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विमर्श

सांप्रदायिकता से लड़ना एक रचनात्मक संघर्ष है
रोहिणी अग्रवाल


"इस क्षण कि दोनों तटों के बीच काल स्थगित है
भविष्य और भूत पर एक सा ध्यान करो
यह क्षण कर्म या निष्कर्म का नहीं। जानो
कि मृत्यु के समय मनुष्य की चेतना सत् के
जिस बिंदु पर भी केंद्रित हो (और मृत्यु का समय हर क्षण है)
वह मात्र एक कर्म है
जो दूसरों के जीवन में फलीभूत होगा।"
(कुर्रतुल ऐन हैदर, आग का दरिया)

''दंगा तो बाढ़ नहीं कि पानी से उठा कर लाते ही खतरा टल गया... दंगा तो आग का लगना नहीं है कि पानी डाल कर बुझा देने से ही छुटकारा मिल जाएगा। दंगे में आदमी अपनी आदमियत को भी स्थगित रखता है। दंगे में आदमी के मन का जहर बाहर निकल आता है। दंगा कोई प्राकृतिक घटना नहीं,दंगा मनुष्यत्व का विकार है। ''( लज्जा ,पृ. 135)

1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के तुरंत बाद घायलों की मरहम पट्टी करते हुए और अपने देश की राजनीतिक-धार्मिक गतिविधियों पर चौकन्नी दृष्टि रखते हुए तसलीमा नसरीन जिस निष्कर्ष पर पहुँचीं, वह था कि दंगा दो भिन्न संप्रदायों के बीच चिरसंचित द्वेष अथवा प्रतिशोध के तात्कालिक प्रस्फुटन के चलते बराबर की सिर फुटौव्वल है, एक-समान नागरिक की हैसियत से समान मौलिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपनी गरिमा और अस्मिता की लड़ाई। ऐसे दंगे होते रहे हैं, इतिहास का अखंड प्रवाह इसका साक्षी है। साथ ही विश्वस्त भी कि यदि विध्वंस और हिंसा मनुष्य की प्रवृत्ति है तो उससे अभिन्न नहीं है शांति और सामंजस्य की प्रवृत्ति जो हर विनाश-लीला की अतल गहराइयों में डूब कर निर्माण और विकास की ऊर्ध्व चढ़ाइयों को संभव बनाती रही है - हर देश, हर काल में। लेकिन जब दंगे सांप्रदायिक आतंक का रूप ले लें, सुनियोजित ढंग से अल्पसंख्यकों को नेस्तनाबूद करने का जिहाद बन जाएँ और एक राष्ट्र-एक धर्म-एक भाषा का तोता-रटंत कीर्तन दिन-रात किया जाए, तब मानवीय अधिकारों और अस्मिता की रक्षा कौन करेगा? 1984 में गिरोह बना कर सिखों की हत्या-लूटपाट का महाभियान, बाबरी मस्जिद ध्वंस तथा गोधरा कांड के दौरान आतंक का नर्तन - क्या महज प्रतिशोधपरक तात्कालिक प्रतिक्रियाएँ है या धार्मिक कट्टरवाद/सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर पनपती विकृति जिसे काबू न किया गया तो पलटवार कर अपने ही सर्जक को खा जाएँगी? दसवें दशक का हिंदी साहित्य इन सवालों पर बेहद चिंतित है और खौफजदा भी। शायद इसलिए परत दर परत समस्या के भीतर उतर कर वह उन वृत्तियों/वादों/वर्चस्वों की पड़ताल कर लेना चाहता है जिनकी सतही मासूमियत विस्फोटक ज्वलनशील सामग्री अपने भीतर छिपाए है। उल्लेखनीय है कि भारत का उपन्यासकार तसलीमा नसरीन की तरह खतरों को न्यौतते हुए अपनी संवेदना1 और सरोकार 2 को आक्रामकता और रिपोर्ताज, लज्जा और पीड़ा में सराबोर कर देश के संविधान के साथ खिलवाड़ करने वाली प्रतिगामी/अवसरवादी राजनीतिक शक्तियों को बेनकाब कर आनन-फानन में मानवीय गरिमा से च्युत कर दिए गए पीड़ित के मनोविज्ञान को टटोलने की निर्भीक-आत्मघाती कोशिश नहीं करता; बेहद ठंडे दिमाग से ठहर-ठहर कर स्थितियों का जायजा लेते हुए अपने-अपने स्तर पर सांप्रदायिक विद्वेष के कारण और निदान का पाठ बुनता है। इस दृष्टि से विश्लेषण हेतु चार उपन्यास विशेष उल्लेखनीय हैं - 'लज्जा' (तसलीमा नसरीन, 1992), 'वे वहाँ कैद हैं' (प्रियंवद, 1994), 'हमारा शहर उस बरस' (गीतांजलि श्री, 1998) तथा उन्माद' (भगवान सिंह, 1999)।

1.

'' अपवित्र वह नहीं जो भीड़ के देवताओं को मानने से इनकार कर देता है , बल्कि वह है जो देवताओं के संबंध में भीड़ की राय को स्वीकार कर लेता है '' 3

भारतीय संदर्भ में सांप्रदायिक हिंसा को सीधे-सीधे हिंदू राष्ट्रवाद के उभार के साथ जोड़ कर राष्ट्रवाद की अवधारणा को ही खारिज कर दिया जाता है। किंतु समाजवादी चिंतक किशन पटनायक यह मानते हैं कि राष्ट्रवाद एक यूरोपियन अवधारणा है और यूरोप तथा गैर-यूरोपीय जनसमूहों में बेशक इसका विकास अलग-अलग कारणों से हुआ, किंतु दोनों जगह मूल उद्देश्य था, ''अपने धर्म, संस्कृति और आर्थिक सुरक्षा को रखने के लिए राजनीतिक स्तर पर अपनी अस्मिता को जाग्रत और परिभाषित करना।''4 लेकिन इसके बावजूद वे इस सवाल पर विचार करना ज्यादा जरूरी समझते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रवाद की अनिवार्यता क्यों नहीं है - ''क्या एक अ-राष्ट्रीय विचारधारा के तहत संघ परिवार की आक्रामकता का मुकाबला किया जा सकता है?' 4 दूसरे, उन्हें इस बात पर खेद भी है कि प्रारंभ से ही भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन 'अराष्ट्रीय' होने के कारण राष्ट्र और राष्ट्रीयता के बारे में वांछित समझदारी विकसित नहीं कर पाया जिसकी पुष्टि मधु किश्वर के निबंध 'सांप्रदायिक हिंसा से संघर्ष कैसे करें' में इस पीड़ा के साथ हुई है कि एन.जी.ओ. की ओर से चलाई जाने वाली सभी विकास परियोजनाओं को गाँवों और झुग्गी-झोंपड़ियों की ओर मोड़ कर ये कम्युनिस्ट न तीतर रह पाते हैं, न बटेर। गरीब बस्तियों में अंत तक 'बाहरी आदमी' की हैसियत बनी रहने के दंश को वे इस परितोष के साथ धो-पोंछ डालना चाहते हैं कि मध्यवर्ग के भीतर काम करने का अर्थ होगा अपने ही समुदाय में लिप्त रहना जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि मध्यवर्गीय सोच के फासीवादी हो जाने पर गरीबों का आहुति के रूप में इस्तेमाल करना आसान हो जाता है। जाहिर है अपने असली एवं महत्वपूर्ण कार्यक्षेत्र से दूर रह कर वे अपनी तमाम संलग्नता और कार्य-तत्परता को निरर्थक उद्योग में बदल देते हैं।5 गौरतलब है कि समाजशास्त्रियों की भाँति उपन्यासकारों ने इस फाँक को समझने और विश्लेषण करने का हर संजीदा जतन अपनी रचनाओं में किया है। भगवान सिंह तो रामविलास शर्मा का हवाला देकर 'उन्माद' को उपन्यास नहीं, बाकायदा इतिहास मानते हैं जिसमें सांप्रदायिकता की परिभाषा देने से लेकर उसके उभार हेतु बनाई गई 'अनुकूल' परिस्थितियों का जायजा लिया गया है। अपने खास अंदाज में घटना को लंबा खींचने, बात को घुमाने और कुटिल ढंग से भड़काऊ टिप्पणियाँ करने के कारण हालाँकि उपन्यास की आंतरिक बुनावट को वे दुर्बल होने से नहीं बचा सके, लेकिन इतना तय है कि हिंदू एवं मुसलमान दोनों की आशंकाओं और दुश्चिंताओं को उन्होंने सही परिप्रेक्ष्य दिया है। उनके ख्याल में सांप्रदायिकता 'इन्सेफेलाइटस' नामक एक दिमागी बुखार है जिससे रोगी की जान चली जाए तो बेहतर, लेकिन अगर वह बच गया तो इसके वायरस के 'होस्ट' होते हैं 'मस्त-मुस्तंड' पड़े सूअर और कुत्ते। उल्लेखनीय है स्वयं इन पर इस वायरस का कोई असर नहीं होता, लेकिन जब कोई मच्छर इन्हें काट लेता है तो वायरस उसके शरीर में चले जाते हैं और फिर वह 'कैरियर मच्छर' जिसे काट लेता है, उसे दिमागी बुखार हो जाता है। ''तो यह जो सांप्रदायिकता है, यह भी एक तरह का दिमागी बुखार है। ये जो सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले हैं और ये जो धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले मुल्ले और पंडित होते हैं, ये सभी इस दिमागी बुखार के वायरस को फैलाने की धौंस देकर राजनीतिक सौदेबाजी करते हैं। इनके भीतर पले वायरस के वाहक हमारे पढ़े-अधपढ़े छुटभैये मच्छर होते हैं जिनमें तंगदिमाग बुद्धिजीवी और पत्रकार और अध्यापक भी आते हैं। वे लोग जो अफवाहें फैलाते हैं, झूठी या अधकचरी खबरें उड़ाते हैं।''