डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कविता

मोहिं कहतिं जुबती सब चोर
सूरदास


मोहिं कहतिं जुबती सब चोर।
खेलत कहूँ रहौं मैं बाहिर, चितै रहतिं सब मेरी ओर।
बोलि लेतिं भीतर घर अपनैं, मुख चूमतिं, भरि लेतिं अँकोर।
माखन हेरि देतिं अपनैं कर, कछु कहि बिधि सौं करति निहोर।
जहाँ मोहि देखतिं, तहँ टेरतिं, मैं नहिं जात दुहाई तोर।
सूर स्याम हँसि कंठ लगायौ, वै तरुनी कहँ बालक मोर।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में सूरदास की रचनाएँ