुदीर्घ परंपरा-सी बनी आई है। लेकिन जब कथा उस तरह न कहनी हो तब?

तब कैसे शुरुआत की जाए?

मैं जानता हूँ कि चाहे मैं कितना भी कह लूँ, मतलब कसम-वसम खा लूँ लेकिन इस लिखे को आप कथा मान कर ही पढ़ेंगे। मेरे कहने का आप विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि इस तरह की बात कहना भी आजकल फैशन-सा हो गया है, लेकिन मैं फिर कहता हूँ कि वास्तव में यह कथा-वथा कुछ नहीं है। इसलिए इसमें आपको कथा के गुरुओं द्वारा गिनाए गए तत्व-अवयव नहीं भी मिल सकते हैं। यह एक अनुभव है जिसके साथ मैं एक यात्रा करूँगा। वह अनुभव भी कई बार मेरा प्रत्यक्ष का नहीं भी हो सकता है लेकिन हो सकता है कि मैं भी कहीं उनमें शामिल होऊँ। लेकिन अभी कुछ भी स्पष्ट तौर पर कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ।

टुकड़े-टुकड़े में की हुई बात अगर एक कथा का रूप ले ले तो मुझे कोई आपत्ति भी नहीं। और यह भी तो तथ्य है कि कथा और होती क्या है, वही न जो पहले घट चुकी है या चुकी नहीं है तो वर्तमान में भी अविरल घट रही है। इस तरह कितनी कथाएँ हैं चारों ओर विखरी पड़ी। कितनी-कितनी कथाएँ कितने-कितने मुँहों से लगातार कही जाती हुईं और कितने-कितने कानों से लगातार सुनी जाती हुईं। हमारी कितनी-कितनी बातों में कितनी-कितनी कथाओं के सार हैं, यह भी तो महत्वपूर्ण है।

कि नहीं?

तो चलिए हमारे साथ एक यात्रा पर - हम और आप। कोई जरूरी नहीं कि आप अंत तक साथ रहें - जब कभी जहाँ कहीं आपको लगे कि आप और साथ नहीं चल सकते तो आप लौट सकते हैं - यह स्वतंत्रता आपको है। अस्तु...

 

1.

अव्वल तो कथा के नायक वही हैं - नायक मतलब सबकुछ। मलतब कहानी उनसे ही शुरू होकर उन्हीं में विलीन हो जाने जैसा कुछ नियम का पालन करती हुई है। वही मतलब सत्यदेव शर्मा यानी पापुलरली नॉन बाई साधु जी, जिन्हें कुछ लोग साधु बाबा कहते हैं और मैं मौज में आकर साधु खान कहता हूँ। यह जानकर आपको दुख होगा कि कई बार एक नाचीज कथाकार का हस्तक्षेप भी होता है। यह कहानी के लिए जरूरी था इसलिए आप इसे मजबूरी में हुआ हस्तक्षेप समझें। यकीन मानिए, मुझे कहानी में आना बिल्कुल पसंद नहीं, क्योंकि मुझसे बेहतर कौन जानता है कि ये कथाकार लोग जिसे कहानी में लेकर आते हैं, उनके साथ कैसे-कैसे सलूक करते हैं। लेकिन मजबूरी है - क्या किया जाए।

सबसे पहले कथा के नायक से परिचय कर लेना जरूरी होगा। तो परिचय कुछ यूँ है नाम - सत्यदेव शर्मा। कुछ लोग साधु जी कहते हैं।

शिक्षा - विज्ञान में स्नातक, बिरला अकादमी, कोलकाता से चित्रांकन में डिप्लोमा

उम्र - लगभग 52 साल

पेशा - शिक्षक। कुछ दिन पहले एक अँग्रेजी माध्यम के स्कूल में चित्रकला पढ़ाते थे। अब ट्यूशन देते हैं। खुद को बेकार चित्रकार कहते हैं।

मैरिटल स्टेटस - सिंगल

फिलहाल घर-घर घूमकर बच्चों को पेंटिंग पढ़ाते हैं। अपने किराए के घर में कम ही जाते हैं। गाँव गए लगभग 20 साल हो गए। बाल सफेद नहीं पर खिचड़ी हो चुके हैं। कभी-कभी उन्हें रंगवाते हैं, इसलिए उनका रंग कई बार लाल भेड़ों के बालों की तरह दिखता है। कभी-कभी नाजिर हुसैन की बनाई गई भोजपुरी फिल्मों के गीत गाते हैं और गाते-गाते उनकी आँखों के लाल डोरे और लाल होते जाते हैं।

कहते हैं कि धरती मइया के गीत उनके सबसे पसंदीदा हैं - खासकर 'जल्दी-जल्दी चलु रे कंहरा'। जानकारी के लिए कहना जरूरी है कि इसे पिछली सदी के एक महान गायक मोहम्मद रफी ने गाया था और चित्रगुप्त ने संगीत बजाया था। यह जानकारी वे खुद देते हैं।

संपर्क : बड़ा माठ के सामने, बाबू साहेब की बाड़ी, लिलुया, हावड़ा, पंश्चिम बंग -711204.

कोई फोन नंबर नहीं।

बहुत दिन हुए उन्होंने कोई फोटो नहीं खिंचवाई। उनकी अपनी तस्वीर जिसे रिंकी सेन ने बनाया था वह उनके संदूक में पता नहीं कितने समय से बंद है। इसलिए फोटो उपलब्ध होते ही चस्पा कर दिया जाएगा।

2.

पहली बार कब मिले? - कथाकार पूछता है। जाहिर है कि अचानक आए इस सवाल से मैं हकबका जाता हूँ।

किससे?

और किससे, उस पागल पेंटर से। अरे जिसके घर गए थे आज तुम। मैं सकते में आ जाता हूँ। इसे कैसे पता कि मैं उसके घर गया था - उस नायक के घर, जिसके ऊपर कथाकार कहानी लिखने की सोच रहा था।

दरअसल कथाकार तो कभी मिला नहीं उससे। मिला तो मैं था और मैं ही जानता था कि कौन है वह, क्या करता है और क्यों रात-रात भर जब सब लोग सो जाते हैं, वह चुप-चाप किसी पेड़ के नीचे बैठा रहता है - उदास-गुमसुम जैसे तपस्या कर रहा हो।

मैं कब मिला था उनसे? मैं सोच की कितनी गहराइयों पार चला जाता हूँ।

कुबूल करता हूँ - हाँ, सच है कि मैं सत्यदेव शर्मा से मिला था।

वह एक बरसाती रात थी।

लगातार हो रही बारिश ने शहर की एक-एक चीज को भिगा दिया था। ठंडी हवाएँ चल रही थी - सर्द साँसें और अधिक सर्द हुई जाती थीं।

मैंने एक आदमी को पेड़ के नीचे खड़े देखा था। लगता था जैसे उसे बारिश की परवाह नहीं। पूरी दुनिया में उस समय वही एक अकेला आदमी था, जो बारिश से बेखबर था। मेरे शरीर पर रेनकोट था, मैं पास की सड़क से गुजर रहा था - तभी देखा था उसे।

ऐसा क्या था उस आदमी में कि मैं ठहरकर कुछ देर देखता रहा था, उसे। तब मैं समझ नहीं पाया था, लेकिन मेरे पाँव रुके हुए थे बहुत देर तक - शायद कोई कविता मेरे अंदर जन्म ले रही थी।

बारिश तेज हो रही थे - रात बढ़ रही थी और एक आदमी पेड़ के नीचे चुप-चाप खड़ा था। सामने कैनवास जैसी कोई चीज भीग रही थी - रंग की कुछ शीशियाँ - एक-दो कूँची।

वह हाथ में एक कूँची लिए खड़ा था। इस बात से भी अनासक्त कि कोई अजनबी उसे देर से घुरे जा रहा था। मैं बहुत देर तक उस बारिश में उसे देखता रहा था चुपचाप - बारिश और तेज होती जा रही थी - बिजली की कौंध से कभी-कभी पूरा दृश्य आँखों में उतर आता था - बाद इसके पूरा दृश्य एक घने कुहरे में तब्दील हो जाता था। मैंने कई बार सोचा कि उस आदमी से जाकर पूछूँ, तुम कौन हो? इस बारिश में अकेले खड़े क्या कर रहे हो? कौन हो तुम जिसे देखकर मैं ठिठक गया हूँ? लेकिन मैंने कुछ नहीं पूछा। देर तक बारिश और उसके बीच चुपचाप खड़े उस आदमी को देखता रहा।

कुछ देर बाद मैं बहुत भारी मन और थके कदमों को लिए घर चला आया।

बात बस इतनी-सी थी। लेकिन उस रात मेरे सपने में कुछ अजीब-अजीब दृश्य उभर कर आ रहे थे। नींद कई-कई बार खुली थी। मुझे याद है कि उस रात मैंने पूरे पाँच गिलास पानी पिया था - साथ उसके लगभग पाँच सिगरेट भी।

वह रात...।

रात दिन साथ चलता कथाकार पूछता है - सवाल पर सवाल। खीझ जाने की हद तक। क्यों और कैसे की गुत्थियों के बीच एक मैं और एक सत्यदेव। कभी कभी सोचता हूँ कि क्या साम्यता है उनमें और मुझमें?