6 सांप्रदायिकता का प्रश्न चूँकि किसी भी जाति अथवा कौम की अपनी पहचान और अस्मिता से गहरा जुड़ा है, इसलिए सबसे पहले लेखक आबिदा के अब्बा से सहमत होते हुए आम पाठक को यह समझा देना जरूरी समझता है कि ''हिंदू हो या मुसलमान या क्रिस्तान या यहूदी या आदिवासी - सभी को अपने ख्याल, अपने आदर्श, अपने समाज की खराबियों की ओर से मुँह मोड़ कर और सिर्फ उसकी खूबियों पर निगाह गड़ा कर और उन्हें दूसरों में न पाकर अपने को दूसरों से ऊँचा साबित करना'' (उन्माद, पृ. 183) मजबूरी बन जाता है। तब 'शाखा' के समर्पित सदस्य 'कट्टर' हिंदू रतन की अपने धार्मिक मान्यताओं पर अडिग रहने की दृढ़ता को समझना कठिन नहीं रहता। 'शाखा' को 'इनसानों की रेवड़बंदी' का सबसे सशक्त माध्यम मानने वाले लेखक को प्रारंभ से ही रतन के शाखा जाने पर आपत्ति है, किंतु अपनी आपत्ति को वे तब तक दर्ज नहीं करते जब तक स्वयं रतन शाखा द्वारा 'समझ को कुंद करने वाली सोच' और आदमी को 'यंत्र में बदलने की नीति' को जान नहीं लेता। इससे पूर्व वे उसके साथ उत्साही कारसेवक की तरह बुद्धिजीवियों के व्याख्यान में निर्विकार ढंग से पैंफलेट बाँटते हैं जिसमें 'हिंदू जागो, देश बचाओ', 'हिंदुओं का अपमान', 'हिंदू क्या करें' और 'अनुरोध' नामक उप-शीर्षकों के अंतर्गत तथ्यों एवं आँकड़ों को देते हुए हिंदुओं की अपने ही देश में 'तीसरे दर्जे का नागरिक' होने की पीड़ा का उल्लेख किया गया है (वही, पृ.146) और यहूदियों द्वारा यरुशलम वापिस लेने के संघर्ष का उद्धरण देते हुए सवाल किया गया है कि ''क्या हिंदू धार्मिक आस्था की रक्षा करना उपद्रव है'' (वही, पृ. 151), वह भी तब जब कश्मीर में मुस्लिम आतंकवाद के शिकार हिंदुओं की समस्या पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है? तब क्या इससे यही ध्वनि नहीं निकलती कि योजनाबद्ध रूप से भारत में एक नया पाकिस्तान बनाया जा रहा है? (वही, पृ. 152) लेखक की मान्यता है कि रतन जैसे मेधावी किंतु अपरिपक्व मस्तिष्क को प्रारंभ से ही धर्मांध शक्तियाँ अपने हाथ का मुहरा बनाने को कटिबद्ध हैं क्योंकि उनकी ताकत बाड़े में बंद जानवरों को अपनी दौलत बना कर रखने और मनमाना उपयोग करने में है। (वही, पृ. 55) यही कारण है कि रतन यह जानने के बावजूद कि ''जो केवल दूसरों की बातें सुन कर, उसका सार जाने बिना रह लेता है, वह उस खूँटी के समान है जिस पर दूसरे का ज्ञान लटक रहा होता है। वह स्वयं जहाँ गड़ा हुआ है, वहीं पड़ा हुआ है' (वही, पृ. 59), आर्यसमाजी चिंतामणि जी की हिंदू धर्म के महात्म्य का बखान करने वाली चामत्कारिक बातों के पीछे छिपे खोखलेपन को नहीं समझ पाता। नहीं, शायद शंका का बीज उसके भीतर अँकुराता है, वह भी भाषा के बदलते प्रयोग को लेकर कि व्याख्यान के सम्मोहन में बँधी श्रद्धालु जनता के लिए चिंतामणि जी 'मान्यवर' न रह कर 'महात्मा' हो गए हैं और चिंतामणि जी के लिए श्रोतागण 'सज्जन' नहीं, 'भक्त' - यानी ज्ञान, महिमा और स्तवन की दूरियाँ जहाँ न संवाद संभव है, न तर्क-वितर्क, केवल अभंग आस्था और आज्ञापालन। लेकिन यह क्षणिक विचलन भर है जो तर्क की उँगली पकड़ उसे स्थिति का विश्लेषण करने को बाध्य नहीं करता, पिता की इस नसीहत का स्मरण करा देता है कि ''वेद-पुराण में जिन राक्षसों का वर्णन है न, उन्हीं के कलयुगी रूप हैं'' तर्क/शंका करने वाले कम्युनिस्ट जो ''नाम गरीब जनता का लेते हैं और तानाशाही एक आदमी की चलती है।'' (वही, पृ. 6.) प्रारंभ में रतन की सोच कितनी सांप्रदायिक क्यों न हो, उसके द्वारा बाँटा गया पैंफलेट दो मूल आग्रहों के कारण विशेष उल्लेखनीय है। एक, ''सिर्फ सत्य के प्रचार से ही देश की रक्षा हो सकती है'' और दूसरे, 'नवजीवन' पत्र के 15 जनवरी 1925 के अंक में छपे महात्मा गांधी के इस वक्तव्य के कारण कि ''भारत देश का उत्थान उतना मुस्लिम व ईसाइयों पर निर्भर नहीं करता जितना इस बात पर कि हिंदू अपने धर्म की रक्षा कैसे करता है।'' (वही, पृ. 145) महात्मा गांधी का हिंदुत्व आज के विहिप के उग्र हिंदुत्व का पर्याय नहीं है, 'उन्माद' चाह कर भी यह बात उतनी स्पष्टता एवं तार्किकता के साथ रेखांकित नहीं कर पाया है जैसा पुरुषोत्तम अग्रवाल अपने लेख '1948 और 1992 का फर्क' में कर सके हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल मानते हैं कि गांधी जी अपने हिंदुत्व के साथ मूल रूप से मनुष्य धर्म के अनुयायी7 थे और ''सारे समाज का दानवीकरण कर डालने को उतारू सांप्रदायिकता का सबसे सशक्त प्रतिवाद'' (अयोध्या और उससे आगे, पृ. 37)। इसलिए गोडसे बनाम हिंदू राष्ट्रवाद द्वारा उनका वध किए बिना अपना रास्ता साफ करना संभव न था। इसके बाद मानो सब योजनाबद्ध ढंग से अपने आप होता गया - हिंदू धर्म के नष्ट हो जाने का दुष्प्रचार; हिंदू धर्मावलंबियों की सहिष्णुता का लाभ उठा कर उनके ही घर में उनकी बहू-बेटियों के साथ व्यभिचार करते चले जाने के इतिहास का पाठ; घृणा, आशंका और दहशत का प्रसार; सफेद झूठ की बजाय अर्ध-सत्य के टुकड़ों से बुना एक दिपदिपाता 'संपूर्ण सत्य'। चूँकि ''सांप्रदायिक विचारधारा का लक्ष्य सामाजिक मानस पर एकाधिकार कायम करना होता है'' और ''सांप्रदायिक विचारधारा सामाजिक संस्कार को विकृत'' करने का 'सांस्कृतिक' काम लगातार करती है, इसलिए आश्चर्य नहीं कि उसे मस्जिद ध्वंस के अगले ही दिन जनता द्वारा स्तंभ एवं आघात की प्रारंभिक प्रतिक्रिया से उबरने के बाद अपने पक्ष में 'अभूतपूर्व सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण' का विजयी अहसास हुआ। पुरुषोत्तम अग्रवाल इसकी सबसे बड़ी वजह सांप्रदायिकताविरोधी बुद्धिजीवियों की निष्क्रियता के साथ जोड़ कर देखते हैं जिनके अनुसार उनकी सक्रियता का समय है सांप्रदायिक हिंसा से घिरा एक कालखंड और लड़ाई का लक्ष्य है राजसत्ता पर अधिकार। (वही, पृ. 43) लगभग इसी भाव की आवृत्ति गीतांजलि श्री के उपन्यास 'हमारा शहर उस बरस' में भी हुई है - समाजशास्त्र के सेकुलर प्रोफेसर शरद एवं हनीफ के आश्चर्य में कि ''एकदम से तो यह (सांप्रदायिक मानसिकता) इंडस्ट्री नहीं बन गई। हम कहाँ थे, जब यह बन रही थी?'' (पृ. 51)

