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कहानी

नमक
वंदना राग


माथुर ने उसे पहली बार एक छोटी-सी घरेलू पार्टी में देखा था। कमरे के कोनों में जुगनू से चमकते टेबल लैंपों के बीच। रजनीगंधा की पूरी डाली ही मानों एक ओर लचकी-सी, कोने के हरे सोफासीट पर धँसी एक अलहदा एहसास की तरह। बाकी जमा औरतों से अलग तरह का खिंचाव, चेहरे में, देह में, व्यक्तित्व में। ऐसा नहीं था कि बाकी औरतें सुंदर नहीं थीं। सभी तो परियाँ लग रही थीं - कमरे के वितान पर हँसती, थिरकतीं, बेशुमार परियाँ। माथुर की पत्नी भी उसमें शामिल थी। उसने गौर से देखा, उसकी पत्नी निस्संदेह सभी से कमउम्र और हसीन थी, गोरी, गदबदी, गुड़िया परी। माथुर जानता था, उसके साथी इसका रश्क उससे किया करते थे, क्योंकि वह खुद कहीं से खूबसूरत नहीं था। लंबा वह जरूर था और उसका शरीर भी छरहरा दिखता था, पर नयन-नक्श उसके साधारण थे, अलबत्ता आँखें एक चालाक, चपल चीते की तरह थीं और आवाज में गंभीरता का वजन था। कुल मिलाकर एक पैकेज के रूप में वह एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होने का भाव जगाता था। एक ऐसा व्यक्ति जिसके लिए सत्ता उसके व्यक्तित्व का विस्तार हो। ऐसा व्यक्ति जो सत्ता से भी ज्यादा मजबूत हो और एकदम ऐसा व्यक्ति जिसकी सत्ता को चुनौती देना एक दुस्साहसी प्रयास होता।

उसकी शादी अभी दो ही साल पहले हुई थी और नौकरी भी उसकी आला थी। उद्योग मंत्रालय में ऊँचे पद पर था वह। उसके काम की रफ्तार से उद्योग मंत्रालय की फाइलें दौड़ती थीं, ओर इस प्रदेश की उद्योग-नीतियाँ जीवन पाती थीं। माथुर का अंतस जब आईने में उभरी छवि पर उँगली धरता था तो आईने में रोशनी खिल जाती थी। वहाँ नजर आता था एक प्रसन्न संतुष्ट, पूरा व्यक्ति जो माथुर ही होता था। बस, वही! उसी की आवाज, उसी के ठहाके, उसी की उपस्थिति हर ओर।

आज की पार्टी उसके महकमे में काम करने वाले एक जूनियर अफसर ने रखी थी। 'न जाने किस खुशी में…।' उसे याद नहीं पड़ रहा था, न उसने याद करने की जहमत उठाई थी। इन छोटी बातों को याद रखने से उसका वक्त और उसकी ऊर्जा अनावश्यक रूप से खर्च हो जाते थे जिन्हें बचाकर ही वह अपने घर में लगे आईने से इतर लोगों के चेहरों के आईनों पर भी अपनी ही रौशन छवि देखता था, हर ओर माथुर। पार्टी में भी वह अपने प्रभाव की छाप सब पर देख रहा था। वहाँ आए सारे लोग उसकी जान-पहचान के थे। सब ऊँची नौकरियों वाले, सुंदर पत्नियों और ऊँचे ओहदेवाले थे। सब खाने-पीने, बात करने में मशगूल थे। सब व्यवहार में अपने को श्रेष्ठ समझ रहे थे। फिर भी इन सबके बीच जिसने माथुर का ध्यान आकृष्ट किया था, वह कहीं से श्रेष्ठ नहीं थी। न ही वह परी थी, न उसे महत्वपूर्ण पुरुष की पत्नी होने का गौरव हासिल था। उसने अनुमान लगाया, उम्र उसकी होगी यही कोई पच्चीस-छब्बीस वर्ष, पर न तो वह लड़की लग रही थी, न भरी-पूरी औरत। बस, एक अपरिचित से काकटेल-सा था उसमें कुछ और माथुर बिलकुल नहीं समझ पा रहा था कि क्यों वह अपने खाने-पीने और बातचीत करने के सिलसिले को तोड़ उसे बार-बार देखने पर मजबूर हो रहा था।

