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संस्मरण

जो नहीं हो सके पूर्णकाम
मधु कांकरिया


रोमन इतिहासकार टैसितस (Tasitus) ने जलते हुए रोम और नीरो के बारे में लिखा है। उसने लिखा है कि नीरो ने एक शानदार पार्टी दी ...ऐसी पार्टी जो अभूतपूर्व थी। उसके लिए सम्राट नीरो ने अपना शानदार गार्डेन दर्शकों के लिए दे दिया। हर कोई जो कोई भी हो, वह पार्टी में उपस्थित था...। सीनेटर, नोबिलिटी, सकारी अफसर, अखबार में गॉसिप कॉलम लिखने वाले, पेज थ्री पीपुल। वहाँ लेकिन एक समस्या थी। समस्या थी कि इतने विशाल बगीचे को प्रज्ज्वलित कैसे रखा जाय? इतनी विशाल पार्टी के लिए उजाला आवश्यक था। नीरो ने समस्या का समाधान निकाला। टैसितस के खूबसूरत गद्य में लिखा है कि नीरो ने कई कैदियों और अपराधियों को बाहर निकाल उन्हें ही जलवा दिया जिससे उनके जलते शरीरों से रोशनी मिल सके। इसलिए मुद्दा नीरो नहीं है, मुद्दा है नीरो के अतिथि। कौन थे वे? कैसी थी उनकी मानसिकता कि उन्होंने इसे होने दिया कि आपकी पार्टी को रोशन करने के लिए किसी को जलना पड़े। नीरो की पार्टी में कवि थे, गायक थे, संगीतकार थे, कलाकार थे, इतिहासकार थे, पर किसी ने भी विरोध में हाथ नहीं उठाया कि यह गलत है इसे रोक दिया जाना चाहिए... पी. साइनाथ ने लिखा है कि वर्षों तक मैं समझ नहीं पाया कि वे लोग कौन थे जो नीरो के अतिथि थे... पर पिछले कई सालों से जब से मैं किसानों की आत्महत्या पर काम कर रहा हूँ, मुझे जवाब मिल गया है कि नीरो के अतिथि कैसे लोग थे।

वह तीन लड़कों का ग्रुप था जो देवगिरि एक्सप्रेस से मराठवाड़ा के जालना जिले के कुछ गाँवों में आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवार के लिए कुछ करने का जज्बा लेकर जा रहा था। वे तीनों ही कोर्पोरेट कल्चर में पले बढ़े युवक थे जिनमें एक मेरा पुत्र भी था। दबी जुबान से मैंने भी संग चलने की इच्छा जाहिर की। बेटे ने गौर से मुझे देखा और कहा - अम्मा हमें बहुत पैदल चलना होगा, तेज धूप में तुम थक जाओगी... खाने पीने का भी कोई ठिकाना नहीं है। नहीं, मैं नहीं थकूँगी... कुछ भी खा लूँगी और यदि थक भी गई तो कही बैठ जाऊँगी तुम लोग आगे बढ़ जाना, तुम लोगों को डिस्टर्ब नहीं करूँगी। हेलो अम्मा, चिल! वो कोई पिकनिक स्पॉट नहीं है कि घूम फिर कर हम वहीं लौट आएँ... हम ट्रेन से पारतुल उतरेंगे और चार पाँच गाँव होते हुए औरंगाबाद जाएँगे और वहाँ से वापस मुंबई के लिए ट्रेन में बैठेंगे।

मेरे कानों में नाना पाटेकर के स्वर गूँज रहे थे - 'अगर मुंबई में सड़क पर अचानक कोई आपसे मदद माँगे तो उसे भिखारी न समझें, वह किसान हो सकता है...।' मुंबई में तो मुझे कोई किसान मिला नहीं जिससे मिलकर सच्चाई तक पहुँच पाती। 1997 से अब तक दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके थे लेकिन अभी तक मुख्यधारा के मीडिया के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं था। विश्व के सबसे तेज और आगे बढ़ते हमारे मीडिया के पास फैशन, ग्लेमर, सोसाइटी... सबके लिए अलग अलग संवाददाता थे, पर एक भी फुल टाइम संवाददाता या चैनल नहीं था, गरीबी और किसानों की आत्महत्या पर लिखने के लिए। यह मौका मैं छोड़ना नहीं चाहती थी। हर देखे सुने को आँखों की कलम से शब्दों में पिरोना चाहती थी।

मेरा आग्रह बेटे को दुराग्रह लग रहा था। मुझे लग रहा था कि अपनी हाई फाई सर्किल के बीच आंटी टाइप माँ को साथ ले जाने में शायद उसे असुविधा हो रही हो।

असुविधा उसे थी पर अपनी हाई फाई सर्किल के चलते नहीं वरन अपनी उपयोगितावादी सोच के चलते। उसका कहना था कि मैं वहाँ जाकर क्या उखाड़ लूँगी। जो भी प्रोजेक्ट लेना है उन्हें ही लेना है। उसने कहा भी - जाकर अधिक से अधिक उन पर लिखोगी और लिखोगी भी क्या दर्द ही तो लिखोगी। उन्हें अपने पर आलेख नहीं कुछ ठोस कार्यवाही, कुछ मदद चाहिए। वह भी तुरंत!

मैंने जवाब दिया - हमारा काम दुबके बैठे सत्य को बाहर लाना है, तुम लोगों ने भी तो सच्चाई पहले जानी फिर जाने का और उनके लिए कुछ करने का मन बनाया ना! मुझे एकाएक जाने माने पत्रकार पी. साइनाथ की बात याद आई जो मराठवाड़ा में घूम घूमकर आत्महत्या कर चुके किसानों के घर घर जा जा कर उनकी सच्चाई और उसके लिए जिम्मेदार सरकारी नीतियों पर सवाल उठा रहे थे। मैंने 'हिंदू' अखबार में छपे साईनाथ के दो दिन पहले के उनके प्रखर आलेख और किसानों की आत्महत्या पर लिखे संजीव के उपन्यास 'फाँस' को उसे दिखाया और कहा ...यह भी जरूरी है!

बेटे के सोच की दिशा बदली। वह साथ ले चलने को राजी हुआ।

पारतुल स्टेशन पर ही हमें लेने आये थे 'आधारबड' संस्था (जो आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवारों के लिए काम कर रही थी) के बालासाहब बाडेकर जो आधारबड संस्था के संथापक सदस्यों में से एक थे और जो स्वयं भी किसान थे। उनके घर चाय नाश्ता कर हम निकल गए बाबुलतारा गाँव की ओर।

गाँव की सुबह!

