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विमर्श

दलित विमर्श की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मीडिया
कृपाशंकर चौबे


दलित विमर्श की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए जो किताब 'कुंजी' का काम करती है, वह है, 'भारतवर्ष में जाति भेद'। उस किताब के लेखक हैं बंगाल के मशहूर अध्येता आचार्य क्षितिमोहन सेन शास्त्री जो रवींद्रनाथ ठाकुर के समकालीन थे। उनकी किताब का हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने प्रकाशित कराया था। द्विवेदी जी ने ही उसका संपादन भी किया है। उस पुस्तक में आचार्य क्षितिमोहन सेन भारत की जाति व्यवस्था पर चर्चा प्रारंभ करने के पहले कई दूसरे देशों की जाति व्यवस्था का परिचय देते हैं। वे लिखते हैं, "प्राचीन काल में मिस्र में जमींदार, श्रमिक और क्रीतदास तीन श्रेणियाँ थीं। धीरे-धीरे वहाँ योद्धा व पुरोहित का गौरव ऊँचा माना जाने लगा और शिल्पी तथा क्रीतदास (गुलाम) का नीचे। चीन में भद्र श्रेणी, किसान, शिल्पी व वणिक चार श्रेणियाँ थीं। वणिक का स्थान नीचे था। जापान में भी ये चार श्रेणियाँ थीं।1 बोर्निया में तो तीन श्रेणियाँ भी हैं। मैक्सिको में भी तीन जातियाँ हैं। वहाँ सिर्फ स्पेनीय लोग उत्तम हैं, मिश्रित लोग मध्यम और आदिम जातियाँ अधम।2 अरब के दक्षिणी प्रदेशों में कारीगर लोग ही अंत्यज थे। उन्हें गाँव या नगर के बाहर बसना पड़ता है। रोम में अभिजात और प्राकृत दो श्रेणियाँ थीं। ग्रीस और प्राचीन जर्मनी में भी अभिजात लोगों की एक विशेष श्रेणी थी। ईरान में भी चार वर्ण थे, यद्यपि एक वर्ण के लोग गुणकर्मानुसार दूसरे में जा सकते थे। 3 यानी इन श्रेणियों में छूआछूत न था। जिस देश के आदमी जितनी ही आदिम अवस्था में होते हैं, छूआ-छूत का विचार उनमें उतना ही कठोर होता है। स्पर्श दोष से अपनी विशेष शक्ति खो देने की और दूसरों के निकट से नाना अमंगल के पाने की आशंका इस प्रकार के विचार के मूल में होती है।"4

स्पर्श दोष के बारे में क्षितिमोहन सेन की यह टिप्पणी दलित विमर्श की बुनियाद रखती है। उस टिप्पणी के बाद क्षितिमोहन सेन का ध्यान वेदों पर जाता है। वेद चूँकि भारत के प्राचीनतम ग्रंथ हैं इसलिए भारत में जाति भेद का संदर्भ उठाते ही क्षितिमोहन सेन ऋग्वेद का उद्धरण देते हैं, "ब्राह्मणोSस्य मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृतः। ऊरू सदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।" यानी ब्राहमण की उत्पत्ति प्रजापति के मुख से, क्षत्रिय की भुजाओं से, वैश्य की जंघाओं से और शूद्रों की पैरों से हुई थी। ऋग्वेद के उद्धरण के बाद श्री सेन गीता का संदर्भ उठाते हैं, "चातुर्वण् र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" गीता में भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि गुण-कर्म विभाग के अनुसार चारों वर्णों की सृष्टि उन्होंने ही की है। क्षिति मोहन सेन ने लिखा है कि श्रीकृष्ण ने जिस तरह चातुर्वण्य का निर्देश किया था, अगर वह प्रचलित होता तो भारतीय जाति व्यवस्था से हमारा शायद उपकार ही होता। उस हालत में समाज में एक गति और स्पंदन दिखाई पड़ता। मनु ने भी कहा है कि अवसर विशेष पर ब्राह्मण शूद्र हो जाता है और शूद्र ब्राह्मण हो जाता है। परंतु ये व्यवस्थाएँ और विधियाँ इस देश में धीरे-धीरे अचल हो उठीं। संस्कृत के काव्य, पुराण, नाटक आदि में हीनवृत्ति ब्राह्मण और उच्च वृत्त शूद्र की कम चर्चा नहीं है। चरित्र और शील में कभी-कभी शूद्रों को ब्राह्मणों से भी अधिक उन्नत पाया गया है।5 शूद्र कुलजात चंद्रगुप्त ने न केवल ब्राह्मण कौटिल्य को अपनी तेजस्विता से प्रभावित किया, बल्कि भारत में एक नए शासन की आधारशिला रखी।

प्रो. रामशरण शर्मा ने शूद्रों के दास के रूप में परिणत होने के इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने अपनी किताब 'शूद्रों का प्राचीन इतिहास' में लिखा है, "अधिकांश शूद्र मूलतः आर्य समुदाय के ही अंग थे, इसलिए परवर्ती वैदिक समाज में भी उनके अनेक जनजातीय अधिकार थे। लेकिन प्राक् मौर्य काल (लगभग छह सौ ईसा पूर्व से तीन सौ ईसा पूर्व तक) में वर्णाश्रित समाज पूर्णतया स्थापित हो गया, तब उन्हें इन अधिकारों से वंचित कर दिया गया और तमाम आर्थिक, राजनीतिक, कानूनी, सामाजिक और धार्मिक अशक्ताताएँ उन पर लाद दी गई। शूद्र को दास समझा जाने लगा।6 प्रो. रामशरण शर्मा के अनुसार बहुत दिनों तक शूद्र शब्द का प्रयोग उन बहुविध मजदूर वर्गों के लिए सामूहिक रूप से किया जाता रहा जो तीन उच्च वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य की ताबेदारी करते थे। इस दृष्टि से उसकी तुलना सामान्यतया स्पार्टा के गुलामों से की जा सकती है। 7 शूद्रों की चाकरी कई प्रकार की थी। वे घरेलू नौकरों और दासों, कृषि दासों, भाड़े के मजदूरों और शिल्पियों के रूप में काम करते थे। यह दृढ़ता के साथ कहा जा सकता है कि शूद्रों के श्रम और कौशल तथा वैश्य किसानों द्वारा किया गया अतिरिक्त उत्पादन प्राचीन भारतीय समाज के विकास के भौतिक आधार थे। 8

वर्ण व्यवस्था बहुत पुरानी है। स्वयं बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने अपनी किताब 'हू वेयर द शूद्राज' में कहा है कि 'मनुस्मृति' की रचना के पहले भी जाति प्रथा थी। मनुस्मृति ने तो सिर्फ उसे संहिताबद्ध किया और दलितों पर सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक दासता लाद दी। वर्ण व्यवस्था जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी उसके प्रतिरोध की परंपरा भी है। ज्ञात इतिहास में जाति प्रथा को सबसे पहली चुनौती गौतम बुद्ध ने दी थी। उन्होंने भिक्षु संघ की स्थापना की, जिसमें जाति संबंधी किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं था। गौतम बुद्ध ने भिक्षु संघ में सभी जाति-वर्ग के लोगों को प्रवेश देकर बराबरी का संदेश दिया था। उसका चामत्कारिक असर हुआ। बौद्ध और जैन दर्शन के प्रभाव में बलि प्रथा में कमी आई। बचा हुआ पशुधन किसानों और पशु-पालन द्वारा आजीविका चलाने वाली जातियों के लिए आर्थिक रूप से बहुत मददगार सिद्ध हुआ। हमें स्मरण रखना चाहिए कि बौद्ध दार्शनिक दिग्नाग, अश्वघोष, धर्मकीर्ति और नागार्जुन ब्राह्मण होते हुए भी वर्ण व्यवस्था का प्रतिरोध करते हैं और बौद्ध चिंतन की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। सिद्धों-नाथों की परंपरा में सरहपाद और गोरखनाथ और निर्गुण धारा के संतों में कबीर-रैदास वर्ण व्यवस्था का प्रतिरोध करते हैं। कबीर ने जातिभेद पर कड़े प्रहार किए। कबीर ने कहा "जो तू बाभन बभनी जाया, आन राह तै क्यों नहीं आया।" कबीर ने यह भी कहा, "जाति पाति पूछे नहि कोय, हरि को भजै सो हरि का होय।" उसके बाद स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) ने वर्ण व्यवस्था का प्रतिरोध करते हुए कहा था, "जो शास्त्र और पुराण शूद्रों को वेदों का अध्ययन से रोकते हैं, वे कुएँ में फेंक दिए जाने चाहिए।" स्वामी दयानंद सरस्वती के समकालीन ज्योतिबा फुले (11 अप्रैल, 1827-28 नवंबर 1890) ने भी जातिभेद का प्रतिरोध किया। ज्योतिबा फुले ने दलितोद्धार के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इसीलिए 1888 में उन्हें महात्मा की उपाधि दी गई थी। उन्होंने महाराष्ट्र में सर्वप्रथम महिला शिक्षा तथा अछूतोद्धार का काम आरंभ किया। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1851 में पुणे में एक स्कूल खोला। वह देश में पहला कन्या विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया। उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले को पुणे के ही ब्राह्मणों के संकुचित दृष्टिकोण का सामना करना पड़ा, जब वे लड़कियों के लिए आरंभ की गई पाठशाला में पढ़ाने के लिए जाती थीं। लोग रास्ते में गोबर, कीचड़ आदि उन पर फेंकते थे। उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की कोशिश की, किंतु जब फुले दंपत्ति आगे बढ़ते ही गए तो ज्योतिबा के पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया गया। इससे कुछ समय के लिए उनका काम जरूर अवरुद्ध हुआ किंतु जल्द ही उन्होंने तीन कन्या विद्यालय खोल लिए।

