डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कहानी

इतने सारे शब्द
योगेंद्र आहूजा


कुछ खामोशी से बहती हैं, कुछ शोर मचाते। नदियाँ जो इस मुल्क में अनगिनत हैं, जिनके खूबसूरत नाम हैं। उनके अलावा एक और अनाम, बहुत पुरानी नदी है... खून की नदी जो न जाने कब से, इस छोर से उस छोर तक बहती है और पिछले कुछ बरसों में किनारे तोड़ कर बहने लगी है। लेकिन इस कहानी में, इसे इस लेखक की जिद कहें या संकल्प, एक भी बूँद खून नहीं बहेगा। इस कहानी का लेखक, बतौर लेखक, खून की उस नदी से, टप टप टपकते खून से, खून की बरसात से, उसकी धार, छींटों और धब्बों से, सूखे हुए खून, खून के थक्कों, खूनआलूदा जख्मों और उन पर जम जाने वाली पपड़ियों, खून के फव्वारों, भल भल बहते खून, खून में भीगी आस्तीनों और खूनी निशान लिए पट्टियों से, खून से लिखे जाने वाले करारनामों और प्रेमपत्रों और उन कविताओं से जिनमें रक्त का रंग होता है और लहू के बारे में मिसरे - दूसरे शब्दों में खून की हर किस्म से और उसके जिक्र से भी बेतरह ऊब चुका है, अब वह उसके नहीं, दूसरी नदियों के बारे में लिखना चाहता है जो उस खूनी नदी के पैरेलल और उसी की तरह उफनती हुई बहती हैं। जैसे सल्फ्यूरिक एसिड की नदी और आँसुओं की और शराब की। शराब जिसके दो घूँट हलक से उतारो तो रगों में खून सरपट दौड़ने लगता है, मगर ताजे जख्मों पर उसका फाहा रखो तो खून बहना बंद हो जाता है। मीना कुमारी के शरीर में, उसके आखिरी बरसों में, भीतर ही भीतर, उसके दिल से लगातार कुछ रिसता, टपकता रहता था... टप टप, तभी तो वह इतना पीने लगी थी - सीधे बोतल से मुँह लगाकर, नीट, गट गट गट।

शराब के जिक्र से ही शुरू करता हूँ। ''सुनिए'' एक बहुत पुरानी, विशाल हवेली की सीढ़ियाँ पर एक खंभे की ओट में बहुत धीमी आवाज में फुसफुसा कर कहा था 'साहब बीवी और गुलाम' फिल्म में छोटी बहू बनी उस अप्रतिम अभिनेत्री ने भूतनाथ को, जिसका रोल गुरुदत्त कर रहे थे। ''मुझे आपसे कुछ काम था, बहुत जरूरी। क्या आप मेरे लिए... बाजार से... शराब...?'' इसके बाद पर्दा काला पड़ गया था, सिर्फ उस स्याह अँधेरे में कहीं दूर से आती एक बेमालूम सी रोशनी में मीना कुमारी को अविश्वास से तकती गुरुदत्त की फटी फटी आँखें थीं। मीना कुमारी के पति का रोल कर रहा रहमान उससे कहा करता था कि उसका खून गर्म है, उसे सँभाल पाना उसके बस का नहीं - और उसे परे धकेल कर रोज रात रमणियों के पास चला जाता था। हिंदी की फिल्मों के शायद उस सबसे कारुणिक रोल में, जिसमें उस महान अभिनेत्री की अदाकारी भी उतनी ही अद्भुत थी, वैसी ही अविस्मरणीय - मीना कुमारी ने अपने पति को अपने पास रोक रखने के लिए पीने की प्रेक्टिस करना चाही थी, चुपके से शराब मँगवा कर बहुत मुश्किल से शुरुआती घूँट लिए थे... धीरे धीरे वह रमणियों की तरह पीने लगी थी, फिर पियक्कड़ों की तरह पीने लगी थी, फिर पुराने नशेबाजों की तरह सुबह से शाम तक पीने लगी थी और अर्धरात्रि में भी उठकर जाम बनाती थी जिसे काँपते हाथों से, एक हिलते डुलते प्याले में पी जाती थी - फिर वही होना था जो हुआ, मार कर उसी हवेली के तहखाने में दफना दी गई। दिल्ली के अंसारी रोड पर, जहाँ हिंदी की साहित्यिक किताबों, यही कविता, कहानी उपन्यास आदि, के तमाम प्रकाशक हैं, ऐसे ही एक प्रकाशन में काम करने वाली छिआलीस साल की मीनाक्षी माथुर ने न जीवन में कभी शराब पी थी, न कोई शराब की बोतल छुई थी, केवल फिल्मों में लोगों को पीते बहकते देखा था, यहाँ तक कि उसके दिमाग में कहीं अभी तक वे नीति वाक्य पड़े थे कि शराब मनुष्य की दुश्मन है, शर्तिया नुस्खा जिगर और आत्मा दोनों को चौपट करने का - फिर भी उसे उस दिन मीना कुमारी का एक विचलित करने वाला ख्याल आया, उसकी निजी जिंदगी के दुख याद आए जिनसे निजात पाने के लिए उसने शराब में शरण पाई थी, एल्कॅाहलिक होकर मरी थी... और इनके संग कोई और भी याद आया जो उसे मीना कहा करता था, इसी नाम से संबोधित करके पत्र और कविताएँ, अक्सर पत्रों में कविताएँ लिखता था, दिल्ली के बार्डर पर स्थित सीमापुरी नाम की बस्ती का एक आवारा, उस पूरे इलाके में 'कवि जी' के रूप में बदनाम। शादी से पहले मीनाक्षी का घर दिल्ली के शाहदरा इलाके में था। वे दोनों वहीं श्यामलाल कालेज में पढ़ते थे। दोनों पढ़ने में फिसड्डी थे इसलिए उन्हें दाखिला मिल सका था ऐसे विद्यार्थियों के आखिरी ठिकाने हिंदी साहित्य में, मगर उन दिनों उनके पास साहित्य के लिए भी वक्त नहीं था, वे अक्सर कालेज से भागकर हिस्ट्री पढ़ने चले जाते थे। वे कालेज के सामने के बस स्टाप से बस लेते थे और उनींदी दोपहरियों में दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों में घूमते रहते थे। वह उसकी आँखों का दीवाना था, आँसुओं का रसिया - और उसकी आँखों पर लिखी शुरुआती कविताओं में से एक, पहली बार, उसने लालकिले के दीवाने आम में सुनाई थी, शायद उसी जगह खड़े होकर जहाँ बहादुर शाह जफर के लड़के जवाँ बख्त की शादी के मौके पर मिर्जा गालिब ने सेहरा पढ़ा होगा, हाथों में एक काँपता हुआ कागज थामे। उस कविता में उसने उसकी आँखों की गहरी, नीली झील में नाव चलाने की, एक नाविक बनने की इच्छा जाहिर की थी और वह उसे सुनकर लगातार हँसती रही थी। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ, उसने औरंगजेब की निजी मस्जिद के बाहर सीढ़ियों पर खड़े होकर कहा था, बहुत धीमी आवाज में, कि भीतर नमाज पढ़ता बादशाह डिस्टर्ब न हो जाए। पहली बार उसने उसका हाथ जहाँआरा बेगम की कब्र पर थामा था, हजरत निजामुद्दीन और उनके प्रिय शागिर्द अमीर खुसरो की पवित्र मजारों के बीच, जहाँ शाहजहाँ की उस धर्मपरायण, आजीवन एकाकी बेटी के लिए उसकी आँखें भर आई थीं। और पहली बार कंबख्त ने चूमा कहाँ, सलीमगढ़ किले में आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के लिए बनाई अस्थायी जेल की एक गर्म, भभकती हुई कोठरी में जहाँ भूल से पकड़े जाते तो कहा जाता, स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान हुआ है। उसने केवल आँखों को चूमा था, आँसुओं को शराब की तरह पी गया था। उसने यह बहुत बाद में बताया था कि जिस दिन उसने कहा था, वह उसे प्रेम करता है, वह जिन नाम की गंधहीन शराब के दो पैग चढ़ाकर आया था, उसी से इतनी हिम्मत कर पाया था - और तब मीनाक्षी ने पहली बार जाना था कि यह शराब नाम की शै महज इनसान की दुश्मन नहीं, कभी कभी यही उसकी सबसे बड़ी दोस्त होती है। ''अकेले अकेले पी आया, मुझे नहीं पिलाई'' उसने मचल कर कहा था। फिर वह एक दिन उसके घर सबको बताने आया था कि वह उसे कितना प्रेम करता है, उसके बिना नहीं जी सकता। वह उस दिन भी पीकर आया था और चीखकर हिचकियों और सिसकियों के बीच कहता रहा था, हत्यारे हो तुम सब, मर्डरर्स। उसके दो भाइयों में से एक मेहमानों की भीड़ के बीच उसे खींचता हुआ वहाँ से काफी दूर एक उजाड़ पार्क में ले गया था, वहीं उसकी धुनाई की थी। उस दिन मीनाक्षी की शादी थी और दूर उसके घर से लाउडस्पीकर पर आती फिल्मी गीतों की ऊँची, कर्कश आवाज में वह बेहोश, खून से लथपथ, न जाने कब तक वहीं पड़ा रहा था।... वह शाम के पाँच बजे का वक्त था जब उसके दफ्तर के सामने की सड़क पर छायाएँ लंबी हो जाती थीं और दिन भर कविता संग्रहों, कहानियों और उपन्यासों की पांडुलिपियाँ और प्रूफ पढ़ने के बाद उसका सिर बेतरह दुखने लगता था। पहले यही छुट्टी का वक्त होता था, वह अपने बैग से एक बहुत पुराना काला चश्मा निकाल कर पहनती थी और आटो लेकर राजीव चौक मेट्रो स्टेशन जाती थी और वहाँ से मेट्रो में पचास मिनट का सफर तय करके द्वारका उपनगर में अपने घर। लेकिन साल भर से उसकी छुट्टी रात के आठ बजे हो पाती थी और कभी कभी उससे भी देरी से। मंदी के चलते मालिक ने उसके साथ काम करने वाली एक दूसरी प्रूफ रीडर का हिसाब कर दिया था और उसका सारा काम मीनाक्षी के कंधों पर आ गया था। प्रकाशक का दफ्तर मुख्य सड़क पर था और उसकी किताबों का गोदाम साथ की एक टेढ़ी मेढ़ी अँधेरी गली में कुछ दूर। वह उस दिन कुछ देर से दफ्तर आई थी, दिन भर वही बहुत पुराना काला चश्मा पहने रही, निगाहें कविताओं और कहानियों में गड़ी रहीं मगर उसने एक भी कविता नहीं पढ़ी, न कहानी - और एक बार बाथरूम जाकर बहुत देर रोती रही। शाम छह बजे के आसपास वह उसी काले चश्मे में अपने क्यूबिकल से बाहर सड़क पर आई लेकिन आटो को आवाज देने की जगह उस टेढ़ी मेढ़ी गली में चलने लगी जो धीरे धीरे सँकरी और अँधेरी होने के साथ निर्जन भी होती जाती थी, और नमी और सीलन भरी।

