डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कहानी

सफेद चादर
अमिताभ शंकर राय चौधरी


खल खल खल... छर छर... नल से पानी की धार बहती जा रही है। सीरिया के इस शहर राग्गा में पानी इतनी मामूली जिन्स नहीं है कि बेवजह उसे बर्बाद किया जाए। फिर भी डा. अबु इब्राहीम साबुन से रगड़ रगड़ कर अपना हाथ धोये जा रहे हैं। अब तक उन्होंने तीन बार अपने हाथ धो लिए। फिर से वह लिक्विड सोप लेकर हाथों में मल रहे हैं। चौथी बार हाथ धोने के लिए...

'कॉफी लाऊँ, डाक' सा'ब?' सरकारी मॉर्च्यूयरी यानी मुर्दाघर का बूढ़ा अर्दली फहमीद उनके जवाब के लिए रुके बिना थर्मस से एक मग में कॉफी उड़ेलने लगता है।

डाक्टर ने कुछ भी नहीं कहा। सिर्फ उसकी ओर देखते रहे और टॉवेल से अपने हाथ पोंछते हुए आकर कुर्सी पर बैठ गए। निगाह में एक सूनापन। नेफद रेगिस्तान की दोपहर की खामोशी उनमें छाई हुई है।

'पी लीजिए।' फहमीद मग को टेबुल पर आगे सरका देता है।

'कॉफी -!' अबु इब्राहीम ने पूछा नहीं, बल्कि सिर्फ उस शब्द को बुदबुदाया....

फहमीद जरा झुक कर सलाम करते हुए दो कदम पीछे हट कर खड़ा हो जाता है।

'हाय अल्लाह!' कॉफी की एक चुस्की लेने के लिए मग को मुँह के पास लाते ही अबु. इब्राहीम उसे दूर हटाकर अपने हाथों को झटकने लगते है।

'क्या हुआ, सा'ब?' बूढ़ा फहमीद मेज की बगल में खड़ा हो जाता है।

'ओह, यह बदबू! मेरे हाथों से बू आ रही है, मियाँ। मॉर्ग की लाशों की बू। इन हाथों से कैसे पीयूँ अपनी कॉफी को?' डाक्टर की आवाज मानो काँप रही है।

'पता नहीं खुदा की मर्जी क्या है?'फहमीद एक गहरी साँस छोड़कर खिड़की से बाहर की ओर देख रहा है।

अर रक्का यानी रग्गा या रक्का शहर अँधेरे में डूबा हुआ है। सड़कों पर रोशनी नहीं। आई एस आई एल यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक और लेवान्ट के दहशतगर्दों ने शहर की सारी रोशनी छीन ली है। रग्गा की जिंदगी की रोशनी भी छीन ली है। उन लोगों ने इस छोटे से शहर की शिया मस्जिदों को जमींदोज कर दिया है। कुर्द, यजीदी (कुर्दिस्तान के गैर इस्लामी जाति), अहमदिया, ईसाई या शिया के लहू से पाँच लाख की आबादीवाले इस शहर की सड़कों को उन लोगों ने राहे दोजख बना कर रख दिया है।

और उनके कब्जे से रग्गा को मुक्त करने के लिए अमरीका और सऊदी ताकतों के साथ मिलकर सीरिया सरकार खुद यहाँ बमवर्षक विमानों से धुआँधार बांबिंग करते रहे। नतीजतन इतने दिन जालिमों के हाथों कत्लेआम होता रहा, और अब उनको शिकस्त देने के नाम पर रग्गा के लोग अपने ही शासकों के हाथों मरते रहे। लाशों का अंबार लगता रहा। रग्गा के सरकारी मॉर्ग में लाशों को रखने के सिंदूक में खाने बचे ही नहीं। मॉर्च्यूयरी का फर्श लाशों से पटता रहा। डा. अबु इब्राहीम और दूसरे डाक्टर लाशों की ऑटोप्सी यानी चीरफाड़ करते करते थक गए थे। तभी तो उनको लग रहा है कि उनके हाथों से भी लाश की बू आ रही है। मरे हुए इनसानों के सड़े हुए जिस्म की बू...

कई दिनों से तो वह अपने हाथों से खाना भी नहीं खा पा रहा था। फातिमा बोल रही थी, 'एक तो दुकानें बंद हैं, सब्जी भाजी भी नहीं मिल रही है। फिर मैं किसी तरह जो पका देती हूँ, वो आप छूते तक नहीं। क्या मुझको ही यह अच्छा लगता है?'