2.

'' वे दहशत इसलिए फैलाते हैं क्योंकि दहशत सचमुच उनके भीतर है '' 8 बनाम '' जिस युग में धर्म ही राष्ट्र का मूलमंत्र था (हो) , उसे अंधकार युग कहते हैं '' 9

गीतांजलि श्री भगवान सिंह की तरह सांप्रदायिक ताकतों के संगठन का इतिहास लिखने की बजाय बढ़ते धर्मोन्माद की कुत्सित चेष्टाओं को कभी सांकेतिक तो कभी बेहद लाउड ढंग से चित्रित करती हैं। उपन्यास पारंपरिक ढाँचे से पूर्णतया अलग चित्रकला की कोलाज शैली में रचा गया है - जीवन को खंड-खंड करते हादसों और त्रासदियों के टुकड़े जिनके बीच कहीं छिपी है मनुष्यता और आशा। जरूरत उन्हें देखने और जोड़ने की है लेकिन इसके लिए 'तीसरी आँख' और धीरज किसके पास है? 'लज्जा' से कोसों दूर होते हुए भी वे 'लज्जा' के साथ एक कोष्ठक में आ बैठती हैं जहाँ दैनंदिन जीवन में धर्म का बढ़ता हस्तक्षेप आस्था को अनास्था में तब्दील कर मनुष्य को हैवान बना देता है या आत्मदया से ग्रस्त। लेकिन तसलीमा जहाँ इस बात पर लज्जित हैं कि ''पश्चिम बंगाल के बंगाली मुसलमान बांगलादेश के बंगाली मुसलमानों से कहीं ज्यादा सुख-आराम से हैं। ...वामपंथी सरकार ने अल्पसंख्यक मुसलमानों की हर तरह की सुरक्षा का इंतजाम किया है। मुसलमानों के खिलाफ जातीय निर्यातन की कहीं कोई व्यवस्था नहीं है, वहीं बांगलादेश में राष्ट्र ही अल्पसंख्यक लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानता है।'' 10 (द्विखंडित, पृ. 268) और इसलिए ''वहाँ (भारत) के मुसलमान लड़ाई भी कर सकते हैं। भारत सेकुलर राष्ट्र जो है'' (लज्जा, पृ. 68), वहीं गीतांजलि श्री इस बात पर आँख चुरा रही हैं कि मुट्ठियाँ उछाल-उछाल कर जै श्रीराम का उद्घोष और मठ पर लगे लाउडस्पीकरों से छन-छन कर फैलता धार्मिक प्रदूषण क्या भारत के सेकुलर चरित्र पर आघात नहीं करता? खास कर पुलिस अफसर कापड़िया की गर्वोन्मत टिप्पणी कि ''मैंने सालों का मुहर्रम का जलूस ही बंद कर दिया। उनका तो बज गया बाजा। ...यह हिंदुस्तान है कि पाकिस्तान? तो फिर होली की ताजिया?'' (हमारा शहर उस बरस, पृ. 94) और ''किसी को कुछ अपने बस में या साफ नहीं दीख रहा था; जब मठवालों की ललकार गूँजी कि मस्जिदों की गुंबद पर गेरुआ पताका लगा दो। न सरकार, न वर्दीपोश, न प्रशासन, न अखाड़ेबाज, न श्रुति, न हनीफ, न शरद, न किसी और को क्योंकि तब मठवालों के जुलूस की धमधमाती पदचापें सबकी आँखों में धूल झोंकती चली गईं।'' (वही, पृ. 19) क्या इसलिए कि ''जो हमारे संग हुआ, वही हमें उनके संग करना है' में निहित थ्रिल आम आदमी के जड़ जीवन में एक नई रवानगी ला देती है जिस कारण प्रियंवद के 'वे वहाँ कैद है' में चिन्मय जैसे इतिहास के बुद्धिजीवी छात्र त्रिशूल और भगवा पताका में देश का भविष्य देखने लगते हैं? लेकिन अपनी तमाम बौद्धिकता, तार्किकता और शराफत के बावजूद चिन्मय मठ के प्रभावाधीन जिन उन्मादी शक्तियों के हाथ का खिलौना है, वहाँ लूका और सुक्खी बाबू जैसे आपराधिक तत्व भी तो गुटबाजी और धनबल के साथ पनाह पाते हैं। तो क्या धर्म अप्रासंगिक हो गई पुस्तकों और भगवाधारियों के पुनरुत्थान का नाम है या दादू की चीरती-चीथती भाषा में कहें तो सिर्फ 'प्लैजर ऑव मास्टरबेशन' - 'शून्य में स्वयं को मथ कर उत्पन्न की गई उत्तेजना के आनंद का सुख' (वे वहाँ कैद हैं, पृ. 7.)? या फिर बकौल तसलीमा ''कैंसर की तरह खतरनाक रोग' - ''न मानो तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन इसे दूर करने जाओ तो फौरन गड़बड़ी हो जाती है।'' (द्विखंडित, पृ. 63) लेकिन मस्तराम कपूर मानते हैं कि अपनी तमाम भयावहता एवं संकीर्णता के बावजूद धर्म मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक है, बेजान, लाचार, त्रस्त-पस्त मनुष्य की आस्था का एकमात्र केंद्र जो उसे वर्तमान से जूझने और सहने की शक्ति देता है और बेहतर कल का विश्वास भी - ठीक अफीम के प्रभाव की तरह। और जब धर्म की सत्ता है तो संप्रदाय भी होंगे ही क्योंकि ''सब मनुष्यों के विश्वास का आधार एक नहीं होता, सारी दुनिया में एक ही धर्म नहीं हो सकता।'' 11 जाहिर है खतरनाक धर्म नहीं, धर्म को अपने हक में भुनाने वाले शातिर इरादे हैं। दूसरे, अपने आप में धर्म इतना संहारक भी नहीं कि अकेला विनाश का तांडव करता फिरे। सत्ता और समर्थन पाए बिना वह महत्वहीन है, पिछवाड़े पड़ी गुठली या छिलके की तरह। इसलिए धर्म और राजनीति एक दूसरे का संबल पाकर अपने को बचाने और टिकाने की कूटनीति है। तब गीतांजलि श्री के इस कथन का निहितार्थ समझ आता है कि क्यों 'उस बरस' मठवालों के जुलूस की धमधमाती पदचापें सबकी आँखों में धूल झोंकती चली गईं और क्यों प्रार्थना सभा में स्टेनगन लिए जवानों की गश्त अनिवार्य हो उठी। साथ ही समूचे परिप्रेक्ष्य के साथ उपस्थित होती है चिन्मय की पीड़ा कि ''अभी हम (हिंदू) राष्ट्र है ही कहाँ? बनने की प्रक्रिया में भी नहीं। ...जाति-अल्पसंख्यक के नाम पर कुछ नहीं होगा। हर आदमी राष्ट्र का नागरिक होगा। ...हमें किसी दूसरे धर्म से शिकायत नहीं, बस, उनको अपनी जगह मालूम होनी चाहिए।'' (वे वहाँ कैद हैं, पृ. 58) लेकिन क्या 'धार्मिक राष्ट्र' जैसी कोई अवधारणा है जहाँ इतर धर्म को सुरक्षा या मान्यता की गारंटी मिली हो? बकौल प्रियंवद ''धर्म या जातीय महानता का उन्माद सिर्फ एक बर्बर तानाशाही में खत्म होता है जिसे कुछ मूर्ख लोग या मूर्ख पुस्तकें नियंत्रित करते हैं।'' (वही, पृ. 73) दादू की पीड़ा में ही तसलीमा की पीड़ा है कि 'पीपल्स रिपब्लिक ऑव बांगलादेश' 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑव बांगलादेश' घोषित होते ही जब 1971 के मुक्तियुद्ध के विरोधियों को संरक्षण एवं नेतृत्व प्रदान करने लगता है तब हिंदू जैसे दूसरे दर्जे के नागरिकों के लिए अपना आत्मसम्मान बना कर देश में बने रहना संभव नहीं होता। 'मालाउन' जैसी गाली और 'एक-दो हिंदू धरो, सुबह-शाम नाश्ता करो' (लज्जा, पृ. 17) जैसी हिंसा से सनी अपमानजनक कटूक्तियों को निगल कर 'मुसलमानों की छतरी के नीचे जिंदगी बिताना' उनकी नियति बन जाती है और सरकार के लिए देश से पलायन कर गए हिंदुओं की संपत्ति को लेकर अयूब खान द्वारा बनाए गए 'शत्रु संपत्ति कानून' को नाम बदल कर 'अर्पित संपत्ति कानून' के रूप में स्वीकार करना बेहद आसान हो जाता है। पलायन रोकने की जिम्मेदारी महसूसने की संवेदना पनपने का स्पेस वहाँ है ही नहीं क्योंकि 8 फरवरी 1979 में कुमिल्ला जिले में हिंदू ऋषि संप्रदाय पर औचक हमले के बाद कोई भी कट्टरवादी मुस्लिम संगठन माँग कर सकता है कि ''सरकार द्वारा देश में इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म घोषित किया गया है। इसलिए इस्लामी देश में रहने के लिए सबको मुसलमान बनना पड़गा।'' (लज्जा, पृ. 36) इस माँग का विरोध करने की ताकत अपनी कुर्सी बचाने में लगी किसी सरकार में नहीं। अलबत्ता भारत-समर्थक होने का 'कलंक' धोने के लिए मुजीब-पुत्री शेख हसीना को मक्का जाकर हज कर आने के बाद लंबी-लंबी इफ्तार पार्टियों और भारतविरोधी वक्तव्यों का सरंजाम जुटाना पड़ता है (द्विखंडित, पृ. 219) और भारत में बसे 'अल्पसंख्यक मुसलमानों के जान-माल की रक्षा के लिए अपनी चिंता का सार्वजनिक ढिंढोरा पीटना पड़ता है - ''भारत के चौदह करोड़ मुसलमानों की जानमाल की रक्षा के स्वार्थ से ही हमें अपने देश में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना होगा।'' (लज्जा, पृ. 145) यानी चहुँ ओर अँधेरी सुरंगें! क्षुब्ध तसलीमा सुरंजन के रूप में उठाए गए अपने ही इस प्रतिवाद ''बांगलादेश के हिंदू बाढ़ के पानी में बह कर नहीं आए हैं'' (वही, पृ. 92) की खोखली अनुगूँजों को सुन-सुन कर इस निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि ''इस उपमहाद्वीप के तीनों राष्ट्रों के सत्तारूढ़ दलों ने राजनीतिक फायदे के लिए कट्टरपंथी फासिस्ट ताकतों से हाथ मिला रखा है'' (वही, पृ. 146); कि ''बाबरी मस्जिद को लेकर इतना हंगामा करने का मकसद राजनीति को सांप्रदायिकता के पावर हाउस में परिणत करना है'' (वही, पृ. 138) अन्यथा क्यों भारत ने मस्जिद ध्वंस जैसे संवेदनशील मुद्दे को अंजाम देने से पहले मुस्लिम देशों में बसे हिंदुओं के बारे में नहीं सोचा12 और क्यों बांगलादेश में इत्मीनान से मंदिरों की तोड़फोड़, मार-काट के बाद सद्भावना यात्रा निकालने और दंगे के पाँच दिन बाद 11 दिसंबर को ढाकेश्वरी मंदिर के खंडहर पर पुलिस पहरा बैठाने का पाखंड किया गया?13

प्रश्न! प्रश्न! पश्न! लेकिन ये प्रश्न परिदृश्य को धुंधलाते नहीं, परिदृश्य पर पड़ी धुंध को साफ करते हैं और लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत में रहने वाले चिन्मय की निराधार आस्था को खंड-खंड करते हैं कि जाग्रत आधुनिक धार्मिक राष्ट्र बनने के बाद ''संभव है एक बार पूरा देश अस्थिरता में डूब जाए, पर उसी से फिर जन्म लेगा एक दीर्घ, स्थिर और निश्चित रूप हिंदू राष्ट्र का जो इस देश की मुक्ति है।'' (वे वहाँ कैद हैं, पृ. 121) चिन्मय की आँख में जिस त्रिशूलधारी हिंदू योद्धा का स्वप्न है, वह मूलतः आतंकवादी है 14 और आतंकवादी कभी मुक्तिदाता नहीं हो सकता - यह बात अमेरिका पर पलटवार करते अमरीकी प्रशिक्षित अफगानी आतंकवादियों को लेकर जितनी सही है, उतनी ही गहरी अनुस्यूत है तसलीमा की आशंका भरी इस भविष्यवाणी में कि ''वे लोग तोड़ देंगे अपराजेय बांगला, स्व अर्जित स्वाधीनता, तोड़ देंगे शाबाश बांगला।'' (लज्जा, पृ. 167) संहार और अवसाद की अंतिम टेक पर टिकी इस परिणति के कारण अस्वाभाविक नहीं कि 'वे वहाँ कैद हैं', 'उन्माद' और 'हमारा शहर उस बरस' के उदार शांतिप्रिय परिवार अंततः अपनी ही जमात के हाथों मारे जाते हैं।

3.

'' इतिहास की सारी बिनाई में से एक धागा क्यों निकालते हो ?''15 बनाम अभी तक हमने अपने इतिहास पर हँसना नहीं सीखा ''16

पिछले पाँच हजार वर्ष का भारत का इतिहास धर्म की जय का अखाड़ा भर है। ऐसा कोई भी राजा या राज्य नहीं हुआ इस पूरी कालावधि में जिसने अपने विशिष्ट धर्म या संप्रदाय की पताका फहराए बिना बुलंदियों को छुआ हो। सेकुलर अकबर से लेकर अशोक महान तक हर स्वर्णिम काल भी 'वे और हम' की विभाजक पट्टियों से अटा पड़ा है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि स्वयं इजिहास के छात्र होने के नाते प्रियंवद और गीतांजलि श्री दोनों अपने-अपने उपन्यासों में इतिहास में घटी घटनाओं को संगति एवं तारतम्य देने के साथ-साथ इतिहास-अध्ययन हेतु आवश्यक 'दृष्टि' की बात करते हैं। दादू इसे 'तीसरी आँख'17 कहते हैं, गीतांजलि श्री 'साझी संस्कृति की जीवित मिसाल'18 और कुर्रतुल ऐन हैदर अपने आप (इतिहास) पर हँसने की परिपक्वता। उनके सवाल खासे अहम हैं कि क्यों इतिहास को पूर्णतया निरपेक्ष और तटस्थ भाव से देखना संभव नहीं हो पाया? कि क्यों जब-तब अपनी जाति-धर्मगत पहचान के साथ इतिहास का विश्लेषण करते-करते हम इतिहास में 'इन्वॉल्व' हो जाते हैं - लज्जित होकर क्षमा माँगने की स्थिति में या उपकी तरफ से सफाई पेश करने की मजबूरी में? ''जरूरी यह नहीं कि हम इतिहास की चहारदीवारी के पीछे कैद हो जाएँ। जरूरी यह है कि हम उसके ऊपर तने मकड़ी के जाले झाड़-पोंछ कर साफ कर दें।'' (कुर्रतुल ऐन हैदर, आग का दरिया, भूमिका) लेकिन विडंबना यह है कि प्रियंवद और गीतांजलि श्री दादू-चिन्मय एवं शरद-हनीफ के जरिए पक्ष-प्रतिपक्ष का तटस्थ आकलन करते-करते अचानक भावातिरेक में स्वयं इतिहास में शामिल हो जाते हैं - ''पूछते क्यों नहीं कि जहाँ तीनों बातों की गुत्थमगुत्था थी - परस्पर जुल्म, परस्पर मेल और तीसरा कि अलग-अलग पर शांति से दूर रहना, वहाँ सिर्फ जुल्म और सिर्फ मुसलमानों का ही, क्यों हमारे कान में डाला जा रहा है? सत्ता की होड़ में राजनीतिज्ञ बेईमानी करते हैं, करेंगे ही, मगर क्यों हम-तुम उनके झाँसे में आ रहे हैं, क्यों उनके बेवकूफ पिट्ठुओं की तरह मुंडी हिला रहे हैं? ...मैं (हनीफ) क्या तुमसे कम यहाँ का हूँ?'' (हमारा शहर उस बरस, पृ. 3.)