पहली बार वह उसे पीले फूलोंवाले सफेद शिफान की साड़ी में नजर आई - मुस्कुराते हुए, सबसे परिचित होते हुए। तेज चुस्त चाल से किचन में दौड़-दौड़ खाने-पीने का इंतजाम करती हुई। शायद वह मेजबान के करीबी दोस्त की पत्नी थी। अगले ही पल जब माथुर की नजर उस पर पड़ी तो वह इठलाकर किसी पुरुष को अपनी वाकतुरता से मात कर रही थी, और उसके बाद तो लगा, जैसे महफिल उसकी हँसी की खनक के नाम हो गई। सारे लोग उसे ही देखने लगे। औरतें उससे बात करने लगीं, पुरुष बात करने को उत्सुक होने लगे। ऐसे ऊँचे ओहदेवाले अभेद्य अफसरों और उनकी पत्नियों के कँटीले बाड़ों के भीतर असरदार सहजता से यूँ ही प्रवेश करने वाले लोग कम ही होते थे। यह माथुर के लिए एक अप्रत्याशित घटना थी। वह बेचैन हो गया। एक ही कुर्सी पर देर तक चीजों को देखते हुए बैठे रहना, उसके लिए दूभर होने लगा। वह उठकर कमरे में टहलने लगा और मेजबान के घर पर लगे पिकासो के प्रिंट को बेचैन आँखों से तौलने लगा। कनखियों से उसने अपनी पत्नी की ओर भी देखा। वह जानता था, उसकी भली गुड़िया-सी पत्नी उस पर हुए इस असर से अनजान ही होगी। उसकी दुनिया माथुर को खुश करने से शुरू होती थी और उसके संतुष्ट होने पर खत्म। माथुर अपनी पत्नी के इस कमसिन अंदाज पर खुद को ही शाबाशी देता था। उसने बड़ी मेहनत से पोसा था इस अंदाज को, इसीलिए वह आश्वस्त था। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता जा रहा था, माथुर की परेशानी बढ़ती जा रही थी। उसे अपनी किशोरों-सी हरकत जम नहीं रही थी। भला बताइए तो 'यह सब... और माथुर साहब करे, उसे लगता था, इस तरह की चीजों के वह पार जा चुका है। उसके ओहदे, उसकी उम्र ने उसे इन छिछली भावनाओं से बहुत दूर बहुत ऊपर पहुँचा दिया था, इसलिए भी यूँ...?

रात बारह बजते-बजते महफिल बर्खास्त होने लगी। बारी-बारी से बड़े लोग अपनी गाड़ियों में जाने लगे - जोर-जोर से हाथ हिलाते, अभिवादन करते। माथुर भी धीरे से दरवाजे की ओर बढ़ा और अपनी पत्नी को इशारा कर पास बुलाया। पत्नी के सान्निध्य से उत्पन्न हिम्मत बटोर, सबको नमस्कार कर, उसने उस बेचैन करने वाली औरत को नमस्कार करने के लिए भी हाथ उठाया। उसने माथुर को खुशनुमाई से जवाब दिया। वह कितनी ताजा लग रही थी, माथुर ने देखा और उसी एक क्षण दोनों की निगाहें आपस में मिलीं। माथुर को न जाने क्यों लगा कि वह समझ गई है कि माथुर उससे आकर्षित हो गया है। जब उसने अपनी अचानक स्पंदित होती पलकों को नीचे झुकाया तो माथुर को लगा, उसके आकर्षण को भी कहीं हल्का-सा समर्थन मिल गया है। बस, उसी क्षण बाद माथुर लौट गया, अपनी प्यारी पत्नी को बगल में दबाए हुए, फर्राटे से उड़नेवाली गाड़ी में सवार, अपनी ऊँची जिंदगी जीने।