बीसवीं शताब्दी में तीन बड़े नायक - महात्मा गांधी, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और राममनोहर लोहिया जाति-प्रथा से टकराते हैं। जाति प्रथा को लेकर गांधी और आंबेडकर आपस में भी टकराते हैं। अँग्रेज सरकार ने आंबेडकर से सहमति जताते हुए जब यह घोषणा की कि आरक्षित स्थानों पर केवल दलित ही अपनी पसंद के व्यक्ति को वोट देकर चुन सकेंगे तथा सामान्य सीटों पर भी वे अन्य जातियों के प्रत्याशियों को वोट दे सकेंगे तो गांधीजी ने उसका यह कहकर विरोध किया कि इससे हरिजन हिंदुओं से अलग हो जाएँगे। उन्होंने यरवदा जेल में 30 दिनों तक आमरण अनशन किया। गांधी जी के जीवन की रक्षा के लिए अंततः डॉ. आंबेडकर को झुकना पड़ा और दलित अपने अधिकार से वंचित हो गए। पूना पैक्ट के उस संदर्भ का महत्व यह है कि जो समझौता हुआ, वही आगे चलकर आरक्षण व अन्य सुविधाओं के रूप में फलीभूत हुआ।

गांधी हरिजनों का उद्धार चाहते थे, इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। हरिजन सेवक संघ की स्थापना और उसके बैनर तले सेवा कार्यों से लेकर 'हरिजन' का प्रकाशन इसका प्रमाण है। यह इतिहास स्वीकृत तथ्य है कि 4 फरवरी, 1932 को 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' के बंद होने के उपरांत गांधी जी ने हरिजनों के उद्धार के लिए ही 'हरिजन' नामक अँग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र निकाला। देशभर में उन्होंने हरिजन सेवक संघ की शाखाएँ बनाईं। संघ की अछूतोद्धार संबंधी साप्ताहिक गतिविधियों की जानकारी 'हरिजन' के हर अंक में दी जाती थी। 11 फरवरी, 1933 को निकले 'हरिजन' के प्रवेशांक की संपादकीय में ही गांधी जी ने 'अस्पृश्यता' शीर्षक संपादकीय लिखी और उसमें साफ-साफ कहा कि जातीय छूआछूत शास्त्रों के खिलाफ है। प्रवेशांक में ही गांधी ने सात पंडितों के हस्ताक्षर का एक पत्र प्रकाशित किया जिसमें कहा गया था कि चारों वर्णों में जो समान अधिकार हैं, उनका अधिकार हरिजन को मिलना चाहिए। ये अधिकार हैं - मंदिर प्रवेश, शालाओं में शिक्षा, सार्वजनिक कुओं, घाटों, तालाबों और नदियों में निस्तार सुविधा। गांधी जी ने 'हरिजन' के प्रवेशांक के लिए बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर से संदेश भेजने को कहा तो उत्तर में आंबेडकर ने सात फरवरी, 1933 को लिखे पत्र के रूप में संदेश की जगह टिप्पणी भेजी। उसमें उन्होंने कहा, "दलित वर्ग वर्ण व्यवस्था का प्रति उत्पाद है और जब तक वर्ण व्यवस्था रहेगी, दलित वर्ग बने रहेंगे। इसलिए जाति प्रथा की समाप्ति ही दलितों के लिए एकमेव स्वीकार्य बात है और आनेवाले संघर्ष में यही तत्व हिंदुओं की रक्षा करेगा और उनके अस्तित्व को सुनिश्चित करेगा।" 'हरिजन' में सभी राज्यों में हरिजन उत्थान के लिए किए गए कार्यों का विवरण छपता था। 'हरिजन' के आरंभिक अंकों को देखने से ज्ञात होता है कि प्रथम हरिजन दिवस 18 दिसंबर, 1932 को मनाया गया था किंतु उस दिन किए गए कार्यों से गांधी जी संतुष्ट नहीं थे। द्वितीय हरिजन दिवस अप्रैल 1933 के अंतिम रविवार को मनाया गया। उसके लिए उन्होंने छह कार्यक्रम घोषित किए थे - 1. हरिजन दिवस प्रातः पाँच बजे प्रार्थनाओं से प्रारंभ हो और हरिजनों के लिए कुछ राशि, कपड़े और अनाज अलग निकालकर जरूरतमंदों को दिया जाए। जो गरीब हैं और ऐसा करने में असमर्थ हैं, उन्हें उपवास रखना चाहिए चाहे एक समय का ही क्यों न हो। 2. भंगियों का काम स्वयं किया जाए या उनके कार्य में हाथ बँटाया जाए। 3. घर-घर जाकर राशि या सामग्री दानस्वरूप प्राप्त की जाए। इसके बाद हरिजन बस्तियों में जाकर उनके घरों की सफाई की जाए। 4. हरिजनों की बैठक लेकर उनकी जरूरतों की जानकारी प्राप्त की जाए। 5. हरिजनों और सवर्णों की संयुक्त बैठकें आयोजित कर अछूतोद्धार के कार्यों संबंधी प्रस्ताव भी पारित किए जाएँ। 6. जहाँ जनमत का समर्थन हो, वहाँ हरिजनों को सार्वजनिक कुओं से पानी लेने दिया जाए और निजी मंदिर हरिजनों के लिए खोल दिए जाएँ। इन सबके बाद इस दिन किए गए सभी कार्यों की रिपोर्ट प्रकाशनार्थ 'हरिजन' को भेजी जाए। द्वितीय हरिजन दिवस देशभर में मनाए जाने की रिपोर्ट 'हरिजन' के अंकों में छापी गई। द्वितीय हरिजन दिवस मनाने के बाद भी गांधी जी इस बात को लेकर दुखी थे कि उस दिवस को सभी देशवासियों का समर्थन नहीं मिला। इसी सवाल पर उन्होंने 8 मई, से 29 मई, 1933 तक 21 दिनों का अनशन किया। अपने अनशन के नतीजों पर संतोष जताते हुए गांधी जी ने 8 जुलाई, 1933 के 'हरिजन' की संपादकीय में लिखा, "अपने पाठकों को मुझे यह सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि मेरे अनशन से हरिजन भी उद्वेलित हुए हैं।"