- नैपाल। उसने उस सुनसान गली में जाकर वहाँ गोदाम में काम करने वाले अठारह बीस साल के लड़के को आवाज दी। उसका नाम कुछ और था लेकिन सब उसे उसके मुल्क के नाम से बुलाते थे और अब यही उसका नाम हो गया था। वहाँ सन्नाटा पसरा रहा। उसने दरवाजे को धक्का दिया जो भीतर के खामोश अँधेरे में एक धीमी कराह के साथ खुला। वहाँ करीने से कई कतारों में युवा, कुछ कम युवा, वरिष्ठ, मृत्यु के करीब और मृत लेखकों और कवियों की किताबें लगी थीं, जिनमें न जाने कितनी चेतनाओं का सत था, संख्यातीत विचार दुनिया बदलने और बहुत सारे शब्द सुंदरता को बचाने के बारे में - और जिनमें वाक्य, विराम चिह्न, शीर्षक और पैराग्राफ्स और उनके बीच के गैप्स, सब कुछ दुरुस्त था, त्रुटिहीन और परिष्कृत। दरअसल ये सारी किताबें जब छपी थीं, वे युवा कवियों और लेखकों की थीं और वक्त बीतने के साथ कुछ कम युवा, वरिष्ठ, मृत्यु के करीब और मृत की शैल्फों में शिफ्ट होती गई थीं। प्रकाशक युवा लेखकों और कवियों से पैसे लेकर उनकी पहली किताब छापता था। उन्हें पकड़ लाने के लिए उसके एजेंट साहित्य की गोष्ठियों और कार्यक्रमों में घूमते रहते थे। फिर गोदाम के ठंडे, खामोश अँधेरे में, बंद दरवाजों के पीछे वे कविताएँ और उन किताबों के पन्ने धीरे धीरे पीले पड़ते रहते थे। किताबों की कतारों के बीच के अँधेरे में खड़ी मीनाक्षी माथुर को डर लगा और वह दुबारा चीखी - नैपाल। ऊपर किसी कोने से आवाज आई - जी, मैडम। उसने सिर उठाकर देखा, ऊपर दुछत्ती में नैपाल एक पेंसिल टार्च की रोशनी में किसी अलमारी में कुछ तलाश कर रहा था।

पेंसिल टार्च की हिलती डुलती रोशनी में नैपाल कोने में रखी लकड़ी की सीढ़ी से सावधानी से उतर कर नीचे आया।

- आप, मैडम ? नैपाल ने उसे पहचान कर कहा। - आप यहाँ क्यों... मुझे बुलवा लिया होता।

- यहाँ इतना अँधेरा क्यों है? मीनाक्षी ने कहा। उसकी साँसें अभी तक तेज चल रही थीं।

- कोई बल्ब के पैसे नहीं देता। कहते हैं कि मंदी चल रही है, खर्चे कम करने हैं। साल भर में सारे फ्यूज हो गए, बस एक बाकी है। नैपाल ने कहा और किसी कोने में जाकर एक स्विच दबा दिया। एक जीरो वाट के बल्ब की मरी सी रोशनी गोदाम में फैल गई।

- बताइए मैडम, कैसे आना हुआ? नैपाल ने कहा।

- कुछ काम था। उसने कहा। - पहले मुझे एक किताब निकाल दे। देख, स्तब्ध की कोई किताब हमारे पास है या नहीं। फिर दूसरा काम बताऊँगी।

- स्तब्ध? स्तब्ध कौन मैम?

- स्तब्ध जी को नहीं जानता ? बेवकूफ, हर वक्त किताबों के बीच रहता है और...। स्तब्ध... बहुत बड़े कवि हैं वो... अक्सर उनका नाम और तस्वीर छपती है। अभी स्वीडन या नार्वे पता नहीं कहाँ से कोई बहुत बड़ा सम्मान लेकर... तू नाम भी नहीं जानता, बड़े शर्म की बात है। जा तलाश कर।

नैपाल फिर टार्च की हिलती डुलती रोशनी में कोने की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर दुछत्ती में गया। कुछ देर खामोशी छाई रही। - क्या नाम बताया था, मैडम? ऊपर से आवाज आई।

- स्तब्ध... स्तब्ध...। एस वाली शैल्फ में देख। कविताओं के बीच, कुछ कम युवा वाले खाने में।

- नहीं मिल रही मैडम। कुछ देर की खामोशी के बाद ऊपर से आवाज आई।

- नहीं है? उसने मायूस होकर कहा। - अच्छा, एक बार वरिष्ठ वाले खाने में भी...

फिर बहुत देर तक खामोशी छाई रही। लकड़ी की दुछत्ती बहुत पुरानी थी, बीच बीच में चर्र मर्र की आवाज के साथ काँपने लगती थी, आशंकित करती कि सारी अलमारियों, किताबों और नैपाल समेत भहरा कर नीचे न आ जाए। वह दुछत्ती से परे, काफी दूर गोदाम के दूसरे कोने में खड़ी हो गई जहाँ जीरो वाट के बल्ब की मैली सी रोशनी थी। दूर से आवाज आई - मैडम, क्या ये वाली... उसकी आँखों के सिवा ... स्तब्ध।

- हाँ, हाँ यही। उसने कहा।

- तो लीजिए मैडम, कैच करो। नैपाल की धुँधली छाया दुछत्ती के किनारे नजर आई और अँधेरे में उड़ती हुई एक पुरानी, पतली, पेपरबैक किताब उसके पैरों के पास आकर गिरी। वह किताब उठाकर उसे जीरो वाट के बल्ब के ठीक नीचे ले आई, उसके पन्ने सहलाने लगी। चश्मा उतार कर देखा, पिछले कवर पर कवि का बहुत पुराना काला सफेद फोटो था और शुरुआत के दो तीन पन्नों के बाद पूरे पेज पर छपा था - यह पहली किताब उसके लिए जिसकी आँखों के सिवा इस दुनिया में कुछ भी नहीं। उसने उसे कई बार पढ़ा, उँगलियों से सहलाया। इस बीच नैपाल सीढ़ियों से उतर कर नीचे आया।