'फातिमा, यह सारा शहर सड़ रहा है। मेरे हाथों में उसी की महक लगी है। कैसे खाऊँ?'

कितने दिन हो गए वह अपने बेटे और बेटी से भी बात न कर सका। सारी रात जाग कर जिला अस्पताल के मॉर्च्यूयरी की टेबुल पर लाशों का डिसेक्शन करता रहता है। सारे स्कूल कालेज तो बंद हैं। मगर वह समय से अस्पताल से निकल ही नहीं पाता है। अगर ड्यूटी से छुट्टी मिल गई, तो बैठे रहो यहीं पर। जब तक साइरेन न बज जाए, तुम घर जा भी नहीं सकते। कई बार तो वे छुट्टी के बावजूद घर नहीं पहुँच सके।

'गुड मार्निंग, डाक्टर।' अपनी खिचड़ी दाढ़ी को खजुआते हुए डा. मन्सूर बगल की कुर्सी में आकर धम्म से बैठ गए। उनके वजन से कुर्सी मानो कराह उठी। 'अमाँ यार, तुम लोग भी अब यह रोज रोज का रोना बंद करो, भाई। बचपन में अम्माँ दादी की गोद में बैठता था, और अब जवानी में - 'फिर अबु. इब्राहीम की ओर मुँह फेरकर आँख मार कर अपनी बात जारी रक्खी, 'क्यों यार, फॉरेंसिक में जवानी का कोई मेडिकोलिगल डेफिनेशन है? जब तक दिल जवाँ, तब तक हम जवाँ, क्यों?'फिर कुर्सी के बाजुओं में हाथ फेरते हुए बात पूरी की,'बचपन में अम्माँ दादी की गोद थी। अब तेरी गोद है। मेरी जवानी की पनाह, कराह मत। इस दफे मेरा वजन सिर्फ दो केजी ही बढ़ा है। साले इस्लामिक स्टेटवालों के चलते तो पूरा बाजार बंद पड़ा है। बेगम बनाएगी क्या, और मैं खाऊँगा क्या?'

इस मस्तमौले को पाकर डा. अबु इब्राहीम के मन में कुछ सुकून पहुँचा। मुस्कुराकर उन्होंने पूछा, 'कॉफी पीजिएगा?'

'नेकी और पूछ पूछ? वो नहीं तो यही सही। लाओ चचा फहमीद। मुझ पर भी अपना रहम बरसाओ।' फिर मेज पर उँगलिओं की थाप देते हुए पूछा, 'क्यों, कल रात कितनों को ठिकाने लगाए?'

'सात आठ होंगे। फार्म भरते भरते तो रात भी साथ छोड़ने लगी।'

'मालूम है न? कल जो हमारी सरकार ने हमारे शहर पर बॉम्बिंग की है, उसमें नौ आईएसआईएल के और सोलह सिविलियन मारे गए हैं। छह सात को तो मैंने निबटाया। एक रात में जितनों का दिल टटोला, उतना अगर जवानी में किया होता तो लोग मुझे बगदाद का खलीफा कहते।' कॉफी की चुसकी लेते लेते वह खिड़की की ओर देखते हुए उदास हो गए, 'हर रोज हम जितनी औरतों की लाशों के जिस्म को खोल रहे हैं, उससे तो अब अपनी बीवी का जिस्म छूने में भी मिजाज बदरंग हो जाएगा।'

'मौका भी मिलता है आजकल?' अबु. इब्राहीम ने हँसते हुए पूछा।

'वाजिब फरमाया, दोस्त।'

इतने में उवैश अल कारनी मसजिद की मीनार से खुदा की प्रशंसा में सुबह की अजान की तकबीर गूँजने लगी - 'क़द क़ामितस सलात! अल्लाह, तू महान है!' डाक्टर्स लाउंज की लंबी खिड़की के बाहर का स्याह धीरे धीरे रोशन होने लगा। दूधिया उजाला पंख फैलाकर हर दरवाजे पर, दरख्तों की शाखों पर दस्तक देने लगा। मीनारों से गुटरगूँ करते हुए कबूतर आसमान में चक्कर लगाने लगे। उनके पंखों की फरफर आवाज सातवें आसमान में जाने क्या फरियाद पहुँचा रही थी। दूसरे परिंदे भी एक दूसरे से पूछने लगे, 'अमाँ, कुछ पता है - ये इनसान नाम का जानवर आज कौन सी कयामत बरपानेवाला है?'