गांधी जी की दलित चिंता की पुष्टि अपना मैला साफ करने से लेकर अगले जन्म में हरिजन महिला के रूप में पैदा होने की उनकी इच्छा से भी होती है। गांधी ने 'यंग इंडिया' में लिखा था, "मैं फिर से जन्म नहीं लेना चाहता लेकिन मेरा पुनर्जन्म हो ही तो मैं अछूत पैदा होना चाहूँगा ताकि मैं उनके दुखों, कष्टों और अपमानों का भागीदार बनकर स्वयं को और उन्हें इस दयनीय स्थिति से छुटकारा दिलाने का प्रयास कर सकूँ। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र में न हो, बल्कि अतिशूद्र में हो।" 9 छूआछूत उन्मूलन के लिए गांधी अपनी पत्नी तक को छोड़ने पर भी विचार करने से नहीं हिचकते। 'यंग इंडिया' में उन्होंने लिखा था, "अपनी पत्नी के साथ बंधन में बँधने से बहुत पहले ही मैं छूआछूत उन्मूलन के कार्य के साथ बँध गया था। हमारे संयुक्त जीवन में दो ऐसे अवसर आए जब अछूतोद्धार और पत्नी के साथ रहने के बीच एक चीज को चुनना था और मैं अछूतोद्धार को ही चुनता। लेकिन मैं अपनी पत्नी का आभारी हूँ जिसने संकट को टाल दिया। मेरे आश्रम में, जो मेरा परिवार है, कई अछूत हैं और एक प्यारी नटखट लड़की तो मेरी अपनी बेटी की तरह ही रहती है।10 गांधी लिखते हैं, "लोगों के प्रति प्रेम में छूताछूत की समस्या मेरे बाल्यकाल में ही उठा दी थी। मेरी माँ ने कहा, इस बच्चे को मत छूना यह अछूत है। 'क्यों न छूऊँ?' मैंने पलटकर पूछा और उसी दिन से मेरा विद्रोह आरंभ हो गया।11 गांधी ने जिस स्वराज्य के लिए लंबा संघर्ष किया, उसे भी छूआछूत रहने पर वे बेकार मानते हैं। 'यंग इंडिया' में उन्होंने लिखा था, "यदि हम भारत की जनसंख्या के पाँचवें हिस्से को सदा के लिए पराधीन रखना चाहें और उन्हें राष्ट्रीय संस्कृति की उपलब्धियों से जान-बूझकर वंचित रखें, तो स्वराज्य बेकार है। हम इस महान शुद्धि आंदोलन में भगवान की सहायता चाहते हैं, लेकिन उसकी सृष्टि के सर्वाधिक सुपात्र प्राणियों को मानवता के अधिकार देना नहीं चाहते। यहि हम स्वयं अमानवीय हैं तो दूसरों की अमानवीयता से मुक्ति पाने के लिए ईश्वर से याचना कैसे कर सकते हैं?12 गांधी मानते थे कि धर्म के पवित्र नाम पर मनुष्य को उत्पीड़ित करते जाना कट्टर हठधर्म के अलावा और कुछ नहीं हैं।13 गांधी जी का बल छूआछूत मिटाने के लिए हिंदू धर्म में सुधार लाने पर था। उन्होंने 'यंग इंडिया' में लिखा था, "हिंदू धर्म के सुधार और उसके वास्तविक संरक्षण के लिए, छूआछूत को मिटाना सबसे आवश्यक बात है... छूआछूत को मिटाना... एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।14 अगर छूआछूत कायम रहती है तो हिंदू धर्म को खत्म हो जाना चाहिए।15 गांधी लिखते हैं, "मैं तो यहा तक कहूँगा कि छूआछूत कायम रहने से हिंदू धर्म का खत्म हो जाना ही अच्छा है।16 गांधी जी छूआछूत को खत्म कर मानव जाति के पुनरुद्धार का सपना देखते थे। 'हरिजन' में उन्होंने लिखा था, "छूआछूत से लड़ने और उस संघर्ष के लिए स्वयं को अर्पित करने में मेरी आकांक्षा मानव जाति के संपूर्ण पुनरुद्धार की है। वह सीपी में चाँदी के आभास की तरह, मात्र एक स्वप्न भी हो सकता है। लेकिन मेरे लिए मेरी यह आकांक्षा यथार्थ है, अतः यह स्वप्न नहीं है। रोमाँ-रोलाँ के शब्दों में 'विजय लक्ष्य की प्राप्ति में नहीं, अपितु उसके लिए अथक प्रयास में निहित होती है।"17

अस्पृश्यता को तो गांधी जी खत्म करना चाहते हैं किंतु वर्ण व्यवस्था को नहीं। छूआछूत और जाति पर उन्होंने लिखा, "अछूतों के कारण जाति-व्यवस्था को समाप्त करना उतना ही गलत है, जितना कि किसी भद्दी अंग वृद्धि के लिए शरीर को और खर-पतवार की वजह से फसल को नष्ट कर देना। इसलिए, जिसे हम अछूतपन कहते हैं, उसे पूर्णतया नष्ट कर दिया जाना चाहिए। यदि सारी व्यवस्था को नष्ट होने से बचाना है तो इस अतिरेक का उच्छेदन आवश्यक है। छूआछूत जाति व्यवस्था के कारण उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि हिंदू धर्म में ऊँच-नीच के भेदभाव के कारण उत्पन्न हुई है और इसे नष्ट कर रही है। इसलिए छूआछूत पर आक्रमण इस 'ऊँच-नीच' पने पर आक्रमण है। जिस क्षण छूआछूत का अन्मूलन हो जाएगा, जाति-व्यवस्था स्वयं शुद्ध हो जाएगी अर्थात मेरे स्वप्न के अनुसार, सच्चे वर्ण धर्म की स्थापना हो जाएगी। समाज के चार भाग परस्पर पूरक होंगे जिनमें कोई किसी से श्रेष्ठ अथवा हीन नहीं होगा और प्रत्येक भाग हिंदू धर्म की समूची काया के लिए समान रूप से आवश्यक होगा।" 18

वर्णाश्रम धर्म में अपनी आस्था के लिए जो गांधी जी तर्क देते हैं, वह सहजता से पचाने लायक नहीं है। वे लिखते हैं, "वर्णाश्रम धर्म पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन-ध्येय को परिभाषित करता है। मनुष्य धन-संपदा जुटाने और आजीविका के विभिन्न साधनों की खोज करते रहने के लिए बारंबार देह धारण नहीं करता, यह इसलिए देह धारण करता है कि अपनी ऊर्जा का एक-एक अणु अपने स्रष्टा को जानने में खर्च कर दे। अतः उसे, अपनी प्राण रक्षा के निमित्त, अपने पूर्वजों के व्यवसाय तक ही अपने को सीमित रखना चाहिए। वर्णाश्रम धर्म यही है। न इससे ज्यादा, न कुछ कम।" 19 गांधी कहते हैं, "पैतृक व्यवसायों पर आधारित वर्ण व्यवस्था में मुझे विश्वास है। चार वर्ण चार सार्वभौम व्यवसायों से जुड़े हैं - ज्ञान देना, असहायों की रक्षा करना, कृषि और वाणिज्य कर्म तथा शारीरिक श्रम द्वारा सेवाएँ प्रदान करना। ये चार व्यवसाय सारी मानव जाति में समान रूप से विद्यमान हैं। लेकिन हिंदू धर्म ने इन्हें हमारे अस्तित्व का नियम मानते हुए, सामाजिक संबंधों और व्यवहार को नियमन के लिए इनका इस्तेमाल किया है। गुरुत्वाकर्षण का नियम हम सभी को प्रभावित करता है, हम उसके अस्तित्व से परिचित हों या न हों। लेकिन जो वैज्ञानिक इस नियम से अवगत हैं, उन्होंने इसकी प्रयुक्ति से ऐसी-ऐसी चीजें निकाली हैं कि दुनिया हैरत में है। इसी प्रकार, हिंदू धर्म ने वर्ण के नियम की खोज और प्रयुक्ति से सारी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। जब हिंदू जड़ता के शिकार थे तब वर्ण-व्यवस्था के दुरुपयोग के फलस्वरूप असंख्य जातियाँ पैदा हो गईं और अंतरजातीय विवाहों तथा अंतरजातीय भोजों को लेकर अनावश्यक और हानिकर प्रतिबंध लगा दिए गए। वर्ण-व्यवस्था का इन प्रतिबंधों से कोई लेना-देना नहीं है। विभिन्न वर्णों के लोग परस्पर विवाह कर सकते हैं और एक-दूसरे के साथ बैठकर भोजन कर सकते हैं। ये प्रतिबंध शुद्धता और सफाई के हित में आवश्यक हो सकते हैं पर यदि कोई ब्राह्मण लड़का शूद्र लड़की से विवाह करता है या शूद्र लड़का ब्राह्मण लड़की से विवाह करता है तो इससे वर्ण के नियम का कोई उल्लंघन नहीं होता।"20 गांधी का जोर शुद्धीकरण पर है। वे लिखते हैं, "आज ब्राह्मण और क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र केवल नाम की चिप्पियाँ हैं। जहाँ तक मैं समझता हूँ, वर्ण-व्यवस्था पूरी गड्डमगड्ड हो गई है और अच्छा हो, यदि सभी हिंदू स्वेच्छा से अपने को शुद्ध करना आरंभ कर दें। ब्राह्मणवाद की सच्चाई को साबित करने और सच्चे वर्ण-धर्म को पुनः प्रतिष्ठित करने का यही एकमात्र उपाय है।" 21

