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कहानी

कोई भी एक जगह
राकेश मिश्र


बसंत देव नहा धोकर तैयार हुए तो अनायास उनका हाथ अपने पैर के पिछले हिस्से की ओर चला गया। नई नौकरी 'ज्वाइन' करने के उपलक्ष्य में उन्होंने अब तक की अपनी जिंदगी का सबसे महँगा जूता खरीदा था। साढ़े तीन हजार का 'रेडचीफ'। लेकिन ये जूता जैसे उनको सूट नहीं कर रहा था। बहुत मुलायम और आरामदायक होने के दावे के बावजूद इसके पहनने से उनके पैर छिल गए थे। वे जानते थे कि इसमें जूते से ज्यादा गलती उनकी अपनी थी। आखिर उन्होंने ही जैसे जूते न पहनने की कसम खा रखी थी। लेकिन ये कसम भी उन्होंने शौक से तो नहीं ही खाई थी। बसंत के पिता जी जूते बनाने का ही धंधा करते थे। बचपन में उन्होंने बड़े प्यार से अपने बेटे के लिए एक जूता बनाया था, लेकिन वह जूता ही जैसे बसंत के जी का जंजाल बन गया था। स्कूल में हर कोई जैसे उनके जूते से चोट खाया जान पड़ता था। क्या तो उनके अध्यापक और क्या उनके सहपाठी। सब किसी न किसी बहाने उसे जूते का ताना मारते रहते थे। ताने तक तो उन्होंने हँस कर बर्दाश्त किया लेकिन एक दिन मंडल सर ने उसे सजा के तौर पर अपने जूते सर पर लेकर मैदान का एक चक्कर लगवाया तो जैसे उनके सब्र का बाँध टूट गया। वे अपने पिता के पास अपना जूता पटक आए और अपने टूटे बाँध के आँसुओं से अपने पिता को अंदर तक भिगो डाला। पिता अनुभवी थे। वे जान गए कि शहर में रहने के बावजूद वे अपनी जातिगत पहचान से मुक्त नहीं है और लोग बर्दाश्त नहीं कर सकते कि जो हाथ चमड़े का काम करने के लिए मुकर्रर किए गए हों, उनके पैरों में भी चमड़े की मुलामियत का असर आए। अपने अनुभव से वे यह भी जानते थे कि उस सरकारी स्कूल के हेडमास्टर तिवारी जी से शिकायत का भी कोई फायदा नहीं। शिकायत की आड़ में वे मंडल जी से किसी पुरानी अदावत का बदला तो ले लेते लेकिन अंततः तिल के बने उस ताड़ पर बसंत को ही चढ़ा कर धक्का दिया जाता जिससे उसकी कमर ही टूट जाय। बसंत की कमर बचाने अंततः उन्होंने अपने सीने पर पत्थर रख लिया और वही किया जो बहुत पहले गांधीजी हम सबको सिखा गए थे। उन्होंने मंडल सर के लिए बड़े जतन से एक बहुत खूबसूरत और नायाब जूता बनाया और बसंत को साथ लेकर उसे मंडल जी को सौंपते हुए बोले, 'सर! नादान को अपनी आँखों से न उतरने दें। आपके स्नेह की उँगली पकड़ कर ही यह इस जीवन संग्राम में पार उतर पाएगा।'

जूते की चमक मंडल सर की आँखों में बिजली बनकर कौंधी थी। जूता इतना मनमोहक और आकर्षक था कि वे उसे पैर में पहनने की बजाय बहुत देर तक हाथ में ही थामे रहे। बसंत के प्रति किए गए अपनी कमीनगी की थोड़ी सी झाईं भी उनकी आँखों में उतर आई थी। फिर भी अपने कृत्य को जायज ठहराने की गरज से उन्होंने जैसे दलील दी, 'दास जी! इस उम्र में बच्चों को फैशन के प्रति थोड़ा उदासीन होना चाहिए नहीं तो पैर फिसलते और आवारा बनते देर नहीं लगती। जूता पहनकर अभी से इतराएगा तो जीवन के कठोर रास्तों को कैसे महसूस कर पाएगा?' बसंत के पिताजी ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। इसका भी नहीं कि उनका सर नेम 'दास' नहीं 'देव' है, और इसका तो बिल्कुल नहीं कि उनके जीवन की कटु सच्चाइयाँ क्या है और उनके बेटे के रास्तों को ज्यादा पथरीला और काँटेदार कौन लोग बना रहे हैं। यदि कोई प्रतिवाद था भी तो वह उनके कलेजे के भीतर ही कहीं सीले और गीलेपन में धुआँता रहा लेकिन बसंत के भीतर अभी उतना गीलापन नहीं आया था वह सूखी लकड़ी की तरह धधक रहा था। कहा तो उसने भी उस समय कुछ नहीं लेकिन बाद में मंडल सर का वह जूता स्कूल के किसी कोने में चिथड़े चिथड़े के रुप में मिला था। किसी कुत्ते या जानवर की करस्तानी मानकर मंडल सर गम खा गए थे लेकिन यह सवाल जिंदगी भर उनको परेशान करता रहा कि, आखिर किस जानवर के पंजे ब्लेड जैसे तेज और धारदार होते हैं?

