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शोध

प्रेम और द्वंद्व की कहानी : यही सच है
अनामिका


सुप्रसिद्ध कथाकार मन्नू भंडारी ने जब भी लिखा हिंदी कथा साहित्य में एक नया ही मार्ग निर्धारित किया। इनकी कहानियाँ आम और सामान्य लोगों के अभावों और पीड़ा की कहानियाँ हैं - चाहे तीसरे आदमी की उपस्थिति से पति-पत्नी के विचलित होते संबंध हो या आंतरिक घुटन से तप्त 'अकेली' की माँ हो या दो पीढ़ियों के बीच बढ़ते अंतर का प्रतिनिधित्व करती कहानी 'सजा' या फिर नारी के दो प्रेम संबंधों के बीच ऊहापोह वाली स्थिति तथा नारी मनोविज्ञान का सूक्ष्म चित्रण करने वाली कहानी 'यही सच है'।

प्रेम एक अनुभूति एवं अनुभव के आधार पर ही सच है, बाकी सब झूठ है। प्रेम के इसी स्वरूप को केंद्र में रखकर 'यही सच है' कहानी की रचना हुई है। इस कहानी की नायिका 'दीपा' नामक भारतीय युवती है जो अतीत और वर्तमान के प्रेम संबंध के द्वंद्व में जीवन यापन करती है। दीपा अपने वर्तमान प्रेमी संजय के साथ कानपुर में रहती है। निशीथ उसके अतीत जीवन का प्रेमी रहा है जो उससे संबंध तोड़कर कलकत्ता चला जाता है। दीपा कभी-कभी अपने अतीत को दोहराते हुए सोचती है - "अट्ठारह वर्ष की आयु में किया हुए प्यार भी कोई प्यार होता है। भला! निरा बचपन होता है महज पागलपन! उसमें आवेश रहता है पर स्थायित्व नहीं, गति रहती है पर गहराई नहीं। जिस वेग से वह आरंभ होता है, जरा सा झटका लगने पर उसी वेग से टूट भी जाता है।1

दीपा निशीथ की बेवफाई से अपमानित महसूस करती है और वर्तमान जीवन में वह संजय के प्रति पूरी तन्मयता से समर्पित है। संजय हमेशा रजनीगंधा के फूलों के साथ ही दीपा से मिलने आता है। ऐसा लगता है कि रजनीगंधा का फूल, फूल न होकर संजय का प्रतीक है, जिसे अपने कमर में देखकर दीपा संजय की उपस्थिति का आभास करती है। रजनीगंधा के फूल दीपा के जीवन में विश्वास और उमंग को जगाते हैं उसे संजय के होने का एहसास दिलाते हैं। दीपा संजय के संपर्क में आकर निशीथ को एक तरह से भूल जाती है और संजय को लेकर नए जीवन का स्वप्न देखती है।

संजय का मन निशीथ को लेकर जब-तब सशंकित हो उठता है, किंतु निशीथ के नाम की चर्चा होने पर दीपा उसकी बेवफाई को यादकर गुस्से में भर जाती है और संजय से कहती है - "देखो संजय, मैं हजार बार तुमसे कह चुकी हूँ कि उसे लेकर मुझसे मजाक मत किया करो! मुझे इस तरह के मजाक जरा भी पसंद नहीं।"2 दीपा जानती है कि निशीथ को लेकर संजय पूर्ण रूप से आश्वस्त नहीं है। वह निशीथ की ओर से संजय को पूर्ण रूप से आश्वस्त कर देना चाहती है कि - निशीथ उसके बचपन का प्रेम है, बचपन में किया गया प्रेम, प्रेम नहीं होता, निरा बचपना होता है, महज पागलपन। ऐसा लगता है कि दीपा ऐसी बातें संजय को विश्वास में लेने के लिए नहीं कहती, बल्कि निशीथ की ओर से स्वयं अपने मन को आश्वस्त करने के लिए सोचती है। उन्हीं दिनों एक इंटरव्यू के सिलसिले में दीपा को कलकत्ता जाना पड़ता है जहाँ उसकी मुलाकात निशीथ से होती है। इंटरव्यू के सिलसिले में उससे मिली सहायता और अपने प्रति उसके लगाव को देखकर दीपा को अतीत का स्मरण हो आता है। जीवन की इस नई परिस्थिति में दीपा कल्पना में बहुत कुछ देखती सोचती रहती है और निशीथ की ओर से कोई पहल करने पर दुखी होती है। जब निशीथ उसके सामने आता है, तो उसे लगता है कि यही प्रेम सच्चा प्रेम है। इसलिए निशीथ को लेकर सोचती है - "तुम आज भी मुझसे प्यार करते हो, तुम मुझे सदा अपने पास रखना चाहते हो, जो कुछ हो गया, उसे भूलकर तुम मुझसे विवाह करना चाहते हो! कह दो, निशीथ, कह दो।"3