उस रात जब मिला था इस सवाल वाले कथाकार से, हाँ, याद है बराबर, तब तीन बजकर पाँच मिनट हुए थे और नींद न आने के कारण मैं एक पुरानी किताब को अनायास पलट रहा था - उसी किताब के पन्ने में बैठा था वह। अचानक सामने आकर प्रकट हो गया। पहले तो मैंने पहचाना नहीं। बाद में उसने खुद ही बताया कि वह एक कथाकार है और अब कुछ दिन मेरे साथ ही रहेगा। अजीब पेशोपेश थी - अजीब मुश्किल। मैं पूछना चाहता था कि तुम क्यों आए हो और अब मेरे साथ क्यों रहना चाहते हो? मैं वैसे ही बहुत मुश्किल में हूँ - दफ्तर में मेरा बॉस मुझे कवि कहकर हो-हो कर के हँसता है और घर में पत्नी मुझे कविता लिखने के कारण निकम्मा घोषित कर चुकी है। अब यह कथा का शिगूफा लेकर आए हो तो किसलिए आए हो तुम कथाकार! मेरी जान वैसे ही कम आफत में थी कि अब तुम भी चले आए हो मेरी जान को साँसत में डालने के लिए...।

वह रात...।

लेकिन मैं मिला हूँ सत्यदेव से। वह इतना चुप रहते हैं कि हूँ हाँ से अधिक बोलते ही नहीं और आप सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं - मैं उनके बारे में बहुत कुछ नहीं बता सकता। आप खुद क्यों नहीं चले जाते? तसल्ली से उन्हीं के साथ रहिए, मेरे पास क्यों आ गए। मैं आपके किस काम का हूँ?

कथाकार कुछ नहीं बोलता। बस मुस्कुराता है - जैसे कह रहा हो तुम कितने भोले हो विमल बाबू।

हँसते क्यों हो? मेरे पास बहुत कम समय है। घर है। नौकरी है। बच्चे हैं। ऊपर से तुम क्यों आ गए हो। मैं पहले से ही बहुत परेशान हूँ यार। यह जो मेरी पत्नी है जो सो रही है, चादर तानकर - इसे झगड़ने की बुरी आदत है। मेरी किताबों पर इसकी सख्त नजर है। कभी उसके पल्ले पड़ गए तो कथा-वथा सब भूल जाओगे। इसलिए कहता हूँ। घर में मत आओ। बाहर रहो - कभी समय रहेगा तो तुमसे भी मिल लेंगे।

और जो मुझे मिलने का मन किया तो? वह उसी मुद्रा में बोलता है।

तब देखा जाएगा - तुम जाओ अभी। रात में आना 12 बजे के बाद।

मैं उसे टालने के लिए कह देता हूँ। ऐसा तो नहीं हुआ कभी पहले। मैं सोच में पड़ जाता हूँ - यह एक अप्रत्याशित और अनहोनी बात है जिस पर किसी को भी विश्वास नहीं होगा। पत्नी से कहूँ तो वह कल से ही ओझा-गुनियों के चक्कर में लग जाएगी। इसलिए मैं उसे तो नहीं ही बताऊँगा - मैं चुपचाप सोचता-सा बैठा रहता हूँ।

और पता नहीं कब वह चला जाता है - मेरी उम्मीद के खिलाफ...।

3.

तुम्हें याद हो कि न याद हो -
गा रही हैं आबिदा परवीन
इतिहास से आती हुई उसकी आवाज
वर्तमान को छेदती लगातार गूँज रही है
मरे हुए समय में
सिर्फ गीत ही जिंदा लगते हैं
मुझे क्यों बार-बार सुनाई पड़ता है वह रुदन
जो मेरे दोस्त की आखिरी चिट्ठी में दर्ज थे
क्यों याद आता है
उस रात के बाद का मौन
जब उसके शब्द चुक गए थे
खड़े थे पराजित मेरे सामने शर्मसार
ओ जो हममे - तुममें करार था
गा रही है आबिदा परबीन...।
शहर सुनसान है किधर जाएँ
गा रही है आबिदा परबीन
एक विशाल पेड़ की सभी चिड़िया
उड़ गई हैं
पता नहीं कहाँ किस मुलुक चली गई हैं
कोई मशीन चला रहा है
एक-एक शाखें कतर रहा है
मिट्टी से पानी की जगह
निकल रहा है काला तेजाब
आसमान का छत फट गया लगता है
टप-टप टपकता है
सदियों से संचित आँख का खारा पानी
खाक होकर बिखर जाएँ
गा रही हैं आबिदा परबीन

गीत चलता रहता है कि अचानक मोंगरे की एक तेज खुशबू उनके नाक के आस-पास महसूस होनी शुरू होती है। वे घर से निकल आते हैं। अकेले घर के कमरे में पुराना ताला बंद करते हैं। बारिश ने ताले में जंग लगा दिया है और इसलिए ही ताला लगाने में देर होती है, वे फौरन से पेश्तर उस घर जैसी जगह से कहीं दूर निकल जाना चाहते हैं।

बहुत पहले कमरे के दरवाजे पर नामपट्ट पर उनका नाम टंका होता था। अब सिर्फ पट्ट रह गया है, शब्द घिस कर लुप्त हो चुके हैं - वे शायद अपना नाम भूलने लगे हैं। बहुत दिन हुए जब हर कोई उन्हें उनके नाम से पुकारता था - उनका भी कोई नाम था। मेरा नाम सत्यदेव शर्मा है, वे अपना नाम खूब उत्साह और सही-सही उच्चारण करते हुए बताते थे।

लेकिन अब इतने समयों के पार नाम का सत्य मिटने लगा है, उनके अंदर बैठा कोई देव मर-सा गया है।

वे बाहर निकल आते हैं। घर के सामने तुलसी का एक छतनार पौधा है - उसे हसरत भरी निगाह से देखते हैं और सोचते हैं कि आज वे नहा नहीं सके। वे जब भी नहाते हैं तो तुलसी की जड़ में पानी जरूर देते हैं। पानी देते हुए तुलसी की ओर नहीं मद्धिम सूरज की ओर आँख होती है - आँख कुछ समय के लिए बंद हो जाती है। वे उस समय मंत्र भी बुदबुदाते हैं। यह बचपन में मठ में आए एक साधु ने सिखाया था। बहुत पुरानी बात है, जब दादा के साथ वे मठ में रहने लगे थे। पढ़ाई-लिखाई वहीं शुरू हो चुकी थी। घर पीछे कहीं छूट गया था - घर में रहने की यंत्रणाएँ धुँधली होने लगी थी।

फिर? कथाकार अचानक उपस्थित हो जाता है।

फिर...? वे घर से निकल कर एक चौराहे पर आकर बैठ जाते हैं। वे यहाँ रोज बैठते हैं चुपचाप। पता नहीं क्या सोचते रहते हैं...।

अरे, नहीं। मठ की बात बताओ प्यारे...। मठ में क्या हुआ उसके बाद? कथाकार मेरी आँखों में अपनी दृष्टि गड़ाए हुए है। जैसे लगता है - अपनी आँखों की चमक से मुझे सम्मोहित कर देगा। मैं उसके इस तरह के सवालों से हकबका जाता हूँ - जब-तब मेरे सामने आकर वह खड़ा हो जाता है। उसे देखकर मैं पहले तो घबरा जाता हूँ फिर खुद को संयत करते हुए उससे पीछा छुड़ाने के बहाने ढूँढ़ने लगता हूँ। लेकिन वह मेरी किसी बात की परवाह किए बिना मेरे साथ लगा रहता है जैसे वह मेरा अपना ही हिस्सा हो और मेरे साथ अपने पूर्ण अधिकार के साथ रह चल और बोल रहा हो।

तुम जाओ तो यहाँ से तुम मुझे पागल कर दोगे। मुझसे घाउंज-माउंज सवाल मत पूछो।

मैं अपनी बौखलाहट को दबाते हुए ही यह बात कह पाता हूँ।

इस बार वह सामने की कुर्सी पर आकर बैठ जाता है। इंतजार करता हुआ। मेरे कुछ कहने या बोलने का।

मैं सबसे पहले घर का मुयायना कर लेना चाहता हूँ। पत्नी अगर जगी रही तो मेरी बड़बड़ाहट को पागलपन समझ सकती थी। मैं बेडरूम में गया। बोतल से कुछ घूँट पानी पिया। बहुत करीब से मुयायना किया - वह सो रही थी। उसकी नींद बहुत कच्ची है - मैंने सोचा।

वह अब भी चेयर पर आराम से बैठा था - मेरा ही इंतजार करता हुआ। इस बार उसके हाथ में सुरती थी - अपने हथेलियों में उसे वह आराम से रगड़ रहा था।

तुम क्यों जानना चाहते हो, सत्यदेव के बारे में? एक चित्रकार जो पागलों की तरह हरकत करता है - हाँ, पागलों की तरह ही। उसकी हरकतें देखी हैं तुमने? तुम देखते तो कभी मेरे पीछे नहीं पड़ते इस तरह। वह एक मामूली इनसान है - हमारी आपकी तरह। वह...

