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कहानी

आदाब
अमिताभ शंकर राय चौधरी


(यह कहानी समर्पित है पुलिक्काली के कलाकार बहत्तर साल के चथुन्नी को , जो पिछले छप्पन सालों से ओनम के दौरान ' बाघ ' बनते आए हैं। हर साल।)

एक सुंदर से फ्रेमवाले आईने में चथुन्नी खुद को देख रहा था। ओनम के मेले में सालों पहले उसने इसे खरीदा था। अपने लिए। उसके मन में एक हसरत थी कि बाघ का मेकअप पूरा हो जाने पर उसे देखने में कैसा लगता है - एकबार अच्छी तरह अपने आईने में देखे। पुलिक्काली की झाँकी के लिए लोगों को जहाँ बाघ या शेर के रूप में रंग लगाकर सजाया जाता है, वहाँ एक आईना होता तो है, मगर वहाँ पूरा संगमा यानी सारे अभिनेता खड़े रहते हैं। उस साल उसे मेले के बाद पुरस्कार में पूरे तीन हजार मिले थे। पुलिक्काली के बाद उस आईने को खरीद कर, सड़क की रोशनी में खुद को देखते देखते वह मानो भाव विह्वल हो उठा था...। पर आज...

चथुन्नी ने एक लंबी साँस छोड़ी, ''यह क्या हाल बना है इस शरीर का? इतने दुबले पतले पेट के लिए पाँच हजार तो दूर, दो ढाई हजार मिल जाए वही किस्मत की बात होगी।''

चथुन्नी की बीवी इलांजी को दीन दुनिया का हाल हकीकत अच्छी तरह मालूम था। इसीलिए उसने पहले से ही होशियार कर देना उचित समझा, ''तीन दिन से पुलिक्काली के स्वाँग के लिए लगे हुए हो। ध्यान रहे इनाम में जो भी मिले घर ही लेकर आना। रास्ते में यार दोस्तों पर खर्च मत कर देना।''

चथुन्नी निकलने की तैयारी कर रहा था। पूरे बदन पर टेंपारा लगाकर वार्निश से पीला एनामेल पेंट लगाया गया है। अब तो चमड़ी सूख रही है। रंग को सूखने में सात आठ घंटे लग जाते हैं। पीले रंग के ऊपर काले रंग से बाघ की धारियाँ खिंचवाई गई हैं। जोश कचापिल्ली ने कल दिन भर बैठकर उसके पेट के ऊपर बाघ का एक मुँह भी बना डाला है। बस, आज ओनम के चौथे दिन इन कलाकारों के मेकअप को आखिरी बार देख-सुन कर पुलिक्काली के स्वाँग के लिए भेज देना है। बीवी की हिदायत के जबाब में वह हूँ हूँ कर रहा था।

इलांजी नाराज हो गई, ''क्या तब से हूँ हूँ कर रहे हो? कुटिया की छाजन का हाल देखा है? बारिश हो तो पूरब की ओर से घर के अंदर पानी चूने लगता है। कुछ रुपये मिले तो इस बार पूरे छप्पर को बदलना है।''

कई साल पहले तक अभिनेता मुँह के ऊपर भी पेंट लगाते थे। आजकल मुखौटे का इस्तेमाल करने लगे हैं। मुँह के ऊपर रंग लगाने से बात करने में भी दिक्कत होती थी। हाथ में बाघ के मुखौटे को उठाते हुए चथुन्नी ने बस इतना कहा, ''हाँ हाँ, वही होगा। तू तो कोच्चि की पटरानी की तरह हुकम कर रही है। तीन दिन से रंग लगाकर मेहनत करूँ मैं, और जरा पीने पिलाने की भी छूट नहीं देगी?''

इलांजी भड़क गई, ''तू ने भी अपने को क्या सोच रक्खा है? कोच्चि का महाराज? घर की छत से चूता है पानी, बालम माँगे अंगूर की रानी। वाह!''