उस दिन के बाद से बसंत को जैसे जूतों से चिढ़ और नफरत सी हो आई थी। कॉलेज के दिनों में एकाध बार जरूर इसके पहनने की अनिवार्यता आई परंतु हर बार वह जूता पैरों को काट ही जाता। जूते के काटे निशानों से बसंत के टखने के पिछले हिस्से में काला घट्ट जैसा हो गया था वह घट्ट था पैरों में लेकिन उसकी छाप अब बसंत के चेहरे पर भी पढ़ी जा सकती थी। वह एक स्थायी मुहर की तरह उसके व्यक्तित्व पर चस्पाँ हो गई थी।

लेकिन इस नौकरी के पहले ही दिन सीनियर एक्जक्यूटिव घोष बाबू ने उसके जूते न पहनने को नोटिस कर लिया - 'ऐई बसंतो! ये कैसा माफिक वस्त्रो धारण किया है तुभी। ऐई कुरता! जींस! चप्पल। ये सब पहिन के कोई ऑफिस आने सोकता क्या। बी प्रॉपर। ओवर ऑल वी आर पल्बिक सरवेंट पब्लिक का साथ डीलिंग है तुम्हारा। वह सकपकाया सा उनके केबिन से बाहर निकल आया। निकलते-निकलते भी कुछ शब्द पिछले सीसे की तरह कानों में पड़ ही गए, 'असब्बो! कइसा-कइसा लोग आज कल इस सर्विस में आने लग गिया। सोरकारी दामाद होबे तो।' बसंत की इच्छा वापस कमरे में जाकर घोष को उन्हीं चप्पलों से पीट देने की हो रही थी। साला 'आरक्षण' पाने को सरकारी दामाद कह रहा था। मैं तो हूँ सरकारी दामाद तुम किसके साले बने बैठे हो आज तक। अंग्रेजो के? लेकिन अभी 'प्रोबेशन पीरियड' था। और इस महकमे में उसे पता भी नहीं था कि अपने लोग कितने हैं? और यदि हैं भी तो उनकी ताकत कितनी है? उनका कोई संगठन भी है या नहीं। यहाँ तो जिधर देखो 'तिवारी,' 'घोष,' 'सिन्हा,' 'मिश्रा' ही नजर आते है। एक दास बाबू को अपना आदमी समझकर कुछ बात करनी चाही तो वह भी कायस्थ निकला। बंगाली कायस्थ। दादा। तुम अइसा-वइसा कुछ मत सोचो। चुपचाप अपना काम से काम रखने का। अभी बहुत लंबा समय बिताना है यहाँ। बसंत खामोशी से उसे सुनते रहे। कितना लंबा समय। वह खुद से ही पूछता रहा जैसे। कितना इंतजार और करना है। कितनी हसरतों और इंतजार के बाद तो उसे यहा नौकरी हासिल हुई थी। बचपन से ही वह इस क्षेत्र में आना चाहता था। 'एग्रीकल्चर'। बचपन में जब स्कूल की छुट्टियों में उसके सारे यार दोस्त अपने-अपने गाँव जाते और वहाँ के किस्से उसे सुनाते, तो वह अक्सर उपने पिता से पूछता उसका गाँव कहाँ है। वे लोग अपने गाँव क्यों नहीं जाते। तो जैसे पिताजी की आँखों में कुछ बुझ सा जाता। बुझे स्वर में ही उन्होंने बताया था कि उन लोगों का कोई गाँव नहीं। गाँव मतलब खेत खलिहान होता है और सदियों से ऐसी व्यवस्था की गई कि उनकी तरह की जातियों का खेत खलिहान से कोई रिश्ता नहीं रहने पाये। वह पूछता था कि आखिर ऐसी व्यवस्था की ही क्यों गई? क्यों किसी के पास सारी सुविधाएँ, सारे संसाधन और क्यों किसी के सर पर जूता। पिता इंतजार करने की सलाह देते। धीरज रखो बेटा। जमाना बदलेगा। बसंत कितना इंतजार करते। अपनी पढ़ाई को ही उसने अपना हथियार बनाया। ठीक है तुम मुझे अपनी जमीन नहीं लेने दोगे। मैं तुम सबकी जमीनों पर अपनी तरीके से खेती करवाऊँगा। इसी सोच के साथ उन्होंने बी.एससी. एग्रीकल्चर की पढ़ाई की और आज यहाँ झारखंड के मधुपुर में बतौर जूनियर 'कृषि वैज्ञानिक' के तौर पर योगदान देने आए थे।