वह क्या है इसके विवरण में मत जाओ। तुम बताओ उसके बारे में। वह बीच में रोकता है मुझे...। वह नाराज दिखता है, एकदम बेचैन। वह कुर्सी से उठकर टहलना शुरू करता है कमरे के इस कोने से उस कोने तक। किसी गहरी सोच में डूबा हुआ। मुझे लगता है कि सत्यदेव से ज्यादा पागल तो यही है - क्या किया जाए इसका?

क्या करोगे मेरा...? कोई उपाय है तुम्हारे पास? वह चिल्लाता है। उसकी आवाज में एक गहरी बेचैनी और पीड़ा है। मैं डर जाता हूँ इस बार...। वह सबकुछ समझता है, यहाँ तक कि जो मैं सोचता हूँ वह भी।

मेरी सोच तक में उसकी दखल है।

तुम खुद क्यों नहीं मिलते उससे?

तुम्हारे बिना मैं उससे नहीं मिल सकता।

क्यों भला?

इसका उत्तर मेरे पास नहीं। तुम जब रहोगे तभी वह मुझे दिखाई पड़ेगा। क्योंकि तुम समझो कि हम और तुम अभिन्न हैं। बस, सोच का अंतर है...।

क्या बकते हो तुम। तुम उस सत्यदेव शर्मा से भी अधिक पागल हो। पागल लोगों को पागल लोग आकर्षित करते हैं, ऐसा किसी किताब में लिखा है क्या?

लिखा भी होगा - तो मैं तुम्हें बताने की जरूरत नहीं समझता फिलवक्त।

मैं लाचार-सा उसे देखता रह जाता हूँ।

और वह बैठा रहता है देर तक यूँ ही। पत्नी पानी पीने के लिए उठ गई है। नल से पानी के गिरने की आवाज की ओर मेरा ध्यान है। वह जरूर आएगी यह देखने के लिए कि इतनी रात को एक कमरे के अंदर अँधेरे में मैं क्या कर रहा हूँ। उसे हमेशा शक होता रहता है कि मैं अँधेरे में कई दूसरी लड़कियों से फोन पर बातें करता हूँ। आप जानते हैं न फेसबुक के आने के बाद यह शक और बढ़ा है - यकीन की हद तक। और मेरे कंप्यूटर में इंटरनेट का कनेक्शन है। फेसबुक में मेरा प्रोफाईल भी है।

वह आती है। मैं कातर नजरों से उसकी तरफ देखता हूँ। और उस कथाकार की परवाह किए बिना उसकी अजीब सी आँखों का पीछा करते हुए अपने बेडरूम तक चला जाता हूँ।

कुछ देर बाद पत्नी सो जाती है - उसके नाक की धीमी और लयबद्ध आवाज उसकी गहरी नींद की सूचना दे रहे हैं।

मुझे देर तक नींद नहीं आती। मुझे बार-बार लगता है कि वह आस-पास ही कहीं हैं। कि वह कुर्सी से उठकर हमारे साथ ही यहाँ तक आया है - लेकिन दिखता नहीं। इस बार लगता है कि वह अदृश्य है। मैं धीरे से उठता हूँ और कमरे के अँधेरे में चला आता हूँ। कुर्सी खाली है। लेकिन उसके होने की गंध अब भी है उस अँधेरे कमरे में।

वह शायद चला गया है। मैं सुकून की साँस लेता हूँ।

 

 

4 .

एक शून्य घिर आता है...।

एक टाली का घर। तीन टिनहे बक्से। एक चौकी जिस पर पता नहीं कितने समय से फाल्तू कह दिए जाने लायक समान रक्खे हैं। पूरे घर में दो कैनवास, जो बारिश के पानी से सड़ चुके हैं। उन पर पता नहीं कितने दिन से कपड़े को कसकर उसे कैनवास का रूप दिया गया है। कैनवास पर कोई रंग नहीं। अगर रंग है कोई - तो वह स्याह है।

घर में अँधेरा है।

यह सत्यदेव शर्मा का घर है। असल में उनका नहीं। किराए का घर है। जिसमें वे पता नहीं कितने दिन से रह रहे हैं।

पूछा नहीं कभी? कथाकार की जिज्ञासा है।

मैं चुप रहता हूँ...।

देखिए मैं पहले ही बता दूँ कि मुझे कुछ कविताएँ वगैरह लिखने का शौक रहा है। कुछ एक कहानियाँ भी लिखी हैं। क्या तो, कुछ लोगों को मेरी कहानियाँ बहुत पसंद हैं, और कुछ लोग मेरी कविताओं की तारीफ करते हैं। कुल मिलाकर एक गुमनाम लेखक से ज्यादा की हैसियत मैं खुद का नहीं समझता। मेरे लिखने को लेकर मेरे घर वाले खुश नहीं हैं। सबसे अधिक झगड़े मेरी कविताओं की वजह से मेरी पत्नी करती है। मैं छुप-छुपकर कविताएँ लिखता हूँ और कवि गोष्ठी रही कहीं अगर तो ऑफिस का बहाना कर के घर से बाहर निकलता हूँ। हर समय मेरे साथ एक भय और एक अनजाना-सा दबाव साथ-साथ चलता रहता है। मैं डरपोक और अकेला होता जा रहा हूँ। लेकिन कुछ दिनों से इस एक नए और अजीबोगरीब मुश्किल में हूँ। वह आकर मेरे पास बैठ जाता है और तरह-तरह के सवाल पूछता है।

वैसे पहली मुलाकात सत्यदेव शर्मा से किन हालात में हुई थी - मैं बता चुका हूँ। लेकिन हर समय उनके साथ रहना-घूमना और एक-एक बातें जानना तो आसान नहीं है न। घर परिवार के अलग झमेले हैं, ऑफिस भी है। रोज घर से निकलते वक्त भगवान से प्रार्थना कर के निकलता हूँ कि नौकरी बची रहे। मेरे साथ के ही सात लोगों को एक ही दिन कंपनी ने निकाल बाहर किया गया था। बिना कारण बताए। लोग कहते हैं कि यह लोकतंत्र है, लेकिन यहाँ कुछ भी कहने की आजादी हुई नहीं है। आप बोल के देखिए। वह एक कवि हैं न हिंदी के? क्या तो कहते हैं कि 'क' लिखते ही कत्ल कर दिया जाता है एक कवि। यही आपका लोकतंत्र है... हुँह...।

छोड़िए जी इन सब बातों से आपको बोर करने का क्या लाभ? लेकिन इस सत्यदेव का क्या करें। अच्छा होता उनको मैंने उस बारिश की रात देखा ही न होता। कम से कम यह मुसीबत तो गले नहीं पड़ती।

बाद उसके ही यह आदमी न दिन देखता है न रात। न घर देखता है न दफ्तर। चला आता है दबे पाँव और खड़ा होकर मुस्कुराता है। मैं झेंपता रहता हूँ, डरता रहता हूँ, मेरे दिल की धड़कन बढ़ती रहती है और वह चुप-चाप मुस्कुराता रहता है। मैं सोचता हूँ कि यह दुनिया का सबसे खुशमिजाज इनसान है - इसके पास कोई तनाव नहीं। वर्ना इस कठिन समय में इतना कौन मुस्कुरा सकता है भला - वह भी लगातार!

हर समय कथा। पता नहीं उसको सत्यदेव की कथा में इतनी दिलचस्पी क्यों हो गई है - वैसे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मेरी भी इस पात्र में थोड़ी बहुत दिलचस्पी तो हुई है लेकिन यह कथाकार मुझे अपनी उपस्थिति से हद दरजे तक बेचैन और परेशान किए दे रहा है। खैर, आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि क्या होता है - और कि आपसे गुजारिश है कि कृपया आप साथ रहें।

बरगना इस जहाँ में मुस्कुराता कौन है यानिकि दास्तान-ए-सत्यदेव की पहली किस्त

सत्तर के दशक की बात होगी।

तब उनकी उमर बारह-तेरह साल की रही होगी। छपरा जिले का एक धुर गाँव। भाषा भोजपुरी, ठाट भोजपुरी और रहन-सहन पूरी तरह से किसानी। गाँव का नाम अगर न भी लिखें तब भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि भोजपुरी अंचल के गाँव लगभग एक ही तरह के होते हैं। दूर तक फैला खेत-बधार। गीत गवनई। भगुआ-चैता और मेहररुई गीत। एक तरह की बेपरवाही और बिंदासपन। घर में रोटी न हो तब भी गीत गवनई में कोई कमी नहीं होती थी। भिखारी ठाकुर के गीत तब एकदम ताजा थे। छपरहियों को तब भिखारी के नाम से ही लोग पहचानते थे। महेंदर मिसिर की किंवदंतियाँ। मेला ठेला तीज त्योहार। विदेसिया नाच और उसमें पूरबी गाने वाले लौंडे।

