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कविता

मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै
सूरदास


मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी, फिरि जहाज पर आवै।
कमल-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव कौ ध्यावै।
परम गंग को छाँड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भावै।
'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै।।


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हिंदी समय में सूरदास की रचनाएँ