लेकिन यहाँ पिछले तीन महीनों से उन्हें योगदान देने जैसा कुछ महसूस नहीं हो रहा था। वे ऑफिस जाते और दिन-दिन भर बिना किसी काम के अपनी टेबल पर बैठे रहते। सामने ही घोष बाबू का चैंबर था लेकिन पहले ही दिन जबसे बसंत ने सरकारी दामाद वाला जुमला सुना था, उसके कमरे में जाने की इच्छा नहीं होती। यह केंद्र अभी प्रायोगिक तौर पर ही शुरू किया गया था, इसलिए तीन जूनियर वैज्ञानिकों के अलावा पाँच ही क्लरक्लियल कल स्टाफ थे। इन तीन महीनों में उसने अपने अलावा किसी दूसरे समकक्ष जूनियर वैज्ञानिकों से इस बाबत जब दास बाबू से कुछ जानने की कोशिश की तो उनका वही सहमा सा लहजा था ''औरी बाबा! तुमको ये सब लफड़ा में नेई पड़ना चाहिए। कोई आए न आए तुमको क्या। ये सब बड़े लोगों की बातें है। ...एक तो दुबे जी है। वो तो घोष बाबू के भी बड़े साहब के साले हैं। बहुत बड़े ठेकेदार हैं इधर के जंगल के। ये नौकरी तो उन्होंने ऐसे ही किया है...। एक और अरुण बाबू हैं... अभी ज्वाइन नहीं किया है लेकिन... ठीक है। ठीक है... जाओ अपना काम करो।'' बसंत की आवाज में एक दम से तुर्शी आ गई। ये लोग बड़े लोग थे तो वो क्या था। छोटा? छोटा आदमी। उसके ही समकक्षों को यह अदना सा क्लर्क ऐसे महिमामंडित कर रहा था जैसे वह किसी और ग्रह से आए हैं और वह खुद पाताल से।

दास बाबू उसके इस बदले रुख से थोड़े लड़खड़ा गए फिर एकाक से लपक कर घोष बाबू के कमरे में घुस गए। बसंत का हाथ आदतन अपने टखने के पिछले हिस्से की ओर चला गया जबर्दस्ती जूता पहनने की कोशिशों में उन काले पड़ चुके घट्टों में दरारें सी आ गई थी, और वहाँ से पानी जैसा कुछ रिसने लगा था। वह अक्सर अपनी सीट पर जूते खोलकर ही बैठता और किसी भी तनाव में जब अनायास उसका हाथ उन जख्मों के इर्द-गिर्द गोल-गोल घूमता तो उसकी कनपटियों के आस-पास से पसीना फूट पड़ता वह उसके आवेगों के बाहर निकल आने का सूचक था। उसके अभी सहलाने से पसीना फूटने ही वाला था कि घोष के चैंबर से निकलते दास ने जैसे उलाहना या धमकी जैसे स्वर में कहा, ''आपको साहब बुलाता है अब्बी।'' 'अब्बी' उसने थोड़ी देर में जोड़ा ताकि उसके बुलाए जाने और दास के अंदर जाने में कोई संबंध जाहिर हो सके। लेकिन बसंत ने उसके 'अब्बी' के धमकी भरे अंदाज को कनपटियों के पसीने में घुल जाने दिया, और इतमीनान से पंद्रह मिनट बाद घोष के चैंबर मैं दाखिल हुआ। आज उसने सोच ही रखा था कि यदि दास के कहने पर घोष ने कुछ उल्टा सीधा सुनाया, तो वह भी आज घोष को अपनी औकात दिखा ही देगा। लेकिन उम्मीद के विपरीत घोष ने हँसते हुए उसका स्वागत किया। आओ बसंतो। कइसे हो? बैठो! अरे इदर बइठे-बइठे तुम बोर हो गया होगा। लेकिन चिंता का काई बात नईं। अब्बी तुम्हारा साथी का फोन आया था। कोई अरुण सरमा। बोला वो तुमको जानता। तुम कालिज में उसका संगी था। कोई इधर तुम्हारा सहकर्मी जूनियर सांयटिस्ट।