गीत से उस दस-बारह साल के लड़के को बहुत प्रेम था। लउंडा का नाच वह इसलिए देखने जाता कि उसे पूरबी सुनने को मिलता। पूरबी एक खास किस्म का गीत है जिसमें पुरुष रोजी-रोजगार के लिए पूरब के देश चला जाता है और स्त्रियाँ उसके विरह में जो सोचती हैं उसको गीत का विषय बनाया जाता। ऐसा क्या था उस गीत में जो बारह साल के इस लड़के को अपनी ओर खींचता था।

उसके लिए कोई पुरुष नहीं गया था पूरब के देश। बस उसकी अपनी माँ चली गई थी। वह बहुत छोटा था तभी। दादा यही कहते थे - वह दूर देश चली गई है। वह उस दूर देश को पूरब के देश से पहचानता था और गीत सुनते हुए पूरबी का सारा विरह उसके सीने में उतरता चला जाता था।

एक पुरुष औरतों की तरह सजकर नचनिया बन जाता था। नाचता जाता था डूगी -नगाड़े की ताल पर। वह चुपचाप सुनता जाता था। कई-कई बार उस नचनिया के चेहरे में अपनी माँ के चेहरे को ढूँढ़ता हुआ।

भुनेसर की लड़की का बियाह था। बारात आई थी - समियाना लगा था। शोर हुआ था कि विदेसिया नाच आ रहा है। जरूर नगेसरा भी आएगा - दादा को कहते हुए सुना था उसने। नगेसरा की अपनी विदेसिया पार्टी थी - उसकी उम्र हो गई थी लेकिन आवाज में वही उठान और दर्द था। जब वह पूरबी गाता था तो लोग रोते थे। नोट की बौछार होती थी उस पर। नगेसरा का गीत कभी नहीं सुना था उसने। सुनकर मन ही मन बहुत खुश हुआ कि वह नगेसरा का गीत सुनेगा।

बाबा, सुना है नगेसर का विदेसिया नाच आ रहा है? वह सवाल लिए खड़ा हो गया दादा के पास।

हाँ सोर है चारों ओर। पचास हजार दहेज दिया है भुनेसर ने। नगेसर के नाच से कम ले आएँगे तो इज्जत रहेगी? चान बिजुलिया की औकात नहीं, नगेसरा तो आ ही सकता है।

चान बिजुलिया? क्या वह नगेसरा से भी बड़ा नाच है?

अरे, वो लेडी का नाच है। वह सब नाच सरीफ लोग थोड़े देखते हैं। ऊ सब माफिया लोगन के यहाँ जाती हैं। पुलिस आती है। बड़ा झमेला है उसके नाच में। हम नहीं देखे कभी। और खबरदार तू भी मत देखना।

अच्छा...। पर क्यों दादा?

कह दिया न सरीफ लोग नहीं देखते वह नाच। समझे गए कि नहीं।

हम्म...।

दादा अपने काम में लग जाते हैं। वह कुछ देर इंतजार करता है फिर वापिस लौट जाता है।

गाँव के बाहर शामियाना लग गया है। शामियाने के पीछे रेंवटी लगी है, जो इस बात का संकेत है कि बारात में नाच-पार्टी भी आएगी। रेंवटी नचनियों के सजने-सँवरने की जगह होती है जो मूल शामियाने से लगी टेंट की तरह तान दी जाती है। नाच-पार्टी अपने साज-साजिंदों और नचनियों के साथ वहीं अपना डेरा जमाते हैं। ठीक उसके सामने पर्दा लगा होता है और पर्दे के आगे चौकियाँ बिछाकार मंच जैसा बना दिया जाता है। इसी मंच पर लउंडे नाचते हैं और एक तरफ साजिंदे बैठे हुए हारमोनियम, तबला और डुगी-नगाड़ा बजाते हैं। इस मंच पर ही पाठ भी खेला जाता है - विदेशिया नाच में बेटी बेचवा, सत्ति बिहुला, सारंगी-सदाबृक्ष आदि नाटक मंचित किए जाते हैं जिसे लोग पाठ खेलना कहते हैं। नगेसर की उम्र हो गई है लेकिन सत्ति बिहुला में वह बिहुला का पाठ लेता है - वह गीत-गाते हुए जब विलाप करता है तो लोग गमछे से अपनी आँख पोंछते हैं। तो ऐसे ही थोड़े है, कहते हैं कि नगेसरा भिखारी ठाकुर का चेला है - नाटक और अभिनय उसने भिखारी ठाकुर से सीखा है। आज भुनेसर की लड़की की शादी में उसी नगेसर की पार्टी आ रही है। लोग खुश हैं लेकिन सबसे ज्यादा खुशी सत्यदेव को है। वह कई बार शामियाने का चक्कर लगा चुका है। सैफू को कोई खास खुशी नहीं है - उसे लउंडों का नाच पसंद नहीं। वह लेडी का नाच देखता है और रंडियों को पैसे दिखाकर टिटकारी मारता है और उन्हें ललचाकर अपने पास बुलाता है।

बारात आ गई है - पैट्रोमेक्स जल चुके हैं। रेंवटी में नाचपार्टी सज रही है - पाऊडर और सेंट की खुशबू से शामियाना महक उठा है।

घर नहीं आते सत्यदेव। सीधे शामियाने की ओर चले जाते हैं। गाँव के अँधेरे से दूर शामियाने में गैस की सनसनाहट के बीच रोशनी के कतरे दूर खेतों तक विखर रही है। उनके कदम तेज हो जाते हैं। चौकियाँ लग गई हैं। उसके पीछे रेंवटी बँधी है और उसके आस-पास नचदेखओं की भीड़ जमी है। लौंडे तैयार हो रहे हैं। एक अधेड़ आदमी पास ही में बैठा बीड़ी पी रहा है। नगेसरा है यही - एक आदमी धीरे से बुदबुदाता है।

सत्यदेव सबकुछ भूलकर नगेसर नचनिया को देख रहे हैं। तभी पीछे से कोई आकर उन्हें पकड़ लेता है - वे चिहुंक जाते हैं। पीछे हकबकाकर ताकते हैं - सैफू है।

तुम्हें खोजते हुए मियंटोली गए थे - उनकी शिकायत है।

सैफू हँस रहा है

बारातियों के आगे मैली और फटी दरी पर एक जगह बनाकर दोनों बैठ जाते हैं। सैफू और सत्यदेव। वे दोनों मुयायना करने आए थे लेकिन अब इस उजाले और सजी हुई महफिल को देखकर उन्हें फिर घर लौटने का मन नहीं होता। नगेसर के नाच ने सबकुछ भुला दिया है - मरछिया की मार। उसका डर सबकुछ।

हारमोनियम बजना शुरू होता है - डूगी-नगाड़े की लयबद्ध आवाज बजने लगी है। लोग झूमने लगे हैं। एक-एक कर नचनिया मंच पर आ रहे हैं - पहले प्रार्थना होगा।

सत्यदेव को इंतजार है नगेसर का। उसे पूरबी सुननी है - नाच में उसका मन नहीं रमता। वह पीछे लगे परदे को देख रहा है। परदे पर एक बूढ़ा आदमी पगड़ी बाँधे लाठी लेकर खड़ा है - एक सुंदर औरत उसके पास नृत्य की मुद्रा में चित्रित है।

भूख भी लग रही है। याद आता है कि बिना खाए चले आए हैं। मरछिया का चेहरा याद आता है। सुबह के बारे में सोचकर रूह काँप जाती है सत्यदेव की - वे नगेसर की पूरबी में सबकुछ भूल जाना चाहते हैं।

लेकिन प्रार्थना के बाद नाच शुरू है...। डूगी बज रहा है - नाच हो रहा है। जोकर हँसा रहा है...। अश्लील फब्तियाँ कस रहा है। पीछे बैठा एक मोटी मूँछों वाला आदमी दुनलिया से कभी-कभी फायर करता है। लोग उसकी ओर देखते हैं - वह मूँछों पर ताव देता अपने कंधे से दुनलिया टिकाए शान से बैठा नाच देख रहा है।

मंच पर नगेसर आ चुके हैं। लाल रंग की साड़ी पहने नगेसर पहले सुमिरन करते हैं, सरस्वती वंदना। ऐसा लगता है जैसे मंच पर कोई दिव्य दृश्य तैयार हो गया हो। सत्यदेव के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बार-बार वह स्वयं को झटकता है - आह कितना दिव्य लग रहा है नगेसर का चेहरा।

सैफू बीड़ी सुटक रहा है दूर खेत की तरफ जाकर।

भूल गया है सत्यदेव सबकुछ। सैफू कब चला गया उसे याद भी नहीं। पूरबी की तान में डूबता उतराता वह भूल गया है अपनी मरछिया की पिटाई। पीठ पर पड़े सरके की दाग।

नगेसर को वह बार-बार कई बार देखता है - उसे लगता है कि उसकी अपनी माँ का चेहरा नगेसर से कितना मिलता है। वह माँ ही है - वह माँ जो किसी दूर देस चली गई थी - अब आ गई है यहाँ नगेसर की शक्ल में...। भूल गया है वह सबकुछ। पूरबी उठ रही है गिर रही है, बजता है डूगी नगाड़ा हारमोनियम और तबला और आँखों में नदी की धार उतर आई है सत्यदेव के। वह भूल गया है सबकुछ कि भूल जाना चाहता है - यह संसार कितना मनोरम है। इसी संसार में वह लगातार धँसता चला जा रहा है। इस बात से अनजान कि उसका एक घर है जिसमें मरछिया रहती है - जो कई-कई बार उसे खाना नहीं देती और इस तरह यदि वह नाच देखता रहा कि पता नहीं उसके इसके लिए कितनी निर्मम सजा मिलेगी।

भूल गया है वह सबकुछ - देर रात तक पूरबी की तान उठती और गिरती रहती है और वह तमाम भौतिक चीजों से बेपरवाह एक अलग दुनिया में लगातार उड़ रहा है - निस्पृह और नादान।

5.