माथुर की दूसरी मुलाकात उस औरत से माथुर के अपने घर में हुई, उस पार्टी के रेले के गुजर जाने के चंद महीनों बाद। उसे देखते ही माथुर की कसक फिर आजाद हो गई। उसने बड़ी मुश्किल से उस पर काबू पाया था। उस पार्टी के बाद उसके भीतर रह-रहकर एक खलिश-सी उठी थी और वह जानने-समझने के क्रम में निरंतर झुँझलाता चला गया था कि वह ऐसे कौन से सुख का निमंत्रण था जो उसे आज तक नहीं मिल पाया था और जिसका वादा उससे वह अनजान औरत अपनी आँखों से कर चुकी थी? माथुर सोच-सोच मीठी नींद से जग गया था और यूँ ही थका रह गया था कई बार।

वह दूसरी मुलाकात भी पहली की तरह माथुर को असहज करने वाली थी। वह अपने पति अतुल चौधरी के साथ उसके यहाँ पहली बार मिलने आई थी। माथुर उसके पति का नाम याद रह जाने से अपने पर हैरान हो रहा था। हाँ, उसने उसके पति का नाम याद रखने की जहमत उठाई थी। क्यों? 'उसके पति की डेपुटेशन पोस्टिंग उद्योग मंत्रालय में हो गई थी।' यह बताते-बताते वह माथुर की पत्नी को देख, लगातार मुस्कुराए जा रही थी। उसकी पत्नी भी किसी पुराने अच्छे लगने वाले परिचितों से मिलने पर होने वाली खुशी से भरी-भरी, उनसे उल्लास से बतिया रही थी। माथुर को आश्वस्ति हुई, उसकी पत्नी बिलकुल भी नहीं बदली, वैसी ही भोली-भाली है। उसकी पत्नी ने उसकी ओर देख उस औरत का माथुर से परिचय करया। "याद है, तान्या चौधरी...?" माथुर ने बड़ी मुश्किल से औपचारिक-सी हामी भरी और झुककर बैठ गया ठीक कमरे के उस हिस्से में, जहाँ से उसकी नजर पत्नी की पीठ से शुरू होकर तान्या चौधरी की आँखों पर ठहरती थी। उसने देखा, तान्या चौधरी जरा भी नहीं बदली थी, वैसी ही साँवली अनगढ़ सीधी अपने स्वभाव से विपरीत इस लुका-छुपी वाले अंदाज से माथुर चोर की तरह महसूस करने लगा। उसके अंदर का चोर एक सियासत को जन्म देने की फिराक में लग गया। तान्या सामीप्य को हासिल करने का सबसे सीधा तरीका उसके पति का दोस्त बनकर उसके नजदीक जाना था। उसने अपनी सारी इच्छाशक्ति समेटी और चौकन्ने समर्पण से तान्या के पति की ओर मुखातिब हो गया।

"वाह, यार अतुल, वेन डिड यू ज्वाइन? लास्ट जो मुझे पता था, तुम कहीं और पोस्टेड थे?"

"जी सर, इसी मंगलवार को यहाँ ज्वाइन किया, इस दरमियान हम लोग जिले में थे सर। चाहता था, आफिस में ही मिल लूँ, पर आप बहुत व्यस्त थे...! आज संडे था, सोचा, आप घर पर थोड़ी फुरसत में मिल जाएँगे, इसलिए बिना अपाइंटमेंट हम चले आए, सॉरी फॉर दिस...।"

"अरे नहीं यार, तुम भी... कैसी बात कर रहे हो! इट्स ए प्लेजर यार! तुम लोग तो आया करो हमारे यहाँ, अच्छा लगेगा हमें भी, वरना तो आजकल महानगरों के ऐब हमारे इन शहरों में भी आ गए हैं और जेनुइन लोगों से वास्ता ही नहीं पड़ता है। आया करो यार!"