चथुन्नी हँसते हुए घर से निकल पड़ा।

कहते हैं दो सौ साल पहले कोचि का महाराज रामवर्मा सकथन थंपूरन ने ओनम के उत्सव के लिए इस स्वाँग की शुरुआत की थी। मलयालम में पुलि का अर्थ है तेंदुआ, और काली यानी नाटक। तो पुलिक्काली का मतलब है बाघ, सिंह या तेंदुए आदि के भेस में नाटक। उन्ही दिनों अंग्रेजी फौज के साथ कई तमिल मुस्लिम सैनिक त्रिशूर आए हुए थे। वे अपने मुहर्रम के जुलूस निकालते थे। तो राजा के कहने पर उसी तर्ज पर उन्होंने पुलिक्काली की शुरुआत की थी।

सुबह से ही इक्के दुक्के लोगों की भीड़ त्रिशूर के स्वराज मोड़, पैलेस रोड और करुणाकरण नांबियार रोड के इर्द गिर्द इकट्ठी होने लगी। क्योंकि इन्हीं जगहों से पुलिक्काली की झाँकी सबसे अच्छी तरह देखी जा सकती है। ओनम के अवसर पर दुकानें भी सजी हुई हैं। जगह जगह फुटपाथ के ऊपर ठेलों पर लंबी लंबी मिर्च की पकौड़ी, केले की भाजी या गन्ने का सुनहरा रस बिक रहा है।

पुराण के कथनानुसार यहाँ के राजा महाबली ने एक बार स्वर्ग मर्त्य पाताल तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया। देवता भयभीत होकर विष्णु की शरण में पहुँचे, ''हमें हमारा स्वर्ग वापस दिला दो, प्रभु।'' दानशील के रूप में महाबली की महती ख्याति थी। सो विष्णु एक छोटे वामन का रूप धर कर केरल के राजा महाबली के पास भिक्षा लेने पहुँचे, ''तीन कदम भर चलने के लिए जितनी भूमि की जरूरत होती है, बस उतनी सी जमीन मुझे दान में दे दो।''

महाबली ने हँस कर कहा, ''तथास्तु।''

बस और क्या था? विष्णु ने अपना आकार इतना विशाल बना लिया कि उनका मस्तक आकाश को छूने लगा। अपने दाहिने पैर को आगे बढ़ाकर उन्होंने समूचे स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया, और बाएँ पैर से पूरे मर्त्य पर। फिर वह पूछने लगे, ''राजा, अब मैं तीसरा कदम कहाँ रखूँ?''

महाबली ने हँसते हुए अपना सिर नवाया, ''प्रभु, मेरे मस्तक पर...।''

विष्णु ने भी मुस्कराते हुए अपने चरण से उसके सर पर धक्का मारा, ''तो जा। तू पाताल में ही जाकर रह।''

राजा तो चला गया पाताल लोक में। और तबसे हर साल एक बार अपनी प्रजा से मिलने चिंगम यानी अगस्त सितंबर के महीने में वापस आते हैं। उन्हीं के स्वागत के लिए केरलवासी अथम से दस दिन तक ओनम का उत्सव मनाते हैं। अपने अपने घरों के सामने रंगोली सजाते हैं। ओनासाद्या या थीरूओनम के अवसर पर केले के पत्तों पर बारह तेरह किसिम के भोजन परोसे जाते हैं।

भड़क्कुनाथन शिवमंदिर के मुख्यद्वार से ही पुलिक्काली का जुलूस निकलता है। उसके सामने जो नादुविलाल का गणेश मंदिर है, उसीके अहाते में सारे कलाकार बाघ, शेर या भालू के स्वाँग बनाकर हाजिर हो गए। पहले जमाने में केवल रंगों का ही इस्तेमाल होता था। पर आजकल तो मुखौटे, लंबे लंबे नकली दाँत और झबड़े बालों से भी मेकअप होने लगे हैं। पहले ये बातें न थीं।

कचापिल्ली जैसे और कई पेंटर अपने अपने कलाकारों के मेकअप को फाइनल टच दे रहे थे। दोपहर तक संगमा यानी कलाकारों का झुंड नादुविलाल मंदिर से भड़क्कुनाथन मंदिर की ओर चल पड़े। नाद, नाल, मृदंगम और नादस्वरम् बजने लगे। पंचानन को प्रणाम कर संगमा सड़क पर निकल पड़ा...