अचानक मेरी नींद खुल गई थी। ऐसा अक्सर होता है मेरे साथ। मैं कोई बुरा सपना देखता हूँ और डर के मारे बहुत जोर से चीख पड़ता हूँ। जितनी ताकत हो सकती है चिल्लाने की एक आदमी के अंदर उतने ही जोर से। शुरू में पत्नी डर जाती थी। लेकिन अब ध्यान नहीं देती। मैं चिल्लाता हूँ और वह कुछ क्षण के लिए कुनमुनाती है और फिर सो जाती है।

लेकिन आज मैं चिल्लाया नहीं। चुपचाप उठ बैठा। लगा कोई बहुत देर से मुझे जगा रहा था।

अन्हुआया-सा मैं फिल्टर की ओर जाता हूँ, गला सूखता-सा लगता है। मुझे पानी की जरूरत है। एक गिलास पानी एक ही साँस में पी जाता हूँ।

बाहर कोरिडोर और उसके पार सब कुछ शांत है। मोबाइल में दो बजता हुआ दिखता है। वॉलपेज पर हनुमान जी की तस्वीर देखकर मुझे राहत महसूस होती है। मैं डरने के बारे में सोचना बंद कर देता हूँ। जब डर लगे तो डर के बारे में सोचना बंद कर दो। किसी कविता के बारे में सोचो या किसी कहानी के किसी पात्र के बारे में, बहुत समय पहले की कहीं पढ़ी हुई यह बात याद आ जाती है। मुझे लगता है कि कोई है जो मेरे साथ चल रहा है, मेरी हर गतिविधि को ध्यान से देखता हुआ।

कहीं फिर तो नहीं आया वह?

मैं मुआयना कर लेना चाहता हूँ। मैं बहुत धीमे कदमों से अपने किताबों वाले कमरे की ओर बढ़ता हूँ।

और वह सचमुच बैठा है। वहीं, ठीक उसी जगह जहाँ उसके होने की कल्पना की थी मैंने। चुपचाप मंद-मंद मुस्कुराता हुआ। जैसे मेरे ही इंतजार में बैठा हो और आश्वस्त हो कि मुझे तो आना ही था।

आओ, बैठो। वह बहुत प्यार और सहानुभूति से आदेश देता है। मैं कुछ देर पता नहीं किस सोच में डूबा उसे देखता रहता हूँ। मुझे लगता है कि दरअसल मैं जगा नहीं और मैं अब भी एक गहरी नींद में हूँ।

मैं दीवान पर बैठ जाता हूँ। वह कुर्सी पर ही है। मैं देखता हूँ मेरे अंदर बहुत सारे प्रश्न हैं, डर है, खीझ है, बेचैनी है, पीड़ा है। इनका एक कोरस उस समय मेरी आँखों में उतर आया हुआ लगता है। वह लगातार मेरी आँखों में देखता जा रहा है।

देखो, मैं तुम्हारा मुखालिफ नहीं हूँ। मैं उस आदमी के बारे में लोगों को बताना चाहता हूँ। वह 'डिजर्व' करता है। मैं चला जाऊँगा। लेकिन यह काम करना है मुझे पहले। इसमें तुम्हारा सहयोग चाहिए। तुम भूल क्यों नहीं जाते कि तुम एक साधारण इनसान हो? साधारण मतलब घरेलू। जब तक तुम नहीं भूलोगे यह बात, तुम जीवन भर कलम घिसते रहोगे, कोई झाँट नहीं पूछेगा तुमको। देखो, मेरी बात का बुरा मत मानो। मैं तुम्हारी भलाई के लिए ही आया हूँ।

हम्म...। मैं उसे विस्मित-सा उसे घूरता रहता हूँ।

तो तुम निकलो अपने डर से। और चलो साथ चलते हैं। तुम्हें बाहर निकलने की जरूरत है। इस घर से और घर के अंदर की ऊब से। थोड़ा बिंदास बनना है। बिंदास मतलब समझते हो ना?

मैं अब भी एकटक देख रहा हूँ उस रहस्यमय आदमी को जो खुद को कथाकार कहता है। मैंने कहानियाँ तो लिखी हैं, कविताएँ भी लिखी हैं लेकिन ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि किसी रहस्यमय आदमी ने मुझे इस तरह परेशान किया हो।

तुमने ही जगाया मुझे?

हाँ, मैंने ही।

इस वक्त?

हाँ, इस वक्त...।

क्यों?

बताता हूँ। लेकिन तुम्हें मेरे साथ चलना होगा अभी...।

कहाँ?

यह सवाल पूछना पहले तुम्हें बंद करना होगा। चिरकुट की तरह बात मत किया करो यार। बोलो तैयार हो? हाँ या ना?

मैं क्या जवाब दूँ। ऊहापोह तो है लेकिन पता नहीं क्यों इस आदमी में कैसा तो आकर्षण है कि 'हाँ' कह देने का मन करता है। सोचता हूँ कि इसी के साथ कहीं निकल जाऊँ - किसी खोह में, किसी जंगल या किसी वीरानगी में। सात-आठ साल के जीवन - मतलब घरेलू जीवन में पता नहीं कितनी बार सोचा है कि चला जाऊँगा। कहीं भागभूग जाने की जुगत में कई-कई बार रातभर घर से बाहर भी रह चुका हूँ। और भी बहुत कुछ किया है, क्या-क्या बताऊँ आपसे। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी ने इस तरह मुझे परेशान किया हो।

मैं... देखो, मैं अभी कुछ कह नहीं पा रहा। अभी वह जग जाएगी।

तुम सोचते बहुत ज्यादा हो। एक लेखक को इस तरह नहीं सोचना चाहिए जैसा कि तुम सोचते हो।

लगता है वह जग गई है।

मैं हड़बड़ाहट में विस्तर पर दुबक कर लेट जाता हूँ। ऐसे कि जैसे रात में पत्नी के कमरे से आकर इस अकेले अँधेरे कमरे में सो गया हूँ।

उसके कदमों की आहट सुनाई पड़ रही है - साफ-साफ। मेरे दिल की धड़कन और उसके पैरों की चाप मिलकर एक होती जा रही है। वह आते ही मुझे झकझोर देगी। मैं कल्पना कर रहा हूँ कि उसके हाथ मेरी ओर बढ़ रहे हैं और वह गुस्से में है।

मैं कल्पना करता हूँ कि उसकी चीखें दीवारों को चिरती हुई बाहर जा रही हैं - कल सुबह जब मैं उठूँगा तो पड़ोस के खन्ना अंकल मेरी ओर एक अजीब निगाह से देखेंगे। तिवारी जी एक मस्त हिदायत ऑब्लिक सलाह दे देंगे और हूहूहू कर के हँसेंगे और मेरा मन करेगा कि अपने दोनों हाथ से उनका मुँह चाँप दूँ। मान लीजिए अगर कोई कुछ नहीं बोलेगा तब भी उसकी निगाह में उसके चिल्लाने का चित्र साफ-साफ देख ही लूँगा मैं।

लेकिन मैं आँख बंद किए रहता हूँ - कहीं कोई हरकत नहीं होती।

तो क्या वह नहीं आई? तो क्या यह मेरा भ्रम था। तो क्या यह मैं सपना देख रहा हूँ।

एक नरम हाथ मेरे गाल को छूते हुए लगते हैं।

पापा, उठो कब की सुबह हो गई। यह अंकू है।

मैं हड़बड़ा के आँख खोलता हूँ। सामने वह मुस्कुरा रहा है। स्कूल जाने के लिए पूरा तैयार।

अले, मेला बेता तैयाल हो गया? मैं खुश हो जाता हूँ कि यह कोई सपना था।

किट्टू भी तैयार हो गया है। और जानते हैं पापा, वो टी.वी. देख रहा है।

और मम्मी? मैं पूछता हूँ।

वह तो किचेन में है।

मैं चुपचाप एक भर गिलास पानी पीता हूँ और बाथरूम की ओर रुख करता हूँ। इस बीच एक बार पत्नी से मेरी आँख मिलती है। वह गुस्से में घूरती है मुझे - मैं दुबक कर बाथरूम की ओर बढ़ जाता हूँ।

और मैं वह हूँ कि गर खुद पे कभी गौर करूँ यानि दास्ताने सत्यदेव की दूसरी किस्त

सत्यदेव पूरबी में खोए रहते हैं। उसके बाद नौटंकी। बाच-बीच में नगेसर की पूरबी होती है - उसके लालच में बैठे रहते हैं। इस बीच सैफू बीड़ी फूँकता रहता है - नौटंकी से बोर होकर वो सैफू के पास चले आते हैं सामियाने के बाहर खेत में। सैफू हर बार की तरह पूछता है।

बीड़ी पिएगा बाबा?

