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कविता

चरन कमल बंदौ हरि राई
सूरदास


चरन कमल बंदौ हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौं सब कछु दरसाई।
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तेहिं पाई।।


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