अतुल चौधरी सर की बात सुन सहज हो गया। नई नौकरीवाला जूनियर अफसर था, सर की उदारता पर भीतर से मुग्ध-मुग्ध भी हो गया। माथुर की पत्नी का स्वभाव भी बड़ा मीठा-मीठा लगा उसे और माथुर की बातों का समर्थन कर माथुर की पत्नी ने कमरे में मौजूद दोनों पुरुषों का जी खुश कर दिया।

धीरे-धीरे दोनों पति-पत्नी का माथुर के घर आना-जाना तकरीबन रोज ही होने लगा। माथुर उन्हें कभी नाश्ते पर बुलाता, कभी खाने पर। जब नाश्ते पर बुलाता तो खाने तक रोक लेता, दोपहर का खाना रात तक चलता। माथुर की पत्नी अपने नए बनाए मित्रों की आवभगत में माथुर का पूरा साथ देती। माथुर अपनी पत्नी की इन भोली अदाओं पर और रीझ जाता और अपनी पत्नी को और ज्यादा प्यार करने लगता। माथुर की पत्नी निहाल हो जाती और माथुर को रोज तान्या चौधरी से मिलने का एक और मौका मिल जाता।

तान्या अब माथुर से खूब घुल-मिलकर बतियाने लगी थी। कई बार माथुर की पत्नी से मिलने वह, अकले ही चली आया करती थी और माथुर की पत्नी के घर पर नहीं होने पर, माथुर के दस महीने के बच्चे से खेलने लगती थी या माथुर से ही लंबी गप्पों में मशगूल हो जाया करती थी। कितनी बेलाग है यह! माथुर समझता और रोमांचित हो जाता। उस रोज माथुर की पत्नी बाजार गई थी, जब तान्या माथुर के घर आ पहुँची।

"मैम...?" तान्या की आवाज ड्राइंगरूम से होते हुए माथुर के कानों तक बेडरूम में पहुँची।

वह सपना देखते-देखते चिंहुक गया हो जैसे, वैसे ही उठा, उसने शीशे के सामने खड़े हो अपनी बगलों में डीओ का स्प्रे किया और धीरे-धीरे किसी आशा से भरा बाहर आया, "हाय, तान्या!"

"अरे सर, मैम कहाँ हैं? ओह हाँ, भूल गई थी, बाजार गई हैं न? फोन पर बात तो हुई थी, फिर भी मैंने चांस लिया। सोचा, कहीं लौट आई हों।"

माथुर को लगा, कोई घूँसा-सा पड़ा हो उसके दिल पर। यह सबकुछ जानते-बूझते यहाँ आई है, क्यों? उसे क्या फिक्र नहीं? क्या माथुर अभी तक उस तक पहुँचा नहीं पाया अपनी चाहत और उससे उपजती पेंचीदगियाँ? उसके अंदर की सियासत की स्कीम में तान्या का नाफिक्र होना कहीं नहीं था, उल्टे फिक्रमंद और भरपूर हो लचक जाना था, ठीक माथुर की दिशा में, फिर...? वह निराश हो गया। तान्या सचमुच संभव थी, या वह संभव है, यही बताने आई थी...। उसने दबी जुबान से कहा, "बैठो तान्या, फील कंफर्टेबल।"

एक गैरजरूरी चुप्पी कहीं से आकर दोनों के बीच बैठ गई। तान्या को उसका इस अच्छे रिश्ते में घुसपैठ कर जाना अखर गया, वह बोल पड़ी, "सर, चाय पीयें?"

माथुर को जाने क्यों लगा, तान्या की आवाज उसके चिर-परिचित लहजे से कहीं ज्यादा सूखी-सूखी थी। वह एक और भ्रम में पड़ गया, क्या तान्या भी कुछ अपनी तरफ से चाहती थी और वैसा नहीं होने पर शुष्क हो जा रही थी? पत्नी के आने पर, निरुदेश्य-सा बैठा, 'वक्त जाया कर रहा हूँ', वाला भाव लेकर पत्नी को उलाहना देता-सा वह देखने लगा।

पत्नी को माथुर का भाव सहज और परिचित लगा। वह तान्या से भी पहले, माथुर से बोली, "सॉरी... सॉरी, रियली सॉरी!"