उजड़ा उखड़ा उनींदा सा गाँव। छोटी छोटी दुकानें। गंदी गंदी सड़कें। जगह जगह गड्ढे, नालियाँ, पुराने फटे टायर और कचरे के ढेर। ढेर में मुँह मारती गौ माता, भैंस। साइकिल पर चलते लोग। मुँह में उँगली डाले मंजन करती औरतें। आँगन में झाड़ू लगाती औरतें। मूँज की खाट पर बैठ आसमान की ओर दार्शनिक अंदाज में ताकता कोई बूढ़ा। छोटा सा सैलून। सैलून के बाहर उकताया बैठा मोची।

उत्तरी भारत के किसी भी गाँव जैसा गाँव! रुनझुन करती बैलों की जोड़ी। मीलों तक फैले सूखे हुए कपास के खेत ...बीच बीच में कहीं खेतों में बिखरा प्याज तो कहीं ज्वार के खेत।

थोड़ा और आगे बढ़े तो गन्ने के खेत। फिर मकई के खेत! सामने दुधना नदी। मैं इलाके के भूगोल में रमी थी। बालासाहेब अपने खेत दिखाने में। साथ साथ ज्ञान की घूँटी भी हम शहरियों को पिलाते जा रहे थे - बहुत मेहनत का काम है। पहले धरती पर हल चलाते हैं। फिर धड़कते दिल से बारिश का इंतजार। फिर हल चलाकर धरती को नम करते हैं जिससे धरती बीज पकड़ सके। फिर बीज डालते हैं। फिर बारिश का इंतजार। बीज डालने के सात दिन के भीतर यदि बारिश नहीं हुई तो फिर बीज का दुबारा खर्चा। कई बार चार चार बार तक बीज डालना पड जाता है। पंद्रह दिन बाद बीज अंकुरित हो जाते हैं। अनावश्यक घास को हटाने के लिए फिर हल... फिर कीटनाशक। काम ही काम। फिर खाद। फिर चार महीने इंतजार। फिर महिलाएँ खुरपी से घास काटती हैं। फिर फसल पकने तक स्प्रे मारती है कि कहीं कीड़े न लग जाएँ। जून महीने में बीज डालते हैं, सितंबर महीने में फसल तैयार हो जाती है...। वे बोलते जा रहे थे और मेरी नजर गड़ी थी दो बैलों पर जो खरामा खरामा हमारे आगे आगे शाही अंदाज में चल रहे थे। ये बैल किसके हैं? यूँ अकेले? हँसते हुए जवाब देते हैं बालासाहब 'बैलों को रास्ता पता होता है, देखिएगा ये ठीक अपने मालिक के पास पहुँच जाएँगे।'

बैल मालिक के यहाँ पहुँचे या नहीं, नहीं पता पर शीघ्र ही हम पहुँच गए दिलीप उद्रराव काले के घर जिसने साल भर पूर्व ही आत्महत्या की थी। नौ बाई नौ की छोटी सी झोपड़ी ...हमारे पहुँचते ही घर में दरी बिछा दी गई। बिना खिड़की की छोटी सी झोपड़ी में ढेर सारा अँधेरा। मुझे चेहरा भी नहीं दिख रहा था। बेटे ने मोबाइल की टॉर्च को जला दिया। हमारे आने की सुनकर ही आसपास के कई लोग वहाँ आ गए थे। आखिर बेटे ने मेरी मुसीबत समझी, वह खुद झोपड़ी के बाहर चला गया और बाकी लोगों को भी उसने बाहर आने का अनुरोध किया।

अब मैं थी और मेरे सामने थी दिलीप जी की उजड़ी उखड़ी दुनिया जिसमें दिलीप जी के वृद्ध पिता, उनकी चौबीस वर्षीया पत्नी शोभा और दो बेटियाँ थीं। रोते झींकते ही सही उस पाँच एकड़ जमीन पर सोयाबीन और कपास की खेती के सहारे जिंदगी के पहाड़ पर चढ़ते रहे वे, किसी प्रकार साँसें लेते रहे... कि एक दिन सब खत्म हो गया। अपने समय के यथार्थ से पराजित उस योद्धा ने चरम हताशा में अंतिम विकल्प के रूप में मौत को छू लिया, निशब्द ...खामोश ...ठीक वैसे ही जैसे धरती छूती है आसमान को। हवा फूलों को। जी तोड़ मेहनत के बाबजूद जिंदगी से हार गए वे। मेहनत इस घर में शर्मिंदा थी। दिलीप जी के पिता राजमिस्त्री थे और खुद शोभा दो बच्चियों को सँभालते हुए भी खेत में सिंचाई और कटाई में पति को भरपूर सहायता दे रही थी।

फिर क्या हुआ?

शोभा की नम आँखों में कुछ हलचल सी हुई। एक पूरी दुनिया उसके भीतर हाहाकार मचा रही थी। उसके ओंठ फड़फड़ाए भर कि तभी सरपंच काशीनाथ नारायण जी बतलाने लगे - साढ़े चार लाख का कर्जा हो गया था ...मेधा बैंक प्राइवेट लिमिटेड से लिया था कर्जा। तेरह प्रतिशत ब्याज पर। बैंक के लोन से ट्रेक्टर खरीदा था। कर्ज दिलीप जी के पिता के नाम पर था। उम्मीद थी कि धीरे धीरे किश्त भर देंगे पर दो साल से लगातार घाटा हो रहा था, इसी बात को लेकर बाप बेटे में रोज घमासान होने लगा था।

हरे नायलोन की साड़ी में लिपटी दुबली पतली खुलते रंग की शोभा सिर झुकाए सुन रही थी सारी बातचीत कि तभी उसकी छोटी बेटी उसकी गोद में आकर बैठ गई। उदासी पुता चेहरा। गोबर पुता आँगन। पलस्तर उखड़ी दीवारें... चहुँ ओर रसोई का समान। मसालों से भरी शीशियाँ लकड़ी की खुली आलमारी में सजाई हुई। कहीं स्टील के कुछ बर्तन, एल्युमीनियम के डब्बे, एक छोटा सा कूकर, चाय छकनी और प्लास्टिक की बाल्टी... सभी एक रैक में। बीच में भगवान गणेश लक्ष्मी जी का आलया। कोने में सिलाई मशीन। मशीन की टेबल पर रखी बच्ची की स्लेट। दीवार से सट कर टँगी मूँज की रस्सी पर सूखते कुछ मैले कुछ धुले कपड़े। दरवाजे पर बँधी दो बकरियाँ।

एक ही कमरे में कितनी सारी दुनिया! एक कमरे की कथा में कितनी सारी उपकथाएँ!

बाला साहेब मुझे संकेत दे रहे हैं कि मुझे जो भी पूछना है मैं पूछ डालूँ शोभा से। मैं दुविधा में हूँ ...सौम्य शांत और गमगीन शोभा से क्या पूछूँ? कैसे पूछूँ? कितना कुरेदूँ फिर फिर उन घावों को जिन पर वक्त की पपड़ियाँ शायद जमना शुरू हो गई है। और नहीं पूछूँ तो सत्य तक कैसे पहुँचूँ?

सच लेखक होना भी कितना यातनापूर्ण है!