बसंत के चहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट कौंधी। अरुण शर्मा। तो वह था उसका यहाँ दूसरा पार्टनर। ए.जी. कॉलेज में वह उसका सबसे अच्छा दोस्त तो नहीं लेकिन अच्छा परिचित था। दोस्त भी कह सकने लायक। बिहार के बेगुसराय का रहने वाला, सबको कामरेड से संबोधित करने वाला, लपक कर सबसे गले मिलनेवाला, हँसमुख, मिलनसार, कॉलेज यूनियन का नेता अरुण शर्मा। तो तुमसे यहाँ मुलाकात होनी थी। तुम तो कहते थे कि ये सरकारी नौकरी सब बुर्जुआजी के हथियार है... क्रांति की धार को कुंद करने के। तुम तो ए.जी. पढ़ ही इसलिए रहे थे कि यह सब पढ़कर किसानों के बीच क्रांतिकारी तरीके से काम कर सको। उनको खेती के क्रांतिकारी तरीके सिखाओ और समाज में वास्तव में क्रांतिकारी बदलाव ला सको।

तो ये है तुम्हारा क्रांतिकारी बदलाव। सोचते हुए बसंत के होठों पर एक तिरछी मुस्कुराहट पसर गई। उसे इस तरह मुस्कुराता देख घोष ने टोहकी ली : ऐई! खूब भालो! दोस्त को याद कोरके मुस्कान आया तुम्हारा चेहरा पे। अब खूब मन लोगेगा तुम्हारा। बसंत जब चलने को हुए तो घोष ने फिर टोका 'ऐई बसंतो। तुम्हारा सर नेम टा की? क्या टायटिल है तुम्हारा?' बसंत की कनपटियाँ सुलग उठीं। साले सरनेम से क्या लेना देना है तुमको? जानते तो हो न कि मैं सरकारी दामाद हूँ। लेकिन अपनी आवाज को भरसक संयत रखते हुए कहा उसने जी, देव! बसंत देव। ''वोई तो। देव तुम्हारा सरनेम है? तुम लोगों में 'देव' भी होता है? बसंत का सब्र अब उसका इम्तहान ले रहा था। साले, जीवन भर अपने श्रम, अपनी मेहनत से अपना पेट भरने वालों में 'देव' नहीं होगा तो तुम हरामखोरों, दूसरों के मेहनत का शोषण कर अपनी हैसियत बनाने वालों में होगा?

''सिर्फ 'देव' ही नहीं दानव भी होता है।'' वक्रोक्ति में बसंत के होठ थोड़े तिरछे हो चले।

''हा-हा-हा-हा गुडजोक, बसंतो,! गुडजोक,! आई लाइक इट। घोष, बसंत के भीतर से अनजान, यूँ ही ठहाका मार कर हँसने लगा। 'बहोत अच्छा 'हयूमर' है तुम्हारा। और अब्बी गेटअप भी आच्छा हो गया। देखो तो ये तुम्हारा जूता ठो, ओनेक भालो! भीषण सुंदर!