गीतांजलि श्री उपन्यास के शिल्पगत प्रयोग - संवादों एवं असंबद्ध जुमलों - के कारण इतिहास का विश्लेषण नहीं करतीं, मात्र कुछ महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज करती हैं कि ''मध्यकालीन युग में धार्मिक स्थलों पर हमला करना युद्ध नीति का अंग था।'' (वही,पृ. 53) इसलिए मंगोल (जो मुसलमान नहीं थे) मध्य एशिया की मस्जिदों और पुस्तकालयों पर टूट पड़े; कि जिन मुसलमान फौजों ने ध्वंस किया, वे नोमैडिक थे और नोमैड लोगों ने हमेशा इसी तरह अपने लिए ठिकाने बनाए हैं; कि यूरोप में भी धार्मिक लड़ाइयों का लंबा इतिहास है जहाँ है प्रोटेस्टेंट द्वारा कैथोलिक गिरजाओं में मूर्तिभंजन के किस्से, ...मेरी क्वीन ऑव स्कॉट की क्रूरता ...स्पैनिश इन्क्वीजिशन। पुनः भारतीय संदर्भ में लौटें तो गुप्त, मौर्य, हर्ष कौन नहीं राज्य विस्तार हेतु वही चीजें कर रहे थे जिन्हें मुसलमानों के मत्थे मढ़ा गया यानी शैवों ने जैन मंदिरों और बौद्ध विहारों का ध्वंस किया तो शैव मंदिरों पर बनीं इस्लामी मीनारें। इन सबके मूल में बस एक ही तथ्य कि दुनिया भर में ''जिसके राज्य को खत्म करके जिसने राज्य शुरू किया, उसने पहले की इमारतों पर दूसरी इमारतें खड़ी कर दीं।'' लेखिका हिंदू समाज में फैले दो पूर्वाग्रहों को विशेष रूप से प्रश्नांकित और खारिज करती हैं कि मुसलमानों के आने के बाद ही यहाँ पर्दा और सती प्रथा शुरू हुई और व्यापक दर्जे पर हिंदुओं का नर-संहार हुआ जबकि मुसलमानों के पदार्पण के लिए बदनाम आठवीं सदी में राजपूत आपस में लड़ रहे थे, मींडों और जाटों के जत्थे हमले पर हमले कर रहे थे और जयचंद की शह पर मौहम्मद गोरी कहर ढा रहा था। वे शरद-हनीफ की खीझ को विस्फोटक रूप देते हुए 'अज्ञानी' नागरिकों पर बरस उठती हैं कि ''क्यों नहीं लोग जानते कि सबसे पहले मुसलमान उत्तर नहीं, दक्षिण भारत में आए,, मलाबार तट पर व्यापार के लिए, बिना हमला किए। बिना खून-खराबे के वहीं साउथ में बसे और उधर के राष्ट्रकूट और चालुक्य राजाओं ने, जो हिंदू थे, उनका स्वागत किया। यहाँ तक कि मिली-जुली शादियाँ हुईं और इनसे जो बच्चे हुए, उन्होंने 'बयासरा' के नाम से नई कौम बनाई। ये मेल था, झगड़ा नहीं। क्यों ये बातें आम जनता तक नहीं पहुँची हैं?'' (वही, पृ. 67) दूसरा पूर्वग्रह यह कि हिंदू स्वभाव से शांत और मुसलमान आक्रामक होता है। प्रो. छोटे जोश के रिसर्च पेपर के जरिए वे सिद्ध करती हैं कि लोगों की ऐतिहासिक-भौगोलिक स्थितियाँ उनकी कौम और मजहब के चरित्र को बनाती हैं - ''जहाँ औपनिवेशिक साम्राज्य ने और लोगों के साथ-साथ मुसलमानों में भी अपनी अस्मिता को लेकर डर और चेतना और उम्मीदें पैदा कीं, वहाँ-वहाँ कौमवाद ने सिर उठाया। जहाँ मुसलमान की पहचान को खतरा नहीं है, उन देशों में हालात कुछ और हैं ...कि इस्लाम का मूल स्वभाव न तो कट्टर ही कहा जा सकता है, न ही हर हालत में उदार ...कि कुरान की जो आयतें मक्का में लिखीं गईं, वे आक्रामक थीं क्योंकि वहाँ इस्लाम को अपनी एग्जिस्टेंस के लिए लड़ना पड़ रहा था और मदीना में यहूदियों और ईसाइयों से समझौते करके कुरान में भी नर्मी आ गई।'' (वही, पृ. 72) साथ ही उल्लेखनीय है इसी के परिपार्श्व में दद्दू द्वारा सहेज कर रखी गई 1917 में गाँव-गाँव बँटी 'पाती' - एक ऐतिहासिक दस्तावेज जो हिंदू-सहिष्णुता की पोल खोलती है। ''हिंदू को लाजिम है। आगे आप को बिदित है के हिंदू और मुसलमान से बैर है कुरबानी के वास्ते। सो आप लोग खूब जानते हैं कि हिंदू के बाँध कर दरख्त टाँग दिया है और गाँव में दिखा कर कुरबानी कर दिया। इससे हिंदू को बड़ा भारी लजाया है के जीना धिक्कार है। इससे मुसलमान का घर लूट लेवें और मुसलमान को मार दें और पतिया पाँच गौ देहात में फैल देवें। न पतिया फैलावें और न लूटमार के तो बेटी पर चढ़े न जोरू के मूत पियें, व भगनी पर चढ़ें। इससे बेहतर है के मतारी के मुसलमान से ब्याह कर दें। ...अगर ज्यादा मुसलमान तुम लोग से पिटाने काबिल न हो तो डुम्राओं के महाराज के यहाँ खबर देओ, तुरंत बंदूक समेत पल्टन आवेगा।'' (वही, पृ. 88)

गीतांजलि श्री हनीफ के साथ क्षणिक स्खलन के उपरांत इतिहास के निरपेक्ष अध्ययन से विचलित नहीं हुईं। वे मानती हैं कि इतिहास जब-तब होने वाले कौमी दंगों का साक्षी है, लेकिन उन्हें ही अंतिम सच के रूप में क्यों स्वीकारें? ''झगड़े थे तो उन्हें मानेंगे, पर उन्हें बढ़ाएँ क्यों? खत्म क्यों न करें? मोहब्बत थी और रह सकती है तो क्यों न उसे उजागर करें, झगड़े को घातक मानें'' (वही, पृ. 19.) हर तथ्य और निष्कर्ष को तोल कर व्यावहारिक जिंदगी में उतार लेने की पक्षधरता लेखिका के इतिहास-विवेक की मिसाल है। अतः इतिहास को सामान्यीकृत करने की संकीर्ण कोशिशों का विरोध करती हैं कि ''स्याह और सफेद में नहीं बँटी हैं कौमें, न सच, न समाज।'' इसलिए यदि इतिहास का पुनर्लेखन करना ही है तो क्यों इस झूठ को बढ़ावा दें कि एक कौम ने मंदिर तोड़े और दूसरी सहनशील बनी रही? अलगाव के प्रतीकों को ढूँढ़ने की अपेक्षा क्यों नजरूल इस्लाम और अमीर खुसरो के कृतित्व को महिमामंडित न किया जाए? क्यों नहीं दोनों ही कौमों के भीतर छिपे सांप्रदायिकता के बीजों को देखते हुए खुलासा किया जाए कि एक कौम में सांप्रदायिकता यदि डर और असुरक्षा से पैदा होती है तो दूसरी कौम में ताकत और अहंकार से। गीतांजलि श्री के विपरीत प्रियंवद दादू-चिन्मय की भावनात्मक बहस में प्रारंभ से ही दादू के साथ हैं। वे मानते हैं कि ब्राह्मणों, बौद्धों-तांत्रिकों-मुस्लिमों-सिखों की तरह कुषाण-होयसाल-चालुक्य वंश धर्म के उन्माद पर ही जीवित रहे, लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि धर्म ही उनके अंत का कारण बना। बेशक फाह्यान और डेमिगोपायस जैसे विदेशी यात्रियों ने धर्म के बर्बर रूप को देखा, लेकिन क्या उनकी दृष्टि समग्र और मानवीय थी? उस युग का इतिहास लिखते हुए उन्होंने क्यों नहीं उन लोगों की पीड़ा बताई जिनके कानों में पिघला सीसा डाला गया? पुष्यमित्र के राज्य में क्यों उन बौद्ध श्रमणों की चीखें दर्ज नहीं कीं जिनके सिर के बदले सौ मोहरों के इनाम की सार्वजनिक घोषणा की गई थी? इतिहास वह नहीं जो तथ्यों और तिथियों से बँध कर स्थूल घटनाओं की शक्ल में हमारे सामने आता है, इतिहास वह है जो बिंदु भर रिक्तियों के पीछे खड़े मनुष्य को उसकी बेबसी और त्रासदी के साथ देखता है जहाँ ''मैं ही लाश हूँ और मैं ही कब्र खोदने वाला और मैं ही रोने वाला'' (आग का दरिया, पृ. 5.7), लेकिन जानता है कि ''इन अँधेरों में जब सब नष्ट होता है, तब भी एक चीज अक्षत-अक्षुण्ण रहती है और वह है मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता, उसकी गरिमा पर आस्था और उस आस्था के कभी न क्षरित होने की आशा।'' (वे वहाँ कैद हैं, पृ. 24) प्रियंवद जिस मुखरता के साथ आशा और आस्था की बात करते हैं, उपन्यास की संरचना में उस सघनता के साथ उसे पिरो नहीं पाते। गुंडों के भय से निजात पाने के लिए दादू का दूसरे फासिस्ट गुंडे चिन्मय के पास जाना उनके किसी कमजोर क्षण का विचलन माना जा सकता है, लेकिन लूका आदि के दुर्व्यवहार19 के बाद निरंतर 'अपवित्र' हो गए हाथों को धोने का मीनिया जहाँ उन्हें अपने ही आत्मबल के प्रति शंकित करता है, वहीं अविनाश को 'जूनियर दादू' की संज्ञा देकर भी उसे निष्क्रिय पात्र बनाए रखना लेखकीय विजन में पड़ने वाली दरारों का संकेतक है। दरअसल पूरी उपन्यासिका सेमी-आर्ट फिल्म की तरह मार्मिकता एवं सोद्देश्यता के ताने-बाने से बुनी गई पटकथा सरीखी है जिसका साँचा और ढाँचा न पात्रों का अंतर्व्यवहार-अंतःसंघर्ष बदल सकता है, न वक्त के घनीभूत दबावों को पछाड़ उफन-उफन कर बहती उसकी जिजीविषा। अंतिम दृश्य में अविनाश की अनुपस्थिति, वह भी बेहतर भविष्य के सपनों को साकार करने के उद्देश्य से गढ़ी हुई, कहीं इस कारण तो नहीं - संभावनाओं को उगने से रोकने के लिए? और गाढे काले धुएँ में लिपटे अवसाद के स्वर को प्रगाढ़तर करने के लिए? यही वजह है कि उपन्यास का पहला पाठ पाठक को स्तंभित करता है, किंतु इसमें निहित अर्थ-व्यंजनाओं को उसके मानस-पटल पर दूर तक तरंगायित नहीं कर पाता।