नहीं, रहने दे नशा हो गया तो?

कितनी बार कहा कि ये बीड़ी है - चरस या गाँजा नहीं। बोल पिएगा? जलाऊँ? नींद भगाने का सबसे अच्छा उपाय है।

तूने कहा था न कि खैनी में नशा नहीं। खाने के बाद चक्कर आए थे कि नहीं? उल्टी हुई थी कि नहीं? मरछिया से कितनी मार पड़ी थी, याद है न?

पतरकी, उस साली का तो एक दिन हिसाब कर देंगे। सैफू मौज में आ गया लगता है।

सत्यदेव को उसकी बात अच्छी नहीं लगती। वह उसके हाथ से उसकी बची हुई बीड़ी ले लेता है।

अरे बाबा, काहे हमको दोजख में भेज रहे हो। मियाँ की जूठी बीड़ी पियोगे?

मैं मियाँ हिंदू यह सब कुछ नहीं मानता। आदमी को मानता हूँ। देखा नगेसर पूरबी में क्या गा रहा था - सबसे ऊपरा मानुख तार ऊपर कोउ नाहीं। तूझे बीड़ी फूँकने से फुरसत होगी और रेंवटी में नवछेटिया लउंडों को देखने से छूटोगे तब तो मरम समझोगे न।

नगेसर फिर मंच पर था - पिया मोर गवनवा कइलें जालें बदरी में...। खींचा चला गया सत्यदेव। निस्सार है सबकुछ। सब मिथ्या है, जीव-जगत सबकुछ। माया है। पिता फँसे हैं, दूसरा ब्याह कर के लाए। उस पतरकी ने जीना हराम कर रखा है, क्यों। क्या लेकर जाएगी। मरेगी तो कौन होगा उसके आस-पास। कोई कितने दिन तक बरदास करे। पिता तो मउग हो गए। आह, क्या दर्द है नगेसरा की आवाज में। लगता है माँ की ममता फूट-फूट पड़ रही है - यह तो बहुत बड़ा साधु है। कोई सिद्ध पुरुष। दुसाध के घर में जन्म लेकर यह हुनर, यह कला। साक्षात सरस्वती गा रही हैं, उसके वेश में।

रात गहराती जा रही है।

सत्यदेव को बीड़ी लग गई है। नींद क्या खतम होगी। गीत खतम होते न होते सामियाने की धूल भरी दरी पर वह लुढ़क जाता है। सैफू नौटंकी देखने और लौंडों को टिटकारी देने में व्यस्त है। दस-दस के चार नोट दिखाता है - होय-होय का हल्ला हो रहा है। ...और सत्यदेव बेखबर। नाक बजने लगी है - और नाच के संगीत में खो गई है कहीं। नाच पार्टी थकने लगी है लेकिन रात भर का साटा है - उसे तो पुराना है...। नहीं तो सुबह पैसे को लेकर चख-चख।

सुबह एक अलग तरह की होती है उस दिन।

रामबरन आगे-आगे। सत्यदेव पीछे-पीछे। शामियाने से सीधे घर की तरफ जाते हुए। दोनों चुप।

सुबह खोजते हुए रामबरन यानि सत्यदेव के पिता शामियाने तक पहुँचते हैं और धूल में लोट रहे सत्य को उठाकर ले जा रहे हैं घर।

मरछिया का फरमान है।

सत्यदेव जानता है कि मरछिया तक पहुँचाकर रामबरन की ड्युटी खतम हो जाएगी। फिर मरछिया का नाटक शुरू होगा। सैफू ठीक ही उसे मेहरारू नहीं, मेहरार कहता है। औरतों में जो मर्द औरते होती हैं वो मेहरारू नहीं मेहरार होती है - सैफू ऐसा ही कहता है और जोर-जोर से हँसता है। मरछिया सत्यदेव की मएभा महतारी (सोतेली माँ) है।

सत्यदेव की माँ सुगनी देवी सात साल पहले खून की कमी से मर गई थी। सुगनी देवी रामबरन की पहली पत्नी थी। पेट से थी - लेकिन बहुत कमजोरी।

तब सत्य सिर्फ तीन साल का था। सत्य को माँ का धुँधला चेहरा याद है। उसके सपने में हड्डियों का एक ढाँचा आता है बार-बार जिसके मुँह से बहुत मुश्किल से आवाज निकलती है...। वह पानी माँगती है और वह दौड़कर लाने जाता है सुराही तक। आकर देखता है तो खाट खाली है...। लोग उसे बाँस के खटोले पर कहीं ले जा रहे हैं...। राम नाम सत्य है कि गूँज से हर बार उसकी नींद खुल जाती है...। वह डर और पसीने से हदस जाता है...। लेकिन कोई नहीं दिखता कहीं। पास के पेड़ पर एक उल्लू रोता रहता है रात-भर।

फिर कुछ दिन बाद बाजे बजते हैं। पिता के साथ डोली में वह सहबाला बन कर जाता है, उनकी शादी में सरीक होने। अपनी दूसरी माँ को लाने।

माँ दुबली-पतली है जब आती है तो सत्य को उससे मिलने में शर्म नहसूस होती है। वह सैफू को बताता है माँ के बारे में।

बाद में सैफू मिलता है तो मरछिया देवी का दुबला-पतला चेहरा देखकर उसका नाम पतरकी रख देता है। तब से जब भी बात होती है - सैफू उसे पतरकी ही कहता है। सत्य को शुरू में अपनी दूसरी माँ के लिए यह संबोधन अच्छा नहीं लगता। लगता तो अब भी अच्छा नहीं है - लेकिन अब माँ के प्रति उसके हृदय में जज्बात का कोई रेशा शेष नहीं है। वह अनासक्त हो गया है और इस अनासक्ति के साथ ही उसकी अपनी माँ की स्मृतियों का ग्राफ थोड़ा बढ़ गया है। दुःस्वप्न की अवधि और अधिक बढ़ गई है।

जब घर पहुँचे रामबरन और सत्यदेव तो पतरकी दुआर पर ही खड़ी मिली। दादा चौकी पर बैठकर पूजा कर रहे थे। उनकी भी उम्र हो गई थी। उनका कहीं आना-जाना बंद के लगभग हो गया था। सत्यदेव ने जब पतरकी को देखा तो उसका खून सूख गया। बोली की परवाह नहीं थी उसे। गाली-गलौज का तो वह पहले से ही अभ्यस्त हो चुका था, लेकिन मार की याद आते ही अंदर कहीं कुछ दरकने लगा था।

वह एक अपराधी की तरह खड़ा हो जाता है - दुआर पर। माँ कहने में अब जिसको शर्म आती है, वह माँ दाँत पीसती खड़ी है। पिता चुपचाप अपने काम में लग जाते हैं। दादा लगातार मंत्र पढ़े जा रहे हैं। हवा रुक गई है, पृथ्वी रुक गई है, पाखियों ने चह-चह करना बंद कर दिया है। गाय का बछड़ा चुप है अपने खूँटे से बंधा। चरनी पर बँधी गाय नाद में मुँह ढुकाए, खेसारी के दाल का एक दाना खोज रही है।

इन सबके बीच सत्यदेव जैसे शून्य में खड़ा है। और उसके सामने खड़ी है, वह स्त्री जिसे डोली में बैठाकर लाया था वह अपने पिता के साथ। सहबाला बना था।

बीच में कुछ नहीं है।

कुछ समय बाद वह एक अँधेरे बंद कमरे में पड़ा है। हिचकियाँ लेकर रोते हुए। माँ... माँ... की एक ऐसी ध्वनि निकल रही है - इतनी करुण कि घर की दीवार पिघलने लगती है। धरती डोलने लगती है। प्रलय जैसा कुछ आने-आने को है। अँधेरे घर में ऊपर के दरवाजे से रोशनी के कुछ कतरे आते हैं। सामने की दीवार पर पड़ रही रोशनी की ओर लगातार उसकी नजर है। पीठ पर छाकुन के निशान हैं, असह्य दर्द से वह ठीक तरह कराह भी नहीं पा रहा। पीड़ा और क्षोभ से चेहरा विकृत हो आया है - आँख के सामने अँधेरा छाने लगा है।

कि देखते-देखते दीवार की वह रोशनी एक शक्ल में बदलनी शुरू होती है।

यह क्या, कौन यह? सिसकी कम होने लगती है। दीवार पर एक स्त्री का चित्र उभरता है - पहले वह चित्र नगेसर नचनिया की तरह लगता है - फिर वह शक्ल एक कमजोर स्त्री में बदल जाता है - वह स्त्री कुछ बोलना चाहती है, लेकिन उसके मुँह से आवाज नहीं निकलती।