बसंत के 'लव' गर्म हो उठे। न जाने उसे क्यों लगा कि अभी ये घोष हँसते-हँसते कहने वाला है कि इतने सुंदर जूते को जरा सर पर रखकर दिखाओ। अपने भीतर उठते तूफान को किसी तरह दबाए वह घोष के चैंबर से बाहर निकल आया।

रातभर बसंत को नींद नहीं आई। आखिर यह जूता भी सबकी नजरों में खटक ही गया। ओनेक मालो। भीषण सुंदर रात भर उसके कानों में नाद की तरह गूँजते रहे। सुबह देखा तो फफोले और बढ़ गए थे लेकिन किसी तरह उन्होंने जबदस्ती जूते चढ़ा ही लिए।

ऑफिस पहुँचने पर दास गेट पर ही खड़ा मिल गया। उसने नजरअंदाज करना चाहा लेकिन वह लपककर पास आ गया। कल की झिड़क अथवा फटकार का कोई चिह्न उसके चेहरे पर नहीं था। एक खुशामदी मुस्कान के साथ उसने इत्तला दी - 'साहब ने कहा है जैसे ही आप आएँ अंदर चले जाएँ कोई और साहेब भी आए हैं।' ठीक है, अपना काम करो। बसंत ने उपेक्षा से कहा और चिक सरकाकर अंदर चला गया। आज उसे जूते उतारकर घावों को सहलाने का भी अवसर नहीं मिला। अंदर घोष के साथ अरुण बैठा था। 'वही कामरेड अरुण शर्मा।' बसंत ने लपककर उससे गले मिलना चाहा - 'अरे कामरेड! लेकिन अरुण ने बहुत ठंढेपन से उसका हाथ किसी गुप्त इशारे की तरह दबा दिया। बसंत ने देखा घोष के टेबल पर कई तरह के चमचमाते पैकेट रखे थे। उन पॉकेट्स की चमक से घोष की आँखें चुँधिया जा रही थी और पैकेट में माल की कल्पना से उसके मुँह में लार इतनी ज्यादा भर गई थी कि बसंत को संबोधित करते हुए उसकी जुबान लटपटा जा रही थी - ऐई बसंतो। देखो तुमारा संगी। अरुण, खूब, भालो, खूब मानूष है। भद्रो। एकदम जेंटल मैन। अरुण का मुँह कसैला हो गया। अभी आधे धंटे में ही साले को इसकी भद्रता और शिष्टता का पता मिल गया। अपनी पहली मीटिंग में सुना हुआ - असब्बो। उसके माथे पर 'टन्न' की तरह बजा।

अरुण ने शायद बसंत की आँखों में कुछ पढ़ लिया। वह उसे लिए हुए कमरे से बाहर आ गया। बाहर आते ही बसंत ने फिर उसे गर्मजोशी दिखानी चाही - "और कामरेड! यहाँ तक कैसे?'' तो अरुण ने फिर उसका हाथ दबा दिया। "क्या करते हो दोस्त। वो सब लड़कपन की बातें थीं। यहाँ कामरेड का तो नाम भी मत लेना। वैसे भी नक्सली इलाका है। गलत इंप्रेशन जाएगा।''

बसंत को अब कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं थी। उसका सारा इंप्रेशन उसे समझ में आ गया था। अपने हाथों में पसीजता सा अरुण का हाथ उसे लिजलिजा लगने लगा। अरुण से मिलाने से पहले वह जो कुछ उसके बारे में पूछना चाहता था सब उसी पसीजते हाथ में पुँछ गए। उस रात बसंत को फिर नींद नहीं आई। जिस अरुण से आज वह मिला, वह तो पुराने अरुण की परछाईं भी नहीं था। सबको जबरदस्ती कामरेड संबोधित करनेवाला आज खुद कामरेड कहने से सकपका रहा था। किसी भी तरह के अत्याचार और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ मरने की बात करने वाला आज खुद अपने बॉस को अपनी अग्रिम सुविधा और सुरक्षा के लिए रिश्वत की 'डाली' चढ़ा रहा था। कभी मन कहता कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी... और कभी कह उठता, ''हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी।''

दूसरे दिन अरुण पहले की अपेक्षा ज्यादा सहज लगा। बातों-बातों मे ही उसने बताया कि पिताजी के अचानक निधन के बाद उस पर समूचे परिवार की जिम्मेदारी आ पड़ी। वैसे खेत वगैरह तो हैं उसके पास लेकिन मिट्टी खाकर तो नहीं रहा जा सकता। बसंत को उससे कुछ सहानुभूति सी हो आई। आखिर कॉलेज के दिनों का दोस्त था उसका। वह उसे धीरज बँधाता सा कोई वाक्य बोलना चाहता था तभी अरुण के एक वाक्य ने से उसकी जुबान तालू से चिपका दी।