- तुझसे एक और काम था। लेकिन पहले यहाँ से बाहर निकलो, बिल्कुल अँधेरा हो गया है।

वे बाहर चले आए जहाँ गली इस समय तक गहरे अँधेरे में डूब चुकी थी। आसपास की दुकानें बंद हो चुकी थीं। किसी खिड़की से आता रोशनी का एक छोटा सा चिथड़ा सड़क पर पड़ा था, उसके आगे दूर तक अँधेरा था। नैपाल ने गोदाम में ताला लगा दिया और उसके आगे चलता हुआ टार्च की रोशनी में रास्ता दिखाने लगा। वह सँकरी और टेढ़ी मेढ़ी गली अब अँधेरे में डरावनी लग रही थी और बहुत लंबी भी। कभी कोई बहुत करीब से गुजर जाता था। डगमगाती चाल में दो तीन शराबियों की छायाएँ करीब आईं तो मीनाक्षी डर कर एक बंद दुकान के चबूतरे पर चढ़ गई, इस बीच आगे चलता हुआ नैपाल मोड़ पर गायब हो गया। शराबियों के दूर जाने के बाद उसने रफ्तार तेज कर मोड़ पार किया और देखा कि नैपाल रुककर उसका इंतजार कर रहा था। उसने अँधेरे में भी उसकी तेज और उखड़ी साँसों से जान लिया कि वह डर रही है, शायद अँधेरे से, अजनबियों से, शराबियों से, इसलिए उसने एक बार कह दिया - मैडम, आपको डरने की जरूरत नहीं... मैं हूँ न। बस मेरे साथ साथ चलती रहिए। मुझे सब रास्ते पता हैं और ये लोग... उसने अँधेरे में करीब आते चंद सायों को देखकर कहा... कुछ नहीं कर सकते, मैं अकेला काफी हूँ। वे साये करीब से गुजर गए, तब मीनाक्षी की साँसें सामान्य हुईं और तब उसे उस दुबले पतले परदेसी छोकरे की बहादुरी पर हँसी आने को हुई जो पड़ोस के भूखे नंगे मुल्क से रोटी कमाने आया था। वे इस समय तक मेन सड़क पर दफ्तर के करीब आ गए थे जहाँ इक्का दुक्का रोशनियाँ थीं। मीनाक्षी ने पर्स में हाथ डालकर स्तब्ध की किताब को सहलाते हुए कुछ रुपये निकाल कर उसे पकड़ाए।

- ये किसलिए? नैपाल ने कहा।

- तुझे शराब लेकर आनी है। एक... नहीं, आधी... हाफ बोतल। मीनाक्षी ने कहा।

- शराब... मैडम? नैपाल की आँखें अविश्वास से फैल गईं।

- हाँ, इतना ताज्जुब क्यों ? क्या तेरे मुल्क में नहीं पीते?

- नहीं, यह बात नहीं मैडम, हमारे मुल्क में तो...। लेकिन आपको देखकर लगता नहीं कि आप... आप...

- सुन, मैं दफ्तर जा रही हूँ। अभी कुछ काम बाकी है। एक फोन भी करना है। तू आगे जाकर दाईं तरफ जो अंग्रेजी शराब की दुकान है... देखी है न... हर समय भीड़ लगी रहती है। वहाँ तक जाकर...

- कौन सी शराब मैडम ? नैपाल ने कहा। - विस्की, रम या...

- धीमे... उसने फुसफुसाते हुए कहा। - मुझे यह सब नहीं पता। कोई भी लाना, मगर तेज होनी चाहिए। छुपाकर, किसी कागज में लपेट कर लाना। किसी से बताना नहीं। हाँ, साथ में एक मिनरल वाटर की बोतल और एक नमकीन का पैकेट भी। वैसे कहते हैं इसके साथ खीरा खास मजा देता है, ताजे खीरे की ठंडी फाँक, जिस पर थोड़ा सा नमक डला हो और कुछ बूँदें नीबू की - लेकिन छोड़, वह कहाँ मिलेगा। तुझे इस काम के बीस रुपये दूँगी। शराब लाने के बाद मेरे लिए एक टैक्सी और बुला देना... सुन रहा है न, आटो नहीं, टैक्सी।

अब जिक्र गंधक के तेजाब की उस उफनती नदी का जो गहरी कड़वी घाटियों और खाइयों के पार अँधेरे में डूबे उन पहाड़ों के परे से आती है जहाँ तक जाना, जिस नदी के मूल तक पहुँचना दुनिया के प्रत्येक शख्स के लिए मुश्किल है, बहुत, बहुत ही मुश्किल - लेकिन मर्दां के लिए तो कतई नामुमकिन। उनके बस का यह बिल्कुल नहीं, वे तो चार कदम चलकर ही अपनी जन्मजात दुर्बलता के हवाले हो जाते हैं। आज तक कोई मर्द, एक भी, किसी औरत के मन के नक्शे या भूगोल में वहाँ, उतनी दूर तक नहीं गया जहाँ न जाने कितनी भूमिगत दीर्घाएँ, चट्टानें, पगडंडियाँ, तालाब, द्वीप, जंगल और समुद्र हैं, उनके परे वे ओस में भीगती उपत्यकाएँ और उनके भी परे वे स्याह पहाड़ जहाँ से रक्त और आँसुओं और तेजाब की धाराएँ फूटती हैं। तेजाब की वह नदी एक प्रबल वेग से उस वक्त अचानक फूटती है जब चालीस के पार की कभी कोई बेहद सुंदर, इतनी सुंदर कि संख्यातीतों की जानेमन, रही औरत एक दिन शीशे में खुद को अपलक देखती, देखती रहती है और...। जैसे उस दिन मीनाक्षी माथुर के साथ हुआ था। सुबह अभी अँधेरा ही था जब दिल्ली के द्वारका उपनगर में उनके चौथी मंजिल के दो कमरों, किचन, बाथरूम कम टायलेट, एक ड्राइंग कम डाइनिंग रूम और दोनों कमरों से लगी दो बालकनियों वाले फ्लैट में उसके पति सतीश चंद्र माथुर ने झिझक भरे हाथों से कंबल उसके चेहरे से हटाया था और चाय की प्याली पास की मेज पर रखते हुए बहुत धीमी, संकोच भरी आवाज में कहा था - क्या कल आप पैसे लाई थीं?

मीनाक्षी ने चौंक कर आँखें खोलीं। अँधेरे में उस छाया को पहचानने की कोशिश की जिसके कंधे झुक आए थे। उसकी बुझी हुई आँखें निरीह लग रही थीं, हमेशा की तरह नम और उदास। यह दिन की शुरुआत थी, फिर भी वह थका हुआ लगता था।

- पैसे। उसके पति ने फिर एक कमजोर आवाज में कहा।

मीनाक्षी अभी भी आधी नींद में थी, अपने किसी अधूरे सपने में। उसने कुहनियों के बल उठने की कोशिश की तो उसके हाथ ने पास में सोई बड़ी बेटी के चेहरे को छुआ। उसने आँखें खोलकर देखा तो खिड़की के परे मेघाच्छन्न आकाश नजर आया, और बूँदाबाँदी के आसार। उसने उठकर बिस्तर पर, अगल बगल सोती दोनों बेटियों के बीच, बैठने की कोशिश की। पति पास के कमरे में, जो ड्राइंग कम ड्राइनिंग रूम था, एक कोने में जमीन पर बिस्तर बिछा कर सोता था। कमरे छोटे थे, वहाँ दो पलंग बिछा सकने की गुंजाइश न थी। दूसरे कमरे में उसके सास ससुर रहते थे।

- बड़ी का फार्म भेजने का आज आखिरी दिन है। ड्राफ्ट बनवाना है। आप जल्दी निकल जाती हैं इसलिए मैंने सोचा...