आखिर हिम्मत जुटा कर पूछ ही डालती हूँ - क्या आपको अंदेशा था कि दिलीप जी ऐसा कोई कदम उठा सकते हैं? नजरें एकाएक बीच दीवार पर माला पहने दिलीप जी की तस्वीर पर अटक जाती है।

भारी पलकें झपकती हैं उनकी।

आँखें ऊपर उठती है।

पूरी ऊपर।

चेहरे पर उगने लगता है बीता भयावह वक्त,

- नहीं, सब कुछ अचानक हुआ ...दीपावली का दिन था...। वह बोल रही थी कि तभी अचानक से बत्ती आ गई। छोटा सा मरियल लट्टू चुपके से जल उठा।

- फिर क्या हुआ? दुखों का थान खुलने लगता है धीरे धीरे,

- मैं अपने मइके में थी। यहाँ से गई थी तब वे थोड़े परेशान जरूर थे, लेकिन शादी के सात साल बाद से मैंने उन्हें हमेशा काम करते, पाई पाई का हिसाब रखते, पसीना पोंछते, झल्लाते और परेशान रहते ही देखा था। हर रात कभी कर्जा तो कभी सूखा की चिंता, सुबह उठते तो फिर वही चिंता 'क्या होगा?' कभी खुलकर न हँसते देखा न जीते इसलिए मुझे कोई शक ही नहीं हुआ। मैं जिस दिन गई थी उसी दिन बैंक की नोटिस आ गई थी। नोटिस क्या मौत का फरमान थी वह। एक गहरी साँस ले रुक रुक कर भींगे गले से बोलती जा रही है शोभा - उस नोटिस ने बहुत ही डरा दिया था उन्हें। लगा रही सही इज्जत भी अब गई, बची खुची जमीन भी गई क्योंकि जमीन बैंक के पास गिरवी रखी थी। उस दिन वे मुझसे बहुत कम बोले थे, खाना भी नहीं खाया था। पर रोज की अपेक्षा शांत थे। मैंने पूछा भी था ...क्या मैं जाऊँ तो सर हिला कर धीरे से बोले भी थे - निगुण जा (चली जा)। बहुत दिनों बाद उन्होंने छोटी मुल्गी (बेटी) को गोद में उठाया, दोनों मुल्गी के लिए पहली बार लेमनचूस लाए, तब भी मुझे शक नहीं हुआ, अब समझ में आता है कि वे जाने के पहले का अंतिम प्यार कर रहे थे। उफ बड़ी भूल हुई मुझसे। मुझे जरा भी शक होता तो हरगिज नहीं जाती लेकिन बेटियाँ जिद कर रही थीं। मैंने भी सोचा कि बेटियाँ खुश हो जाएँगी। यहाँ के माहौल में बाप बेटे के झगड़ों को देख देख वे भी घुट रही थीं। मैं चली गई। दिवाली के ही दो दिन पहले। वैसे भी इन दिनों क्या दिवाली क्या होली। हर वक्त बाप बेटे के बीच झमेला चलता रहता था। दूसरे दिन खेत में ही चूहे मारने की दवा पी ली थी...। बोलते बोलते आँखें छलछला गई थी उसकी।

कुछ मूक बोझिल थरथराते पल...। कँपकँपाते ओंठ...

अपनी आत्मा के अंश अंश से रो रही थी अब वह!

चले गए थे वे पर पत्नी की यादों में रह रह कर झलक रहे थे!

एक मन के भीतर छिपे रहते हैं कितने मन। चौबीस घंटे साथ रहने वाली पत्नी तक को उनके मन की थाह नहीं मिल सकी कि मौत उनके सिरहाने खड़ी है। कुछ ऐसा था जो सामने दिखते हुए सत्य के पार घट रहा था जिसे शोभा देख नहीं पाई और आज तक पोलीथिन सी वे यादें जो न गली, न जली, न मिटी उसे अपने एकांत पलों में झुलसा रही थी। आदत के अनुसार मैं फिर सोचने लगी थी कि बेटे के दोस्त दीपेश ने पूछा,

- सरकार से कुछ मिला?

जवाब बालासाहेब की तरफ से आया - अभी तक तो नहीं मिला। उम्मीद तो है लेकिन मिलना मुश्किल लगता है। क्या कहा जाए इस बेरहम सरकार को जो मरे हुए किसान की भी मिट्टी पलीद करने पर तुली है..., सारा गाँव जानता है, सरपंच जानते हैं कि इस घर में आत्महत्या हुई है लेकिन फिर भी उन्हें प्रमाण चाहिए, क्योंकि जमीन और कर्जा दिलीप जी के पिता के नाम था जबकि आत्महत्या पुत्र ने की।

सरपंच काशीनाथ नारायण जो अभी तक चुप थे पहली बार फनफनाए - सरकार को तो नहीं देने का बहाना चाहिए जी... ऐसे कई केस हैं जहाँ आत्महत्या हुईं लेकिन कुछ नहीं मिला। यहाँ मराठवाड़ा के अनंतपुर जिले में एक महिला किसान थी सुधा मणि। उसने आत्महत्या की, लेकिन उसकी बेटी को आज तक कोई मुआवजा नहीं मिला क्योंकि वह एक औरत थी इसलिए कोई उसे किसान ही नहीं मानता। एक औरत किसान की पत्नी हो सकती है खुद किसान नहीं।

- गुजारा कैसे होता है दिलीप जी के परिवार वालों का?

आधारबड वालों ने उसे एक सिलाई मशीन और दो बकरियाँ दिलवा दी हैं। कपड़ों को सी कर और बकरियों का दूध बेचकर फिलहाल पेट का गड्ढा भर जाता है। जाते जाते मैंने उसकी पाँच वर्षीय बच्ची को चॉकलेट दिखाई इस उम्मीद में कि वह हाथ आगे बढ़ाएगी, पर वह अपनी माँ से ही चिपकी मुझे टुकुर टुकुर ताकती रही। शायद उसकी मासूमियत पर भी चीलें मँडरा रही थीं। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त असंख्य झुर्रियों से भरे एक काँपते चेहरे ने हाथ जोड़े... कौन हैं ये? दिलीप जी के पिता हैं। बालासाहब ने धीमे से जवाब दिया।

हमारा कारवाँ अब दूसरे परिवार की ओर। क्यों मौत को गले लगाता है किसान। कब लगाता है? शायद तभी जब उम्मीद से भी उम्मीद नहीं रह जाती होगी। जब मन-प्राण-आत्मा, ईश्वर-प्रार्थना ...वर्तमान-भविष्य... और सारी अंतःशक्तियाँ साथ छोड़ देती होंगी, तभी काया के चोले से भी रिश्ता तोड़ देता होगा वह।

बालासाहेब से मैं पूछती हूँ - क्या कोई सुसाइड नोट छोड़ा था उसने?

शायद मुझे नहीं पूछना था!