'यार! ये घोष को तुमसे कोई प्रॉब्लम है क्या। लेकिन तुम चिंता मत करो, देखना मैं इसे कैसे शीशे में उतारता हूँ।'' यह किसी हारे हुए परेशान होकर जिंदगी से समझौता करने वाली आवाज नहीं थी, यह एक खेले खाए शातिर खिलाड़ी की एक गर्वोक्ति थी जिसने बसंत के दिमाग में उठ रहे सहानुभूति के सारे बगूलों को एक साथ ही शांत कर दिया।

लेकिन फिर भी अरुण के आने से बंसत की जिंदगी अब कम उबाऊ और कम बोझिल लगने लगी थी। घोष ने अरुण के आते ही परियोजना का काम आगे बढ़ा दिया था। प्रायोगिक केंद्र था मधुपुर। कई तरह के काम थे। मिट्टी की जाँच करना, उसे तैयार करना आदि।

उस मिट्टी के हिसाब से नई फसलों की पहचान करना। बसंत को जैसे अपने होने का मकसद मिल गया था। वह दिन रात इन गतिविधियों में खोया रहने लगा। अरुण जैसे उसके साथ होकर भी नहीं था। ऑफिशियली वैसे कामों का बँटवारा था। बसंत के जिम्मे जहाँ मिट्टी की पहचान कर उसमें नई फसलों की संभावना तलाशने का था वही अरुण का जिम्मा उन फसलों की नई प्रजाति तैयार करने का था। परंतु अरुण अक्सर जल्दी में होता। वह बसंत की चिरौरी करता - यार बसंत यह भी जरा तुम ही देख लेना। वैसे भी तुम तो जानते हो कॉलेज में मुझे राजनीति से फुर्सत ही कहाँ मिलती थी? वैसे भी किताब पढ़कर जानने में और फील्ड में काम करने में बहुत अंतर है।

बसंत को वैसे भी काम में मजा था। इसी बहाने वह अपने काम के अलावा कोई और काम भी सीख रहा था। अपना हुनर बढ़ा रहा था। उसे बिल्कुल नई जानकारी मिल रही थी कि आदिवासी बहुल यह इलाका 'मशरूम' की खेती के लिए एकदम उपर्युक्त है। यदि उसकी ठीक से ट्रेनिंग दी जाय, और सरकार थोड़ा अनुदान दे तो इस इलाके के आदिवासियों की जिंदगी बदल सकती है। वह अपनी इस नई खोज के साथ जब घोष के दफ्तर में इसपर चर्चा के लिए पहुँचा, तो घोष के बोलने से पहले ही अरुण बोल उठा - पर! हम लोगों को प्रैक्टिकली सोचना चाहिए। इन आदिवासियों के लिए पैसा ज्यादा जरूरी नहीं है। जरूरी है उनका भोजन। हम लोगों के लिए उनको मक्के की पैदावार कैसे बढ़ानी चाहिए इसकी ट्रेनिंग देना ज्यादा जरूरी है।

बसंत इसके जवाब में कुछ बोलता इसके पहले ही घोष का मुँह खुल गया, "खूब भालो! अरुण! तुम ठीक बोलता बसंतो। तुमी एकदम आइडियलिक्टिक। एकटा काम करुन! तुभी अरुण बाबू से किहू सिखते पारब्रेन? क्या कोरेगा आदिवासी लोक पैसा लेके? नक्सल को देगा। अऊर बंदूक खरीदेगा। अऊर लोक को मारेगा।" बसंत का मुँह लाल हो गया। पिछले-एक साल से वह इस प्रोजेक्ट पर लगा हुआ था। इतने सारे रिसर्च करके, इतना सैंपल लेके इतना सर्वे करके वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा था। और अरुण? उसे इन सबके बारे में क्या पता था? इन सालों में उसने एक बार भी मिट्टी को हाथ में लेकर नहीं देखा था। लैब में जाने की बात तो दूर। और आज यहाँ उसके निष्कर्षों को ऐसे उड़ा रहा था, जैसे वह यह सब जानता हो, और उसकी कोई अहमियत न होने के कारण, उस पर बातचीत करना जरूरी न समझ रहा हो। वह लगभग पैर पटकता हुआ बाहर आ गया। उसके पीछे-पीछे लपकता हुआ अरुण भी निकला और उसके कंधे दबाते हुए बोला, ''यार मैंने बताया था न तुमको घोष को कुछ प्रॉब्लम है तुमसे।''