"ठीक है, कोई बात नहीं," माथुर ने बात को एक हाथ के इशारे से बर्खास्त कर दिया और कमरे की ओर चल दिया।

माथुर एक अतल गहराई में डूबता जा रहा था। उसके अंदर के मजबूत किले की रेत अनजाने थपेड़ों के प्रभाव से धीरे-धीरे झरने लगी थी। उसका आकर्षण पहले तो शगल में बदला, अब गाढ़े-गाढ़े द्रव्य-सा रक्त में एक न बदलने वाली आदत के रूप में जमने लगा था। माथुर इस नए उद्घाटन की गिरफ्त से डरने लगा। यह तो एक कमजोरी थी और माथुर का कमजोरियों से क्या वास्ता? उसके अंदर माथुर-माथुर के अलावा तान्या-तान्या की चीख-पुकार भी बसने लगी थी, मगर वह निराश था। वह चाहता था, कुछ ऐसा ही हो, तान्या चौधरी के भीतर भी और वह उसे दिखाई भी दे...! इसी आशा से वह उसे हरदम आँकने-परखने लगा।

तान्या का अकेला आना और फिर लौटते वक्त सुनसान रातों का सामना करना बढ़ गया, क्योंकि अतुल अक्सर काम के सिलसिले में शहर के बाहर जाने लगा था। पहली बार उसे घर पहुँचाने की बात माथुर की पत्नी ने ही की।

"सुनो तान्या आज अकेली है, अतुल किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में शहर से बाहर गया हुआ है, देर हो गई है यार, छोड़ दो न उसे?" माथुर की पत्नी अपने भोले प्रपोजल के साथ खड़ी उसे गौर से ताक रही थी। हमेशा के कुशल प्रशासक माथुर को कुछ भाँपे जाने का संदेह हुआ। पत्नी की मामूली आशंकाओं को कुचलने के उद्देश्य से उसने चिढ़ा हुआ मुँह बनाया और पत्नी मुस्कुरा पड़ी, "प्लीज..."

माथुर चल दिया तान्या को छोड़ने, "चलो...!"

बस, गाड़ी में वे दोनों... माथुर फिर न चाहते हुए किशोर हो गया और अक्सर ऐसे मौकों की तलाश में रहने लगा। जिस दिन पहली बार तान्या के हाथ पर गलती से अपना हाथ रखा जाना उसने प्रदर्शित किया, तान्या सामान्य रही। मगर जिस दिन सीट के नीचे गिरी चाभी ढूँढ़ने के बहाने उसने तान्या की एड़ी में अपने बढ़े नाखून वाली उँगली चुभोई, तान्या सामान्य नहीं रह पाई थी। उसकी आँखें बंद हो गई थीं। माथुर पढ़ ही नहीं पाया उन आँखों में क्या था - आनंद, दुख या वितृष्णा? वह चाहता था कि उसे मन की बात दिखे, मगर तान्या ने अपने ऊपर विद्युत गति से काबू पाया और जल्द ही सहज हो गई। रात को मन शंका से आक्रांत रहा। बार-बार उठने से उसकी पत्नी चिंतित हो गई। उसने बत्ती जला दी और अँधेरे में फँसी बातों को सुलझाने के लिए उन्हें रोशनी दिखाने में लग गई।

"क्या तबीयत ज्यादा खराब है? आजकल देखती हूँ, लगातार सोचते हो, क्या ऑफिस की परशानी बढ़ गई है?"

इतना सुनते ही माथुर खुद को न रोक पाया, सुबक उठा। थोड़ी घबराहट, थोड़ी निश्चिंतता (चलो... पत्नी अभी तक इसे ऑफिस की ही परेशानी समझती है) और थोड़ी ग्लानि उभर आई। "हाँ...।" उसने धीरे से सिर हिलाया, "परेशान हूँ आजकल... मंत्री साला... हर काम में नाक घुसेड़ता है... लेकिन तुम, तुम भी तो कुछ अनमनी दिखाई पड़ती हो आजकल?" माथुर ने टोह लेने के अपने तरीकों को आजमाना शुरू किया। "क्या बात है?"