जो भी हो, 'आग का दरिया' ऐसे किसी भी छोटे से मोड़ पर ठिठक कर अपने ही प्रवाह को अवरुद्ध करने को तैयार नहीं, बल्कि विभिन्न युगों की परस्पर प्रतिकूल काल-धाराओं का संचयन कर लहराता हुआ आगे बढ़ जाता है। बेशक इसमें कुछ काल-धाराएँ आगे बढ़ती हैं, कुछ पीछे लौटने को आकुल हैं तो किसी की प्रवाहिनी दिशा कोई और - लेकिन इन्हीं भिन्नताओं से जूझ कर ही तो आगे बढ़ता है जीवन। फिर इनसे कैसा भय? इसलिए 'आग का दरिया' को चिरंतन काल का प्रतीक मान कुर्रतुल ऐन हैदर इसके अनंत-अखंड प्रवाह को शुद्धिकरण की अनवरत प्रक्रिया मानती हैं - ध्वंस के अवशेषों को लील कर सृजन के लिए उर्वर मिट्टी प्रदान करने वाली जीवनीशक्ति। इसी कारण पंद्रहवीं शताब्दी में बगदाद से भारत आया अबुल मंसूर कमालुद्दीन जोनपुर सुल्तान हुसैनशाह की हत्या और भीषण राजनीतिक उठापटक का शिकार हो लक्ष्यहीन अपना गंतव्य ढूँढ़ता फिरता है, और ज्ञान, कर्म और प्रेम - तीन मार्गों पर बारी-बारी चल कर अंततः पाता है कि जुलाहा कबीर का प्रेम-पंथ ही जीवन का सार-तत्व है।20 तब अस्वाभाविक नहीं कि वतन का नाम पूछे जाने पर वह अपनी शिनाख्त भारतीय के तौर पर करता है। उल्लेखनीय है कि श्रुति (हमारा शहर उस बरस) प्रेम की बात करना चाहती है, आधी-अधूरी प्रेम-कहानियाँ लिखती भी है लेकिन लिख कर अपराधबोध से भर उठती है कि हिंसा और आतंक के नफरत भरे माहौल में बुद्धिजीवी पति और वामपंथी कार्यकर्त्ताओं की तरह अमन-सौहार्द का संदेश बाँटने की बजाय प्रेम-कहानियाँ बाँचने बैठ गई। श्रुति के अपराधबोध के पीछे उसकी वैचारिक-मानसिक अपरिपक्वता कहीं स्वयं लेखिका की झिझक तो नहीं जो 'मैं' नामक पात्र में उतर कर बार-बार विनम्रतापूर्वक अपने को अनुकरणकर्त्ता समझती है - ''मुझमें कोई दंभ नहीं। समझने की सलाहियत रखने का भ्रम नहीं।'' (हमारा शहर उस बरस, पृ. 4.) और कि संपूर्ण दृष्टि और समग्रता वह लाए कहाँ से - ''मैं तो टुकड़े ही उठाती रही... जीवन ही कोलाज बन गया था।'' (वही, पृ. 8) आज के सांप्रदायिक अलगाव के परिदृश्य पर आधारित न होते हुए भी 'आग का दरिया' भारतीय इतिहास के विगत ढाई हजार वर्षों के इतिहास को जिन चार कालावधियों - चौथी शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर पंद्रहवीं शताब्दी और पूर्व सोलहवीं शताब्दी, अठारहवीं सदी का अंत और उन्नीसवीं सदी का अधिकांश तथा 1947 तक का वर्तमान काल - को उठाता है, वह मानव-मन के अंतर्मन में बुनी हिंसा, विषमता, लोभ-लालसा, अहंकार और सत्ता की कुत्सित मनोवृत्तियों को धर्म और राजनीति के संकीर्ण स्वरूप के साथ गूँथ-बाँध कर विकास के उत्तुंग शिखर को छूती हर सभ्यता-संस्कृति के क्षय के कारणों पर उँगली रखता है और वीतरागी, कर्मरत, आस्थावान जनमानस के बीच बहती गंगा-जमुनी लोक-संस्कृति के प्रति अखंड आस्था पर भी जहाँ जीवन का निनाद और नैरंतर्य दोनों संकेंद्रित हैं।

4.

'' क्या हिंदुओं में अपने को उदार समझने की बीमारी होती है ?''21 बनाम ' सेकुलर नहीं , सेक्योरल हैं हम ''22

उजालों की बात कर प्रियंवद भले ही उपन्यास सहित अँधेरे में खो जाते हैं, 'उन्माद' में भगवान सिंह जरूर पते की एक बात कह जाते हैं कि ''जब किसी व्यक्ति को अपने चरित्र को नष्ट करने की स्वतंत्रता हो और इसके बाद भी वह इसे उज्ज्वल बनाए रखे तो ही यह उसके लिए गौरव की बात है।'' (उन्माद, पृ. 218) यानी इतिहास के साथ छेड़छाड़ और इतिहास के वर्तमान के भीतर धड़कती मानवीय गरिमा की रक्षा का दायित्व आज भी 'पीर पराई' जानने वाले 'वैष्णव जन' का है। जरूरत उन्हें पहचानने की है कि अखबारों-जलसों-सेमिनारों में वक्तव्य देते वे शरद-हनीफ जैसे बुद्धिजीवी हैं जिन्हें दद्दू 'ड्राई' और 'थोथा चना बाजे घना' कहते हैं या खुद दद्दू जो घर से बाहर नहीं निकलते, लेकिन अपने अतीत में झाँक कर, 'हिंदू मुसलमान का फर्क रख कर' आत्मीयता23 का प्रसार करने का दावा करते हैं और जीवन के बरक्स धर्म को तो जरा भी अहमियत नहीं देते - ''अरे, टूट गई मस्जिद और टूट गया मंदिर तो क्या हो गया? भगवान-अल्लाह उससे तो जिए-मरे नहीं?'' (हमारा शहर उस बरस, पृ. 89) शरद-हनीफ सरीखे उत्साही सेकुलरों की भागदौड़ को लफ्फाजी सिद्ध करने24 और धर्म को तहजीब तथा परंपरा का सेतुबंध मानने वाले25 दद्दू के लिए चिरंतन की तलाश ही जीवन है, अन्यथा शेष सब फंतासी जिसे पा न सकने की बदहवासी व्यक्ति के भीतर खालीपन की गहरी खाइयाँ खोदती चलती है और उन्हें भरने की लालसा उसे पागल बना डालती है - ''हर तरफ फैले खालीपन को चाहे पशुता से भरो, चाहे प्रेम से, दोनों भ्रम हैं, सिर्फ हवा ...हम डरते हैं, कुछ न होने से। तब हम चाहते हैं, कुछ भी हमें पजैस कर ले, हमें अपने में घोल ले ...ताकि हम भूल जाएँ हम कुछ नहीं, उस रमने में समझें, हम हैं, उसके रंग में डूब कर समझें, यह हमारा रंग है, हमारे होने का सबूत है।'' (वही, पृ. 348) लेकिन शायद कुर्रतुल ऐन हैदर ठीक मानती हैं कि प्रेम की सहज-सरल भाषा-अभिव्यंजना को समझना आसान नहीं। उसके ठीक सामने धरी ज्ञान की भारी भरकम तालाबंद पिटारियाँ ज्यादा आकर्षित करती हैं। इसलिए कमाल की तरह आज का उपन्यासकार भी सेकुलरों के साथ धर्मनिरपेक्षता की तलवार भाँज कर सांप्रदायिकता का शिरोच्छेदन कर डालना चाहता है।

'धर्मनिरपेक्षता : परंपरा और प्रासंगिकता' शीर्षक निबंध में सच्चिदानंद सिन्हा खूब मंथन-मनन के बाद सेक्युलरिज्म की परिभाषा भी देते हैं कि ''सेक्युलरिज्म का अर्थ है इंद्रियगम्य साक्ष्यों पर आधारित संसार की अवधारणा को कबूल कर विभिन्न सांसारिक क्रियाकलाप में पारलौकिक या दूसरी ऐसी भावनाओं का हस्तक्षेप रोकना जिनके आधार में कोई ऐंद्रिक साक्ष्य या तर्कविधि नहीं है। इसमें राजनीतिक जीवन में ईश प्रदत्त साक्ष्य की जगह प्रत्यक्ष अनुभव और तर्क पर आधारित सत्य को, भावना की जगह विवेक को और व्यक्तिगत या जातीय पूर्वग्रहों की जगह सहिष्णुता को आधार बनाया जाता है।''26 इस परिभाषा को मूर्तिमान रूप देना हो तो 'लज्जा' के सुधामय27, वे वहाँ कैद हैं' की एनी 28, 'उन्माद' के भाई साहब, आबिदा के अब्बा और शास्त्री जी, 'हमारा शहर उस बरस' के बाबू पेंटर और दद्दू से बेहतर कोई नहीं। लेकिन विडंबना! कि उपन्यास में ये सब मेनस्ट्रीम से कटे हाशिए पर फेंके गए अतीत के अवशेष हैं। मीडिया पर काबिज सेकुलर पीढ़ी कादंबरी (वे वहाँ कैद हैं) की तरह अफगानिस्तान की राजनीति को कवर करती हो या शरद-हनीफ की तरह यूनिवर्सिटी में नई पीढ़ी का नव-संस्कार कर रही हो - 'संकट में बहुत जल्दी आस्था और धैर्य' खोने लगती है। क्या इसलिए कि इनके पास न समाज और संस्कृति की संरचना और पारस्परिकता का पुख्ता आधार है और न अपने मनोबल को संकेंद्रित करने वाला कोई भगवान/गुरु/राह या अंतःशक्ति? क्या इसलिए अपने ही बुने लफ्जों के मकड़जाल में फँस कर निरुपाय वह मुखौटा दर मुखौट पहनने को विवश हो गया है ताकि भीतर की दरकनों और संशयों, अनास्था और नकारात्मकता के कोलाहल को देख-सुन न ले? लेकिन क्या सच को देर तक बाँध-ढाँप कर रखा जा सकता है? सैलाब की तरह रंध्रों-दरारों से पूरे पोर-पोर में समा जाने के लिए वह क्या रास्ता नहीं तलाश लेता? इसलिए अचरज नहीं होता जब सेक्युलरिज्म के पक्षधर तीनों उपन्यास - उन्माद, हमारा शहर उस बरस, लज्जा - सांप्रदायिकता में उनके क्रमिक विघटन पर क्षुब्ध होते हुए भी इसे एक नैसर्गिक प्रक्रिया की तरह रेखांकित करते हैं। बहुत गहरे उतर कर आत्मान्वेषण करते हुए इन उपन्यासकारों ने अपने सेकुलर पात्रों के साथ अपने/उनके भीतर छिपे पाखंड को अपनी-अपनी तरह बेनकाब भी किया है। शरद की आड़ लेकर गीतांजलि श्री मानती हैं कि मुसलमानों के प्रति अतिरिक्त सहानुभूति और करुणा का मूल कारण अपने मन में गड़ी मुस्लिम विरोधी भावना को छुपा कर निष्पाप होने आसान नुस्खा है तो मंजू के साथ बेहद आक्रामक ढंग से भगवान सिंह हिंदुओं में निहित मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को सांस्कृतिक साम्राज्यवाद से जोड़ कर देखते हैं। उनकी दृष्टि में जिस प्रकार दलित अपने सवर्ण मालिक की कृपादृष्टि पाने के लिए अपना नाम बिगाड़ कर बताने का आदी रहा है (''मेरा नाम हरिआ है सरकार' या हजूर, अपने गोपालवा को नहीं पहचान रहे हैं', उन्माद, पृ. 176), उसी प्रकार हिंदुओं की आत्मनिषेधवादी प्रवृत्ति उसे 'मैं हिंदू हूँ' का गर्वपूर्ण परिचय देने से रोकती है और हिंदू होने का एक ही अर्थ ज्ञापित करती है - कम्युनल होना। इसी के परिपार्श्व में आ खड़ा होता है स्वधर्मी हिंदुओं की बुराई करके सेकुलर हो जाने का दंभ। (हमारा शहर उस बरस, पृ. 1.5)। इस तरह का सरलीकरण समाज को पंगु एवं बीमार बनाने वाले अंतर्निहित तत्वों की शिनाख्त में बाधा पहुँचाता है। अतः सेक्युलरिज्म को 'तीसरी जमात' या 'माइनॉरिटी' बताते हुए गीतांजलि श्री इसे 'बरसों से घर में घूँघट काढ़े बैठी दुल्हन'' (वही, पृ. 144) की संज्ञा देती हैं और इसी रूपक का विस्तार करते हुए हर सेकुलर को 'दोगली संतान'29 कहती हैं। अलबत्ता ईमानदारी का अनुपात कुछ ज्यादा ही हो जाए तो शरद की तरह अपनी लाउड बड़बड़ाहट को आत्मभर्त्सना में ढाल लेते हैं कि ''जिस दिन मैं एक मुसलमान को उसी नफरत से फैनेटिक कह पाऊँ जिससे हिंदू को कह सकता हूँ, उस दिन मानूँगा कि मैं दोनों को एक नजर से देखता हूँ।'' (वही, पृ. 339)