तूने भी यार अपनी फाइडिंग पहले मुझसे डिस्कस नहीं की। बस थोड़े ही दिनों की बात है, ये अपना घोष अब बस अपने शीशे में उतरने ही वाला है। फिर तो जो हम कहेंगे, वही होगा।''

अगले कई महीनों तक बसंत अरुण के उन तरीकों को परखता रहा जो उसने 'घोष' को शीशे में उतारने के लिए तय किए थे। वह दफ्तर में अपनी टेबल से ज्यादा समय घोष के चैंबर में बिताता। सप्ताहांत में लगभग अरुण के घर पर दारूबाजी होती जिसमें कई तरह के 'बीज माफिया,' 'खाद के कालाबाजारी,' 'ठेकेदार' भी शामिल होते। घोष तो सप्ताहांत के अलावा भी हर शाम अरुण के साथ होने की फिराक में होता। बसंत समझ नहीं पाता कि अरुण को आखिर ऐसा क्या चाहिए था जो वह घोष की इतनी चिरौरी कर रहा था। फिर अरुण के साथ उसकी जवान बहन भी रहती है, फिर इस तरह की दारूबाजी...। उसका दिमाग जबाब देने लगता नसें तड़कने लगती। अरुण जब भी उसे मिलता अपने यहाँ हुई पार्टियों के किस्से बताता। उसे उलाहना भी देता कि उसका पुराना दोस्त होते हुए भी वह कभी उसके घर नहीं आता। और एक दिन उसे जैसे अपने सारे सवालों का जवाब मिल गया। अरुण ने उसे दफ्तर में देखते ही गले लगा लिया - गुरू, मैं कहता था न कि इस घोष को मैं शीशे में उतार कर रहूँगा। लो उतर गया शीशे में।

- बसंत कौतूहल में थे, आखिर क्या हो गया कैसे उतरा यह शीशे में।

- अबे तुझे तो मालूम है न बगल में, सिमलतल्ता में सीनियर सायंटिस्ट की एक पोस्ट निकली थी।

- हाँ! तो? उसमें तो मैंने भी एप्लाई किया था।

- अरे यार! एप्लाई तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन मुझे डर केबल दुबे से था।

- दुबे कौन?

- अरे वही अपना कलीग दुबे। जिससे हम कभी नहीं मिले साला, अपने बिग बॉस का साला। जान साँसत में थी साले के कारण। सबने सोच रखा था होगा तो उसी का। लेकिन बॉस! मान गए न, हम भी क्या चीज हैं?

- क्या! क्या किया तुमने?

- अरे यार उससे लिखवा ले गए कि उसने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। अपरिहार्य कारणों से वह मधुपुर नहीं छोड़ सकता।

- तो! फिर इससे तुम्हारा क्या?

- अबे तो फिर अब फिर रहा क्या। घोष बाबू तो तैयार बैठे थे इधर ठेकेदार साहब के कारण साले साहब ने अपनी उम्मीदवारी वापस ली और इधर घोष बाबू का 'स्ट्रांग रिकमंडेशन' पहुँचा। उतर लिए सब शीशे में।

- बसंत सकते में थे। अपने रौ और उत्साह में अरुण ने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि उस पद के लिए वह भी एक उम्मीदवार था और संभवतः सबसे योग्य।