निशीथ, दीपा को कलकत्ते में देखकर उत्साह और उमंग से भर जाता है। वह हर क्षण बड़ी तत्परता से दीपा की मदद करता है। वह फिर दीपा के मन पर छाने लगता है। दीपा संजय के बारे में उसे सब कुछ बता देना चाहती है, पर कुछ कह नहीं पाती। दीपा निशीथ से किसी प्रकार का लगाव नहीं रखना चाहती लेकिन न चाहते हुए भी व निशीथ की ओर खिंचती चली जाती है। न चाहते हुए भी दीपा वही करती है जो निशीथ को पसंद है। वह निशीथ के द्वारा प्रशंसा किए जाने पर खुश भी होती है। ऐसे अवसरों पर वह संजय की तुलना निशीथ से करने लगती है - "पिछले ढाई साल से संजय के साथ रह रही हूँ, रोज ही शाम को हम घूमने जाते हैं कितनी ही बार मैंने श्रृंगार किए, अच्छे कपड़े पहने, पर प्रशंसा का एक शब्द भी उसके मुँह से नहीं सुना।"4 जब निशीथ नौ बजे का समय देकर पौने नौ बजे ही आ जाता है तो वह सोचती है - "संजय होता तो ग्यारह के पहले नहीं पहुँचता, समय पर पहुँचना तो वह जानता ही नहीं।" 5 इस प्रकार दीपा संजय और निशीथ के बीच बह जाती है।

कलकत्ता में निशीथ से मिलने पर दीपा को लगता है निशीथ का प्यार ही सच्चा है, वास्तविक है। संजय को वह प्रियतम नहीं पूरक मानती है। वह सोचती है - "प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है; बाद में किया हुआ प्रेम तो अपने को भूलने का, भरमाने का प्रयास मात्र होता है।"6 कानपुर लौटने पर संजय से मिलने पर जब वह अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती है तब उसे लगता है कि - "यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था भ्रम था।"7

इस प्रकार प्रस्तुत कहानी में क्षण की पूर्णता को चित्रित किया गया है, जो अस्तित्ववादी चिंतन का प्रभाव है। इस कहानी में दीपा के माध्यम से लेखिका मन्नू भंडारी ने क्षण की मनःस्थितियों को ईमानदारी के साथ अभिव्यक्त किया है। जिस क्षण वह जो अनुभव करती है वही क्षण अपने लिए सत्य है।