उस अधूरे सपने में मीनाक्षी न जाने किनसे लड़ती थी, किस पर चीखती थी। कोई पीछा करता था जिसके कदमों की आवाज आती थी...खट खट... लेकिन मुड़कर देखती थी तो कोई न होता था। मेट्रो ट्रेन की खट...खट...खटाक एक नियमित दुहराव में बजती थी, मोबाइलों की अजीबोगरीब घंटियाँ बजती थीं, कोई कहता था आई सी आई सी आई बैंक... कोटक महिंद्रा... कोई गाली देता था... मादर, बहन... इन सबके बीच कुछ बहुत पुराने फिल्मी गीतों की लाइनें बजती रहती थीं जो एक विचित्र संयोग से सबके सब आँखों के बारे में थे... जीवन से भरी तेरी आँखें, तेरी आँखों के सिवा, हमने देखी है उन आँखों की, आँखों में क्या जी, तेरी आँख के आँसू पी जाँऊ, ये नयन भरे भरे - ऐसे गीतों का एक पूरा जखीरा था, और भी, जैसे... नैनों में बदरा छाए, शोख नजर की बिजलियाँ, आपकी नजरों ने समझा, नैना बरसे और मैं तेरी नजर का सुरूर हूँ, और अन्य तमाम - और उनमें से कोई भी कभी भी सुनाई दे सकता था - लेकिन एक भी लाइन पूरी नहीं हो पाती थी कि कोई मोटर 'क्रीं...च' की आवाज के साथ अचानक रुकती थी, शीशा बिखर जाने की आवाज आती थी। वह खुद भी चीखती रहती थी। इतने शोरगुल में उसके लिए पति की बात सुन पाना नामुमकिन था, यूँ भी बहुत धीमी आवाज में बोलता था, हमेशा सिर झुकाकर। वह केवल उसे देख पा रही थी, उसके झुके हुए कंधे, आगे के नदारद बाल, गड़हों जैसी आँखें और इर्द गिर्द का अँधेरा। वह एक रहस्यमय ढंग से संकोची, शायद संसार का सबसे विनीत पति अँधेरे में छुपा रहता था, बस कभी कभी सामने आता था और आप के संबोधन में सिर झुकाकर बात करता था। सुबह उठकर वह सबसे पहले सबके लिए चाय बनाता था और खामोशी से सबके सिरहाने रख देता था। मीनाक्षी और दोनों बेटियों और अपने माँ बाबू के लिए कोई हल्का फुल्का नाश्ता भी वही बनाता था। मीनाक्षी सुबह बहुत जल्दी काम पर निकल जाती थी। थोड़ी देर के बाद छोटी की स्कूल बस आती थी। बड़ी को अपने कालेज के लिए कभी जल्दी निकलना होता था, कभी बहुत देर से। उनके जाने के बाद पति घर के कामों की एक लिस्ट लेकर बाहर निकलता था, बीमे की किस्त, बैंक का कोई काम, बिजली का बिल, दूध और सब्जी लाना जैसे काम उसके जिम्मे थे - लेकिन अक्सर वह दिन भर घर में ही पड़ा रहता था, छत की ओर देखकर न जाने क्या सोचता हुआ। दोपहर और शाम का खाना उसकी माँ बनाती थी। उसे भूख नहीं लगती थी, बस अपनी माँ के इसरार करने पर वहीं जमीन पर पड़े कोने के बिस्तर पर बैठा, सिर झुकाए, एक या दो रोटियाँ खा लेता था, फिर थाली फर्श पर खिसका कर वहीं लेटा कुछ सोचता रहता था।

पति ने उसे उनींदा देखकर पैसों की स्थिति जानने के लिए मेज पर टेबल लैंप आन किया और झिझक भरे हाथों से उसका पर्स खोलकर देखने लगा। उसकी पीठ मीनाक्षी की ओर थी। वह उसे यूँ ही उड़ती निगाहों से देखती रही, लेकिन वह बहुत देर तक उसी मुद्रा में खड़ा रहा जैसे कोई बेजान बुत हो या निस्संज्ञ पुतला, तब मीनाक्षी को अचानक कुछ ध्यान आया और वह बिस्तर से उठकर उसकी ओर लपकी, पर्स अपने कब्जे में करने के लिए। लेकिन देर हो चुकी थी। वह चिट्ठी पढ़ चुका था जो उसे पिछले दिन दफ्तर में मिली थी, प्रिय के संबोधन से शुरू हुई हिंदी के नामचीन कवि स्तब्ध की चिट्ठी, वैसी ही जैसी वह चौबीस बरस पहले लिखता था, उसकी आँखों के बारे में कुछ कविताओं जैसे वाक्य, और साथ में एक साहित्यिक कार्यक्रम का कार्ड। फर्क यही था कि पहले वह पुराने फिल्मी गीतों से काम चलाता था, लेकिन अब अपने वाक्य बनाना सीख चुका था। हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक, आलोचकों की निगाह में इस भाषा के सौभाग्य और गौरव जनाब स्तब्ध कुछ दिन पहले विदेश से एक बहुत बड़ा सम्मान लेकर लौटे थे, साथ में पीतल की प्लेट पर एक प्रशस्ति पत्र, जिसमें लिखा था कि उनकी कविताएँ, वे काव्य की एक अग्रवर्ती छलाँग थीं, एक नई शुरुआत, नए वक्त का आगाज। इसे सेलीब्रेट करने और उनका अभिनंदन करने के लिए साहित्यिक बिरादरी की ओर से वह एक सार्वजनिक कार्यक्रम था। पति चिट्ठी हाथ में लिए पलटा और एक क्षण उसकी ओर खाली, निश्प्राण, अभिव्यक्तिशून्य आँखों से देखता रहा। फिर चिट्ठी वहीं छोड़कर वह बालकनी में चला गया और रेलिंग पर सिर झुकाए नीचे उस कोने को देखने लगा जहाँ से सोसायटी के भीतर आती गाड़ियाँ साफ नजर आती थीं। मीनाक्षी उसके पीछे वहाँ जाना और इस बारे में बात करना चाहती थी, लेकिन इस समय तक घर में लोग जाग चुके थे। दिन की परिचित आवाजें धीरे धीरे तेज होती जा रही थीं। अभी ठीक नहीं होगा, यह सोचते और अपने ख्यालों को व्यवस्थित करने की कोशिश करते हुए वह धीरे धीरे तैयार होने लगी। खिड़की के परे जो बादल उमड़ते आ रहे थे वे अब गरजने लगे थे, एक काली सी, अँधेरे जैसी रोशनी फैल रही थी। पति उस दिन पूरी सुबह बालकनी में बैठा रहा। एक अशांत, असामान्य खामोशी में मीनाक्षी सबके लिए नाश्ता बनाती और सुबह के काम निपटाती रही। बहुत देर के बाद, जब बेटियाँ अपने स्कूल और कालेज जा चुकीं, वह बालकनी में गई और वहाँ कुर्सी पर मिट्टी के ढ़ूह या किसी कब्र के पत्थर की तरह खामोश बैठे पति से कहा - चलो, भीतर चलो। बारिश होने वाली है। तुम भीग जाओगे।

पति ने आँखें खोलकर उसकी ओर देखा। वे वैसी ही थीं, खाली, बेजान, बुझी हुई।

- नहीं, मैं यहाँ ठीक हूँ। उसने कहा, बहुत धीमी आवाज में, जिसे सुन पाना मुश्किल था।

- नहीं, भीतर चलो। यहाँ सर्दी भी है।

- मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आप चिंता न करें। उसने फिर कहा।

मीनाक्षी ने उसका हाथ पकड़कर जबरदस्ती उठाया और खींचती हुई भीतर ले गई। उसे वहाँ बिस्तर पर बिठा कर वह दफ्तर के लिए तैयार होने लगी। उस छोटे से फ्लैट में बड़ी सिंगार टेबल रखने की जगह नहीं थी, बस एक आईना, बहुत पुराना धुँधला सा आईना, दीवार पर टँगा था जिसमें अक्स का केवल अंदाज लगता था। छोटी बेटी के लिए दीवार पर एक दूसरा शीशा था, काफी नीचे। मीनाक्षी के हाथ से साड़ी नीचे गिर पड़ी, तब उसने जाना कि वह सहज नहीं थी, उसका बदन काँप रहा था, उसके हाथ, उँगलियाँ, त्वचा, सब कुछ। झुककर साड़ी उठाते हुए उसकी निगाह बेटी वाले शीशे में गई। उस बेदर्द आईने की चुप्पी में से पता नहीं किसका चेहरा झाँकता नजर आया, थकान से लदा, विवर्ण और भीतर से बेहद उद्विग्न। शायद वही था वह लम्हा जब उसके भीतर तेजाब की नदी फूटी थी, इस तरह जैसे कोई बोतल लुढ़क जाए, शराब बहने लगे। वह काली, ओवरवेट, भद्दी नजर आई थी, आँखों के नीचे गड़हे, आँखें भी धँसे हुए कोटरों की मानिंद और उनमें न जाने कितना गम, कितना दर्द, और बालों में सफेदी। फर्श पर बैठे साड़ी समेटते हुए दर्द की एक महीन डोर उसकी रगों में से गुजर गई, उसने चाहा अकेली होना, चुपचाप रोना - और तब उसकी निगाह आईने में उसके अक्स को चोरी से देखते पति की ओर गई। उस बेचारे की इतनी मजाल न थी कि उसकी आँखों में सीधे देख सके, न जाने कितनी मुद्दत के बाद आईने में उसका अक्स देखने की हिम्मत कर पाया था, वह भी चोरी से, और पकड़े जाने पर उसने निगाहें झुका लीं।

इसी ने मेरी जिंदगी बरबाद की है, मीनाक्षी ने सोचा।

- क्या सोच रहे हो? उसने एक थकी, ठंडी आवाज में कहा।

- जी? पति ने अचकचाकर कहा। - जी, मैं...