स्वराज मोड़ से लेकर नांबियार रोड और आगे के कई किलोमीटर रास्ता तय करने के बाद जब पुलिक्काली की झाँकी खतम हो गई तो दोपहर ढलने लगी थी। लोग इधर उधर तितर बितर होने लगे थे। चथुन्नी के मोहल्ले के पास रहनेवाला एक दूसरे कलाकार नांबीसान ने आकर उसका हाथ थाम लिया, ''सीधे घर जाएगा कि मन्नूर की दुकान होकर चलेगा?''

मन्नूर की दुकान में ताड़ी बिकती है। चथुन्नी ने मुस्कराकर कहा, ''पहले इनाम तो हाथ आने दे। देखें कितना मिलता है। घर से चलते समय इलांजी ने बार बार होशियार कर दिया था कि सीधे घर वापस जाएँ। इधर उधर फालतू खर्च न करें। इस बार छाजन की मरम्मत नहीं की गई तो चिंगम की बारिश खतम होते होते छत भी ढह जाएगी।''

सारे कलाकार बाघ, तेंदुए और शेर बने इधर उधर खड़े थे। कोई चाय पी रहा था, तो कोई बीड़ी सुलगा रहा था। अपने अपने गाँव मुहल्ले से पुलिक्काली की झाँकी तैयार करवानेवाले मुखिया लोग इनको इनके इनाम बाँटने लगे। चथुन्नी को साढ़े तीन हजार मिले। जिसकी तोंद जितनी ज्यादा निकली होती है, उसे उतना ज्यादा मिलता है। साथ ही मेकअप की बात तो है ही। दो चार लोगों को तो पाँच पाँच हजार भी मिले। चथुन्नी ने हल्की मुस्कराहट के साथ अपने पेट को सहलाते हुए नांबीसान से कहा, ''चल, यही काफी है। साल भर अगर खाना पीना ठीक से न मिला तो अगले साल इतना भी नहीं मिलेगा।''

चथुन्नी त्रिशूर के ख्वाब महल बिल्डर के यहाँ राजगीर का काम करता है। दूसरों के लिए बड़े बड़े फ्लैट और इमारत खड़ी करने में उसे पता ही न चला कि कब उसकी छत भी रिसने लगी है।

पुलिक्काली के लिए बदन पर रंग चढ़ाना जितना मुश्किल काम है, फिर उस रंग को छुड़ाना भी कम पापड़ बेलना नहीं है। सारे कलाकार सड़क किनारे एक नल के पास बैठकर मिट्टी के तेल से एक दूसरे के बदन से रंग छुड़वा रहे थे। यहीं से आगे जाकर यह सड़क दाएँ बाएँ दो भागों में बॅट कर नांबीसान और चथुन्नी के घर तक पहुँचेगी। नांबिसान ने फिर से पूछा, ''क्यों क्या ख्याल है? मन्नूर की दुकान होकर घर चलेगा?''