गांधी जी कहते हैं, "मैं मानता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति इस संसार में कुछ सहज प्रवृत्तियाँ लेकर पैदा होता है। प्रत्येक व्यक्ति कुछ निश्चित कमियाँ भी लेकर पैदा होता है जिन्हें वह दूर नहीं कर सकता। इन कमियों का सावधानी के साथ प्रेक्षण करने के फलस्वरूप ही वर्ण का नियम प्रतिपादित किया गया। इसने कतिपय प्रवृत्तियों वाले कतिपय लोगों के लिए कतिपय कार्य-क्षेत्र निश्चित कर दिए। लोगों की सहज कमियों को स्वीकार करते हुए भी, वर्ण के नियम में ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं माना गया है, बल्कि इसने एक ओर तो प्रत्येक व्यक्ति को उसके परिश्रम का फल मिले, इसकी गारंटी दी और दूसरी ओर, उसे अपने पड़ोसियों पर दबाव डालने से रोका। इस महान नियम को विकृत कर दिया गया है और यह बदनाम हो चुका है। लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि जब इस नियम के निहितार्थों को पूरी तरह समझ कर इसे लागू किया जाएगा तभी आदर्श सामाजिक व्यवस्था विकसित हो सकेगी।"22 लेकिन इसी के समानांतर गांधी जी अंतरजातीय विवाह और अंतरजातीय भोज के पक्ष में अपनी राय देते हैं। वे लिखते हैं, "यद्यपि वर्णाश्रम में अतंर्जातीय विवाह और अंतरजातीय भोज पर कोई पाबंदी नहीं है, पर इसमें कोई बाध्यता लागू नहीं की जा सकती। आदमी कहाँ शादी करे और किसके साथ भोजन करे, इसका फैसला करने के लिए उसे आजाद छोड़ देना चाहिए।"23

गांधी जी चार विभाजनों की वकालत करते हैं। वे लिखते हैं, "मैं चार विभाजनों को ही मौलिक, स्वाभाविक और आवश्यक मानता हूँ। असंख्य उपजातियाँ कभी-कभी सुविधाजनक हैं, पर प्रायः ये अवरोधक सिद्ध होती हैं। इनका विलयन जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा है।24 गांधी जी कहते हैं, "आर्थिक दृष्टि से, एक जमाने में जाति का बड़ा महत्व था। इससे पैतृक कौशल की रक्षा होती थी और प्रतियोगिता मर्यादित रहती थी। यह कंगाली को दूर रखने का सर्वोत्तम उपाय था। इसमें व्यापार श्रेणियों के सभी लाभ थे। यद्यपि इससे साहस अथवा आविष्कार को बढ़ावा नहीं मिलता था, पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह उनके मार्ग में बाधक थी... ऐतिहासिक दृष्टि से, जाति-व्यवस्था को भारतीय समाज की प्रयोगशाला में मनुष्य का प्रयोग या सामाजिक संमजन कहा जा सकता है। यदि हम इसे सफल सिद्ध कर सकें तो इसे संसार को उसकी काया पलटने, निर्मम प्रतियोगिता को समाप्त करने और धनलोलुपता तथा लालच से उत्पन्न होने वाले सामाजिक विघटन को रोकने के सर्वोत्तम साधन के रूप में पेश कर सकते हैं।"25 जाति और वर्ण के बारे में गांधी लिखते हैं, "मैंने प्रायः कहा है कि मैं जाति का जो आधुनिक अर्थ है, उसमें विश्वास नहीं करता। यह अनावश्यक है और प्रगति के लिए बाधक है। न मैं मनुष्यों के बीच असमानताओं में विश्वास करता हूँ। हम सब बिल्कुल बराबर हैं। लेकिन समानता आत्माओं की है, शरीरों की नहीं। अतः यह एक मानसिक स्थिति है। हमें समानता हासिल करनी है। एक व्यक्ति का स्वयं को दूसरे से श्रेष्ठ समझना ईश्वर और मानव के प्रति पाप है। अतः जाति, जहाँ तक वह ऊँच-नीच का भेद करती है, एक बुराई है।"26

गांधी ने 'द हिंदू' के 19 सितंबर, 1945 के अंक में लिखा, "जाति-भेद ने हमारे अंदर इतनी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि उससे भारत के मुसलमान, ईसाई और अन्य धर्मावलंबी भी कुप्रभावित हो गए हैं। वैसे, जातिगत अवरोध कमोवेश मात्रा में दुनिया के अन्य भागों में भी पाए जाते हैं, इसका अर्थ यह है कि इस बीमारी से पूरी मानव जाति ग्रस्त है। इससे सच्चे अर्थ में धर्म की स्थापना करके ही दूर किया जा सकता है। मुझे किसी धर्म ग्रंथ में ऐसे अवरोधों और भेदभावों का विधान नहीं मिला। धर्म की दृष्टि में सभी मनुष्य बराबर हैं। विद्या, बुद्धि या धन के कारण कोई व्यक्ति अपने को उनसे श्रेष्ठ होने का दावा नहीं कर सकता जिनके पास इनका अभाव है। यदि कोई व्यक्ति सच्चे धर्म के शुचिकारी तत्व और अनुशासन से आप्लावित और पवित्रीकृत है तो उसे चाहिए कि अपने से कम भाग्यशाली लोगों से साथ अपने लाभों को बाँटने का दायित्व निभाए। इस दृष्टि से, अपनी वर्तमान पतित अवस्था में, सच्चे धर्म का तकाजा है कि हम सब स्वेच्छा से अतिशूद्र बन जाएँ। हमें स्वयं को अपने धन का स्वामी नहीं, बल्कि न्यासी मानना चाहिए और अपनी सेवा के उचित पारिश्रमिक से अधिक को अपने पास न रखते हुए शेष को समाज-सेवा पर लगा देना चाहिए। इस व्यवस्था में, न कोई अमीर होगा, न कोई गरीब। सभी धर्म समकक्ष माने जाएँगे। धर्म, जाति या आर्थिक शिकायतों को लेकर उठने वाले तमाम झगड़े विश्व शांति को भंग करना बंद कर देंगे।" इस तरह स्पष्ट है कि गांधी जाति भेद से पूरी शक्ति से टकराते हैं। गांधी जी वर्ण व्यवस्था में आस्था प्रकट कर संशय जरूर पैदा करते हैं लेकिन सिर्फ इसी कारण अथवा स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का प्रश्न खड़ा कर गांधी के दलित संबंधी लेखन के महत्व को नहीं घटाया जा सकता।