- जो कहना है, कह डालो। जो भी मन में है।

- नहीं, मेरे मन में तो ऐसा कुछ भी...

- वह चिट्ठी तुमने पढ़ ली है न। जो भी मन में आया हो, कह डालो। मन में मत रखो।

- आप गलत समझ रही हैं। उसने सिर झुकाए रखकर कहा। - ऐसा कुछ भी...

मीनाक्षी मुड़ी और उसके पास आकर बैठ गई।

- दिखाना चाहते हो कि तुम कितने ग्रेट हो, कितने उदार? मीनाक्षी ने कहा। - इसकी जरूरत नहीं है। तुम सुबह से गुमसुम हो, उस चिट्ठी की ही वजह से न? जो भी तुम्हारे मन में है, मैं सुनने के लिए तैयार हूँ।

- आप यकीन कीजिए। पति ने वैसी ही उदासीन आवाज में कहा जो कहीं दूर से आती हुई लगती थी। - मेरे मन में कुछ नहीं है।

- कुछ भी नहीं? मीनाक्षी की आवाज तेज होने लगी। - तुम्हारी बीवी को एक लव लैटर मिला है जिसमें न जाने क्या क्या शायरी लिख रखी है। तुम्हारे लिए यह कुछ भी नहीं?

- तो क्या हुआ ? इसमें कौन सी... यह तो...

मीनाक्षी उसका सूजा, निस्तेज चेहरा और उसकी झुकी, बुझी हुई आँखें देखती रही।

- यह एक मामूली बात है? वह अब चिल्लाने लगी थी। - तुमने शायद पूरी नहीं पढ़ी, क्या क्या लिखा है। आँखों की झील में नाव चलाना और पता नहीं क्या। वह मुझे उठाकर या भगाकर ले जाए, तभी तुम्हारे लिए बड़ी बात होगी?

पति अंधों जैसी सूनी, निश्प्राण आँखों से खिड़की के बाहर बादलों को देखता रहा। उसने अस्फुट स्वरों में कुछ कहा जिसमें से मीनाक्षी इतना ही सुन सकी... ऐसा हो तो... क्या... इसमें...

- मेरी जिंदगी बरबाद करने के बाद इसे महान बनने का शौक चर्राया है। वह अब एक गरज जैसी आवाज में बोल रही थी, किनारे पर सिर पटकते समुद्र या सब कुछ तबाह करने पर आमादा तूफानी रात जैसी। - सुन लो, वह कौन हैं। वह बहुत बड़े कवि हैं, बहुत बडे़। पोयट, समझे? मेरे पुराने जानकार। हिंदी लिटरेचर में उनका बहुत बड़ा नाम है। अभी उन्हें कोई बहुत बड़ा सम्मान मिला है।

पति खामोश था, पहले की तरह।

- लेकिन तुम कैसे समझोगे, तुम क्या जानो पोएट क्या होता है, पोएट्री क्या होती है। जिंदगी में कभी एक भी किताब पढ़ी हो तो...। तो सुनो, केवल जानकार नहीं, लवर हैं वो मेरे। लवर। शादी के पहले के। उनसे मेरी शादी नहीं हो पाई क्यों कि किस्मत में तो यह लिखा था... तुम्हारा खूँटा। पिताजी बचपन में ही हमें छोड़कर... और भाइयों को जल्दी थी बहन को विदा करने की। मिला एक नाकारा, नालायक पति जो दिन भर घर में पड़ा रहता है, बीवी सुबह से शाम खटती है। इस फ्लैट की ई एम आई, बच्चों की फीस, बीमे का प्रीमियम, मोबाइल, बिजली के बिल... बस इतने में पूरी तनखा स्वाहा हो जाती है। सुबह से शाम, रात, फिर सुबह... एक चक्की चलती रहती है, काम काम काम - बीमार पड़ने की भी फुर्सत नही, क्यों कि बीमार पड़ी तो तुम सब फुटपाथ पर आ जाओगे। मैं उनकी पत्नी होती तो... वह अब सुबकने लगी थी - उनके संग तमाम मुल्क घूमती। हो सकता है उनकी संगत में मैं भी कविताएँ लिखती। किताबें छपतीं, जिन पर दोनों का नाम होता, हमारे इंटरव्यूज छपते, और पैसे भी शायद...

उसने पति की ओर देखा जो चेहरा दीवार की ओर मोड़ कर लेट गया था। लगता था, जैसे उसने सुना ही नहीं।

- लेकिन अब भी देर नहीं हुई है। वह सुबकियों के बीच कहे जा रही थी। - चिट्ठी तुमने देखी है न। वह अब भी मुझ पर जान छिड़कता है। फिदा है मुझ पर। वह उन दिनों भी कहता था कि मेरे सिवा वह किसी से प्रेम नहीं कर सकता, और क्या क्या जान निकाल देने वाले उर्दू के शब्द... महबूबा, जानेमन... जान। मुझे पता है कि उसने शादी भी नहीं की, अपने को पोएट्री की साधना में डुबो दिया, केवल मुझे भुला पाने के लिए, लेकिन भुला नहीं सका। अब तुम मुझे नहीं रोक सकते, कोई नहीं रोक सकता। अब बेटियों को तुम सँभालो और अपने माता पिता को, और यह फ्लैट, उसकी किस्त, बच्चों की फीस, बिल। तुम्हीं जानो यह सब कैसे होगा। मैं जितना कर सकती थी, कर चुकी और अब थक गई हूँ। मुझे भी अपना जीवन जीने के लिए...

उस दिन बरसात दिन भर रुक रुक कर होती रही और उसी के संग आँसुओं की एक नदी, बरसाती नदियों की तरह रुक रुक कर बहती रही। वह उस वक्त भी बह रही थी जब वह दफ्तर में अपने कोने के क्यूबिकल में बैठी थी, रात में भी वही काला चश्मा लगाए, नैपाल का और शराब का इंतजार करने के दौरान, स्तब्ध की चिट्ठी बार बार पढ़ते हुए जिसमें जालिम ने न जाने क्या क्या लिखा था। लगता था उसने उसके कई ड्राफ्ट बनाए थे और उसे लिखने में अपनी नैसर्गिक प्रतिभा और बीस बरसों के काव्याभ्यास का पूरा इस्तेमाल किया था। आप की आँखों को, उसने लिखा था, नीली, गहरी झीलों जैसी, संसार की सबसे सुंदर, चिरकाम्य आँखें, चौबीस बरसों से नहीं देखा (मीनाक्षी चश्मा उतार कर अपनी आँखों को कुछ देर सुखाती रही) लेकिन वे हमेशा मेरे संग रही हैं, मेरे सामने - और उनके आँसुओं का खारा स्वाद भी, मेरी जीभ की नोक पर। उसने लिखा था कि वह जहाँ भी गया, जिस मुल्क, जिस शहर में, वे उसके साथ थीं... उसी तरह एक अधीर आग्रह में उसकी ओर तकती हुई जिस तरह चौबीस बरस पहले...। लेकिन जब भी वह उन्हें छूने की कोशिश करता था, वे हवा में घुल जाती थीं, विलीन हो जाती थीं। उसने आखीर में लिखा था कि उसके लिए उन आँखों को एक बार दुबारा छू सकने की अधूरी तमन्ना के साथ मरना आसान नहीं होगा, इसलिए उसने उस कार्यक्रम का कार्ड भेजा था, मरना आसान बनाने की विनती के साथ। मीनाक्षी ने अपने बैग से छोटा सा आईना निकाला और चश्मा उतार कर वे खाली, दग्ध सूराख देखती रही जहाँ कभी गहरी, नीली झीलें थीं। वहाँ धूल के बगूले थे और तली में सिर्फ कुछ सूखे ढेले। उसने फिर उन्हें उसी काले चश्मे के अंधकार में छिपा लिया और नैपाल का इंतजार करने लगी। थोड़ी देर में नैपाल दबे पाँवों उसके क्यूबिकल में आया, खाली हाथ। - मैडम, उसने फुसफुसाते हुए कहा - मैं टैक्सी भी ले आया हूँ, बाहर खड़ी है। 'सामान' पीछे की सीट पर है। मीनाक्षी ने उसे पर्स में से निकाल कर एक नोट पकड़ाया और कार्यक्रम के वेन्यू को फिर याद करते हुए उठ खड़ी हुई।