फहमीद ने खिड़की खोल दी। दूर आसमान के नीले रंग को एक काला धुआँ किसी जिन्न की तरह अपने आगोश में ले रहा था। फिर, तर तर तर ...फायरिंग की आवाज -

'चलो, निकल चलें। वरना आज भी यहाँ फॅसे रह जाएँगे।' डा. मंसूर अपने लॉकर से कार की चाबी निकाल कर उँगली में नचाने लगे।

शहर का जमानए हाल बयान करना बिलकुल गैर जरूरी है। सुबह की सड़कें तो ऐसे ही सुनसान रहती हैं। मगर आज तो कहीं कोई लाश अपने जख्मों से रिसते खू्न से आखिरी रिश्ता निभा रही थी, तो कहीं किसी दुकान या किसी बदकिस्मत के आशियाने में आग लगी हुई थी। साम्य का परचम लहराने वाले धर्म इस्लाम के नाम पर जाने किन जालिमों ने इस शहर राग्गा को जहन्नमजार बना डाला था। हर जगह दोजख की आग जल रही थी।

फातिमा ने कार पार्किंग में गाड़ी की आवाज पहचान ली थी। दौड़ी आई किवाड़ खोलने, 'पहले मुँह हाथ धो लो। चाय बनाती हूँ।

डा. अबु इब्राहीम ने बीवी की उनींदी ऑखों को देखते हुए पूछा, 'यह क्या पागलपन है? रात भर सोई नहीं क्या?'

फातिमा मुसकराकर रह गई, 'ऐसी रात राग्गा की किस औरत को नींद आवेगी? वो भी जब उसका शौहर घर में मौजूद न हो।'

'जादरान और मानी कहाँ हैं?'

'रात भर अब्बू अब्बू रटते रहे। अब जाकर सो रहे हैं दोनों।'

'ठीक है, चलो चाय बनाओ। तब तक सोने में ही सही एक बार बच्चों की सूरत तो देख लें।'

बेसिन के पास से लौटकर डा. अबु इब्राहीम बेडरूम में दाखिल हो जाता है। और अंदर दाखिल होते ही...

खिड़की से आती सफेद धूप उसके बेटे और बेटी जादरान और मानी के जिस्मों पर मानो जम गई थी। दोनों बच्चे झक सफेद चादर के नीचे सो रहे थे। और उस चादर को देखते ही फिर से उन्हें अपने हाथों से बू आने लगती है। उनके पाँव ठिठक जाते हैं। मानो यूफ्रेटिस दरिया का सैलाब उसे किसी भँवर में ढकेल देता है, 'या खुदा!'

यूफ्रेटिस के भँवर की तरह उनके मन में हर रात का मंजर घूमने लगता है - सफेद चादर और हर चादर के नीचे एक एक लाश। अबु. इब्राहीम चीख उठा, 'फातिमा - इधर आओ -'

'क्या हुआ?' कहते हुए फातिमा अंदर दाखिल होती है, 'बात क्या है?'

'वो वो चादर - उसे जरा उठाना। उठाकर देखो - जादरान और मानी ठीक हैं न?'

'क्या बक रहे हैं आज?' फातिमा दौड़कर आई और चादर को उठाकर बच्चों को देखा, 'देखिए, सब सो रहे हैं। कितनी बेतकल्लुफी झलक रही है इनके चेहरों से -!'

उसी समय दूर कहीं एक मिसाइल गिरने का धमाका होता है। खिड़की के शीशे झनझनाने लगते हैं। दोनों बच्चे चौंक कर उठ गए, 'क्या हुआ, अम्मीं? अब्बू, आप इतनी देर से आए? जाओ, आप से हम बात नहीं करते...।'

डा. अबु इब्राहीम दौड़कर आए और बिस्तर पर बैठकर अपने बच्चों को छाती में जकड़ लिया,'फातिमा, हाँ हमारे बच्चे जिंदा हैं। खुदा की लाखों नियामत है हम पर -!'


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में अमिताभ शंकर राय चौधरी की रचनाएँ