"कुछ नहीं यार" पत्नी कुछ डबडबाई आँखों से बोली, "बस, थक जाती हूँ। तुम्हें फुरसत है नहीं कि सुनो, ऑफिस-ऑफिस है तुम्हारा तो और उससे छूटते ही तो दोस्तों की महफिल... दोस्त तो अच्छे हैं लेकिन फिर भी..." बातों को यूँ ही हवा के तारों पर टाँग दिया पत्नी ने।

माथुर को धक्का लगा। सब कुछ इतना आसान नहीं रह गया था अब तो। वह क्या ढूँढ़ रहा था और सबकी जिंदगी उलझा रहा था। शायद जो ढूँढ़ रहा था, वह मिलना आसान नहीं था। तान्या हर बार बिना साबित करने के प्रयास के साबित कर ही जाती थी, 'तान्या चौधरी को अपने पति अतुल चौधरी से प्यार है और वह खुश है।' फिर इस रिश्ते की परिणति क्या थी? माथुर का पागल होना? इस निष्कर्ष पर पहुँच वह पागलों के समान हँस पड़ा और अपनी पत्नी को बाँहों में भींच लिया। औरत का महत्व उसकी जिंदगी में एक पत्नी से अधिक नहीं हो सकता था। एक भोली गदबदी गुड़िया से अधिक।

उसने अगली सुबह संतोष से देखा, उसकी कल की अनमनी पत्नी दुबारा घर में इतरा-इतराकर चल रही थी और नौकरों पर हुक्म चला रही थी।

अतुल चौधरी का उस अनायास खबर के साथ माथुर के घर में प्रवेश करना उतना ही असहज घटना थी, जितनी असहज माथुर के लिए उन दोनों की पहली विजिट थी। अतुल उत्साह से भर खबर बता रहा था, "सर, दिल्लीवाला ऑफर ले लिया मैंने, बहुत पहले अप्लाई किया था, कल ही रिजल्ट आया।"

"क्यों यार, वाई? यू वर डूइंग वेल हीयर?" माथुर को लगा, किसी ने उसकी जमीन ही खिसका दी। वह खडे़-खड़े डगमगा गया।

"यस सर, सही, मगर ये बड़ा ब्रेक है मेरे लिए।"

"इतनी अच्छी सरकारी नौकरी छोड़, प्राइवेट सेक्टर में... क्यों यार? सम हाउ मेरा अभी तक इस सेक्टर में बहुत कॉनफिडेंस बन नहीं पाया है। वैसे जल्दी क्या है, थोड़ा और सोच लो।" माथुर ने अपने लिए मरती आशा से पैरवी की।

"नहीं सर, अब तो मैं रिजाइन कर चुका हूँ। अभी मैं यह रिस्क ले सकता हॅू। दिल्ली में तान्या को भी कोई प्लेसमेंट मिल जाएगी। इट्स क्रिमिनल, उसके पास, एच.आर.डी. में डिग्री है और वह कुछ कर नहीं पा रही है।"

"हॉ...!" माथुर ने तान्या की ओर देखा, एक हताशा से, एक टूटी-फूटी इच्छा से। थोड़ी कहीं हल्की-सी उदास नजर आए वो।

"तान्या..." उसने उस परत को उघाड़ना चाहा, "तुम तो बहुत एक्साइटेड लग रही हो... तुम्हें तो खबर बहुत सूट कर रही है...?"

"हाँ सर", तान्या की आँखें थिरक रही थीं, "अब कितने दिन यूँ ही ऐश करते हुए बिताऊँगी, काम करना तो जरूरी है..."

"ओह, यस," माथुर ने पूरी दिलेरी दिखाई और ड्रिंक बनाने चल दिया, "तुम लोग सेलिब्रेट करो, मैं कुछ गम गलत करता हॅू।"

उसके लफ्जों की सच्चाई सभी को उसके जबरदस्त ह्यूमर का नतीजा लगी। खूब ठहाके लगे उस रोज और जब माथुर अपने अंदर के आवेग को टायलेट में फ्लश करने गया, तो उसके कानों में उसकी पत्नी की आवाज सुनाई पड़ी, "कितने अच्छे दिन हमने साथ गुजारे..." पत्नी पर भी व्हिस्की का नशा तारी हो रहा था, वह कुछ लड़खड़ाई फिर बोल ही गई... "वी विल मिस यू यार..." माथुर की आँखें गर्म गीली होने लगीं।