बेबस निगाह से घूरते हैं बालासाहब... फिर एक गहरी साँस ले बोलते हैं - वह क्या पढ़ा लिखा था? फिर दलदल में धँसा किसान क्या एक दिन मरता है? हर दिन वह थोड़ा थोड़ा मरता है। उसकी जमीन उसका कवच कुंडल होती है, जिस दिन वह निकल जाती है हाथ से समझो उलटी गिनती शुरू हो जाती है। पास के गाँव में एक शेतकरी (किसान) था ...नाम था काशी विश्वेश्वर राव। उसकी आत्महत्या ने पूरे जिले को हिलाकर रख दिया। क्या आप सोच सकती हैं कि उस बंदे को 'प्रोग्रेसिव फार्मर ऑफ दी इयर' का अवार्ड मिला था। वह अपने दोस्तों को कहता था मर्द हो मुकाबला करो, रोने धोने और मरने से क्या हालत बदल जाएँगे। शेती (खेती) हमारे खून में है। हमें आत्महत्या नहीं जीवन के लिए सोचना चाहिए। उस पर बैंक का लोन था, कुछ सोसाइटी का भी कर्जा था। बड़ा जीवट वाला बंदा था। उसने भी एक दिन अचानक कर ली आत्महत्या। मर्द था इसलिए रोया नहीं बस मर गया। उसकी मौत के बाद तो यकीन उठ गया जिंदगी से। क्यों की? कैसे टूट गया वह सख्त पर्वत? किसने तोड़ी उसकी हिम्मत?

बाहर के सूखे ने भीतर के पानी को भी सोख लिया होगा ...और कर दिए होंगे जीने के सारे रास्ते बंद ...मैं मन ही मन अनुमान लगाती हूँ कि एक गहरी साँस छोड़ धीमे से बोलते हैं बालासाहेब - सारे सवाल उसी के साथ दफन हो गए। जब उस जैसी सोच का बंदा भी कर सकता है आत्महत्या तो फिर ये लोग तो उसके आगे कहीं नहीं ठहरते हैं। हर दिन दिल धड़कता है कि अब कौन मरा?

बालासाहेब जी अपने ही प्रवाह में बोलते जा रहे हैं और मेरे आगे घूम जाती है एक ओर देश की तस्वीर जहाँ भी अपनी यूरोप यात्रा के दौरान मैंने देखा था ...इसी प्रकार प्रेयसी की तरह मौत को गले लगाते लोग। आप कल्पना नहीं कर सकते कि वहाँ मौत का कारण जीवन के जानलेवा अभाव नहीं थे। वहाँ मौत का कारण था जीवन के अत्यधिक रंगों के कारण बदरंग हुआ जीवन। वहाँ मौत का कारण था जिंदगी का दर्द से रिश्ता ना जुड़ना। जी मैं स्विट्ज़रलैंड की बात कर रही हूँ। दुनिया का पहला देश है स्विट्ज़रलैंड जहाँ आत्महत्याओं की दर सबसे ज्यादा है, जहाँ युथेनेशिया (मर्सी किलिंग) वैधानिक है। कई लोग विदेश से यहाँ आते हैं सिर्फ इसलिए कि युथेनेशिया से मर सके। युथेनेशिया के यहाँ बाकायदा क्लिनिक खुले हुए हैं, जहाँ कोर्ट से ऑर्डर लेकर आप दाखिला ले सकते हैं

स्विट्ज़रलैंड शायद दुनिया का इकलौता देश है जिसके गलियारे में गरीबी, बेकारी, अभाव, भुखमरी, बीमारी ...जैसे दुखों ने झाँका भी न होगा। पिछले 800 सालों के इतिहास में स्विट्ज़रलैंड में एक भी युद्ध नहीं हुआ। स्विस लोग नहीं जानते कि बत्ती गुल होना क्या होता है। पानी की, बिजली की कमी क्या होती है। सूखा क्या होता है, अकाल क्या होता है। महँगाई क्या होती है। भुखमरी क्या होती है। हर वक्त प्रेम और मांसलता में डूबे, भोग के अतिरेक में धँसे, सुख से ऊबे यहाँ के लोगों को मौत भी जिंदगी की तरह लुभाती है क्योंकि हताशा के पलों से लड़ना, जिंदगी की चुनौतियों का सामना करते हुए जीना इन्हें नहीं आता है। इसलिए जिस्म का जादू ढलने पर वह अकेला द्वीप हो जाता है। साँय-साँय करता सूना घर, आत्मा से दूर छिटकी देह और कच्चा बेकाबू मन। संसार के ...ईश्वर के ...सारे दरवाजे बंद। जीवन के प्रति न विशेष सम्मान, न कोई जिम्मेदारी, न कोई उद्देश्य, न कोई स्वप्न और न ही जीवन संघर्ष का माधुर्य... ऐसा कुछ नहीं जो दे 'कोई है' का आश्वासन। ऐसे में आत्महत्या उसे प्रेयसी की तरह लुभाती है। विशेषकर जब एक पार्टनर मर जाता है तो दूसरा भी आत्महत्या कर लेता है।

सामने फैले प्याज के खेत ...मैं कुछ प्याज उठाने को होती हूँ कि बालासाहब रोक देते हैं - ना ना ये खाने के प्याज नहीं हैं इनके बीज निकले हुए हैं।

ऊपर उड़ते कुछ कबूतर। मन में उड़ते कुछ सवाल... सवालों की नोक पर टँगी मैं...। क्या फर्क है स्विट्ज़रलैंड की आत्महत्याओं में और यहाँ की आत्महत्याओं में। फर्क तो है वहाँ रूह के मर जाने पर मौत रास्ता दिखाती है जबकि यहाँ अस्तित्व के ही मिट जाने की आशंका और चरम विवशता के पल या अस्तित्व के ही अर्थहीन हो जाने की चरम हताशा के पल मौत के रास्ते की ओर ले जाते हैं। वहाँ रंगीनियाँ शर्मिंदा हैं यहाँ श्रम शर्मिंदा है। वहाँ वह व्यक्ति का अपना वरण है। यहाँ यह व्यवस्था द्वारा दिया गया है, सोचते सोचते अपने कारवाँ से थोड़ा पीछे छूट जाती हूँ कि हॉर्न की तेज आवाज मेरा ध्यान खींचती है।

क्या सोच रही थीं आप? बालासाहेब पूछते हैं। क्या बोलूँ? यूँ ही टरकाने को पूछ बैठती हूँ।

- क्या यहाँ की जलवायु कपास के अनुकूल है? अधिकांश किसान कपास ही क्यों उगाते हैं?

- मैडम, कपास हाई रिस्क और हाई प्रॉफिट वाली फसल है। इसमें फटाफट पैसा आता है इसलिए इसे ही अधिकांश शेतकरी (किसान) उगाते हैं। लेकिन अब कुछ लोग अरहर की दाल की तरफ बढ़ रहे हैं।

कुछ खामोश पल !

फिर सोचते हुए बोलने लगते हैं वे - देखिए हालत ज्यादा खराब पिछले दस बारह सालों में हुए हैं। मैं तो यहीं जन्मा और बड़ा हुआ हूँ। 1998 तक सप्ताह में एक आध शेतकरी की आत्महत्या की खबर आती थी। 2002 के बाद यह हुआ कि हर दिन एक शेतकरी आत्महत्या कर रहा है। लेकिन अभी तो हाल यह है कि हल जिले से हर दिन तीन तीन और कभी तो चार चार आत्महत्याओं की खबर आ रही है। गहरी निराशा से निकलते हैं उच्छ्वास... अब तो मौत भी सरकार को हवा पानी की तरह लगने लगी है!