उल्लेखनीय है कि यदि भगवान सिंह ने 'उन्माद' में कट्टरपंथी रतन के जीवनानुभवों से सबक लेकर सेकुलर बनने की क्रमिक प्रक्रिया को दर्शाया है (जहाँ विवेकजनित तार्किकता के कारण फंडामेंटलिस्ट ताकतों के साथ संगति न बैठा पाने के कारण उस जैसा हर व्यक्ति पागल हो जाने को अभिशप्त है) तो वहीं गीतांजलि श्री बौद्धिक तेवरों से सुसज्जित शरद-हनीफ जैसे सेकुलरों के भीतर छिपे फंडामेंटलिस्ट शरद-हनीफ की झाँकियाँ प्रस्तुत करती हैं। इसे उन्होंने दो स्तरों पर उभारा है। एक, प्रतीक के सांकेतिक स्तर पर जहाँ बात-बात में लतीफे सुनाने वाला हनीफ सांप्रदायिक दंगों के गहराते चले जाने पर उतना ही चुप्पा हो गया है और अपनी उपस्थिति को लेकर आतंकित तो दोस्ती तथा सौमनस्य की प्रतिमूर्ति शरद आरोपित अपराधबोध के दबाव तले बौखलाते हुए इतना अकेला और रिक्त हो गया है कि हनीफ-श्रुति द्वारा लगाई गई मधुमालती की लतर को काट कर अपने अंतर्मन में छिपी कितनी ही अर्थव्यंजनाओं को अभिव्यक्त कर बैठता है। दूसरे स्तर पर लेखिका ने घटनाओं की घात-प्रतिघात में हनीफ-शरद संबन्धों के छीजने की विश्वसनीय श्रृंखला को पिरोया है जहाँ दोषी न होते हुए भी दोनों एक-दूसरे से आँख चुराने लगे हैं। हनीफ इसलिए कि जब उसकी मानवीय गरिमा पर चोट करते हुए उसे 'नाम-जात का ऐलान करता हुआ पट्टा पहना दिया गया है'' (वही, पृ. 216) तो क्यों न वह अंजुमन-ए-इस्लाम के सदर मकबूल हक के गिरोह में शामिल हो जाए और शरद इस कड़वी प्रतीति के कारण कि धार्मिक दुष्प्रचार को गलत तथा षड्यंत्रपूर्ण मानते हुए भी कहीं वह उन्हीं के नियमों और परिभाषाओं से संचालित होने लगा है। इसलिए मठवालों के विरुद्ध बोलते-बोलते अचानक मंदिरों के ध्वंस पर उनके दुख में अपना दुख भी साझा करने लगा है। गीतांजलि श्री की विशेषता है कि आम जीवन में धर्म के बढ़ते प्रभाव का चित्रण करने के लिए वे एक प्रतीकात्मक युक्ति का सहारा लेती हैं। यह युक्ति है मठ के लाउडस्पीकर से छन-छन कर आते आक्रोश भरे जुमलों का यूनिवर्सिटी की कक्षाओं में बेधड़क प्रवेश यानी जनून का बुद्धि को आक्रांत कर देना। यही कारण है कि यूनिवर्सिटी के उदार जनतांत्रिक माहौल में धीरे-धीरे तीन चीजों की घुसपैठ शुरू होती है - 'रूलबाजी, डिसिप्लिन और कंट्रोल' - धार्मिक महासभाओं के मूल तत्व जिनके चलते अध्यापक लाउडस्पीकर के प्रयोग के खिलाफ शिकायत पत्र पर हस्ताक्षर तो कर देते हैं लेकिन भावनात्मक सहमति देने में चूकते नहीं - ''मठवालों के डेमोक्रेटिक हक नहीं क्या? ...आपके मजाक, इन गुड टेस्ट, आपके कानून-कायदे की माँग इन गुड टेस्ट एंड लार्ज इंटरेस्ट, और हम बैड टेस्ट वाले, पुलिस रेजिमेंटवाले।'' (वही, पृ. 100) आश्चर्य नहीं कि युवा पीढ़ी का दिशानिर्देश करने वालों की ये भावनात्मक सहमतियाँ विद्यार्थियों के राजनीतिक एजेंडे को स्पष्ट कर देती हैं जिसके तहत कल तक के सर्वाधिक लोकप्रिय और काबिल प्रो. हनीफ के 'दीवाने' छात्र आज उसके सेक्शन में पढ़ने को तैयार नहीं। यही राजनीति फैल-फूट कर मदरसे जैसी धर्म-शिक्षा संस्थाओं को प्रोत्साहन देकर अपरिपक्व बाल-मस्तिष्क पर शिकंजा कसना चाहती है। तब हनीफ का यह सवाल बेहद मानीखेज हो जाता है कि ''जब यह जूझने का दौर पूरा होगा तो क्या शरद मठ में होगा और मैं अंजुमन-ए-इस्लाम में?'' (वही, पृ. 321)

गीतांजलि श्री विघटन के खतरों को चेतावनी और प्रश्न बना कर प्रस्तुत करती हैं कि भारत के लोकतांत्रिक चरित्र में संकीर्ण-अनुदार ताकतों के गिरोह को उखाड़ फेंकने की क्षमता भले ही न हो, उन्हें उपेक्षित करने का नैतिक साहस अवश्य है। लेकिन तसलीमा नसरीन सुरंजन के साथ आस्था और विश्वास के हर ठीये से तिरस्कृत हो मंजू (उन्माद) की तरह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के अँधेरों में गुम होती जातीय अस्मिता को देख क्षुब्ध हैं - ''हम लोग बेमतलब ही 'अस्सलाम वालेकुम' कहते हैं, 'खुदा हाफिज' कहते हैं, 'जल' को पानी' कहते हैं,' स्नान' को 'गोसल' कहते हैं। जिनके रमजान के महीने में हम लोग बाहर चाय-सिगरेट तक नहीं पीते, यहाँ तक कि जरूरत पड़ने पर होटल-रेस्तराँ में दिन में भी नहीं खा सकते, फिर भी असलियत में वे हमारे कहाँ तक हैं? आखिर किसके लिए है हमारा यह त्याग, कहो? पूजा में हमें कितने दिनों की छुट्टियाँ मिलती हैं? और उधर दोनों ईद में सरकारी अस्पतालों में हिंदुओं से गर्दन पकड़ कर काम कराया जाता है।'' (लज्जा पृ. 90) 'लज्जा' उपन्यास 'उन्माद' और 'हमारा शहर उस बरस' की अनुगूँजों को निनादित करते हुए भी दोनों की अगली कड़ी है। हनीफ की तरह सुरंजन को भी लगता है कि धर्मगत पहचान ने उसका मानवीय परिचय छीन लिया है और शरद की तरह उसे भी मंदिरों के तोड़े जाने पर क्रोध और अपमान की अनुभूति होने लगी है। चिन्मय (वे वहाँ कैद हैं) जैसे कट्टर हिंदू और हैदर जैसे प्रच्छन्न सेकुलर को एक ही कोष्ठक में रख तसलीमा मनुष्यता को 'वे और हम' में बाँट देने वाली मनोवृत्ति का खुलासा करती हैं तो आबिदा (उन्माद) और सुरंजन की तरह अल्पसंख्यकों में गहराते असुरक्षा बोध और हीनता ग्रंथि का विश्लेषण भी करती हैं। लेकिन जहाँ अल्पसंख्यक हनीफ, आबिदा और उसके अब्बा की भाँति बहुसंख्यक होने पर भी उदार सोच के कारण 'अल्पसंख्यक' बना दिए गए रतन, दादू और शरद अपने आक्रोश को वाणी नहीं दे पाते, वहीं 'लज्जा' का प्रस्थान बिंदु ही इस बात का बलपूर्वक रेखांकन है कि सांप्रदायिक विद्वेष के जवाब में सांप्रदायिक वैमनस्य ही बढ़ेगा, प्रीति-विश्वास नहीं। चिन्मय का यह निष्कर्ष गलत है कि ''जब कोई आतंक एक झटके से अंदर उतार दिया जाता है तब वह सारी जिंदगी नसों में खून के साथ दौड़ता है।'' (वे वहाँ कैद हैं, पृ. 114) तसलीमा चिन्मय के विलोम अविनाश की इस मान्यता की पुष्टि नहीं कर पातीं कि भय मनुष्य के अंदर की सारी चेतना और गरिमा को सोख लेता है। दहशत के प्रत्युत्तर में पसरी खौफनाक निस्तब्धता एक सच्चाई है, लेकिन यह सिर्फ तात्कालिक है। इसकी प्रतिक्रियात्मक मार उतनी ही जानलेवा है - आतंक का कहर बन कर टूटती हुई या पलायन/आत्मघात का मार्ग चुन कर प्रतिपक्षी की मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक गौरव की धज्जियाँ उडाती हुई। तसलीमा की आवेशपरक आक्रामकता घुटने टेक देने को तैयार नहीं। इसलिए सुरंजन के साथ ताल ठोंक कर वे अखाड़े में उतर आती हैं - निहत्थी लेकिन निर्भीक! ''क्रोध अभिमान पर सिर्फ मुसलमानों का अधिकार है?'' (पृ. 47) और ''बांगलादेश के हिंदू बाढ़ के पानी में बह कर नहीं आए हैं, वे इस देश के नागरिक हैं''(पृ. 92) - खुले शब्दों में अपनी आपत्ति और अधिकारों का खुलासा करते हुए सुरंजन जब ढाकेश्वरी मंदिर और चैतन्यदेव का पाँच सौ वर्ष पुराना घर गिरा दिए जाने का समाचार पाकर तारा मस्जिद को जलाने का प्रस्ताव रखता है, अपने हाथ में कटार, तमंचा, पिस्तौल या लाठी लेकर विनाश का तांडव करते हुए 'उनकी' मस्जिद पर पेशाब करने की चाह व्यक्त करता है (पृ. 135) और अपनी बहन माया के अपहरण-बलात्कार के बाद अचानक एक दिन शमीमा नामक वेश्या को घर लाकर बेदर्दी से बलात्कार करता है, तब ये सब प्रकरण उसके स्खलन के उदाहरण न बन सेक्युलरिज्म और मनुष्यता के प्रति अगाध आस्था पर गहरे आघात के निशान बन जाते हैं। न, हर उबाल आतंक की अँधेरी गुफाओं की ओर नहीं जाता। अ-मनुष्यता और अ-संवेदनशीलता का प्रसार अकेले व्यक्ति द्वारा संभव नहीं। धर्म/अर्थ/राजनीति की जनूनी ताकतें ही अकेले या मिल-जुल कर इनसानियत का आखेट कर पाती है, वह भी 'व्यक्ति' की नहीं, 'भीड़तंत्र' की। इसलिए तमाम अपमान झेलने और प्रतिशोध के सपने बुनने के बावजूद सुरंजन की इस कचोट - ''क्या सिर्फ घर-द्वार और मंदिर ही जले हैं, मनुष्य का मन नहीं जला?'' (पृ. 171) - में मनुष्यता को जिंदा रखने की व्यग्रता सराबोर है। गौरतलब है कि हनीफ में स्वयं जल कर भी दूसरों को जिलाने का यह जज्बा गायब है क्योंकि सांप्रदायिकता के सर्वभक्षी तांडव को उसने अपने घर के आँगन में नर्तन करते नहीं देखा। हनीफ की तुलना में आबिदा (उन्माद) ने संहार की आँच को अपनी त्वचा पर झेला है, इसलिए सामंजस्य और सौहार्द की जरूरत वह ज्यादा महसूसने लगी है। इस दृष्टि से वह शरद-हनीफ के मुकाबले सही मायनों में सेकुलर है।

