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कविता

संदेसौ दैवकी सौं कहियौ
सूरदास


संदेसौ दैवकी सौं कहियौ।
हौं तौ धाय तिहारे सुत की, दया करति नित रहियौ।
जदपि टेव तुम जानतिं उनकी, तऊ मोहिं कहि आवे।
प्रात होत मेरे लाल लड़ैतैं, माखन-रोटी भावै।
तेल उबटनौ अरु तातो जल, ताहि देख भजि जाते।
जोइ-जोइ माँगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते।
सूर पथिक सुनि मोहिं रैनि दिन, बढ़्यौ रहत उर सोच।
मेरो अलक लड़ैतो मोहन, ह्वै है करत सँकोच।।


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