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कविता

स्वराज-स्वागत
श्रीधर पाठक


(भारत की ओर से)

आऔ आऔ तात, अहो मम प्रान-पियारे
सुमति मात के लाल, प्रकृति के राज-दुलारे
इते दिननतें हती, तुम्हारी इतै अवाई
आवत आवत अहो इति कित देर लगाई
आऔ हे प्रिय, आज तुम्हें हिय हेरी लगाऊँ
प्रेम-दृगन सों पोंछि पलक पाँवड़े बिछाऊँ
हिय-सिंहासन सज्यौ यहाँ प्रिय आय विराजौ
रंग-महल पग धारि सुमंगल-सोभा साजौ
तहाँ तुम्हें नित पाय प्रेम-आरती उतारूँ
सहित सबै परिवार प्रान धन तन मन वारूँ
माथे दैउँ लगाय बड़ौ सौ स्याम दिठौना
ओखी दीठि न परे, दोख कछु करै न टौना
राखौ यहाँ निवास निरंतर ही अब प्यारे
यातें हमहूँ तात अंत लों रहैं सुखारे।


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