तसलीमा नसरीन की विशेषता है कि धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता जैसे संवेदनशील एवं जटिल प्रश्न पर विचार करते हुए वे शब्द-जाल नहीं फैलातीं, न ही विश्लेषण के नाम पर इतिहास, धर्म, संस्कृति और सामाजिक संरचना की लंबी-चौड़ी चीरफाड़ कर मार्मिक प्रकरणों के बीच ठोस निष्कर्षों को हाथ से छूट जाने देती है। चूँकि डॉक्टर होने के नाते वे जानती हैं कि बदन पर हुए घाव का इलाज तब तक संभव नहीं जब तक उसे खोल कर दिखाया न जाए, इसलिए वे तत्काल धर्म का आखेट कर राजनीतिक छल-छंदों को बुनते-गहराते राजनीतिकों पर कटाक्ष दर कटाक्ष करती चलती हैं और साथ ही पूछती हैं निरुत्तर कर देने वाले बेहद मासूम सवाल - ''हैदर, खालिदा जिया ने भी कहा कि बाबरी मस्जिद का पुनर्निमाण करना होगा। अच्छा, वह क्या मंदिरों के पुनर्निर्माण की बात नहीं कर रही है? ...जब निर्माण की बात उठ रही है, तब सिर्फ मस्जिद का ही निर्माण क्यों होगा?'' (लज्जा, पृ. 76) जाहिर है सवाल की मासूमियत के पीछे राजनीतिक दुष्-मंतव्यों की पोल खोलने की निर्भीकता और आम जनता को उनके प्रति सचेत करने की विकलता कम गंभीर नहीं। अजीब विडंबना है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के बावजूद हिंदी उपन्यासकार धर्म और राजनीति की साँठ-गाँठ को कड़े-करारे अंदाज में नहीं खोल पाता। 'आखिरी कलाम' में बाबरी मस्जिद ध्वंस की रिपोर्ताज प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में भाजपा की सांप्रदायिक नीतियों की कटु आलोचना की गई है, वोट बैंक बनाए रखने के लिए कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति की निंदा करने का फैशन सा हो गया है, लेकिन राजनीतिज्ञ के रूप में व्यक्ति विशेष को पहचान कर उससे सवाल-जवाब की पारदर्शी प्रक्रिया की शुरुआत कोई नहीं करता। अलबत्ता चंद्रकांता जरूर 'कथा सतीसर' में शेख अब्दुल्ला की स्वार्थपरक नीतियों, हर केंद्रीय सरकार की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति का समर्थन करने की राजनीतिक जरूरत और कश्मीर को 'मुद्दा' बनाए रखने में निहित अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रों-दबावों पर खुल कर वार करती हैं। लेकिन आश्चर्य है कि भारत का अंग होते हुए भी सांप्रदायिक समस्या पर कश्मीर के परिप्रेक्ष्य को विश्लेषण से बाहर कर दिया जाता है - स्पेशल स्टेटस की पलायनवादी मनोवृत्ति के साथ। जाहिर है जब तक 'व्यक्ति' को अपदस्थ कर 'दल' का चेहरा सामने आता रहेगा, जवाबदेही एक कंधे से सरक कर दूसरे कंधे पर डाली जाती रहेगी। कश्मीर में लागू धारा 370 , समान सिविल कोड का प्रश्न आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो प्रत्यक्ष और प्रखर डिबेट के बिना नहीं सुलझाए जा सकते। पहली बार प्रियंवद ने 'वे वहाँ कैद हैं' में सांप्रदायिक दंगों के बढ़ते उभार को रोकने के लिए दादू के जरिए प्रधानमंत्री को संबोधित किया है, लेकिन सिर्फ एक अनुरोध, याचना भरा स्वर। इस स्वर में लोगों की जान-माल और गरिमा की हिफाजत न रख पाने की असफलता पर उनसे जवाब माँगने का रोष नहीं है और न ही उनकी नीतियों-दबावों-भविष्य की रणनीति का खुलासा करने की मुखर माँग है। जिस लोकतंत्र में 'लोक' की भागीदारी न हो और न भागीदारी बनाने का दबाव, तो वह क्योंकर सच्चे लोकतंत्र की तरह कार्य करेगा, अवसर मिलते ही तानाशाही प्रवृत्ति अख्तियार नहीं करेगा जहाँ न जन समर्थन की सतत आवश्यकता है और न जन-प्रतिरोध की आशंका? यहाँ एक बार फिर तसलीमा की निर्भीकता के समक्ष शर्मसार होते हुए गीतांजलि श्री को उद्धृत करने का मन हो आता है कि ''सेकुलर नहीं, सिक्योरल हैं हम। हम उतना ही बोलते हैं जितने से हम सिक्योर रहें, हमारी प्राइवेसी न बिगड़े, हमें गोली न लगे।'' (हमारा शहर उस बरस, पृ. 315) जाहिर है कम्युनल लोगों से तो आशा नहीं की जा सकती कि धर्म के जरिए कठमुल्ला सोच पैदा करने वाली राजनीति के औचित्य को लेकर वे सवाल उठाएँ। तब?

5.

'' ये अँधेरे जैसे-जैसे बढ़ें , तुम अपनी लौ बढ़ाते जाओ ''30

यहाँ भगवान सिंह की इस निष्पत्ति से असहमति व्यक्त नहीं की जा सकती कि ''तुम धर्मनिरपेक्ष तभी हो सकते हो जब धर्मनिरपेक्षता को ही एक धर्म बना दिया जाए'' (उन्माद, पृ. 127) क्योंकि मजहब की बुनियाद ईश्वर पर नहीं, शक और नफरत पर टिकी है, और कि जिस तरह व्यक्ति विश्व-नागरिक नहीं हो सकता, उसी तरह धर्मनिरपेक्ष भी नहीं हो सकता। ज्यादा से ज्यादा दूसरे संप्रदाय का हमदर्द हो सकता है, किंतु इससे चूँकि किसी दूसरे संप्रदाय के कठमुल्लों में बाहरी तत्वों से समर्थन मिलने का विश्वास बढ़ेगा, प्रतिक्रियात्मक स्थिति पुनः घातक होगी। इसलिए आबिदा के अब्बा के रूप में चित्रित उदारवादी सोच के साथ जुड़ कर वे मानते हैं कि हर इनसान को आदर्श की तलाश अपनी कौम से बाहर करनी चाहिए - ''जो जितना ही करीब होता है, उसे पहचानना उतनी ही मुश्किल होता है। दुनिया में आधी खराबी की जड़ यह है कि हम अपने बुजुर्गों को समझना तक नहीं चाहते, और बाकी आधी की जड़ यह कि उनको समझे बिना ही, उनसे चिपक जाते हैं। इस मामले में हमारा जो जज्बाती रिश्ता होता है, वह सरेस का काम करता है ...अपने बुजुर्गों को, अपने हमवतनों को, अपने धर्म और ईमान या जात-बिरादरी के लोगों में जिन्होंने किसी तरह कामयाबी हासिल की और जिनकी कामयाबी का कुछ फायदा हमें भी मिला होता है, उनको आदर्श मानने पर हम कई बार ऐसे आदमियों का चुनाव कर बैठते हैं जिनको इनसानियत की कसौटी पर कसें तो उन्हें इनसान कहना तक इनसानियत की बेकद्री होगी। जिनका इनसे नफा-नुकसान का या जज्बात का रिश्ता नहीं होता, वे इनकी असलियत को पहचान कर इनसे नफरत तक करते हैं। ...इसलिए मैं कहता हूँ ...किसी को अपना आदर्श बनाओ ही नहीं। ...अच्छा हो कि तुम्हारे सामने बहुत से आदर्श हों और उनमें से किसी एक का सिर्फ वही एक कारनामा किसी मौके पर तुम्हें इंस्पायर करे जिसके लिए उसे याद किया जाता है।'' (वही, पृ. 188)

'आखिरी कलाम' में नाटकीय कौशल एवं शातिर ढंग से लेखक तत्सत पांडे के साथ कारसेवकों की गुंडागर्दी, मठाधीश महंत अचेतानंद की अपराधी वृत्ति और भीड़ के उन्मादी चरित्र के बीच मियाँ जमील जैसे उत्पीड़ित पाँच मुसलमानों की कथा को मार्मिक संस्पर्श देकर प्रस्तुत करता है, वह पाठक को बिना छुए दो अन्य चरित्रों की याद दिलाता है। एक, तमाम लेखकीय पक्षधरता एवं प्रयास के बावजूद तत्सत पांडे की उभर-उभर पड़ती कुटिल धूर्त, आत्मरतिग्रस्त अहंवादी छवि जहाँ के निखूट अँधेरों में अपने से इतर हर दूसरे का प्रवेश निषिद्ध है। दूसरे, वामपंथियों की नेकनीयती और परिवर्तनकामी सोच की धज्जियाँ उड़ाती मिसिर जी की निहायत बेशर्म उपस्थिति जो एक ओर महंत की मानसिकता का विस्तार बनती है तो दूसरी ओर तत्सत पांडे के पाखंड को समझने का उपयोगी उपकरण। जाहिर है तब मर्मांतक पीड़ा भाजपा की भगवा नीतियों की वजह से नहीं होती, सेकुलर और क्रांति के अग्रदूत कहाए जाने वाले वामपंथी दल के क्रमिक चारित्रिक विघटन के कारण होती है जिसकी मूल्यहीन जड़-जर्जर पार्टी लाइन ने आशा एवं नेतृत्व की तमाम सकारात्मक संभावनाओं को विनष्ट कर दिया है। यह वही बिंदु है जिससे साक्षात्कार करने के उपरांत अविनाश (वे वहाँ कैद हैं) की निष्क्रिय उपस्थिति, शरद-हनीफ (हमारा शहर उस बरस) की किंकर्तव्यविमूढ़ता और 'उन्माद' के 'मैं' की कहीं कमिट न करने की शाइस्तगी को समझना आसान हो जाता है।