स्टेशन पर उन दोनों को विदा करते वक्त उसे न जाने कैसा-कैसा लगता रहा। फिल्मी फ्लेशबैक की तरह तान्या के साथ गुजारे पल याद आते रहे। उसने अतुल को गर्मजोशी से विदा किया और तान्या की पीठ पर भी एक औपचारिक ठंडा, निस्पंद हाथ फेरा और बाय कह दिया। आदतन उसने, तान्या की आँखों में झाँककर, पार जाना चाहा और जानना चाहा कि इस ठंडी बिदाई पर तान्या क्या सोच रही होगी।

वह यह देखकर दंग रह गया कि तान्या का साँवला चेहरा तमतमा रहा था और उसकी दाईं आँख के कोने पर एक नन्हा आँसू अंदर ही बने रहने की नाकाम कोशिश कर रहा था। मतलब तान्या को उसकी बेरुखी अच्छी नहीं लगी, वह उससे कुछ अधिक की अपेक्षा कर रही थी...। उसे अचानक ही सारा माहौल अपने पक्ष का लगने लगा। उसकी सियासती चाल कुछ कामयाब रही थी।

घर लौटने पर, मगर फिर उसका विजयी भाव क्षीण होने लगा। उसे लगा, उसका कुछ स्टेशन पर ही पीछे छूट गया है। वह खाली-खाली महसूस करने लगा। बेहद अधूरा। उसे लगा, उसे ऐसा नहीं महसूस करना चाहिए, उसे कुछ तो मिला ही था, मगर वह फिर सवाल खड़े करने लगा, 'उसे पूरा क्यों नहीं मिला था?' उसे झुँझलाहट घेरने लगी, वह इस पाने और खोने के चक्कर में कब तक फँसा रहेगा? वह अपना महत्वपूर्ण होना कहीं से मिस करने लगा। उसने तय किया, वह अतुल और तान्या से अब आगे कोई संपर्क नहीं रखेगा। वह दुबारा वही शक्तिशाली पुरुष बनकर जिएगा, व्यवस्थित और अपने आप में पूरा... जैसा वह तान्या के मिलने के पहले था।

उसकी पत्नी लहराते-गुनगुनाते हुए उसके पास आई, "चाय पियोगे?" वह उसकी ओर दावत देती झुकी।

माथुर मगर उसे देख ही नहीं पाया, वहीं सामने दीवार की ओर देख कुछ तय करता रहा। उसे अपने ऊपर हैरत हुई, जब तान्या चौधरी को उसने अपने जीवन में बसा रखा था, तो वह अपनी पत्नी को कितना प्यार कर लेता था और आज जब उसने अपने वजूद को व्यवस्थित कर तान्या को अपने जीवन से बाहर करने का निर्णय लिया है तो वह अपनी पत्नी को ठीक से जवाब भी नहीं दे पा रहा है। "सुनो..." वह जोर से चिल्लाया।

पत्नी उसकी उपेक्षा से आहत गार्डन में टहलने लगी थी। उसे कुछ माथुर की आवाज में अकुलाहट का भ्रम हुआ। वह अपनी उपेक्षा भूल दौड़ी चली आई। "ओह... मैं तो डर गई थी, तुम इतनी जोर से चीखे क्यों?" माथुर के चेहरे पर सारे ऊहापोहों के दमन के बाद की बेशर्म हँसी चढ़ आई थी जिसे उसकी पत्नी ने प्यार-भरा मजाक करार दिया और पूछ बैठी, "क्या चाहिए?"

"तुम!" माथुर ने उसे पकड़ दबोच लिया, मानो मुट्ठी में कैद तितली और धीरे-धीरे मुट्ठी खोल, तितली के पंखों को सीधा कर, उसे उड़ान देने में लग गया।

कुछ ही महीनों बाद माथुर को दिल्ली जाने का मौका मिला। उद्योग मंत्रालय में उसका प्रेजेंटेशन था। माथुर का मंत्री उसका मुरीद हो चुका था, क्योंकि माथुर प्रदेश की योजनाओं के लिए दिल्ली से हमेशा ही बहुत सारा पैसा लाता था। माथुर की हर जगह चर्चा थी। आजकल उसके जीवन में एक ही रंग खिला हुआ था - सफलता का रंग।