अचानक चथुन्नी को एक दूसरी ही बात याद आ गई। उन दोनों के घरों के लिए सड़क जहाँ दो में बँट जाती है, उसके पहले ही तो तिरंगलूर मस्जिद की बगल से जो गली गई है - उसी में रहता है उसका उस्ताद अल्लम बसीर। उसे ध्यान आया - कितने दिन हो गए उस्ताद से मिले हुए। पहले पहल बसीर ही उसे पुलिक्काली के स्वाँग के लिए ले आया था। उसी ने सिखाया था - बाघ की चाल कैसी होती है। जनता के मनोरंजन के लिए कैसे बीच बीच में दहाड़ लगाकर छलाँग लगानी चाहिए। उमर के कारण दो तीन साल से बसीर पुलिक्काली में हिस्सा ले नहीं पा रहा है। वरना राजा रामवर्मा के जमाने में तो त्रिशूर में अंग्रेजों के साथ आए मुसलमानों ने ही इसकी शुरुआत की थी। तबसे आज तक कितने लोगों का यही पुश्तैनी काम है। ओनम के अवसर पर लोग इन्हीं के दरवाजे आते हैं, ''चलो, हमारे कलाकारों को सजा दो। सिखा दो।''

कुआर के महीने में जैसे सफेद बादलों की टोली आकाश में तैरती रहती हैं, उसी तरह चथुन्नी के मन में यादों के बादल घिरने लगे। कैसे बसीर उसे सीना तान कर मस्त अदाकारी के साथ चलना सीखाता था। उसने नांबिसान से कहा, ''तू चल अपने घर। मैं आज अल्लम उस्ताद से मिलकर घर पहुँचूँगा।''

''तो अपने बदन पर से रंग तो छुड़वा ले।''

''नहीं। रहने दे। आज इसी तरह बाघ बनकर ही उस्ताद को आदाब कह आऊँगा।''

तिरंगलूर मस्जिद की बगलवाली गली में घुसते ही मोहल्ले के लड़के बच्चे हो हल्ला करने लगे, ''देखो देखो, हमारी गल्ली में शेर घुस आया है।''

साथ ही गली के कुत्ते भी लगे भौंकने।

मगर वह जंगल के घास के मैदानों को पार करनेवाले बाघ की मस्त चाल से आगे बढ़ता जा रहा था। अल्लम के दरवाजे पर दस्तक देते ही भीतर से आवाज आई, ''कौन? कौन है? दरवाजा खुला है। अंदर आ जाओ।''

अंदर पहुँचते ही उसने देखा आँगन के किनारे एक छोटी खटिया पर अल्लम मियाँ बैठे हुए हैं। शाम के धुँधलके में सब कुछ कोहरा कोहरा सा लग रहा था। बसीर ने सिर उठाकर पूछा, ''कौन हो म्याँ? नजदीक तो आओ।''

''मैं हूँ।'' चथुन्नी उसके पास पहुँचा, ''चथुन्नी।''

''या अल्लाह! अरे तुझे जी भर के देख लेने दे।'' बसीर अपने सर को इधर से उधर घुमाने लगा और उँगलियों से छू छूकर चथुन्नी के बदन को टटोलने लगा।

पहले तो चथुन्नी कुछ सकुचाने लगा, फिर मुस्कराकर पूछा, ''क्या हुआ उस्ताद? ऐसे क्या देख रहे हो?''

''अरे मेरी नजर तो मुझे दगा दे गई, इसीलिए तो उँगलियों से छू छूकर तेरा अहसास अपने सीने में भर ले रहा हूँ। आज तो मैं अपनी इन उँगलियों से ही देख ले रहा हूँ - तू कैसा बाघ बना है? कब से तमन्ना थी कि अपनी आँखों से जी भर कर देख लूँ मेरा शेर बाघ बनकर लगता कैसा है?'' फिर वह चिल्लाकर अपनी बीवी को बुलाने लगा, ''अजी सलीमा, देख तो ले कौन आया है। मेरा यार, मेरा शागिर्द चथुन्नी।''

सलीमा बाहर निकल आई, ''कहो कैसे हो? आज पुलिक्काली में गए थे?''