गांधी-आंबेडकर के टकराव का जहाँ तक प्रश्न है तो 'आधुनिकता के आईने में दलित' पुस्तक में संकलित 'आत्मशुद्धि बनाम आत्म सम्मान' शीर्षक लेख में डोड्डबेल्लापुरा रामैया नागराज ने ठीक लिखा है, "तीस के दशक के मध्य तक गांधी और आंबेडकर वैसे नहीं रह गए थे जैसे वे अपने गहन टकराव के शुरुआती दौर में थे। दोनों तब तक एक-दूसरे से काफी प्रभावित और एक-दूसरे के असर से रूपांतरित हो चुके थे।"27 इसी पुस्तक में संकलित 'गैरदलितों की नजर में दलित' शीर्षक लेख में धीरूभाई शेठ ने लिखा है, "गांधी को दलित बनने और उनके साथ एकरूप होने में काफी हद तक कामयाबी मिली थी और वे इस लिहाज से गैर दलित नहीं माने जा सकते। अपना मैला साफ करने से लेकर अगले जन्म में हरिजन महिला के रूप में पैदा होने की उनकी इच्छा इसका एक प्रमाण है। लेकिन गांधी की यह अनूठी सफलता किसी व्यापक राजनीति को जन्म नहीं दे पाई। हरिजनोद्धार के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं पर द्विज नेतृत्व हावी रहा और कोई दलित नेतृत्व नहीं उभर सका।" 28 'आधुनिकता के आईने में दलित' पुस्तक में ही संकलित 'दलित उभार के मायने' शीर्षक लेख में रजनी कोठारी ने लिखा है, "अंतिम विश्लेषण में गांधी दलित उत्पीड़न तथा मुसलमानों के अलग-थलग पड़ने की समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रहे। न वे देश का विभाजन रोक सके और न ही वे हिंदू धर्म का मानवीकरण कर सके।"29

गांधी से अलग दृष्टिकोण अपनाते हुए आंबेडकर ने जाति भेद को खत्म करने के लिए बहुविध प्रयास किए। सामाजिक अन्याय के हर कारक के खिलाफ उन्होंने संघर्ष किया। अपने संघर्ष को बल पहुँचाने के लिए उन्होंने पत्रकारिता को भी आजमाया। डॉ. आंबेडकर का मानना था कि दलितों को जागरूक बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए उनका अपना स्वयं का मीडिया अति आवश्यक है। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने 31 जनवरी, 1920 को मराठी पाक्षिक 'मूकनायक' का प्रकाशन प्रारंभ किया था। 'मूकनायक' यानी मूक लोगों का नायक। 'मूकनायक' के प्रवेशांक की संपादकीय में आंबेडकर ने उसके प्रकाशन के औचित्य के बारे में लिखा था, "बहिष्कृत लोगों पर हो रहे और भविष्य में होने वाले अन्याय के उपाय सोचकर उनकी भावी उन्नति व उनके मार्ग के सच्चे स्वरूप की चर्चा करने के लिए वर्तमान पत्रों में जगह नहीं। अधिसंख्य समाचार पत्र विशिष्ट जातियों के हित साधन करने वाले हैं। कभी-कभी उनका आलाप इतर जातियों को अहितकारक होता है।"30 उसी संपादकीय टिप्पणी में आंबेडकर लिखते हैं, "हिंदू समाज एक मीनार है। एक-एक जाति इस मीनार का एक-एक तल है और एक से दूसरे तल में जाने का कोई मार्ग नहीं। जो जिस तल में जन्म लेता है, उसी तल में मरता है।"31 वे कहते हैं, "परस्पर रोटी-बेटी का व्यवहार न होने के कारण प्रत्येक जाति इन घनिष्ठ संबंधों में स्वयंभू जाति है। रोटी-बेटी व्यवहार के अभाव कायम रहने से परायापन स्पृश्यापृश्य भावना से इतना ओत-प्रोत है कि यह जाति हिंदू समाज से बाहर है, ऐसा कहना चाहिए।"32 आंबेडकर ने उस संपादकीय टिप्पणी में 97 वर्ष पहले जो कहा था, वही आज का भी कटु यथार्थ है। आंबेडकर मानते थे कि अछूतों के साथ होनेवाले अन्याय के खिलाफ दलित पत्रकारिता ही संघर्ष कर सकती है। स्वयं आंबेडकर की पत्रकारिता कैसे इस सवाल पर मुखर थी, इसकी बानगी उनकी लिखी 'मूकनायक' के 14 अगस्त, 1920 के अंक की संपादकीय में देखी जा सकती है, "कुत्ते-बिल्ली जो अछूतों का भी जूठा खाते हैं, वे बच्चों का मल भी खाते हैं। उसके बाद वरिष्ठों-स्पृश्यों के घरों में जाते हैं तो उन्हें छूत नहीं लगती। वे उनके बदन से लिपटते-चिपटते हैं। उनकी थाली तक में मुँह डालते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। लेकिन यदि अछूत उनके घर काम से भी जाता है तो वह पहले से बाहर दीवार से सटकर खड़ा हो जाता है। घर का मालिक दूर से देखते ही कहता है - अरे-अरे दूर हो, यहाँ बच्चे की टट्टी डालने का खपड़ा रखा है, तू उसे छूएगा?" 33 कहना न होगा कि विकल कर देने वाली यह संपादकीय टिप्पणी जाति में बँटे भारतीय समाज को आईना दिखाने में आज भी सक्षम है। केवल मीडिया ही नहीं, सभी क्षेत्रों में आंबेडकर दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित किए जाने के प्रबल पक्षधर थे। 28 फरवरी, 1920 को प्रकाशित 'मूकनायक' के तीसरे अंक में आंबेडकर ने 'यह स्वराज्य नहीं, हमारे ऊपर राज्य है' शीर्षक संपादकीय में साफ-साफ कहा था कि स्वराज्य मिले तो उसमें अछूतों का भी हिस्सा हो। स्वराज्य पर आंबेडकर का चिंतन लंबे समय तक चला। 27 मार्च, 1920 को प्रकाशित 'मूकनायक' के पाँचवें अंक की संपादकीय का शीर्षक है - 'स्वराज्य में हमारा आरोहण, उसका प्रमाण और उसकी पद्धति।' इसमें आंबेडकर ने मुख्यतः निम्न बिंदुओं को उठाया है : 1. हिंदुस्तान का भावी राज्य एक सत्तात्मक या प्रजा सत्तात्मक न होकर प्रजा प्रतिनिधि सत्तात्मक राज्य होने वाले हैं। इस प्रकार के राज्य को स्वराज्य होने के लिए मतदान का अधिकार विस्तृत करके जातिवार प्रतिनिधित्व देना जरूरी है। 2. हिंदू धर्म ने कुछ जातियों को श्रेष्ठ और वरिष्ठ व कुछ को कनिष्ठ और अपवित्र ठहराया है। स्वाभिमान शून्य नीचे की जातियों के लोग ऊपर की जातियों को पूज्य मानते हैं और शील शून्य ऊपर की जाति के लोग नम्र भाव रखनेवाली इन जातियों को नीच मानते हैं। 3. दलित उम्मीदवार को ऊँची जाति का मतदाता नीच समझकर मत नहीं देगा और आश्चर्य की बात यह है कि ब्राह्मणेतर और बहिष्कृत लोग बाह्मण सेवा का सुनहरा संयोग आया देख पुण्य संचय करने के लिए उनके पैरों में गिरने को दौड़ पड़ेंगे। 4. हरेक व्यक्ति को मतदान का अधिकार मिलने पर चुनाव की पद्धति से, संख्या के अनुपात से जातिवार प्रतिनिधित्व देना चाहिए। 5. स्वराज्य मिलेगा, उससे प्राप्त होनेवाली स्वयंसत्ता सब जातियों में कैसे विभाजित की जाएगी, जिसकी वजह से स्वराज्य ब्राह्मण राज्य नहीं होना चाहिए, यह प्रश्न मुख्य है। 34