- क्या सूखा के चलते?

- सूखा तो जानलेवा है ही। पर असली समस्या है कि कपास की पूरी अर्थव्यवस्था ही दिन पर दिन ढहती जा रही है। कृषि और बाजार का पूरा चरित्र ही इन सालों में पूरी तरह बदल गया है। दिन पर दिन लागत बढती जा रही है। खर्च बढ़ते जा रहे हैं लेकिन उत्पादन नहीं बढ़ रहा और कपास के दाम नहीं बढ़ रहे। मुनाफा कुछ होता ही नहीं। बल्कि पिछले तीन साल से तो हालत यह है कि नुकसान झेल रहे हैं। हम तो शेती (किसानी) भी छोड़ दें पर कोई दूसरे काम भी नहीं मिलते, एक नया रोजगार साला इन सालों में पैदा नहीं हुआ। पहले पब्लिक सेक्टर में फिर भी काम मिल जाता था, अब साला वह भी चरमरा रहा है। क्या करेगी युवा पीढ़ी। कई शेतकरी (किसान) मजदूर बन गए। मजदूरी मिलती भी हैं तो घर से दूर बहुत दूर, इतनी दूर कि घर से अठारह अठारह घंटे बाहर रहना पड़े। करें तो करें क्या? अनपढ़ शेतकरी जाए तो जाए कहाँ? आप ही देखिए -प्रति एकड़ बीज का खर्चा है 6000 रुपये। स्प्रे का खर्च 8 हजार रुपये। 3000 खाद का खर्चा। बैल से जुतवाने का प्रति दिन का खर्च 200 रुपये। पंद्रह दिन जुतवाते हैं तो टोटल खर्च हुआ 3000 रुपये।

- लेकिन बैल से क्यों, आजकल तो ट्रेक्टर चलता है ...नहीं चाहते हुए भी टोकना पड़ा उन्हें।

- जहाँ खेत बहुत छोटे होते हैं वहाँ अभी भी बैल से जुतवाना पड़ता है, कई बार ट्रेक्टर भाड़े पर नहीं मिलते तो भी... अभी तो बैल और ट्रेक्टर दोनों ही चल रहे हैं। उसके बाद खुर्पनी कटवाने के लिए 3000 का खर्च। दो बार खुरपवाते हैं। टोटल प्रति एकड़ कुल लागत आई - 23 हजार रुपये, जबकि इस बार प्रॉफिट हुई प्रति एकड़ 18 या 19 हजार।

जेनेटीकेलि मॉडिफाइड कपास के बीज, महँगी खाद और कीटनाशक को इस्तेमाल करने के लिए भारी ब्याज पर कर्जा लेनेवाला शेतकरी व्यापारियों, महाजनों, कंपनियों और बैंकों के खुले जबड़ों में फँस जाता है जो बुआई के पहले से उनके सर पर खड़े रहते हैं और फसल कटाई के बाद उन पर टूट पड़ते हैं। व्यापारी अपने हिसाब से खरीदते हैं और कर्जदार अपने हिसाब से, ऐसे में इंद्र देव ने साथ न दिया तो जी तोड़ मेहनत और हिम्मत पर गोबर पुत जाता है। फिर मौत के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता ...बोलते बोलते उनके चेहरे पर उदासी के बादल घिर आते हैं।

- पानी समय पर मिल जाए तो शायद इतना नुकसान नहीं हो।

- पानी अच्छा हो तो फसल बढ़ जाती है तो कुछ बच जाता है। पानी अच्छा हो तो प्रति एकड़ फसल 6 क्विंटल तक हो जाती है। तो मुनाफा 29 हजार तक हो जाता है क्योंकि रवि की फसल वर्षा पर निर्भर करती है। यदि पानी का संग्रह अच्छा हो तो खरीफ की फसल भी उगा सकते हैं, साल में दो तीन फसल हो तो काम बने, पर हालत यह है कि वर्षा अच्छी हो तो भी हमें खरीफ की फसल का फायदा नहीं मिलता, सारा पानी बह जाता है क्योंकि उसको संग्रह करने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। आप देखिए कि रालेगन सिद्धि गाँव के किसान साल में ऐसी ही वर्षा में भी तीन तीन फसल उगा रहे हैं क्योंकि उनके पास जल संग्रह के लिए सब कुछ है जबकि हम सिर्फ एक ही फसल ले रहे हैं। पिछले दो तीन सालों से प्रति एकड़ 2 क्विंटल फसल हो रही है। न पानी न बिजली। आठ आठ घंटे तक बिजली नहीं आती है। नहीं पहले लागत इतनी नहीं आती थी। पहले खाद अलग से नहीं खरीदनी पड़ती थी। क्योंकि धरती की उपरी लेयर intact थी। अब पानी के बहाव में ऊपर की लेयर बह जाती है। दुगना नुकसान हो रहा है। पहले बीज भी घर से ही निकाल लेते थे। अब सबकुछ महँगे दामों पर खरीदना पड़ रहा है। शेतकरी को यह विश्वास दिला दिया गया है कि धरती की उर्वरा शक्ति को, उत्पादकता को बनाए रखने के लिए जरूरी हो गया है बढ़िया बीज और खाद। बीज, खाद और कीटनाशक बेचनेवाली कंपनियों की चाँदी है।

- आपको कपास के दाम अच्छे क्यों नहीं मिलते?

- सरकार की नीति है - बाजार आबाद और किसान बर्बाद। हमें तो जो भाव मिले उसी पर पारतुल में मिल वालों को बेच देना पड़ता हैं कपास। नहीं बेचें तो उधारी कैसे चुकाएँ, खाएँ क्या और रखे कहाँ कपास को? मिलवालों की दादागिरी चलती है। आप देखिए सब चीजों के दाम बढ़ रहे हैं - सोना चाँदी,जमीन जायदाद सभी के दाम आसमान पर हैं ...नहीं बढ़ रहे हैं तो हमारे उत्पाद के दाम। इसीलिए मौत की फसल लहलहा रही है क्योंकि अच्छी फसल का भी हमें लाभ नहीं मिलता। तब भी बस गुजारा भर जितना ही बन पाता है। अच्छी फसल का फायदा मिले, कुछ बचे तो सूखे के चलते हुई खराब फसल का नुकसान भी हजम कर लें। हम तो साफ कहते हैं सरकार को कि हमें आपके पैकेज नहीं मूल्य चाहिए।

- क्या कोई उपाय नहीं कि लागत कम आए।

- है क्यों नहीं। रासायनिक खेती बंद कर देनी चाहिए, इसके लिए विकल्प तैयार करने होगे, पर कौन सोचता ही किसानों के लिए?

अब हम गाँव बलखेड़ की ओर!

