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कविता

अधर-रस मुरली लूटन लागी
सूरदास


अधर-रस मुरली लूटन लागी।
जा रस कौं षट रितु तप कीन्हौ, सो रस पियति सभागी।
कहाँ रही, कहँ तैं इहँ आई, कौनैं याहि बुलाई?
चक्रित भई कहतिं ब्रजवासिनि, यह तौ भली न आई।
सावधान क्यौं होति नहीं तुम, उपजी बुरी बुलाइ।
सूरदास-प्रभु हम पर ताकौं, कीन्हौ सौति बजाइ।।


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