''और क्या? ऐसे ही बाघ बनकर तेरे दरवाजे पर खड़ा है?'' बसीर हँसने लगा, ''जा जा जरा काफी बना दे। इतने दिनों बाद आज यार आया है...''

चथुन्नी ने धीरे से पूछा, ''भाभी, उस्ताद की आँखों की रोशनी कुछ कम हो गई है क्या?''

''अब क्या बताएँ? मोतियाबिंद के आपरेशन करवाने है। मगर उसके लिए भी तो रुपये चाहिए। पुलिक्काली का बाघ आज अंधा होकर बैठा है।''

''अरे यह क्या बक रही है? जा, पहले काफी बना ला।''बसीर ठहाका लगाने लगा।

लेकिन सलीमा की यह बात चथुन्नी के दिल में चुभ गई। वह सोचने लगा - क्या मैं अपने उस्ताद के लिए कुछ नहीं कर सकता? क्यों नहीं? मेरी अंटी में भी तो साढ़े तीन हजार बंधे हैं। मगर फिर इलांजी? वह तो बरस पड़ेगी। फिर छत का क्या होगा? ओह!

काफी पीते पीते भी उसके मन में यही उधेड़बुन चल रही थी। क्या करूँ? उस्ताद को रुपये दे देता हूँ तो घर में तो तूफान खड़ा हो जाएगा। जबाब क्या दूँगा?

काफी पीकर वह उठ खड़ा हुआ, ''अच्छा उस्ताद चलता हूँ।''

''बहुत अच्छा लगा, बेटा। फिर कभी जरूर आना। अब तो मेरी दुनिया इन दरवाजों के पीछे सिमट कर रह गई है।''

चथुन्नी को पता भी न चला कि वह क्या कर रहा है। चलते चलते अचानक उसने अपनी अंटी से रुपये निकालकर सलीमा के हाथों में थमा दिए, ''इन्हीं रुपयों से उस्ताद की आँखों का इलाज करवा लेना। अगले साल मैं फिर आऊँगा, तो उस्ताद अपनी आँखों से देखें कि मैं कैसा बाघ बनता हूँ !''

बसीर अपने दोनों हाथों को झटकने लगा, ''नहीं नहीं चथुन्नी। यह क्या कर रहा है? अपने रुपये वापस लेते जा। बाघ अपना शिकार खुद करता है। मैं तेरे इनाम के रुपयों से अपना आपरेशन करवाऊँ?''

''उस्ताद, ना क्यों कर रहे हो? यह तो तुम्हारे लिए मेरी गुरु दक्षिणा है। लो, रख लो। अगले साल अपने इस बाघ को अपनी आँखों से अच्छी तरह देख लेना। चलता हूँ। आदाब!''

''मगर तुम्हारी बीवी तो इनाम के इन रुपयों के लिए आस जोये बैठी होगी।'' सलीमा खुद एक औरत है। वह जानती है चथुन्नी की गृहस्थी में कौन सा बवंडर उठ खड़ा होगा।

''मैं अल्लम बसीर का बाघ हूँ। इतनी सी बात को सँभाल न सकूँगा? उसे मना लूँगा। घबड़ाना मत।''वह मन ही मन सोचने लगा इलांजी को बताएगा - कि बाघ के सिर पर भी तो खुले आसमान की ही छत होती है। उनके सिर पर तो - फूटी सही - कम से कम एक छत तो है। ताड़ के पत्तों से छाजन के छेद को ढक कर ही इस बार बेड़ा पार कर लेंगे।

त्रिशूर के रास्ते पर चाँद की जुन्हाई टपक रही थी। चथुन्नी अपने घर की ओर ऐसे ही चला जा रहा था जैसे जंगल के बीच छलाँग लगाते हुए कोई बाघ मस्त चाल से निकल जाता है। चाँद की दूधिया चाँदनी में उसके पीले बदन की काली काली धारियाँ एक अदभुत आह्लाद और उल्लास से थिरक रही थीं...


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