चारों ओर सूखा नजारा। कत्थई पीली सूखी घास के बीच इक्की दुक्की हरी घास। कहीं कहीं जली हुई घास, जमीन पर पड़े सूखे पत्तों के साथ जले हुए पत्ते। पेड़ की पत्तियों पर, डालियों पर रुई के फाहे लटके हुए। चौंकती हुई हमारी शहरी आँखें ...रुई का पेड़ ऐसा होता है? जगह जगह कचरे के ढेर... पोलीथिन, व्हीम वार के उतरे हुए रेपर ...शायद यहाँ हिंदुस्तान लीवर का व्हीम वार खूब प्रयोग में आता है। कँटीली झाड़ियाँ। रास्ते में एक कुआँ। एक मंदिर। मंदिर पर लहराता भगवा झंडा। सामने से आती एक बैलगाड़ी। बैलगाड़ी में पानी के कनस्तर। टीन की छत के नीचे बँधी गाय। पेड़ के नीचे आराम फरमाती भैंस!

बीच सड़क पर दौड़ती हमारी गाड़ी। दोनों ओर खेत। बीच बीच में लोगों के झोपड़ीनुमा खपरैल की छत वाले घर। एक घर के बाहर पतला सा पर्दा। खुले बजबजाते नाले। बुर्के में कुछ मुस्लिम युवतियाँ। घर के बाहर अकेला बैठा एक बच्चा।

खेत अब खत्म हुए और सामने बाजार। चौपहिया गाड़ीवाले ठेले पर शृंगार की ढेर सारी सामग्री बेचता एक तरुण - पाउडर, लिपस्टिक, क्लिप, नेल पोलिश, सेफ्टी पिन आदि। कचरे के ढेर पर मँडराते सूअर। पास में ही जूस सेंटर। हेयर कटिंग सेलून। पान महल। मोबाइल की दुकान। मंथन कंप्यूटर। ब्यूटी पार्लर। फेयर एंड लवली और टाटा साल्ट के विज्ञापन।

हमें जाना है अरुणगिरी जी के घर। आठ महीने पूर्व ही उन्होंने की थी आत्महत्या। लेकिन तभी खबर मिली कि अभी उनकी पत्नी और उनका पूरा परिवार उन्ही के डेढ़ एकड़ के खेत में इकट्ठा है। आधारवड फाउंडेशन की तरफ से आज उनके खाली खेत पर ट्रेक्टर चलवाया जा रहा है, जमीन को नरम करने के लिए।

घर की बजाय हम उनकी पत्नी और भाई से मिलने उनके खेत पहुँचे, सचमुच ही उनके खेत में ट्रेक्टर चल रहा था। ट्रेक्टर के पीछे छोटा सा कपड़े का पोस्टर जिस पर लाल अक्षरों में लिखा हुआ था 'आधारवड फाउंडेशन' और नीचे नीले अक्षरों में लिखा हुआ था 'MISSION SAVE FARMERS'। उसके नीचे थोड़े और छोटे लाल शब्दों में लिख हुआ था 'आत्महत्याग्रस्त शेतकरी कुतुम्बाना मद्चीता हात, चला करुया दुष्कालावर मात' (आइए आत्महत्या ग्रस्त किसानों के परिवार की मदद करें )

मनुष्य के हौसले और गरिमा हनन की पूरी कहानी मौजूद थी यहाँ।

पत्नी संगीता, बेटा, बेटी और चार भाइयों के रहते हुए भी अरुणगिरी जी की नाउम्मीदी, अवसाद और हताशा इस कदर बढ़ गई थी एक सुबह अपने ही खेत में कीटनाशक पी लिया। 'वो देखिए उस पेड़ के नीचे खाया था उन्होंने जहर' उनके छोटे भाई विजयगिरि पेड़ की ओर इशारा कर दिखाते हैं। मेरी कलम की आँख पीछा कर रही है हमसे लगभग 100 मीटर दूर खड़े उस मनहूस पेड़ का जिसकी छाया तले कीटनाशक पीया था अरुणगिरि जी ने। एक नजर पेड़ पर डाल मैं उनकी पत्नी संगीता के पास जाती हूँ कि तभी विजयगिरि दीपेश को बोलते हैं - 37 हजार का स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद से कर्जा लिया था।

- क्या? मात्र 37 हजार? क्या बोल रहे हैं?

- जी मैडम, उसी कर्जे के लिए नोटिस आ गई थी। यूँ कुछ प्राइवेट कर्जा भी था, जिसपर पाँच टका ब्याज हर महीने चढ़ रहा था, पर बैंक की नोटिस ने उनको तोड़ दिया था। गाँव में बहुत बदनामी होगी ...यही चिंता खाए जा रही होगी।

- पाँच टका मतलब?

- मतलब 100 रुपये पर पाँच रुपया हर महीने सूद। अरे यह तो कुछ नहीं, मैंने देखा है मात्र सौ रुपये पर 25 रुपया तक ब्याज जो भी सौ रुपये सिर्फ चार पाँच महीने के लिये लिया गया था...। बालासाहेब की टूटती आवाज ...

मन मर गया था। पूरी व्यवस्था ही लगी है किसान को गिराने में। अरबों खरबों के कोर्पोरेट्स के उधार माफ करनेवाला बैंक मात्र 37 हजार के लिए एक किसान पर इस कदर चढ़ गया कि उसका अस्तित्व ही उसके लिए बोझ बन गया। इस कदर जिंदगी से डर गया वह कि साँसों की डोर ही तोड़ डाली उसने!

एक नजर अरुण जी की पत्नी संगीता पर... पैंतीस से चालीस के बीच की उम्र। पलस्तर उखड़ी दीवार सा सूखा चेहरा एकदम शांत था। शायद वक्त ने घाव कुछ भर दिए थे या दो दो बच्चों की जिम्मेदारी के बोझ ने आँसू सुखा दिए थे उनके...। सोचते हुए पूछने की हिम्मत की मैंने।

- क्या आपको कभी भी ऐसा अंदेशा हुआ कि अरुण जी ऐसा कदम उठा सकते हैं?

मेरा सवाल सुन मेरी ओर ताका उन्होंने।

बीता हुआ बहुत कुछ अभी भी साँसें ले रहा था उनके भीतर...

उनकी पुतलियाँ हिलीं...

आँखें छलछलाईं...

