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कविता

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायौ
सूरदास


मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हों, तू जसुमति कब जायो।
कहा करौं इहि रिस के मारैं, खेलन हौं नहिं जात।
पुनि पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात।
गोरे नंद जसोदा गोरी, तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै दै ग्वाल नचावत, हँसत सबै मुसुकात।
तू मोहीं कौ मारन सीखी, दाउहिं कबहुँ न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि सुनि रीझै।
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं, हौं माता तू पूत।।


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