अरुण उस शाम उसे जिद करके अपने घर की पार्टी में ले गया। बसंत शराब नहीं पीते थे लेकिन वहाँ सबके इसरार करने पर उसे पीना ही पड़ा। वहाँ अरुण के शीशे में उतरे सब लोग थे। शीशे में उतरना क्या होता है, उसे यहाँ अच्छी तरह समझ आ रहा था। जिस अरुण की बहन के लिए वह इतना चिंतित था वह हँस-हँस कर दुबे को, बॉस के साले दुबे को इसरारपूर्वक चिकन परोस रही थी। घोष से रसोगुल्ला खाने का आग्रह कर रही थी। दुबे और घोष की आँखों से लग रहा था कि वे चिकन और रसगुल्ले की जगह उसकी बहन को ही खा जाएँगे। बसंत सर झुकाए बैठे रहे। उनसे यह सब देखा नहीं जा रहा था। दूसरे पैग के बाद उनके दिमाग में कुछ हलचल होनी शुरू हुई। उसने धीरे लेकिन सधी आवाज में बगल में बैठे घोष से पूछा 'सर। उस पद के लिए तो मैंने भी आवेदन किया था, आखिर आपने मेरा रिकमंडेशन क्यों नहीं किया?' घोष उस वक्त रसोगुल्ला लेने न लेने के इसरार के बीच झूल रहे थे। अचानक पूछे गए इस सवाल से उनका 'झूला' जैसे टूट कर नीचे गिर गया। एक अचरज भरी निगाह से वह बसंत को घूरता रहा फिर हो हो कर हँस पड़ा - 'ऐई देखो। ऐई क्या पूछता है? अरे बावा वो पोस्ट तुम लोकन के लिए नहीं था। जेनरल पोस्ट था। जनरल था, तो? जनरल में काबिलियत देखी जाती है या फिर इस तरह की सेटिंग! बसंत की आवाज बिफर उठी। अरुण को अचानक लगा कि जैसे बसंत ने उसी के घर में उसे 'नंगा कर' दिया हो। लगभग फुँफकारते हुए उसकी आवाज निकली - ''साले। आ गए न अपनी औकात पे। तुम लोगों को मुँह लगाना ही साला हराम है। आदमी को अपने बराबर के लोगों को ही साथ बैठाना चाहिए।''

''अऊर तुम समझता क्या अपने आपको? साला! गँवार! सरकारी दामाद होगा तुम अपने घर में। बोका। आच्छा कपड़ा और ऐई महँगा जूता पहनने से तुम हमारा बराबर हो गया?" घोष ने अरुण की फुफकारती आवाज में जहर घोला।

दुबे अचानक खीर में आए इस कंकड़ से बौखला गया था लेकिन वह अपनी भूमिका तय नहीं कर पा रहा था। तभी बसंत ने अपना जूता उतारकर घोष के सर पे रख दिया - "ले ये जूता महँगा है तो अपने सर पे रख साले।''

"ऐई। क्या कोरता है, तुमी नक्सली। घोष झपटने की कोशिश में लुढ़क गया। अरुण ने लपककर बसंत की कॉलर पकड़नी चाही, लेकिन बसंत ने अपने फौलादी हाथों से उसके हाथों को उमेठ दिया - ''अपनी हैसियत में रहो अरुण! मुझे मेरी हैसियत बताने से पहले जरा अपनी गिरेबाँ में झाँकते। एक टुच्चे प्रमोशन के लिए खाने की टेबल पर अपनी बहन को परोसने वाले के हाथों में इतनी ताकत नहीं कि वह मिट्टी से खेलने वाले के गिरेबान से खेले। कामरेड कहते थे न तुम खुद को? थू है साले तेरी 'भड़वागिरी' पे।'' हालाँकि बसंत ने थू कहते हुए थूका नहीं था, लेकिन उसके कुछ छीटें दुबे पर जा पड़े। उसे जैसे दृश्य में अपनी भूमिका मिल गई थी।

- साले, कमीन! थूकता है, सूरज पे थूकता है! वह लड़खड़ता हुआ इधर उधर कुछ ढूँढ़ने लगा। कहाँ है पिस्टल, मेरी पिस्टल?

बसंत ने उसे धक्का देकर बिठा दिया और आराम से अपना जूता पहनते हुए बोला - "ये जंगल नहीं है दुबे जी। और वैसे भी 'पैंथर' का शिकार करना मना है। अपनी हद में रहो और चुपचाप कंबल ओढ़ के 'घी' पीये जाओ, बाहर दिखाई दिए तो न कंबल रहेगा और न घी। दुबे संट होकर बैठ गया। बसंत आज जब अपने जूते पहने बाहर आया, तो उसे पीछे जूते काटने या घाव के रिसने जैसी कोई अनुभूति नहीं हुई।


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