माँ कहकर सत्यदेव उस आकृति की ओर दौड़ता है... लेकिन प्रकाश की किरणें उसके शरीर पर आ जाती हैं। दीवार स्याह अँधेरे में बदल जाती है। वह निरीह चुप और हताश पत्थर की तरह खड़ा रह जाता है, पता नहीं कितनी देर तक।

नीचे कोयले के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। जिस घर में वह बंद हैं, वहाँ जलावन का सामान रक्खा जाता है। कोयला, गोइंठा, फारी हुई लकड़ियाँ बाजरे-ज्वार के ढाठे। किरासन तेल और कुछ तेल में सने अनुपयोगी जूट।

हाथ में कोयला उठाते हुए वह सोचता है कि अपनी माँ... अपनी माँ जो कहीं दूर देस चली गई है उसका चित्र बनाए। वह आँख बनाता है, कान और एक पिचके गालों वाला चेहरा। वह लगभग उसके द्वारा बनाई गई पहली आकृति है। चिरईं-चुरूँग और फूल पत्ती से अलग एक जिंदा तस्वीर - जो बोल बतिया सकने के लायक है। कोयले से बनी वह स्याह तस्वीर - जिसकी साँसें चलती हैं। हिचकी रुक जाती है, आँसू सूख जाते हैं। चेहरे पर एक शांत भाव उभर आता है, जिसे आभा कहते हैं शायद...।

उसे सजा दी गई है और उस कोयले और गोइठे से भरे एक अँधेरे घर में बारह-तेरह साल का वह लड़का सो रहा है, एक रात, एक दिन, दो रात। बिना खाए-पिए। दीवार पर बनाई एक आकृति के सहारे।

एकदम निःशब्द।

6 .

नींद क्यों रात भर नहीं आती
गा रही हैं आबिदा परबीन
पूरी कायनात सो रही है
देश सो गया है
लोग सो गए हैं
पेड़ के पखेरू चले गए हैं स्मृतियों की काली दुनिया में
जाग रहा है कोई एक पागल फकीर
दुनिया की फिक्र में सर खपाता
कोई उम्मीदबर नहीं आती
गा रही हैं आबिदा परबीन

नींद नहीं आ रही। आँख बंद करते ही लगता है कि वह आकर मेरे सामने खड़ा है। पत्नी मुझे जगा हुआ देखकर एक अजीब निगाह से घूरती है। शायद वह कहना चाहती है कि क्या बात हैं, नींद क्यों नहीं आ रही है। लेकिन यह पूछना उसके लिए काफी मुश्किल लग रहा है। कई बार हम किसी से खराब बातें आसानी से कर लेते हैं, लेकिन कोई अच्छी बात कहने के पहले हमें शर्म आती है। संबंध एक ऐसे धरातल पर चले जाते हैं, जहाँ अच्छी बातें अटपटे मुहावरे की तरह आती हैं, एकदम अप्रत्याशित, जिनके बारे में सोचकर हम शर्मिंदा हो जाएँ थोड़ी देर के लिए।

वह कई बार देखती है। हर बार अलग-अलग नजरों से। मैं बताना नहीं चाहता कि रात को वह आता है, मुझे कहीं ले जाने को और दूसरी ओर करवट बदल लेता हूँ।

पत्नी पानी पीती है। चेहरे पर बोरोलीन मलती है। अंत में मुझसे एक नजर मिलती है उसकी, फिर वह लाइट बुझाकर बिस्तर पर निढाल हो जाती है। मैं कहना चाहता हूँ कि लाइट जलती रहने दो, मुझे अँधेरे में डर लगेगा, लेकिन चुप रहता हूँ। बस एक कातर नजर से मैं देखता हूँ उसकी तरफ और झूठ-मूठ आँखें बंद कर लेता हूँ।

लाइट बंद होते ही मेरी आँखें खुल जाती हैं। कुछ समय पहले कुछ कविताएँ जोड़ लेता था लेकिन अब तो वह भी नहीं कर पा रहा। उस आदमी, मतलब तथाकथित कथाकार ने मेरे नाक में दम कर के रखा है। अरे क्या हुआ लेखक नहीं बना - अब लेखक बनने के लिए पागलों की तरह चिरकुट बटोरूँ, रोड पर फटेहाल फकीरों की तरह गदहेंड़ई करूँ।

अजीब जिद्दी आदमी है।

क्या मैं आँखें बंद किए सोने का अभिनय करता रहता हूँ? मेरे पास ही पत्नी सो रही है। एक हल्की-सी आवाज उसकी नींद खोल देने के लिए काफी है। मैं नहीं चाहता कि उसकी नींद खुले। क्या उसके सो जाने पर मुझे आजादी का अहसास होता है? क्यों इस घर की एक-एक दीवारें मुझे अजनबी लगती हैं - एकदम जड़? जैसे मैं इन्हें जानता ही नहीं - यहाँ रहा ही नहीं कभी। मेरे अंदर एक अजीब सी शून्यता क्यों भरती जा रही है - क्या इसे ठीक-ठीक शून्यता कहना भी ठीक है?

एक ऐसा समय जब तुम्हारी अपनी प्यारी किताबें भी तुमसे बोलना-बतियाना छोड़ दें वह समय कैसा होगा। उसको व्यक्त करने के लिए सही शब्द क्या होगा। बहुत सारे शब्दों की भीड़ में कोई एक शब्द भी मिल पाएगा, जो ठीक-ठीक तुम्हारी शून्यता तुम्हारे और तुम्हारी रचना के बीच के गैप को हू-ब-हू व्यक्त कर सके...?

आगे आती थी हाले दिल पे हँसी
गा रही हैं आबिदा परवीन
एक सन्नाटा रेंगता है
घर के चारों ओर घूप अँधेरे में
शब्द चींटियों की तरह अभरते
फिर किसी खोह में
हो जाते हैं अदृश्य
घर की दीवारें बजती रहती हैं
बहुत मद्धिम पीड़ा में
अब किसी बात पर नहीं आती
गा रही हैं आबिदा

मैं चुपचाप आकर कोरीडोर में खड़ा हो जाता हूँ। लगता है कि वह आया है - खड़ा है एक कोने में। मैं एक गहरी दृष्टि से देखता हूँ उसकी ओर। नहीं, वह नहीं है। एक पेड़ की छाया है, जो बाहर से आ रही है।

वह नहीं है - मैं बुदबुदाता हूँ। लगता है कि आज के इस नींद से खाली रात में उसे जरूर होना चाहिए था। वह नहीं आया - मैं बुदबदाता हूँ। कल सत्यदेव के घर जाऊँगा - मैं बुदबुदाता हूँ। पत्नी सो रही है - मैं बुदबुदाता हूँ। बच्चे रोज स्कूल जा रहे हैं - मैं बुदबुदाता हूँ। सत्यदेव के घर जाना है, उनके घर की सफाई करनी है - मैं बुदबुदाता हूँ। अपने हाथ को अपने हाथ से छू लेता हुआ, अपने बालों को एक बार कसकर उखाड़ता हुआ, खुद को झटकता हुआ खूब जोर से। बुदबुदाता हुआ - चुपचाप खड़ा हूँ।

बाहर रात है, अंदर रात है। उन दो रातों के बीच मैं खड़ा हूँ अकेले।

और वह नहीं आया है...।

दूसरे कमरे की कुर्सी पर शायद आराम कर रहा हो। मुझे अचानक याद आता है। भय और उत्साह दोनों एक साथ उभरते हैं। मैं तेज कदमों से कमरे की ओर भागने की तरह जा रहा हूँ।

और वह वहीं है। कुर्सी पर चुपचाप बैठा। कुछ-कुछ ऊँघता हुआ-सा। जैसे इंतजार करते-करते थक गया हो।

मेरे कमरे में प्रवेश करते ही वह सक्रिय हो जाता है। लेकिन आज वह थोड़ा हताश-सा दिखता है। लगता है वह मुझसे निराश है। वह कई दिनों से मेरे साथ है, लेकिन उसके और हमारे बीच बहुत कम संवाद हुए हैं। वह चाहता है जो, वह करने के रास्ते में कई तरह की दिक्कतें हैं - लेकिन कोई एक बीच का रास्ता जरूर होता होगा। कवि हूँ तो जानता हूँ कि कोई एक सनकीपन की हद तक प्रतिबद्ध साहित्यकार कहता था कि बीच का रास्ता नहीं होता। फिर भी जो कुछ है इस समय में, वहाँ कोई एक पतली सी गली जरूर होती होगी, जहाँ से मैं और वह साथ-साथ चल सकें।

सोचता हूँ कि आज मैं ही बोलूँ और आज की उसकी चुप्पी को तोड़ूँ।

कब से बैठे हो?

अच्छा, कोई बीच का रास्ता तो होगा। मतलब हम और तुम चाहें तो...। ...तुम आए हो तो तुम्हारा आना अच्छा भी लगा। लेकिन तुम ऐसी अटपटी बातें करते हो, क्या मेरे जैसे घरेलू आदमी के लिए संभव है यह। वह बिंदासपन... वह पता नहीं क्या क्या...?