अतीत की स्मृतियों के भार से ओंठों में हल्का सा कंपन हुआ। कुछ देर वे चुप रहीं शायद भीतर उठते आवेग को थामने के प्रयास में। फिर धीरे धीरे गिरे कुछ शब्द जैसे पेड़ से गिरते हैं पत्ते पतझड़ में - नहीं ...सब कुछ अचानक हुआ। वैसे जब तक रहे रात दिन दौड़ते खटते ही रहे। फिर भी पूरा नहीं पड़ता था तो कर्जा लेना पड़ गया। वह कर्जा ही गले का फंदा बन गया। नोटिस आने से बहुत घबड़ा गए थे। भाइयों को भी कुछ नहीं बताया। अकेले ही जाने क्या क्या सोचते रहे। किसी से कुछ भी नहीं बोले। सुबह सुबह घर से निकल गए, हम समझे खेत पर गए होंगे काम से, जब बहुत देर तक नहीं लौटे, साढ़े ग्यारह बजने को आए, तब उनके छोटे भाई के साथ खेत में जब तक हम पहुँचे वे खा चुके थे...। मुँह से झाग ही झाग... पीड़ा से भरी अधमुँदी आँखें ...बोलते बोलते संगीता की आँखें फिर डबडबाईं। आवाज लडखडाई - तुरंत सब कोई मिलकर सरकारी अस्पताल में ले गए लेकिन शाम तक...।

- सरकार से कुछ मिला?

- हाँ! तहसीलदार से मिलकर बैंक ने अब कर्जा माफ कर दिया है।

चार भाई थे फिर भी ...शायद संबंधहीन संबंधों में भी वो तपिश ...वो जीवन शक्ति नहीं बची थी जो बचा लेता अरुण जी को या जिंदगी का खौफ और निष्फल जिंदगी से उपजी हताशा ही इतनी गहरी थी कि लिख दी उसने मौत की कहानी ...कौन जाने! किसान के लिए कर्ज मतलब उसके माथे पर लिखी 'एक्सपायरी डेट'। कर्ज ले नेवाला किसान क्यों नहीं कर पाता है अपने जीवन की मियाद पूरी... ऐसा सिर्फ किसान के लिए ही क्यों? मैं मन ही मन सोचती हूँ। मेरे बेटे के पास तो जाने कितनी बार कार लोन, होम लोन के लिए बैंक से मनुहार भरे फोन आते हैं ...ई मेल आते हैं जो भी 8% ब्याज दर पर जबकि दिलीप कालेकर को मेधा बैंक लिमिटेड से कर्जा मिला था 13% सूद पर, जो भी बड़ी मुश्किल से, और जितना माँगा उसका एक चौथाई भर मिला ...यानी जो जितना गरीब ब्याज की मार उतनी ही अधिक।

अपूर्व जी हमारे साथ थे। वे स्टेंडरड चार्टेड बैंक में प्रोजेक्ट मेनेजर थे, उनके मुँह से भी निकल ही गया - आप सोच भी नहीं सकते कि देश के बड़े बड़े कोर्पोरेट्स के पास जमीन किस दाम पर मिली हुई है, कितने इनसेंटीव सरकार द्वारा उनको मिले हुए हैं। मुंबई के सबसे पॉश इलाके में हमारे बैंक को तीन एकड़ जमीन एक रुपये से भी कम प्रति वर्ग फीट की दर पर मिली हुई है। मुंबई में एक मिनट के लिए भी कभी बिजली नहीं जाती और यहाँ आठ आठ नौ नौ घंटे तक बत्ती गुल! सही कहते हैं पत्रकार पी. साईनाथ कि भूमंडलीकरण के इस दौर में पिछले पंद्रह सालों में जिस क्षेत्र में जबरदस्त इजाफा हुआ है वह न आईटी सेक्टर है, न सॉफ्टवेर है। वह है असमानता का क्षेत्र! आजाद भारत में इससे पहले इतना इजाफा कभी नहीं हुआ।

मनोज वांगे जो बाबुलतारा गाँव से ही हमारे साथ था, उनकी युवा आँखों से चिनगारियाँ फूटने लगीं - जिंदगी जी पाने के अधिकारों को यदि लगातार छीन लिया गया तो देखिएगा इसके परिणाम बहुत भयंकर होगे...।

लेकिन गाज तो हम पर अब गिरनी थी। आदमी को बुरी तरह दीन हीन, कीड़ा मकोड़ा और अपदार्थ बनाने वाली स्थितियाँ तो अब देखनी थी। रजनी गाँव में एक ऐसे परिवार में ले गए बालासाहब जहाँ तीन परिवार के सदस्यों में से दो आत्महत्या कर चुके थे। मेहनत मौत में रूपांतरित हो चुकी थी। तिनका तिनका चुन कर बनाए उस खाली घोंसले में अकेली थी फुलवा बाई जिनमे अभी भी थोड़ी सी जिंदगी बची हुई थी, इसीलिए जीवित थीं वे। बेटे गोविंदगिरी ने दो वर्ष पहले की आत्महत्या और पति बबनगिरि ने साल भर पहले मौत को गले लगाया।

कहीं पढ़ा था 'सुंदर है विहग, सुमन सुंदर। मानव तुम सबसे सुंदरतम! ये वे 'सुंदरतम मानव' थे जो बेहतर जीवन के लिए उड़ान भर चुके थे पर अधबीच में ही जिन्हें मौत की अँधेरी पगडंडियों की ओर निकल जाना पड़ा। मन इतना बेमन हो गया था कि बात करने की उर्जा भी नहीं बची थी। उसने जो कुछ बताया उसे ही सुनती रही - दो दो बेटियों की शादी में जितनी भी जमीन थी कर्जे के चलते हाथ से निकल गई थी। अब ठेके पर दूसरों के खेत पर मजदूरी करनेवाले उसके अठारह साल के बेटे ने 60 हजार का कर्जा लिया था। महीने के 5 टका ब्याज पर यानी 60% ब्याज दर पर। वह अपना कुछ धंधा करना चाहता था। बाप को हड्डीतोड़ मेहनत के बावजूद हाय हाय करते देख, श्रम और शेती पर से विश्वास उठ गया था उसका, इसलिए वह छोटी मोटी कोई दुकान खोलना चाहता था। बैंक ने कर्जा देने से मना कर दिया था इसलिए किसी निजी साहूकार से लिया था कर्जा ...अब कर्जा था, मजदूरी थी, गिरता स्वास्थ्य था, पहाड़ की तरह भीमकाय ब्याज था और देनदारों के जानलेवा तकाजे थे। श्रम और आत्मविश्वास के सहारे सजाई उसकी नन्हीं दुनिया हर दिन जिल्लत और अपमान की आग में सुलगती रही। फिर एक दिन ...फुलवा मनरेगा के अंतर्गत 180 रुपये रोज के हिसाब से 10 बाई 10 का गहरा गड्ढा खोदने के काम में जुटी हुई थी...। पति दूसरे के खेत में मजदूरी करने गए हुए थे कि पीछे से दोपहर के किन्हीं हताश पलों में अठारह साल के उस लड़के ने स्वप्न देखने की उस उम्र में ही इतनी पीड़ा कमा ली थी कि भीतर की आग बाहरी आग से जा मिली। शरीर धू धू कर जलने लगा। वह आई तब तक बहुत जल गया था वह। उसके साथ ही जल गई थी उसके पति बबन गिरि की भी दुनिया। साँसें चल रही थी पर न जिंदगी बची थी उनमें, न जिदगी का कुछ अर्थ, न धड़कन न स्पंदन ...और जब काया का भार भी बेकाबू हो गया तो करीब साल भर बाद बबन गिरि जी ने भी...।