3 अप्रैल 1927 को आंबेडकर ने मराठी पाक्षिक 'बहिष्कृत भारत' निकाला। वह 1929 तक निकलता रहा। बाबा साहेब अछूतों की कमजोरियों को भी ठीक-ठीक पहचानते थे और उसकी खुलकर आलोचना करते थे। उनके इस आलोचनात्मक विवेक की झलक हम 'बहिष्कृत भारत' के दूसरे अंक यानी 22 अप्रैल, 1927 के अंक में प्रकाशित उनकी संपादकीय टिप्पणी में पा सकते हैं, "आचार-विचार और आचरण में शुद्धि नहीं आएगी, अछूत समाज में जागृति और प्रगति के बीज कभी नहीं उगेंगे। आज की स्थिति पथरीली बंजर मनःस्थिति है। इसमें कोई भी अंकुर नहीं फूटेगा इसलिए मन को सुसंस्कृत करने के लिए पठन-पाठन व्यवसाय का अवलंबन करना चाहिए।"35 आलोचनात्मक विवेक के समांतर आंबेडकर ने दलितों के आरक्षण का सवाल जोर-शोर से उठाया था ताकि दलितों को ऊपर उठाया जा सके। 20 मई, 1927 को प्रकाशित 'बहिष्कृत भारत' के चौथे अंक की संपादकीय में बाबा साहेब ने लिखा था, "पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए सरकारी नौकरियों में उसे प्रथम स्थान मिलना चाहिए। यह विचार प्रगतिशील लोगों को अस्वीकार नहीं है परंतु यदि धन के स्वामी कुबेर पर अपनी संपत्ति सब लोगों में समान रूप से बाँटने का प्रसंग आए तो योग्य मांग (अतिशूद्र) जाति के व्यक्ति को योग्य जोशी अपनी वृत्ति उसको अर्पण करने के प्रसंग में प्रोग्रेसिव व्यक्ति का भी आश्चर्य में मुँह खुला रह जाएगा।"36 'बहिष्कृत भारत' के बाद 1928 में आंबेडकर ने समाज में समता लाने के उद्देश्य से 'समता नामक 'पाक्षिक पत्र निकाला। बाद में उसका नाम 'जनता' कर दिया गया और अंततः 1954 में पाक्षिक 'समता' का नाम बदलकर 'प्रबुद्ध भारत' कर दिया गया। 'प्रबुद्ध भारत' आरंभ से आखिर तक साप्ताहिक रहा। 'मूकनायक', 'बहिष्कृत भारत', 'समता' और 'प्रबुद्ध भारत' में प्रकाशित आंबेडकर की तलस्पर्शी संपादकीय टिप्पणियाँ भारत की समाज व्यवस्था से मुठभेड़ के रूप में देखी जानी चाहिए। आंबेडकर किसी विषय पर तटस्थ पर्यवेक्षक की तरह नहीं लिखते थे, अपितु हर बहस में हस्तक्षेप करते हुए यथास्थिति बदलने का प्रयास करते थे। आंबेडकर ने धर्म, जाति व वर्ण व्यवस्था की विसंगतियों की जहाँ गहरी छानबीन की, वहीं उस सामाजिक ढाँचे की परख भी की, जिसके अंदर ये वर्ण व्यवस्था काम करती हैं। इस लिहाज से जाति-वर्ण व्यवस्था पर आंबेडकर का मूल्यांकन सटीक है और इसीलिए विश्वसनीय दस्तावेज भी। इस दस्तावेज का मूल्य तब और बढ़ जाता है, जब पूरे परिदृश्य का जायजा व्यापकता और गहराई से लेते हुए संबंधित सभी मुद्दों को उभारने की कोशिश की गई हो। इसीलिए आंबेडकर का लेखन आज भी उतना ही प्रेरणास्पद व प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। 1948 में 'हू वेयर द शुद्राज' की उत्तरकथा 'द अनटचेबल्स : ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी' में आंबेडकर ने लिखा था, "हिंदू सभ्यता जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे में और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है।" आंबेडकर का लेखन हमें यही सिखाता है कि जाति, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, लिंग, वर्ग आदि शोषणकारी प्रवृत्तियों के प्रति समाज को आगाह कर उसे इन सारे पूर्वाग्रहों और मनोग्रंथियों से मुक्त करने की कोशिश ईमानदारी से की जानी चाहिए। इसी के समांतर मुख्यधारा के सभी पक्षों को दलित मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास भी किया जाना चाहिए। आंबेडकर ने 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई। उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन में बदलते देखा, हालाँकि 1946 में हुए भारत के संविधान सभा के चुनाव में उसने खराब प्रदर्शन किया। वही फेडरेशन 1956 में भारतीय रिपबल्किन पार्टी में बदला। आंबेडकर के बाद राममनोहर लोहिया ने भारतीय समाज और राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन लाने के लिए 'जाति तोड़ो' अभियान चलाया। वह अभियान उन्हीं मुद्दों पर चला था जिसके बारे में अपनी पुस्तक 'कास्ट सिस्टम' में लोहिया ने सुचिंतित और सारगर्भित ढंग से विवेचन किया है। 'जाति तोड़ो अभियान लोहिया का सबसे बड़ा क्रांतिकारी योगदान माना जाता है। उस अभियान के प्रभाव में लोगों ने जनेऊ तोड़ डाले। अपने नाम के साथ जाति लिखना छोड़ दिया। लोहिया ने पिछड़ों की लड़ाई को स्त्रियों के उत्थान से जोड़ा। लोहिया ने नारा दिया था - 'पिछड़ा पावे सौ में साठ।' लोहिया ने जाति भेद का जिस पुष्ट मनोबल से प्रतिरोध किया, उससे वे कहीं गांधी तो कहीं आंबेडकर को भी एक नया, अप्रत्याशित संदर्भ दे देते हैं।

दलित आंदोलन का असर साहित्य पर भी पड़ा। हालाँकि कन्नड़ साहित्य में उसके बीज सदियों पहले पड़ चुके थे। सोलहवीं शताब्दी में कन्नड़ की कवयित्री अक्क महादेवी ने कहा था, "हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर / मंगवाओ मुझसे भीख / और कुछ ऐसा करो / कि भूल जाऊँ अपना घर पूरी तरह / झोली फैलाऊँ और न मिले भीख / कोई हाथ बढ़ाए कुछ देने को / तो वह गिर जाए नीचे / और यदि मैं झुकूँ उसे उठाने को / तो कोई कुत्ता आ जाए / और उसे झपटकर छीन ले मुझसे।" अक्क महादेवी के समकालीन वसवन्ना ने कहा था, "हे भगवान/ सहन न कराओ मुझे / उच्च कुल में पैदा होने का यह अनवरत / कशाघात!" उन्होंने यह भी कहा था, "हाय-हाय शिव / आपने मुझे जन्म क्यों दिया? क्या आप मेरी जगह उगा नहीं सकते थे / कोई वृक्ष या झाड़ी?" वसवन्ना ने एक कविता में कहा, "व्यास एक मछली पकड़नेवाले के पुत्र थे / मार्कंडेय जातिच्युत थे जन्म से ही / चिंता मत करो जाति की / अगस्त्य वास्तव में चिड़ीमार थे / और दुर्वासा गाँठते थे जूता।" अक्क महादेवी व वसवन्ना के प्रतिरोध की अगली कड़ी बीसवीं शताब्दी के मध्य में यू.आर. अनंतमूर्ति के उपन्यास 'संस्कार' में दिखती है। संस्कार ने कन्नड़ साहित्य में दलित विमर्श को नया परिप्रेक्ष्य दिया। लगभग उसी कालखंड में तेलुगू साहित्य में दलित विमर्श को गति देने का काम महाकवि गुर्रम गाजुआ (1895-1971 )कर रहे थे। उनकी पद्यबद्ध आत्मकथा-ना कथा (मेरी कहानी) का पहला भाग 1951 में छपा। उनकी प्रबंध रचनाएँ - फिरदौसी और गाब्बिलम की खासी चर्चा रही। उन्होंने लिखा है : क्या कभी शांति संभव होगी? क्या आदमी इसी तरह बँटा रहेगा जातियों और धर्मों में? क्या हिंदू और मुसलमान कभी साथ-साथ लड़ेंगे साझे लक्ष्य के लिए? क्या सह अस्तित्व संभव होगा दक्षिण के हाथियों और उत्तर के हाथियों का? गाब्बिलम चमगादड़ से कहते हैं - जब तुम उल्टे टँगे होगे किसी मंदिर में / तुम्हारा मुँह बहुत पास होगा शिव के कानों के / उनमें चुपके से बुदबुदा देना मेरी यातना की कहानी। बस इतना ध्यान रहे / वहाँ कोई पुजारी न हो। मलयालम साहित्य में दलित विमर्श को कुमारन आशान (1873-1924) ने खड़ा किया। केरल के अस्पृश्य माने जाने वाले ईषवा समुदाय में जन्मे कुमारन आशान ने 'चिंताविष्टा सीता' और 'चांडाल भिक्षुकी' जैसी कालजयी कृतियाँ दीं। 'चांडाल भिक्षुकी' में राजा के समक्ष बुद्ध के मुख से उन्होंने कहलवाया : मुझे बताओ / क्या ब्राह्मण किसी लता के डंठल / या किसी बादल से जन्मा है? क्या जाति पाई जाती है / किसी अस्थि / मज्जा या रुधिर में? क्या बंध्या है किसी दलित स्त्री की देह किसी ब्राह्मण के रेतस के प्रति? कुमारन आशान की अमर पंक्ति है : अपने नियमों को बदलो, नहीं तो तुम्हारे नियम तुम्हें बदल डालेंगे। गुजराती में हरीश मंगलम के काव्य संकलन 'प्रकंप' और कहानी संग्रह 'दायन' ने गुजराती दलित साहित्य को नया तेवर दिया। नीरव पटेल, शंकर पेंटर, गणपत चह्वाण, चंदुभाई मेहरिया, साहिल वर्मा, प्रवीण गढ़वी, सिद्धराज सोलंकी, दलपत चह्वाण ने भी अपनी रचनाओं में गुजराती दलित अस्मिता को उभारा। पंजाबी साहित्य के इतिहास में दलित के पक्ष में सशक्त आवाज की शुरुआत गुरुनानक की वाणी से होती है : "नीचा अंदर नीच जाति / नीची हूँ अति नीच / नानक तिन के संग साथि / वडिया सिऊ क्या रीस।" गुरु नानक ने दलित भाई मरदाने को अपना शिष्य बनाया। गुरु अर्जुन देव ने गुरुग्रंथ साहिब के संपादन के समय नामदेव, कबीर और रैदास जैसे दलित भक्तों को सम्मानजनक स्थान दिया। सूफी कवि शाह हुसैन ने उच्च जाति को चुनौती दी : "सभै जाति वड्डियाँ / निमाणी फकीराँ दी जाति।" नामदेव ने कहा : "कहा करउ जाति कहा करउ पाति / राम को नाम जपउ दिन राति।" आधुनिक काल में सुजान सिंह, संत सिंह सेखों, संतोष सिंह धीर, गुरदयाल सिंह, संतराम उदासी, लाल सिंह दिल, गुरदास राम आलम, बलबीर माधोपुरी जैसे लेखक दलित प्रश्नों से टकराते हैं। बलबीर माधोपुरी एक कविता में कहते हैं - "ये निरे अक्षर नहीं/ ये तो / साफ पानी की लहर है / और लहरें / समानता के लिए / किनारों के साथ रगड़ खाती हैं / मंजिल की ओर बढ़ती सड़कें।"