हम्म...। वह अपना सिर हिलाते हुए उसे अपने पैरों के दोनों घुटनों के बीच छुपा लेता है।

अच्छा ठीक है, मैं तुम्हारी बात सुनूँगा। लेकिन इस बार नहीं। इस बार तो तुम्हें मेरी बात सुननी ही होगी। नहीं, तो मजबूरन मुझे वापिस लौटना होगा। फिर कलम रगड़ते रहना जीवन भर। मुझे क्या है...। बोलो क्या कहते हो...?

वह अपना सिर घुटनों के बीच से बाहर निकाल कर मेरी ओर ही देखे जा रहा है।

मैं सोच में पड़ जाता हूँ। वह जो मेरे लिखने को निकम्मा और आलसियों की शगल से नवाजती है, वह जो हर बार मेरी किताबों को बेतरह खा डालने वाली नजरों से घूरती है, वह जिससे मुझे प्यार था कभी बेहद... वह... जो...। उसे समझाऊँ, लेकिन कैसे? वह मेरी एक कविता तक पढ़ने को तैयार नहीं। कैसे समझेगी इस कथाकार के आने की अजीब लगती घटना को? पागल तो वह मुझे पहले से ही समझती और कहती रही है, यह सुनकर तो उसे यकीन हो जाएगा कि मैं सचमुच गंभीर पागलपन के दौर से गुजर रहा हूँ।

लेकिन यह कथाकार, इसे तो कुछ जवाब देना होगा।

तो तुम कहते हो कि सत्यदेव की कथा तक?

हाँ मान लो कि यहीं तक। इसके बाद जो तुम कहोगे, मैं वही करूँगा। तुम्हारा कृतदास हो जाऊँगा।

वह हँसता है एक अजीब सी हँसी। एक ऐसी हँसी जिसे हमेशा के लिए चुरा लेने का जी करता है। मैं भी चाहता था कभी इसी तरह हँसना...। लेकिन...।

ठीक है।

ठीक?

ठीक।

पक्का?

पक्का... पक्का...।

तो लॉक कर दिया जाए...? या एक बार अपनी पत्नी से राय लेना चाहते हैं?

नहीं...। पत्नी नहीं...। लॉक कर दिया जाए।

तो चलें?

कहाँ?

फिर ये सवाल, चिरकुट लेखकों की तरह...?

चलिए। नहीं... चलो...। नो सवाल, बॉस...।

गुड, यंग रायटर...।

मैं खुश तो नहीं हूँ... लेकिन डर का एक परदा उठ गया लगता है और रोशनी की कई - एक किरणें लगातार मेरे जेहन की ओर बढ़ी आ रही हैं।

वह आगे चल पड़ता है। मैं उसके पीछे-पीछे।

लेकिन कहाँ...?

7.

वह आगे-आगे चल रहा था। मैं उसके पीछे-पीछे। क्या खास था उस रात में, जब पूरी कायनात सो रही थी, लोग अपने-अपने घरों में दुबके हुए थे। बेघर कुत्ते इधर-उधर घूम रहे थे, पहरा देते। कुछ सो रहे थे बंद दुकानों के आहाते में। सब शांत था दिन के शोर के विपरीत। ...और वह गुनगुना रहा था कोई एक गीत जो बहुत-जाना पहचाना लगता था।

आमारे यदि जागाले आजि, नाथ
फिरो ना तबे फिरो ना, करो
करुण आँखीपात।

(मुझे यदि आज जगाया तो हे नाथ लौटो मत मेरे ऊपर करुण दृष्टिपात करो - रवि ठाकुर)

पीछे धीरे-धीरे एक संसार छूटता जा रहा था। हल्की ठंडी हवाएँ कभी-कभी देह को गुदगुदा कर निकल जाती थीं, जैसे हमारे इस समय रात में निशाचरों की तरह निकलने की क्रिया उसे भली लग रही हो, और वह हमारे साथ कुछ क्षण अठखेल करना चाहती हो। बहुत अजीब लग रहा था मुझे उस समय यह सोचना। मैं कुछ और सोचना चाहता था। कुछ अप्रत्याशित - कुछ भयानक, कुछ पागल बातें। सबसे ज्यादा उसके बारे में जो मेरे आगे-आगे चला जा रहा था और मुझे पता तक नहीं था कि उसके पीछे मैं कहाँ जा रहा हूँ। सत्यदेव की कथा के पीछे इस बारह बजे रात का क्या संबंध है? कितने लोग तो कथा-कहानी लिखते हैं। लेकिन इस तरह पागलों की तरह रात में घुमना सब लोग करते हैं क्या? मैंने बहुत कम पढ़ा है मेरी जानकारी की सीमा है, लेकिन वह जो आगे जा रहा है...? वह कौन? वह क्या...?

निविड़ वनशाखार परे
आषाढ़-मेघे वृष्टि झरे
बादल भरा आलस भरे
घुमाए आछे रात।
फिरो ना तुमि, फिरो ना, करो
करुण आँखिपात।

(निविड़ वन शाखाओं पर/आषाढ़ के मेघ बरस रहे/ इस बदली में आलस से भर/सोई हुई है रात। तुम न लौटो, न लौटो, करो करुण दृष्टिपात...)

और उस सोई हुई रात में मैं, वह अजनबी कथाकार और सत्यदेव - सत्यदेव और सत्यदेव।

हर एक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता यानि दास्ताने सत्यदेव की तीसरी किस्त!

दादा कई बार दरवाजा पीटते हैं। खाना भी छोड़ दिया है। कह चुके हैं कई बार पतरकी से कि बच्चा है, उसपे रहम कर। नहीं तो तू भी मराछ (बाँझ) हो जाएगी। तेरा नाम मरछिया रख्खा है, माँ बाप ने। गरियाते हैं दादा। पिता को मउगड़ा कहते हैं। लेकिन पिता चुप हैं। जैसा अक्सर होता है कि महतारी के सामने पिता चुप ही रह जाते हैं। उनके दिल में कैसी और कितनी तड़प होती है, इसको मापने का कोई पैमाना सत्यदेव के पास नहीं है। इसके बाद एक सन्नाटा है, जिसके बीच सारे काम-काज चलते हैं। पिता के खेत के काम। दादा का पूजा-पाठ। और एक अँधेरे घर में बारह साल का एक बच्चा माँ की बनाई हुई सुंदर और बेढंगी तस्वीर के साथ अपनी पीड़ा और दर्द के बीच खुश है। यह पहली बार ही है कि उसने दरवाजा खोलने की गुहार नहीं लगाई। भूख का जिक्र नहीं किया। नहीं, अपनी माँ से भी नहीं जो उस दीवार पर सियाह रंगों की शक्ल में बैठी है।

बाहर की दुनिया काली हो गई है और अंदर एक संतरंगा इंद्रधनुष फैला हुआ है। उन स्याह रंगों में सबके चेहरे काले पड़ चुके हैं। मरछिया, रामबरन और पूरा गाँव। उन सबके बीच धवल वस्त्र पहने एक साधु खड़ा दिखता है। उस साधु का नाम है विश्वभंर दास। वह साधु सत्यदेव के दादा से मिलते जुलते चेहरे-मोहरे का है - वह आशिर्वाद की मुद्रा में खड़ा है। सैफू वह कहाँ है? उसे भी कमरे में बंद कर दिया गया है सत्यदेव के साथ। नहीं सत्यदेव ने भीतर बुलाया है उसे। बिल्कुल माँ के सामने उसे खड़ाकर बता रहा है, - देखो, यह मेरी माँ हैं। इन्होंने मुझे अपना दूध पिलाया है, इनका रक्त है मेरे रक्त में।

माँ का चेहरा दमक रहा है। लेकिन एक स्त्री का चेहरा पता नहीं कितनी सदियों से स्याह पड़ा हुआ है। धरती की सारी माँएँ बाँस की खाट पर बीमार लेटी हुई हैं। अधमरी हो रही हैं, हिमोग्लोबिन की कमी से। मुझे लाल रंग चाहिए। मैं इन सबको जिंदा करना चाहता हूँ, उस लाल रंग से जो खून की तरह है, मैं उस लाल रंग में हिमोग्लोबिन के टुकड़े मिलाना चाहता हूँ। सैफू देखो, ये मेरी माँ है। नहीं, यह सैकड़ों लोगों की माँ है, जो अँधेरे कमरे में कोयले से बनी हुई तस्वीरों में बदल चुकी हैं।

और पूरे दो दिन के बाद दरवाजा खुलता है।

सत्यदेव चुपचाप अँधेरे में पड़ा हुआ है - ऐसा लगता है जैसे कोई मासूम शिशु अपनी माँ की गोद में सोया हुआ हो। बेपरवाह और निस्पृह। मरछिया दरवाजा नहीं खोलती। रामबरन दरवाजा खोलते हैं। मरछिया की चलती तो शायद सत्यदेव के मर जाने के बाद दरवाजा खुलता। कोई औरत इतनी क्रूर कैसे हो सकती है - सोचते हैं सत्यदेव के दादा। पिता