एक उड़ती नजर उस पर डाली - जिंदगी का विष पीते पीते नीला होता चेहरा। गहरे पीले रंग की प्रिंटेड पोलिएस्टर की साड़ी के आँचल से ढका सर। जगह जगह निकली ईंटों की तरह बाहर निकले थोड़े बड़े पीले दाँत। उम्र पचपन साठ के आस पास। छोटी सी कोठरी के दरवाजे से बँधी बकरी की चहुँ ओर बिखरी मेंड़। घर के एक कोने में छोटी सी चटाई पर सूखते प्याज। थोड़ी ही दूर पर तेल के दो तीन कनस्तर। दरवाजे के ऊपर लिखा हुआ 'जय भवानी'। सामने के झोपड़े की दीवार पर खड़िया से लिखा हुआ 'मेरा भारत महान'।

मैंने फुलवा से अधिक बात नहीं की। शब्द साथ छोड़ रहे थे मेरा। उसके घर की ही तरह उसका बहुत कुछ उघड़ा हुआ पड़ा था मेरे सामने। बेहतर जिंदगी का स्वप्न देखने वाला अठारह साल का उसका लड़का उसके मानसिक क्षितिज पर पल भर के लिए उगा और भोर के तारे सा ओझल हो गया था। संवाद के दौरान एक बार मेरी आँखें मिली थी उसकी आँखों से, वे दुनिया की सबसे उदास आँखें थीं। जमी बर्फ सी उन आँखों की उदासी को लिख नहीं पाऊँगी। मैंने उसके माथे पर लिखी 'एक्सपायरी डेट' भी पढ़ ली थी। कहीं पढ़ा था मैंने कि जिसके माथे पर लिखी हो 'एक्सपायरी डेट' उससे नहीं पूछना चाहिए कि आप कैसी हैं। मैंने नहीं पूछा - क्या हुआ था आपके पतिदेव को? क्यों ले ली उन्होंने अपनी जान और देह से छूटती साँसों की डोर के उन जानलेवा पलों के हजारवें हिस्से में भी क्या उन्हें आपके ख्याल ने परेशान नहीं किया होगा कि क्या गुजरेगी आप पर या हताशा में इतने आगे निकल चुके थे वे कि वहाँ से आप उन्हें दिखी ही नहीं।

मैंने कुछ नहीं पूछा।

उसके डबडबाए चेहरे से एकाएक पुराने समय की धधकती बरबादियाँ और त्रासदियाँ चमकने लगी। पति पुत्र दोनों चले गए उस पार और वह आँगन में ठिठकी खड़ी ढूँढ़ रही थी उन्हें बीते वक्त में, यादों में, निशानियों में...

बेटे की तस्वीर को देखते हुए वह खुद से ही बुदबुदाई - उस सुबह मुलगा ने कुछ नहीं खाया था। मैंने पूछा तो एकबार तो कुछ नहीं बोला, दुबारा पूछा तो बोला - खायला नाहीं होत (मन नहीं है)। मुझे भी जल्दी थी, बिना कुछ दिए काम पर निकल गई। मुलगा गया, नवरा (पति) गया। सूना घर...। इस उम्र में कुदाल नहीं थमती पर पेट का गड्ढा...। बोलते बोलते ओंठ गोल कर मुँह से गर्म हवा छोड़ी उसने। जीवन की भट्टी से दाना पानी उठाने वाले उसके खुरदुरे कटे पिटे हाथ लहराए। मृत परिजनों की याद में रह रहकर उसके मुर्दा दुःख जीवित हो उठते। मौत उसकी चेतना, उसके मन और आत्मा में धँसी हुई थी। मैं उठ गई। वह बैठी रही, वैसी ही... बुदबुदाती ...शून्य में ताकती।

मेरे दिमाग में चिथड़े की तरह उड़ रही थीं कुछ अखबारी खबरें!

कुछ अश्लील हकीकतें!

किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 आत्महत्याएँ हो चुकी हैं, इसी साल जनवरी 2016 से मार्च 2016 तक... यानी महज तीन महीने में 601 किसान प्रदेश में आत्महत्या कर चुके थे और चमचम कुरता जाकेट में विराजमान हिंदू हृदय सम्राट मुख्यमंत्री के लिए ज्वलंत मुद्दे थे - गौ हत्या, मांस बिक्री, लव जेहाद और जैनियों का अचार विचार।

कोई भी यात्रा कभी पूरी नहीं होती। हमारी यात्रा भी पूरी कहाँ हो पाई थी। जाने कितने ऐसे परिवार थे जहाँ वजूद बिखर गए थे और जिंदगी ने अधबीच में ही दम तोड़ दिया था। उनमें से बस सिर्फ तीन परिवारों से ही मिल पाए हम कि सूरज ढलने लगा था। बाला साहेब की भीतरी कड़ुवाहट छलक छलक बाहर फूट रही थी - शेतकरी की जिंदगी में न राग है न रंग, न प्यास है न पनघट, न फाग है न फागुन। है तो सिर्फ तीन चीज - कर्ज कर्ज और कर्ज। देखा नहीं आपने, जिंदगी कपास पैदा करने में बीत जाती है इनकी लेकिन ये किसान सालों तक पत्नी के लिए कॉटन की साड़ी तक नहीं खरीद पाते। सब सस्ती और टिकाऊ पोलिएस्टर की साड़ी पहने मिलेगी आपको

- सरकार क्या कुछ भी सब्सिडी नहीं देती ...अपूर्व था, पूछ रहा था।

- देती है न! दस साल में दिया है न एक रिलीफ पैकेज! आवाज व्यंग्य से ऐंठ गई। ओंठ विद्रूप हुए उनके - अमेरिका में देखिए कपास किसानों को सरकार करोड़ों में देती है सब्सिडी। अपनी छोटी सी डायरी खोलते हैं बाला साहेब जी और दिखाते हैं एक आँकड़ा - देखिए 2005 में वहाँ कॉटन उत्पादन हुआ 3.9 मिलियन डॉलर का और सरकार की सब्सिडी थी 4 मिलियन डॉलर की। हर साल वहाँ की सरकार उत्पादन की कीमत सें भी ज्यादा की सब्सिडी देती है। यहाँ 2 लाख किसान मर गए और देश के प्रधानमंत्री विदेश यात्राओं में और योग के भव्य आयोजन में व्यस्त हैं...!

उड़ती धूल, गर्द और गुबार के बीच बढती हमारी जीप अपने गंतव्य की ओर। सूखे खेत, जिंदगी की कड़ी धूप में कड़े कोस चलते हुए फटी बिवाइयों वाले धूल सने पैरों, सूखे चेहरों और बिखरे प्याज के ढेरों को देखते देखते एकाएक कानों में गूँजती है मनोज वांगे की चेतावनी - जिंदगी जी पाने के अधिकारों को भी यदि लगातार छीन लिया गया तो देखिएगा इसके परिणाम बहुत भयंकर होगे...।


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हिंदी समय में मधु कांकरिया की रचनाएँ