आधुनिक काल में दलित साहित्य की शुरुआत मराठी से मानी जाती है। 1970 के दशक में आत्मकथाओं की वजह से मराठी दलित साहित्य चर्चा में रहा। दया पवार की आत्मकथा 'अछूत' 1979 में पहली बार मराठी में प्रकाशित हुई और मराठी दलित साहित्य का पर्याय ही बन गई। वह किताब दलित साहित्य में आत्मकथात्मक लेखन का प्रस्थान बिंदु है। उसके बाद शरण कुमार लिंबाले की 'अक्करमाशी' से लेकर लक्ष्मण गायकवाड़ की आत्मकथा 'उठाईगीर' मराठी साहित्य की धरोहर बन गई हैं। लक्ष्मण गायकवाड अपनी आत्मकथा में कहते हैं, "जिस समाज में मैं जन्मा उसे यहाँ की वर्ण व्यवस्था और समाज व्यवस्था ने नकारा है। सैकड़ों नहीं हजारों वर्षों से मनुष्य के रूप में इस व्यवस्था द्वारा नकारा गया। समाज ने पशुवत् जीवन जीने के लिए मजबूर किया। अँग्रेज सरकार ने तो 'गुनहगार' का ठप्पा ही हमारे समाज पर लगा दिया और सबने हमारी ओर गुनहगार के रूप में ही देखा और आज भी उसी रूप में देख रहे हैं। रोजी-रोटी के लिए सभी साधन और सभी मार्ग हमारे लिए बंद कर दिए गए और इस कारण चोरी करके जीना यही एक मात्र उपाय हमारे सन्मुख शेष रह गया। हम पर थोपे गए चोरी के इस व्यवसाय का उपयोग ऊपरवालों ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए किया। संभवतः विश्वभर में हमारी एकमात्र जाति होगी जिसे जन्म से ही गुनहगार घोषित किया गया है, जिनके माथे पर जन्म से ही 'अपराधी' की मुहर लगाई गई है।" हिंदी का दलित साहित्य भी मराठी की ही तरह अपनी आत्मकथाओं के लिए प्रसिद्ध हुआ। हिंदी की पहली दलित आत्मकथा 'अपने-अपने पिंजरे' 1995 में आई। उसके लेखक हैं मोहनदास नैमिशराय। उसके दो साल बाद ओमप्रकाश बाल्मीकि की 'जूठन' आई। 'जूठन' सिर्फ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा नहीं, अपितु दलित समाज का भोगा हुआ यथार्थ है। 'जूठन' में वर्णित घटनाएँ और प्रसंग वर्णव्यवस्था की निमर्मता के प्रमाण हैं। उसके उपरांत श्योराज सिंह बेचैन की 'मेरा बचपन मेरे कंधों पर', तुलसीराम की 'मुर्दहिया' और 'मणिकर्णिका' आईं। उन आत्मकथाओं को कौशल्या वैसंत्री की आत्मकथा 'दोहरा अभिशाप' और सुशीला टाकभौरे की 'शिकंजे का दर्द' ने पूर्णता प्रदान की क्योंकि इनसे पता चलता है कि एक दलित स्त्री को किस तरह दोहरे अभिशाप से गुज़रना पड़ता है। एक अभिशाप है उसका स्त्री होना और दूसरा उसका दलित होना। दलित लेखिकाएँ इन दोनों अभिशापों को एक साथ जीती हैं। तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' में दलित स्त्री का जो यथार्थ वर्णन है, वह अपनी मार्मिकता में बेजोड़ है। पहली दलित स्त्री हैं तुलसीराम की दादी, दूसरी दलित स्त्री हैं, उनकी माँ और तीसरी दलित स्त्री है नटिनिया। तुलसीराम के अँग्रेजी ज्ञान से नटिनिया उनकी तरफ आकृष्ट हुई थी। नटिनिया उनसे अँग्रेजी में कुछ-कुछ बोलना सीख भी जाती है। जब तुलसीराम इंटर करने के लिए गाँव छोड़कर आजमगढ़ जाने लगते हैं तो उनसे नटिनिया पूछती है - अब लौटिके ना अइबे का रे बाबू? इस सवाल में वह जो कहती है, उससे ज्यादा अनकहा रखती है। नहीं कहकर भी वह बहुत कुछ कह जाती है। दूसरी दलित चरित्र तुलसीराम की माँ हैं। तुलसी जब नौवीं में पढ़ते तो उनके भोजन के लिए उनकी माँ अधपेटवा खातीं और आधा खाना बेटे के लिए रखतीं। उस ममतामयी माँ को कितनी तकलीफें सहनी पड़ती थीं, इसका विवरण भी तुलसीराम ने इस तरह दिया है, "मेरी माँ बस्ती के किसी भी व्यक्ति से बात करतीं तो पिताजी तुरंत उसके चरित्र पर उँगली उठाना शुरू कर देते। पिताजी अक्सर माँ को फरुही से मारने दौड़ पड़ते। एक बार उन्होंने माँ को मारने के लिए फरुही उठाया कि मैंने पिता को एक तमाचा मारा। उस घटना के बाद पिताजी माँ को मारने से बचने लगे।" इस घटना से यह पता चलता है कि दलित परिवारों में भी स्त्री के प्रति वही सलूक होता है जो सवर्ण परिवारों में। दलित स्त्रियाँ हाड़तोड़ मेहनत करती हैं, खेतों में मजूरी करती हैं, घर के सारे काम करती हैं और मर्दों की मार भी उन्हें खानी पड़ती है। इस आत्मकथा में सबसे महत्वपूर्ण स्त्री पात्र तुलसीराम की दादी हैं। इस आत्मकथा से पता चलता है कि विभिन्न रोगों के इलाज का उन्हें कितना गहरा ज्ञान था। खास तौर पर वनस्पतियों से किए जाने वाले इलाज का। लेकिन वही दादी अंधविश्वासी भी थीं। उस अंधविश्वास को जस का तस तुलसीराम ने लिपिबद्ध किया है। मुर्दे पशुओं का मांस निकालने के लिए दलित स्त्रियाँ ही आगे आतीं। मुर्दहिया यानी गाँव की मुर्दे जलाए जाने वाली जगह। मुर्दहिया मानव तथा पशु में कोई फर्क नहीं करती थी। मुर्दहिया दलित बस्ती की जिंदगी थी। किसी की गाय, भैंस या बैल मर जाता तो दलित ही उसका चमड़ा निकालते और उसके बाद गँड़ासे और कुल्हाड़ियों से काट-काटकर उसका मांस सारे दलित बाँस से बनी हुई टोकरियों में भरकर घर लाते। मांस काटने का काम प्रायः दलित स्त्रियाँ करती थीं। तुलसीराम की दादी मांस के कुछ हिस्से को आवश्यकतानुसार तुरंत पकातीं किंतु अधिकांश बचे हुए कच्चे मांस को कई दिनों तक तेज धूप में सुखातीं। खूब सूख जाने पर कच्ची मिट्टी से बनी कोठिली में रखकर बंद कर देतीं। जब खाने का टोटा बन जाता तो उस सूखे मांस को नए तरीके से पकाकर परिवार के लोग अपना पेट भरते। अकाल के समय दलित घरों में चूल्हा नहीं जलने का मार्मिक चित्रण पुस्तक में किया गया है। अकाल के समय धोबियों पर तो जैसे कहर ही टूट पड़ता क्योंकि उन्हें काम के बदले सिर्फ अनाज मिलता और अकाल के कारण वह मिलना भी बंद हो जाता। इस आत्मकथा में लेखक बताता है कि दलित स्त्री को कितना सहना पड़ता है। इस किताब की विशेषता यह भी है कि दलित स्त्रियों के प्रति लेखक जितना संवेदनशील है, उतना ही सवर्ण स्त्रियों के प्रति भी। तभी तो ब्राह्मण घर की लड़की आशा को नाला पार कराने के कारण तरह-तरह की अफवाहें उड़ीं और अंततः आशा की पढ़ाई छूट गई और वह ब्याह दी गई तो इस संदर्भ का वर्णन करते हुए तुलसीराम लिखते हैं - मेरे जैसा गुलाम पुत्र यदि शिक्षा से इतना कुछ हासिल कर सकता था तो फिर मालिक पुत्री न जाने कितना आगे जाती? यह पंक्ति एक चीख बन जाती है। यह आत्मकथा अब तक प्रकाशित दलित आत्मकथाओं से सर्वथा अलग और आगे की कृति है। यह सिर्फ तुलसीराम की, उनके परिवार की तथा जातिगत समाज की कथा नहीं है, बल्कि समूचे समाज की धड़कन इसमें सुनी जा सकती है। इसमें एक कालखंड का पूरा लोकजीवन अभिव्यक्त हुआ है। 'मुर्दहिया' जितनी तुलसीराम की कथा है, उतनी ही तुकबंदी बनाकर गानेवाले जगीबाबा, लक्कड़ ध्वनि पर नृत्य करनेवाली नटिनिया, गिद्ध प्रेमी पग्गल बाबा और सिंघा बजाते बंकिया डोम की भी। पूरी किताब में कहीं भी व्यक्तिगत अथवा सामाजिक प्रसंग एकतरफा ढंग से अभिव्यक्त नहीं हुए हैं। सवर्ण सहपाठियों में एक मात्र संकठा सिंह थे जो तुलसीराम से आत्मीयता रखते थे। राहुल सांकृत्यायन के बारे में पारसनाथ पांड़े नामक शिक्षक ने दिलचस्पी पैदा की। लालबहादुर सिंह के साथ शराब पीने, चिंतामणि सिंह द्वारा पढ़ाने के बदले भोजन का प्रबंध करने और शिक्षक सुग्रीव सिंह द्वारा हाईस्कूल के फार्म भरने के लिए तीस रुपए देने को बहुत कृतज्ञता से तुलसीराम ने याद किया है। सुग्रीव सिंह जैसे सवर्णों का दलित के प्रति सदव्यवहार और सहयोग को जिस ढंग से तुलसीराम ने लिपिबद्ध किया है, उसी के कारण उनकी आत्मकथा कहीं भी एकांगी नहीं बनती। जिस आवेग के साथ लेखक समाज में दलितों की स्थिति और उस स्थिति की वजहों और समूचे सामाजिक परिवेश का जीवंत चित्रण करता है, उसी आवेग के साथ वह दलितों के जीवन में कुजाति छाँटने से लेकर तमाम अंधविश्वासों जैसी घर कर गईं विकृतियों का बेबाक वर्णन भी करता है। कदाचित इसीलिए समूचे सामाजिक परिवेश की धड़कन इस आत्मकथा में हम सुन पाते हैं। 'मुर्दहिया' और 'मणिकर्णिका' के नामकरण में गहरे सामाजिक आशय छिपे हैं। जब तक देश में जातिगत भेदभाव है तब तक यह देश मुर्दा ही है। इस तरह दलित प्रसंग पर बेचैन कर देने वाली अभिव्यक्ति लगभग सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में हम देख सकते हैं।