कार्यक्रम उस चार मंजिला इमारत की दूसरी मंजिल पर एक विशाल हॉल में था, लेकिन रोशनियों और बंदनवारों का सिलसिला नीचे गेट से ही शुरू हो गया था। वहाँ पलकें झुलसाने वाली रंग बिरंगी रोशनियाँ और रेशमी कपड़ों के बैनर्स ही बैनर्स थे, जिन पर चाँदी जैसे अक्षरों में श्रीमान स्तब्ध, सम्मान, अभिनंदन, गौरव, हार्दिक वगैरह लिखा था। उस विशाल हॉल में रोशनी से रँगी पीछे की दीवार पर भी वैसा ही एक बैनर था और सात या आठ लोग जो दूर से धुँधले धब्बों जैसे दिखते थे, मंच पर कुर्सियों पर बैठे थे। हाल खचाखच भरा था और पीछे और अगल बगल की दीवारों से सटकर खड़े लोगों की भी एक बड़ी तादाद थी। मंच के कोने में आकर्षक सफेद दाढ़ी और दयालु चेहरे वाले एक जनाब, काफी उम्रदराज, स्तब्ध की कविताओं पर बोल रहे थे और हॉल में मौजूद लोग दत्तचित्त सुन रहे थे। कार्यक्रम के दौरान मंच के बीच मालाओं से लदे बैठे स्तब्ध के पास हॉल के बीच हाथों हाथ चलती, कतारें पार करती एक पर्ची पहुँची। उसे पढ़कर स्तब्ध ने मालाएँ उतार कर मेज पर रख दीं और पास में बैठे शख्स के कानों में कुछ कहा, फिर मंच से उतरकर हाल में बैठे लोगों की कतारों के बीच चलता हुआ बाहर चला गया। वहाँ कोरीडोर के एक खामोश कोने में रेलिंग से नीचे झाँकती एक उम्रदराज औरत खड़ी थी, रात में भी काला चश्मा लगाए। ये आँखें आपकी नहीं, मेरी हैं, स्तब्ध ने बीस बरस पहले वह सस्ता सा चश्मा उसे देते हुए कहा था। - इनमें झाँकने का हक और किसी को नहीं।

धीमे कदमों से चलता हुआ स्तब्ध उसके पास जाकर खड़ा हो गया।

- शुक्रिया, मीना जी। स्तब्ध ने कहा। - मेरी बात रखने, यहाँ आने के लिए। मुझे उम्मीद नहीं थी कि आप...। लेकिन आप यहाँ बाहर क्यों...?

- मुझे आना ही था। मीनाक्षी मुस्करा रही थी। - आने में देर हो गई, वहाँ इतनी भीड़ है कि भीतर जाना नामुमकिन है। मुझे जल्दी जाना है, इसलिए किसी तरह आपको वो स्लिप भिजवाई। आपका ज्यादा वक्त नहीं लूँगी। बस मुबारकबाद देने आई हूँ। आपको इतना बड़ा सम्मान मिला है। आप इतने बड़े कवि हैं, हम लोगों से कितने ऊपर, ऊँचे। हम लोग तो...

- अरे यह तो... यूँ ही। स्तब्ध ने जैसे लज्जित होकर कहा - मुझे नहीं पता, यह सब कैसे...। मैंने न ऐसा सोचा था, न चाहा था। मेरी तमन्ना यह सब नहीं थी।

- फिर क्या थी आपकी तमन्ना। मीनाक्षी ने पूछा और पर्स में से वह पुरानी पेपरबैक किताब निकाली, उसका पहला कविता संग्रह। - मैं यह किताब साथ लाई हूँ, आपके आटोग्राफ्स के लिए...

- मैं तो सिर्फ एक नाविक... मल्लाह...। आप तो जानती हैं। स्तब्ध ने कहा।

मीनाक्षी का चेहरा सख्त था जब एक हाथ में उसकी कविताओं की किताब थामे, उसने दूसरे काँपते हाथ से चश्मा उतारा, उस एक लम्हे में उन सारी कविताओं को झुलसाते, जलाते, राख कर देते हुए। स्तब्ध उसकी ओर देखता हुआ खामोश खड़ा रहा, स्तब्ध। उस घड़ी उसके मस्तिष्क का एक कोना हमेशा के लिए बर्फ बन गया था, वह तत्काल यह जानने की स्थिति में नहीं था कि उस क्षण के बाद या तो उसे जीवन भर कुछ न लिख सकना था, या नए सिरे से, बिल्कुल शुरू से लिखना सीखना और जानने की कोशिश करनी थी कि कविता का मतलब क्या होता है और कवि होने के मायने क्या। हॉल के अधखुले दरवाजे से भीतर की आवाजें बहुत धीमे आ रही थीं जो बाहर की गहरी खामोशी में साफ सुनाई देती थीं। कुछ शब्द, वाक्यों के टुकड़े कानों में पड़ जाते थे... हमें घेरती परायी, अजनबी, विजातीय भाषाओं के घटाटोप के बीच हमारे जातीय शब्दों को शुद्ध और सुरक्षित रख पाने वाले हमारे वक्त और भाषा के अद्भुत कवि स्तब्ध... वेदना के बुलबुले... इतिहास का अपूर्व बोध... जीवन की संपूर्णता... काला सफेद... शुभ और अशुभ...

- मुझे आपसे एक काम भी था, बहुत जरूरी। मीनाक्षी ने हस्ताक्षर लेने के बाद किताब को वापस पर्स में रखते हुए कहा।

- काम? हाँ, कहिए न।

- पता नहीं, आपको कैसा लगेगा, आप इतने बड़े कवि हैं। लेकिन इसी वजह से मुझे उम्मीद है कि शायद यह काम आपके ही जरिये...। बहुत मुश्किल से हिम्मत जुटा सकी हूँ। इसके लिए मुझे वही तरकीब करनी पड़ी, जिससे बहुत पहले आपने मुझसे कुछ कहने की हिम्मत की थी।

- कहिए न, मीना जी। स्तब्ध ने उसकी आँखों में देखने से बचने की कोशिश करते हुए कहा। - क्या आप सोचती हैं कि वह काम मेरे लिए थोड़ा भी मुमकिन होगा तो मैं कुछ कोर कसर उठा रखूँगा?

वक्ता कह रहा था, मानवीय परिस्थिति से परे और निरपेक्ष नहीं, वे मनुष्यता के उस अंश के प्रतिनिधि और प्रवक्ता हैं, जिसके हिस्से में महज दुख दारिद्रय, अपमान, एकाकीपन... वे एक उदाहरण भी हैं काव्य और कर्म, बाह्य और आंतरिक के एक बेजोड़, अटूट रिश्ते के। उनके समूचे कविकर्म में दोनों के बीच कोई विभाजन या विच्छेद नहीं। दरअसल वे अपना कविधर्म इसी जनता के आदेश से...

- आपके लिए मुमकिन नहीं होगा तो भला किसके लिए... मीनाक्षी हँसने लगी। वह एक अजीब, अतिरिक्त हँसी थी, जैसे कोई दबाव अचानक हटा हो, कुछ ज्यादा जोर से, ज्यादा देर तक। वह अपने पर्स में कुछ तलाशने लगी। - आप इतने बड़े और प्रसिद्ध कवि हैं। इतना सम्मान, इतनी जान पहचान। उसने एक पर्चा निकाल कर दिया। - यह उस कंपनी का नाम और फोन है जहाँ मेरे पति साल भर पहले तक काम करते थे। उनकी नौकरी चली गई। कंपनी के मालिकों ने कहा कि मंदी चल रही है स्टाफ कम करना है।

''...''

