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कविता

अँखियाँ हरि-दरसन की भूखीं
सूरदास


अँखियाँ हरि-दरसन की भूखीं।
कैसैं रहत रूप-रस राँची, ये बतियाँ सुनि रूखीं।
अवधि गनत इकटक मग जोवत, तब इतनौं नहिं झूखीं।
अब यह जोग संदेसौ सुनि-सुनि, अति अकुलानी दूखीं।
बारक वह मुख आनि दिखावहु, दुहि पय पिवत पतूखी।
सूर, सु कत हठि नाव चलावत, ये सरिता हैं सूखी।।


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