डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कविता

ऊधौ बिनति सुनौ इक मेरी
सूरदास


ऊधौ विनति सुनौ इक मेरी।
जब कैं बिछुरि गए नँदनंदन, काम के दल रहे घेरी।
देखौ हदै बिचारि तुमहिं अब, प्रीति रीति सब केरी।
जहँ जाकी निधि तहँ सब सौंपै, ज्यौं मृग नाद अहेरी।
वै दस मास रतन रस बस तैं, ससि बिनु रैनि अँधेरी।
सूरदास स्वामी कब आवहिं, बास करन ब्रज फेरी।।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में सूरदास की रचनाएँ