दिल्ली में अपने काम से फुरसत पा, माथुर के वजूद में बहुत दिनों बाद कुछ हलचलों ने दस्तक दी। उसे तान्या चौधरी की आँख में रुका हुआ वह नन्हा आँसू शिद्दत से याद आने लगा। उसके सेल पर तान्या का नंबर सेव्ड नहीं था। शायद किसी डायरी में नोट किया था उसने वह नंबर। उस वक्त उस नंबर का उसके सेल पर नहीं होना उसे सुकून से भर गया था। मगर आज वह उसे परेशान करने लगा। वह बेचैनी से नंबर ढूँढ़ने की कोशिश में लग गया। उसने अपने सारे फाइल फोल्डर्स फर्श पर पटक दिए और होटल के कमरे में चारों ओर सूटकेस का सामान फैला दिया। तभी उसे दिखाई पड़ा, वह छोटा-सा पाउच जिसमें उसने उन कागजातों को बंद कर दिया था, जिसका उसके भविष्य से अब कोई वास्ता नहीं होना था। उसे याद आया, उसी में थी वह डायरी जिसमें तान्या का नंबर था। उसने काँपते हाथों से पन्ने पलटे, हरे जेल पेन से लिखा था नंबर '981...!' वो पसीने से तर हो गया। उन्माद में डायल करने लगा। एक बार, दो बार... तीसरी बार में रिंग गई। उसकी तेजी से दौड़ती साँस रुक गई।

"हेलो... तान्या हीयर, आप कौन?"

"मैं माथुर..."

"अरे!" वो किलक उठी।

"आप... आप कहाँ हैं? क्या यहाँ दिल्ली में? नंबर तो लोकल लग रहा है आई डोंट बिलीव इट।"

इतनी पुलक, इतने सवाल?

"तुम बहुत खुश हो?"

"हाँ," वह चहकी, "मैं अभी ऑफिस में हूँ, पर आपसे मिलने आ सकती हॅू, अतुल तो सिंगापुर गए हैं, आप बताएँ, घर आएँगे या मैं आपसे मिलने आऊँ?"

फिर वही, एक संभव-सी तान्या और माथुर की असंभव-सी इच्छा। वही असंभव-सी इच्छा तान्या में देखने को वह उत्सुक था और नहीं देख पा रहा था। उसे कच्चा-कच्चा लगने लगा। "इस बार नहीं तान्या...!" वह यह क्या-क्या बोल रहा था? उसे अपनी आवाज बेगानी लगी। ये उसके शब्द भी नहीं हो सकते। कैसे आखिर? उसने तो दुबारा मिलने के लिए ही फोन लगाया था। इसमें कहीं कोई संशय था ही नहीं। वह क्यों यह मौका गँवा रहा था? लेकिन फिर भी वह दोबारा जोर देकर बोलने लगा, "इस बार नहीं, मेरी फ्लाइट है थोड़ी देर में, अगली बार जरूर, जरूर मिलेंगे।"

इतना सुनते ही तान्या एक विचित्र स्वर में अपनी साँस गटक चुप हो गई।

माथुर ने फोन के इस पार भी उसका तनाव अपनी रगों में महसूस कर लिया वह भारमुक्त हो उड़ने लगा।

"बाय!" उसके शरीर का तरल रक्त गति के साथ दौड़ने लगा था।

"बाय!" उधर से एक निराश आवाज आई।

माथुर ने होटल के कमरे में अपना बिखरा सामान समेटा। उसे सब करते हुए कुछ ऊँचा-ऊँचा लगने लगा। उसने अपने अंदर की व्यवस्था को दुरुस्त रखा था, उसने कहीं कोई समझौता नहीं किया था। खासा मुश्किल काम था यह! उसने आराम से सामान समेट, एक सिगरेट सुलगाई और राख को ऐशट्रे में झाड़ते हुए अपने को शाबाशी देने लगा, 'वह फिर बच निकला था!' इसी एहसास के साथ धुएँ के छल्लों से खेलता हुआ वह उठा, अपना सूटकेस उठाया और अधपी सिगरेट उसने ऐशट्रे में मसलकर छोड़ दी।


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