- आपको उनसे बात करके मेरे पति की नौकरी वापस दिलवानी है। वे बिल्कुल खाली हैं। बस मेरी तनखा से घर चल रहा है। तंगी रहती है, लेकिन बात तंगी की नहीं। मीनाक्षी अब बहकने लगी थी। - वह पूरी दुनिया से मुँह छुपा कर घर में पड़ा रहता है। अँधेरे में, कोनों में छुपता फिरता है, किसी कुत्ते की तरह जिसे हर जगह केवल दुत्कार मिलती है। यह मंदी क्या आई, कुत्ता बन गया मेरा पति, सुन रहे हैं कुत्ता। जस्ट लाइक ए डॅाग।

स्तब्ध खामोश खड़ा था।

- खुदा का शुक्र है कि मेरे पास एक नौकरी है, जैसी भी है। सुबह बहुत जल्दी घर से निकलना होता है, दिन भर खटती हूँ। जब घर लौटती हूँ, बहुत रात हो चुकी होती है। वह मेज पर खाना परोसता है और फर्श के कोने में पड़े अपने बिस्तर पर कंबल मुँह तक ओढ़कर सो जाता है। खाते खाते मुझे भी नींद आने लगती है। घर में एकदम सन्नाटा रहता है। बेटियाँ भी सहमी रहती हैं। मैं जानती हूँ कि वह पूरी रात नहीं सोता, अकेले में चुपचाप रोता है। कभी कभी रात के सन्नाटे में कोई आवाज सुनकर मेरी नींद टूट जाती है, तब सुनती हूँ उसकी दबी दबी सिसकियाँ।

वे अपने कर्तव्य से, कवि के दायित्व से कभी विरत नहीं होते, हमेशा, हर घड़ी जनता के दुख दर्द में शामिल रहना चाहते हैं... दरअसल यही स्रोत है उनकी कालातीत काव्य शक्ति का। मनुष्य की पीड़ा को सचाई और सादगी से रखते हुए वे उसे कालजयी अभिव्यक्ति दे पाने में...

- क्या आप सचमुच सोचती हैं मीना जी, कि यह काम मैं...

- क्यों नहीं, आप इतने बड़े, इतने प्रसिद्ध कवि हैं। आपको कौन नहीं जानता। आपका एक फोन ही काफी होगा।

- आप बहुत भोली और मासूम हैं मीना जी। क्या आप इस दुनिया में नहीं, कहीं और रहती हैं ? स्तब्ध ने कहा। - कवियों को कविता की दुनिया के बाहर कौन जानता है। यह कंपनियाँ, फैक्टरियाँ, कार्पोरेट हाउसेज, बैंकर्स, इंडस्ट्रीज, एक्सपोर्ट इंपोर्ट... वह एक अलग दुनिया है। वहाँ हमें कोई नहीं...

अहिस्ता बढ़ते नशे के संग मीनाक्षी का स्वर तेज होता जा रहा था। पिए होने के पुख्ता सबूत की तरह, वह भी अंग्रेजी, वह अब अंग्रेजी बोलने लगी थी। - हाऊ कैन दिस बी? यू आर सो वैल नोन, एपियर आन टी वी, यूअर इंटरव्यूज पब्लिश इन न्यूजपेपर्स एंड मैग्जीन्स...

- मीना जी, कवियों को कविता की दुनिया के बाहर कोई नहीं जानता। फिर जो काम आप मुझसे चाहती हैं, वह कवियों या कविता का काम नहीं। वह एक अलग दुनिया है, पावर, पैसे, सत्ता की। कविता तो... वह एक चिरंतन प्रतिपक्ष है, इन सबके खिलाफ।

वे अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति को शुद्ध और सघन रखते हैं, किसी अमूर्तन में मुँह छुपाए बिना वे जनता की ओर से ताकतवरों को चेतावनी देते और, आतताइयों को ललकारते हैं, इस तरह कि उनके दिल की धड़कन गुम हो जाए, और उनकी कविताओं के सर्वाधिक प्रेरणास्पद अंश वे हैं...

- आई हैव गाट यूअर प्वांइट। ओ के दैन, लाइक ए ट्रू पोएट, पिक अप द फोन एंड एट लीस्ट कर्स दैम, वार्न अैम। डैम देम, एट लीस्ट। कम से कम उन्हें इतना तो कहो, कवि जी, कि उन्होंने मेरे पति के साथ जो किया, उन्हें किसी के साथ ऐसा करने का कोई हक नहीं। बिना किसी गलती के, बिना कोई वजह बताए...

- इस तरह नहीं मीना जी। स्तब्ध ने सिर झुका कर एक बहुत धीमी, मायूस आवाज में कहा - कविता... दरअसल वह बहुत सूक्ष्म, अदृष्य तरीकों से और बहुत धीमे अपना काम करती है। उसके असर तत्काल नहीं, एक बहुत लंबे अरसे में प्रकट होते हैं, कभी कभी तो शताब्दियों में।

- आई नो, आई एम नाट सो नाइव, मि. पोएट। मीनाक्षी नशे में अब बहक नहीं, बह रही थी, उसकी आवाज उठती जा रही थी। - आई आल्सो वर्क इन ए पब्लिकेशन हाउस एंड माई जाब इज टू रीड मैन्युस्क्रिप्टस। आई नो एवरीथिंग। नाऊ यू माइट ईविन से दैट ग्रेट पोएट्री रिक्वायर्स ग्रेट पेशेंस... यू हैव ए थ्योरी फार एवरीथिंग।

- क्या तुमने शराब पी है मीना? स्तब्ध ने स्तब्ध होकर कहा।

- हाँ, मेरे चौबीस साल के बिछड़े सनम, तेरी महबूबा आज शराब पीकर आई है। वह अब पूरी तरह धुत्त हो चुकी थी। - तूने तो कभी पिलाई नहीं, इसलिए आज मैंने खुद ही...। इसी से तो हिम्मत पाई यह सब कहने की। वाकई बड़ा मजा आता है। वह अब जोर जोर से हँसने, यहाँ तक कि चीखने लगी थी। उसकी आवाज तेज हो गई थी और संतुलन बनाए रखने के लिए दीवार से पीठ टिकाए खड़ी थी, बीच बीच में स्तब्ध के कंधे पर झूल जाती थी। स्तब्ध ने भयभीत होकर चारों ओर देखा। लोग जुटते चले आ रहे थे। पगली है पगली, उसे कहीं करीब साफ सुनाई दिया। कहीं दूर कोई चौकीदार को चीख कर आवाज दे रहा था। - होश में आओ मीना, वह उससे कहना चाहता था, लेकिन वह अब बेहोशी में डूबने के करीब थी, कुछ सुनने और समझने से परे। वह बाँहों और कंधों का सहारा देते हुए उसे धीरे धीरे सीढ़ियों की तरफ ले जाने लगा।

- ही वाज सेइंग दैट यूअर पोएम्स इन्स्टिल फियर इन दी हार्ट्स ऑफ टाइरेंट्स। वह बड़बड़ा रही थी और बीच बीच में हँस देती थी। - टेल मी ए सिंगल टाइरेंट हू ड्रेस यू आर इविन नोज यू बाई नेम। अच्छा, जनता और उसके दुख दर्द... कोई एक भी पानवाला है जो आपको... कवि की तरह...

स्तब्ध उसे किसी तरह सीढ़ियों से उतार कर नीचे के फ्लोर पर, फिर बाहर के दालान में ले गया। उसके कंधे से चिपकी, नशे में बेहोश मीनाक्षी बीच बीच में हँस देती थी, बीस साल पहले की दिलकश, मोहक हँसी नहीं, भद्दी और भयानक। उसकी साड़ी और बाल बिखर गए थे। वह अचानक बिलख कर रो पड़ी - धीमे धीमे असर करती है, धीमे धीमे असर करती है... वही किस्सा हर बार। मगर दर्द होने पर राहत की जरूरत फौरन होती है, अभी, अभी, अभी... इसी वक्त। स्तब्ध ने उसे किसी तरह सहारा देते हुए पैंट की पिछली जेब से चाबी निकाल कर पार्किंग अटैंडैंट को दी, उससे अपनी कार जल्दी से जल्दी निकाल लाने को कहा। एक पेड़ की ओट में, अँधेरे में कार का इंतजार करते हुए वह मीनाक्षी का सिर सहलाते और गाल थपथपाते हुए, जैसे उसे सांत्वना देते हुए, कहता रहा - आप अभी ठीक हो जाएँगी, बस थोड़ी देर में, और फिर यह भी - शायद आप कहना चाहती हैं कि मैंने कविताओं में जीवन बरबाद किया। मुझे कहानियाँ लिखनी चाहिए थीं या उपन्यास, नाटक या कुछ और। लेकिन अब तो बहुत देर...