'यही सच है' कहानी का वैचारिक आधार कमजोर है। यहाँ दीपा के मन का द्वंद्व ही प्रमुख है जो अलग-अलग क्षणों में निशीथ और संजय दोनों को ही सच के अतिरिक्त कुछ और मानने से इनकार कर देता है। दीपा के प्रेम में न वह ऊष्मा है और न वह उदात्तता जो जीवन को वृहत्तर आशयों से जोड़ सके। दीपा के प्रेम के साथ आर्थिक सुरक्षा, स्वार्थ, वासना और अस्तित्व बोध के प्रश्न जुड़े हुए हैं। वस्तुतः दीपा का प्रेम दर्शन नैतिकता-अनैतिकता से परे सिर्फ वर्तमान को पकड़ और भोग लेने वाला क्षणवादी दर्शन है, इसलिए जो भी उसके सामने होता है, चाहे वह निशीथ हो या संजय, वही एकमात्र सच लगता है इस प्रकार दीपा अतीत और भविष्य से कटकर पूरी तरह वर्तमान को ही समर्पित है।

यह कहानी परंपरागत प्रेम संबंधों से अलग हटकर लिखी गई है। जहाँ पहले की प्रेम कहानियों में एक आदर्श व नैतिक मूल्य दिखाई पड़ते हैं, वहीं मन्नू भंडारी की इस कहानी में सर्वथा उनका अभाव है। दीपा के प्रेम का दर्शन बहुत कुछ उपभोक्तावादी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। प्रेम में भोग का तर्क ही नहीं होता, उसमें त्याग का एक स्थायी आदर्श भी होता है। प्रेम के क्षणों में केवल तन ही सक्रिय नहीं होता, बल्कि हृदय और मन भी सक्रिय होता है। यही कारण है कि प्रेम विषयक कहानियों में त्याग और बलिदान का एक आदर्श मिलता है। गुलेरी जी की कहानी "उसने कहा था" में लहना सिंह की त्याग और बलिदान की भावना को महत्व दिया गया है। इसी प्रकार प्रसाद की कहानी "पुरस्कार" में मधुलिका का वैयक्तिक प्रेम राष्ट्र प्रेम की ओर उन्मुख होता है। किंतु मन्नू भंडारी की इस कहानी में प्रेम के किसी आदर्श या मूल्य को स्थापित नहीं किया गया है। इस कहानी के बारे में राजेंद्र यादव जी लिखते हैं - "जब मैंने मन्नू की कहानी 'यही सच है' की एक और ढंग से व्याख्या करते हुए बताया कि यह प्यार और भावनात्मक अंतर्द्वंद्व की या दो प्रेमियों को स्वीकारती लड़की की कहानी नहीं, सन 50-60 के बीच की उस खंडित मानसिकता की कहानी है जहाँ भारतीय मन अपने को दो मनःस्थितियों में एक साथ बँटा पाता था, एक ओर उसका अतीत था (पहला प्रेमी) जो आज भी उसके लिए सच या और दूसरी ओर था वर्तमान - दोनों उसके लिए समान सच थे और उसे एक को चुनना था।"

'यही सच है' डायरी शैली में लिखी गई उत्कृष्ट कोटि की कहानी है जो कथ्य और अभिव्यक्ति दोनों ही दृष्टियों से पाठकीय चेतना पर अमिट प्रभाव छोड़ती है। प्रेम के पारस्परिक त्रिकोणात्मक स्थिति को आधुनिक नारी और सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में बिल्कुल नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि यहाँ संजय, निशीथ और दीपा का प्रेम त्रिकोण है, किंतु इन दोनों पुरुषों के द्वंद्व के बीच अपने को, अपने प्रेम के अस्तित्व को तलाशती एक बेबस नारी को देखा जा सकता है। दीपा बेबस है सिर्फ अपने मन से, अपनी सामाजिक स्थितियों के कारण नहीं। इस प्रकार इस कहानी में संजय और निशीथ दोनों के बीच प्रेम का सच नारी मन की विवशता के साथ उजागर हुआ है।

संदर्भ सूची :

1. प्रतिनिधि कहानियाँ, मन्नू भंडारी, यही सच है, पृ.-13

2. वही, पृ.-12

3. वही, पृ.-24

4. वही, पृ.-20

5. वही, पृ.-18

6. वही, पृ.-27

7. वही, पृ.-30


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