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कहानी

तुलसी का बिरवा
सैयद वलीउल्लाह


वह एक दो मंजिला मकान था-सीमेण्ट के पुल के करीब सौ गज दूर। इन लोगों ने उस मकान पर कब्जा कर लिया। देश विभाजन के हंगामे में इस शहर में आने के बाद सुबह से शाम तक वे एक कामचलाऊ डेरे की तलाश में घूम रहे थे।
एक दिन उन लोगों ने यह मकान देखा। पहले वे हैरान रह गये। बाद में सारे दल के साथ आकर, ताला-वाला तोडक़र, हो-हल्ले के साथ उस घर में प्रवेश कर गये।

शाम तक सारे शहर को इस मकान का पता चल गया। और लोग भी आने लगे, पर वे लोग अकडक़र डट गये। दिमाग ठंडा रखकर बोले-''देखिए साहब, इस छोटे से अँधेरे कमरे में भी चार-चार बिस्तर लगे हैं...ज़रा-सी भी जगह खाली नहीं है।''

फिर वे आने वालों के प्रति हमदर्दी जताने लगे-''हम आप लोगों की तकलीफ महसूस कर सकते हैं! आप लोग ज़रा पहले आते तो यह कोने वाला कमरा मिल सकता था...अभी दो घंटे पहले ही तो एकाउंट्स दफ्तर के एक मोटे आदमी ने उस पर कब्जा किया है...''

वे लोग अपनी पुरानी जगहों के बारे में सोचते और खुश होते कि अब उन्हें वैसे सीलनभरी और रोगीली जगह में नहीं रहना पड़ रहा, कि अब उन्हें तपेदिक का डर नहीं है। दिन मजे से गुजर रहे थे।

मोदाब्बेर ज़रा हुल्लड़बाज आदमी था। एक दिन वह नीम की दातून करता हुआ आँगन में टहल रहा था। अचानक उसकी नज़र रसोई घर के बायें कोने पर चली गयी। वहाँ ईंटों का चौकोर, छोटा-सा चौरा बना था। उसमें तुलसी का एक बिरवा लगा था। तुलसी की पत्तियाँ कुम्हला गयी थी। और उनका हरा रंग कत्थई-सा हो गया था। उसके नीचे घास उग आयी थी।

मोदाब्बेर मुँह से दातून निकालकर जोर से चिल्लाया। उसी चिल्लाहट सुनकर सभी लोग आँगन में इकट्ठे हो गये। वह जोर-जोर से बोल रहा था-तुलसी का पौधा हिन्दूपन की निशानी है। हमारे रहते हिन्दुओं की कोई निशानी नहीं रहेगी। इसे उखाड़ फेंको...''

सब लोग स्तब्ध रह गये। मकान का सूनापन शक्ल बदलने लगा। तुलसी का बिरवा खामोशी में भी बहुत कुछ कह गया।

हिन्दू रीति-रिवाज से यह लोग भली-भाँति वाकिफ नहीं। फिर भी सुन रखा है कि हिन्दू घरों में हर शाम को घर की मालकिन तुलसी के नीचे साँझ का दीया जलाती है और गले में आँचल लपेटकर प्रणाम करती है।

उनके सामने एक हिन्दू औरत की शक्ल उभरने लगी जो गले में आँचल लपेटे सँझबाती कर रही है। मतीन कभी रेलवे में काम करता था। वह सोच रहा है...इस घर की मालिकन अब कहाँ होगी? शायद कलकत्ता, आसनसोल या हावड़ा में! कहीं भी हो लेकिन हर साँझ को इस तुलसीचौरा की याद कर उसकी आँखें नम हो जाती होंगी!

मतीन के खयालों में नम आँखें लिए एक औरत उतर आयी। वह बोल पड़ा-''रहने दो उसे। हम लोग कोई पूजा तो कर नहीं रहे...मकान में तुलसी का एक पौधा होना अच्छा ही है...नजले-जुकाम में इसकी पत्तियों का रस फायदेमन्द होता है...कल से यूनुस को ही नजला हो रहा है...''
मोदाब्बेर ने इधर-उधर देखा। सभी की मानो यही राय हो। उनमें इनायत कुछ मौलवी किस्म का है-पाँचों वक्त की नमाज पढ़ता है, कुरान भी पढ़ता है। इस समय वह भी खामोश खड़ा रहा। शायद उसके जेहन में भी किसी की नम आँखें उतर गयी हों! सबको खामोश देखा, मोदाब्बेर ने भी हथियार डाल दिये।

एक दिन मोदाब्बेर घबराया हुआ आया और बोला-''पुलिस आयी है।''

''क्यों?'' एक प्रश्न सबके चेहरों पर चिपक गया।

मतीन बाहर निकल आया। पुलिस के सब-इंस्पेक्टर ने उसे आर्डर दिखाते हुए कहा-''सरकार ने यह मकान रिक्वीजीशन किया है। आप लोग चौबीस घंटे के अन्दर-अन्दर इसे खाली कर दीजिए।''

और एक दिन वे अपने सारे दल के साथ चले गये। और वह तुलसा का बिरवा एक बार फिर खामोश हो गया।


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