- डू यू रियली थिंक आई एम सच ए फूल। मीनाक्षी ने, जिसने बेहोशी में भी न जाने कैसे उसकी बात सुन ली थी, आँखें खोलकर कहा। - इट इज वन एंड दी सेम थिंग। शब्द ही शब्द, ढेर सारे, बहुत सारे शब्द, बट चेंज नथिंग। ऑल दी वंडर्स पुट टुगेदर, कैन दे मेक माई डाग ए मैन? टैल मी।

कार आने पर स्तब्ध ने अटैंडैंट की मदद से उसे सामने की सीट पर बिठाया। - मुझे कहाँ ले जा रहे हो? मीनाक्षी ने अचानक आँखें खोलकर कहा।

- तुम्हारे घर। तुम्हें इस तरह नहीं छोड़ सकता।

- घर?

ड्राइवर की सीट पर बैठकर स्तब्ध को ध्यान आया कि उसे नहीं मालूम कि मीनाक्षी का घर कहाँ है। वह बेहोश थी, अपने में ही कुछ बड़बड़ाती हुई। स्तब्ध ने कार के भीतर की फीकी रोशनी में उसके पर्स की तलाशी ली। पहले उसकी अपनी किताब, फिर वह काला चश्मा, फिर उसकी लिखी चिट्ठी, फिर मीनाक्षी का मोबाइल उसके हाथ में आए। स्तब्ध ने उसके नंबरों में 'होम' तलाश कर डायल किया। उस ओर से एक मर्दाना आवाज आई - जी...

- कौन, मि. माथुर? प्लीज अपने घर का पता बताएँगे? जी हाँ, यह फोन आपकी पत्नी का ही है। उनकी तबीयत खराब है, नहीं नहीं, कोई चिंता की बात नहीं। मैं उन्हें छोड़ने आ रहा हूँ, बस अभी थोड़ी ही देर में...।

कार हुमायूँ के मकबरे के सामने से गुजर रही थी जो गुजरे जमाने के बादशाहों, शहजादों की लाशें दफन थीं। रास्ते भर मीनाक्षी बीच बीच में बड़बड़ाती रही - कविता धीमे धीमे असर करती है... उम्र भर इंतजार करते रहो। इटर्नल वेट। मगर दर्द से निजात की जरूरत फौरन होती है, आज, अभी। महान कविता... इतने सारे शब्द... महान धीरज... महान इंतजार...। सामने सड़क पर आँखें गड़ाए, सावधानी से कार चलाते स्तब्ध का ध्यान उसकी ओर नहीं था। वह उस वक्त न उसकी आँखों के बारे में सोच रहा था, जिन्हें वक्त ने नोच डाला था, न अपनी उन कविताओं के, जिनमें बेशक शब्दों का एक ढाँचा बाकी बचा था, मगर मायनों की धज्जियाँ उड़ चुकी थीं। उसके सामने आगामी, अजन्मी कविताओं की जो धुँधली सी शक्ल तैर रही थी, वह उसे डरा रही थी। उनके शीर्षक थे पूँजीवाद, उत्पादन संबंध, व्यापार चक्र, मंदी वगैरह, और सोच रहा था कि क्या यह मुमकिन होगा। क्या उन्हें लिख पाना उसके बस का होगा। क्या वे कविता के पारखियों को स्वीकार होंगी, वे कविता भी होंगी या नहीं। इस तरह के सवाल।

स्तब्ध बेहोश और बीच बीच में कुछ अस्फुट बड़बड़ाती मीनाक्षी के साथ कार में जब द्वारका उपनगर में उसकी सोसायटी में पहुँचा, बहुत रात हो चुकी थी। वहाँ सन्नाटा था जिसे दिन भर जमा होते रहे बादलों की गरज बीच बीच में टुकड़े टुकड़े कर देती थी। उसने मीनाक्षी को बाँहों का सहारा देते हुए बाहर निकाला। वह शायद सो चुकी थी, बार बार उसके कंधों पर झूल जाती थी। उसे कंधों पर टिकाए और बाँहों का सहारा देते हुए वह उसे कारों की कतारों के बीच उसके फ्लैट की दिशा में ले जाने लगा। उस तारों से खाली रात के घुप अँधेरे में उसने किसी के बदहवास कदमों से दौड़ते, करीब आने की आवाज सुनी। एक छाया उनके पास आकर रुक गई। स्तब्ध ने सावधानी से मीनाक्षी को उसके सुपुर्द किया।

- देखिए, चिंता की कोई बात नहीं। उन्होंने पी ली थी, ज्यादा हो गई। वे सुबह तक बिल्कुल ठीक हो जाएँगी।

- दर्द... राहत... फौरन... मीनाक्षी फिर बेहोशी में बड़बड़ाई।

बहुत देर के बाद मीनाक्षी ने नींद में बिस्तर से एक हाथ बाहर निकाला, जैसे कुछ टटोल रही हो। शायद उस घड़ी नशा टूटा था, शायद वह और पीना चाहती थी। अनायास उसका हाथ गाल पर वहाँ चला गया, जहाँ दुख रहा था। दर्द बढ़ता जा रहा था। उसके पति ने उसे सीढ़ियों पर मारा था, जीवन में पहली बार। उसका चेहरा रेलिंग से इतनी जोर से टकराया था कि उसका एक दाँत हिल गया था। नींद और बेहोशी में डूबते उतराते उसने महसूस किया मुँह में रिसते हुए खून का खट्टा, खारा स्वाद। उसे उस घड़ी फिर मीना कुमारी का एक धुँधला सा ख्याल आया, आखिरी फिल्म 'पाकीजा' में काँच की किरचों पर एक घेरे में गोल गोल घूमती, उन्मत्त नाचती हुई... बिखरे हुए बाल और सफेद कपड़े पर उसके पैरों के खून सने निशान। इस कहानी के लेखक ने शुरुआत में कहा था कि वह खून की हर किस्म से और उसके जिक्र से भी बेतरह ऊब चुका है उसकी जिद थी कि इस कहानी में एक भी बूँद खून नहीं आएगा, लेकिन नहीं हुआ। उसके आने के हजार रास्ते हैं, वह एक चोर रास्ते से इस कहानी में भी चला आया। पता नहीं वह क्या चाहता है, उसका क्या इरादा है। शायद उसकी अपनी स्मृतियाँ और कुछ अपने सपने हैं जिन्हें सुनाने के लिए वह हर वक्त सबका सीना खटखटाता है, बार बार सामने आता है।

मीनाक्षी बहुत रात बीते उठी थी। किसी ने बाहर के दरवाजे पर दस्तक दी थी... खट खट खट। वह उठकर अँधेरे में ही रास्ता टटोलती हुई बाहर गई थी, दरवाजा खोला था। बिजली चमकी तो उसकी रोशनी में उसने उसे पहचान लिया, और उसके मुँह से निकला... अरे तू...। वह नैपाल था, वही दुबला पतला परदेसी छोकरा, जो पड़ोस के भूखे नंगे मुल्क से...। - मैडम, मैं आ गया हूँ। उसने कहा। - अब आपको डरने की जरूरत नहीं... मैं हूँ न। मुझ पर यकीन कर मेरे साथ चलिए, मुझे सब रास्ते पता हैं। उसने कहा। - हाँ, मुझे यकीन है, मीनाक्षी ने मन ही मन कहा, इसलिए कि यकीन के लिए और कुछ बाकी नहीं। उसने भीतर जाकर अँधेरे में टटोलते हुए चप्पलें पहनीं और कहा - तैयार हूँ तेरे साथ चलने के लिए, दुनिया के दूसरे छोर तक। जब वे सीढ़ियाँ उतर कर बाहर सड़क पर आए तो नैपाल ने शर्माते हुए कहा - मैडम यह लीजिए, मैं देना भूल गया, और हाथ में पकड़े एक पोलीथीन के बैग से उसे एक खीरा निकाल कर दिया, ताजे खीरे की ठंडी फाँक, जिस पर थोड़ा सा नमक डला था और नीबू की कुछ बूँदें। एक धमाके जैसी आवाज से मीनाक्षी की आँख खुल गई। आसमान में खूनआलूदा जख्मों की तरह बिजली चमक रही थी, जिसकी आग जैसी तीखी रोशनी गरज के साथ बार बार कमरे में भर जाती थी। यह याद करते हुए कि दफ्तर के लिए सुबह जल्दी उठना है, मीनाक्षी ने करवट ली और पास में सोई बड़ी बेटी के बदन की गरमी सोखते हुए मुँह में जहाँ दुख रहा था, वहाँ से रिसता हुआ खून चूसती दुबारा सो गई।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में योगेंद्र आहूजा की रचनाएँ