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कविता

देखे सात कमल इक ठौर
सूरदास


देखे सात कमल इक ठौर।
तिनकौ अति आदर दैबे कौ, धाइ मिले द्वै और।
मिलत मिले फिरि चलत न बिछुरत, अवलोकत यह चाल।
न्यारे भए बिराजत है सब, अपने सहज सनाल।
हरि तिनि स्याम निसा निसि-नायक, प्रकट होत हँसि बोले।
चिबुक उठाइ कह्यौ अब देखौ, अजहूँ रहत अबोले।
इतनै जतन किए नंदनंदन, तब वह निठुर मनाई।
भरि कै अंक सूर के स्वामी, पर्यंक पर ह्वाँ आई।।


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