संदर्भ

1. सेन शास्त्री, आचार्य क्षितिमोहन (2006) भारतवर्ष में जातिभेद, साहित्य भवन प्रा.लि., इलाहाबाद, पृष्ठ-7

2. वही, पृष्ठ-8

3. वही, पृष्ठ-8

4. वही, पृष्ठ-7

5. वही, पृष्ठ-19

6. शर्मा, रामशरण (2013 पुनरावृत्ति, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-278

7. वही, पृष्ठ-278

8. वही, पृष्ठ-278

9. 'यंग इंडिया', 04-05-1921, पृष्ठ-144

10. वही, 05-11-1931, पृष्ठ-341

11. 'हरिजन', 24-12-1938, पृष्ठ-393

12. 'यंग इंडिया', 25-05-1921, पृष्ठ--165

13. वही, 11-03-1926, पृष्ठ-95

14. वही, 06-01-1927, पृष्ठ-2

15. 'हरिजन', 28-09-1947, पृष्ठ-349

16. 'यंग इंडिया', 26-11-1931, पृष्ठ-372

17. 'हरिजन', 25-03-1933, पृष्ठ-3

18. वही, 11-02-1933, पृष्ठ-3

19. 'यंग इंडिया', 27-10-1927, पृष्ठ-357

20. वही, 04-06-1931, पृष्ठ-129

21. 'हरिजन', 25-03-1933, पृष्ठ-3

22. 'माडर्न रिव्यू', अक्टूबर 1935, पृष्ठ-413

23. 'हरिजन', 16-11-1935, पृष्ठ-316

24. 'यंग इंडिया', 08-12-1920, पृष्ठ-3

25. वही, 05-01-1921, पृष्ठ-2

26. वही, 04-06-1931, पृष्ठ-129

27. दुबे, अभय कुमार (सं. संस्करण-2008), आधुनिकता के आईने में दलित, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-59

28. वही, पृष्ठ-193

29. वही, पृष्ठ-259

30. मूकनायक', 31 जनवरी 1920

31. वही, 31 जनवरी 1920

32. वही, 31 जनवरी 1920

33. 'मूकनायक', 14 अगस्त 1920

34. वही, 27 मार्च 1920

35. 'बहिष्कृत भारत', 22 अप्रैल 1927

36. वही, 20 मई 1927


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हिंदी समय में कृपाशंकर चौबे की रचनाएँ