फिर भी यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि आशा मनुष्य का सबसे बड़ा हथियार है और लचीलापन उसका सबसे बड़ा गुण। वह जानता है कि ध्वंस और द्वेष जीवन का अथ और इति नहीं, बल्कि जीवन इन्हीं के बीच से निकलता है और इन्हें आक्रांत कर अबाध गति से बहता चलता है। इसलिए मनुष्य की चिंता जीवन को सुंदर बनाने की होनी चाहिए जो स्थिति के सतत विश्लेषण के साथ उसके नवीनीकरण में निहित है, स्थिति को यथास्थितिवाद की चौहद्दियों में घेरने के पूर्वग्रह में नहीं। मनुष्य की वैयक्तिक आस्था के रूप में धर्म वरेण्य है किंतु धार्मिक राष्ट्र के रूप में किसी देश की पहचान अपने साथ अनेक समस्याएँ और खतरे ले आती है। हिंदी उपन्यासकारों एवं समाजशास्त्रियों ने भारतीय संदर्भ में 'हिंदू राष्ट्रवाद' की सत्ता के साथ उभरने वाली चुनौतियों के रूप में हिंदू वर्णाश्रम व्यवस्था के बढ़ते प्रभाव को देखा है जो विषमता और दमन के सहारे अपनी सत्ता कायम रखता है। विष्णु नागर 'हिंदू राष्ट्र के मायने' शीर्षक लेख में अपनी आशंकाओं को सवालों की बौछार के रूप में प्रस्तुत करते हैं कि ''यह तो स्वयंसिद्ध है कि यह 'हिंदू राष्ट्र' मुस्लिम ईसाई, पारसी आदि धार्मिक अल्पसंख्यकों का विरोधी, बल्कि दुश्मन होगा। लेकिन क्या यह 'हिंदू' माने जाने वाले हरिजन, दलितों, पिछड़ों का अपना होगा? ...क्या इसमें ऐसी स्पष्ट व्यवस्थाएँ होंगी जो ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था के आधार को मजबूत करने के बजाय उसे खत्म करें? क्या उसमें स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार होंगे। ...क्या उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित होगी? ...क्या उसमें सबको शिक्षा का समान अधिकार होगा? कहीं 'मनुस्मृति' के तहत हरिजनों-स्त्रियों के कान में सीसा डालने की व्यवस्था तो नहीं होगी? क्या उस राष्ट्र का आर्थिक आधार गांधीवादी दर्शन होगा क्योंकि नेहरूवाद तो उनके लिए गाली है?''31 विष्णु नागर की चिंता तब और भी बढ़ जाती है जब वे सती प्रथा का समर्थन करने और मस्जिद गिराने के लिए आग उगलती राजमाताओं और साध्वियों को देखते हैं, लेकिन औरत के हक में लड़ने वाली एक भी शख्सियत ढूँढ़ नहीं पाते। जाहिर है सांस्कृतिक महिमामंडन के बहाने यह स्थिति स्त्री को पुनः चारदीवारी के पीछे ढकेल देने की मीठी साजिश है जिसकी परिधि बढ़ कर कल किसानों, मजदूरों, भूमिहीनों और असंगठित समूह के कर्मचारियों को भी घेर लेगी। विष्णु नागर के आक्रोश को लेखकीय सरोकार बनाते हुए भगवान सिंह ने 'उन्माद' में डॉ. वर्मा और रतन की बहस के जरिए इस तथ्य को रेखांकित करने का प्रयास किया है कि 'हिंदू राष्ट्र' का नारा उछालने वालों को यदि सचमुच ''हिंदू समाज से प्रेम होता तो सबसे पहले इस चिंता से कातर होते कि कम से कम इस समाज में कोई दीन-हीन, कातर, असुरक्षित, रोग से घिसटता हुआ और दवा से वंचित व्यक्ति न रहे।'' (पृ. 209) कीर्तनों और धर्म-प्रवचन सभाओं में स्त्रियों के यौन शोषण की अंतर्कथाएँ नियोजित कर वे स्त्री की स्वतंत्र अस्मिता को कुचल कर 'मादा देह' बना डालने की कुत्सित चालों को भी संकेतित करते हैं। गीतांजलि श्री एवं प्रियवंद हालाँकि स्याह भविष्य की ऐसी कोई भी तस्वीर उकेरने से बचते रहे हैं, लेकिन 'वे वहाँ कैद हैं' में प्रियंवद प्रातू-बिज्जू के आठवर्षीय अपंग (शारीरिक-मानसिक दोनों दृष्टियों से) बेटे जीवन की परिकल्पना कर यह संकेत अवश्य देते हैं कि आपसी नफरत की नींव पर खड़ा समाज यकीनन जीवन की तरह अपंग और लाचार होगा - अपनी ही सीमाओं में घिर कर हाँफता-घिघियाता, मौत की प्रतीक्षा में अधीर। नहीं, ऐसी किसी भी प्रत्याशा के साथ अपनी कथाकृति को समापन के बिंदु पर नहीं छोड़ना चाहता रचनाकार। पात्रों में भले ही सृजन का विश्वास न हो, उनमें है। इसलिए दद्दू से सहमत हो वे मानते हैं कि ''कहानी घटना के ब्यौरे में नहीं होती, उससे उपजने वाली नई और अलग दुनिया में होती है। वह नहीं गढ़ी तो कुछ नहीं।'' (हमारा शहर उस बरस, पृ. 76) और दादू के साथ इस विश्वास को सींचते हैं कि ''रचना समाज नहीं गढ़ती, संवेदना गढ़ती है, दृष्टि देती है और वह भी व्यक्तिगत, सामूहिक नहीं।'' (वे वहाँ कैद हैं, पृ. 29) इसलिए पूरे उपन्यास में प्रत्यक्षतः हाशिए पर पड़े रहने के बावजूद उपन्यास बंद होते ही पाठक की अंतश्चेतना में वे अपनी प्रेरक जीवंतता के साथ सशरीर उपस्थिति हो जाते हैं - एनी की तरह, जिसने सात वर्ष की अवस्था में नाजियों की बंदूक में पहली बार मौत को देखा तो अपने अनाथ जीवन को 'मृत्यु के विरोध में, जीवन के नाश के विरोध में, उसकी गरिमा के क्षरण के विरोध में' समर्पित कर दिया। जीवन की विराटता के प्रति आसक्त उसकी दृष्टि में मृत्यु मानो थी ही नहीं, थी भी तो 'शव एक फूल है' की तरह जो 'नई शाख पर फिर खिलने की प्रतिज्ञा के साथ' अपने को हजारों बीजों में विभक्त कर देता है। (वही, पृ. 124) या सुधामय की तरह जिसके लिए 'मनुष्य' से बड़ा इस दुनिया में कोई नहीं। 1971 के मुक्ति युद्ध में यौनांग काट दिए जाने जैसी अमानुषिक शारीरिक-मानसिक यातनाएँ झेल कर भी धार्मिक-राजनीतिक बर्बरताओं के प्रति निर्विकार बने रहने वाले उस 'महा-मानव' के प्रति सिर श्रद्धा से झुकता है और मन उसकी रक्षा के लिए अतिरिक्त रूप से चिंतित हो उठता है क्योंकि ''इतनी सतता, इतनी सरलता, इतना स्वस्थ चिंतन, गंभीर भावना और प्यार, इतनी असांप्रदायिकता को ढोकर आजकल कोई जिंदा नहीं रहता।'' (लज्जा, पृ. 54) या अखबारनवीस बाबू पेंटर की तरह जो सीधा-सादा आडंबरहीन कर्मयोगी है। अपनी मजहबी पहचान, चोट और कचोट को भूल कर (वह हनीफ या उसकी पत्नी श्रुति की तरह लाउड नहीं है, बल्कि उसका मुसलमान होना पाठकों के साथ-साथ उपन्यास के पात्रों के लिए भी चौंका देने वाली जानकारी है) दंगों के बीच 'पीस मार्च' जैसे आयोजनों और लोगों के गुस्से को शांत करने की युक्तियों में निस्पृह भाव से लगा रहता है। उस दौरान जब नाम ही इनसान की पहचान बन गई हो, वह किसी सेकुलर मुस्लिम का गुणगान कर या मठ की संकीर्णता के तथ्य बखान कर शांत होती हिंदू मैजोरिटी को भड़का नहीं सकता क्योंकि ''अभी जो हवा है, उसमें क्या कैसे कहें, इस पर गौर करना ही पड़ेगा। लोगों के कान खोलने हैं, न कि बंद करने हैं'' (हमारा शहर उस बरस, पृ. 169)। वह वह जानता है कि एक बहुत बड़ी जमात ऐसे संवेदनशील लोगों की भी है जो मीडिया के 'उदार बनाम दोगले' चरित्रा पर विश्वास न टिका पाने की वजह से मठ की बात सुनते चले जाने को अभिशप्त हैं, इसलिए पहले इन्हें विश्वास में लेना होगा और फिर स्वयं तथ्यों-आँकड़ों के सहारे सूरते-हाल की बोलती तस्वीर का विश्लेषण करने को प्रेरित। कहना न होगा कि ''मेरी मुसलमानियत जबरदस्ती मुझ पर लद गई है'' जैसे शहादती जुमले बोलने वाले हनीफ का विलोम रचते हुए बाबू पेंटर कबीर का प्रतीक बन जाता है - समाज से निरासक्त और समाज में निरंतर सक्रिय।

वायु और पानी की तरह अपने को जीवन के लिए नितांत अनिवार्य बनाते हुए ये पात्र न ठोस है, न निश्चित आकार में बंधे। पारदर्शी और सर्वव्यापी होकर ये व्यक्ति की ऊर्ध्व चेतना का रूपक बनते हैं और किसी भी नई संसृष्टि की नींव का पुख्ता आधार भी। इनकी महत्ता और वांछनीयता निरंतर गत्यात्मकता में है जो हर प्रकार के स्थिरीकरण-सामान्यीकरण का विरोध करते हुए आकार और प्रकार की सारी श्रेणियों को ध्वस्त करती है। शायद इसीलिए इनकी पहचान इनकी महक में है जो व्याप्त होते हुए भी अपरिभाषेय है। इसी पहचान को ताजा रख कर जीना जीवन को ध्वंस के कगारों से लौटा लेने का उद्यम है जो हर संघर्ष को रचनात्मकता का बाना पहनाता है और हर द्वेष की तह में छिपी रागात्मक झंकारों की अपेक्षाओं को उभारता है। बहौल दद्दू इसे कोई निश्चित नाम या आकार देना अपनी ही जड़ों को काटना है क्योंकि ''पहचान को गाढ़ी लकीरों से आकार बना कर किसी टुकड़े में घुसेड़ोगे तो पहचान नहीं, बेकार-बेजान कटआउट रह जाएगा, कि पहचान तो बाहर फूटती और फैलती और खुले में विचरती, हर चीज से लिपटती, घुलती रोशनी है, जिसे किसी टुकड़े में बंद करोगे कि विशुद्ध अस्तित्व बनेगा तो बस बुझ जाएगी और मरा हुआ आकार रह जाएगा। मांस का घिनौना लोथ।'' (हमारा शहर उस बरस, पृ. 8) फिर यह सारी उठापठक-ऊहापोह किसलिए - एक स्वर में एक ही सवाल उठा रहे हैं ये चारों उपन्यास! कहीं भीतर-बाहर के अँधेरों से जूझने के लिए अंतस की लौ बुझ तो नहीं गई न?

 

संदर्भ

1. ''अपने मुसलमानी नाम के लिए मैंने अपना सिर शर्म से झुका लिया है। ...मनुष्य की मनुष्यहीनता की वजह से मेरा इनसान होने का परिचय मानो मुझ पर व्यंग्य कर रहा है।'' तसलीमा नसरीन, द्विखंडित, पृ. 346.347

2. ''देश में सांप्रदायिक प्रीति का अभाव है, इसीलिए यह किताब रची गई है ताकि सांप्रदायिक प्रीति की सृष्टि हो, ताकि किसी भी इनसान पर, भिन्न धर्म में आस्था रखने की वजह से किसी तरह का जोर-जुल्म न बरसाया जाए।'' तसलीमा नसरीन, द्विखंडित, पृ. 362

3. प्रियंवद, वे वहाँ कैद हैं, पृ. 133

4. अयोध्या और उससे आगे, संपा. राजकिशोर, 'धार्मिक राष्ट्रीयता बनाम आर्थिक राष्ट्रवाद', किशन पटनायक, पृ. 142

5. वही, मधु किश्वर, 'सांप्रदायिक हिंसा से संघर्ष कैसे करें', पृ. 155

6. भगवान सिंह, उन्माद, पृ.144

7. ''वे (गांधी जी) हिंदू थे - हिंदू राष्ट्रवाद के मुखर विरोधी हिंदू। हिंदू होने पर गर्व के साथ-साथ आलोचनात्मक विवेक से संपन्न हिंदू। ...हिंदू होने का अर्थ मुसलमान से घृणा करना नहीं, बल्कि सर्वधर्म समभाव में सक्रिय विश्वास होना चाहिए - ऐसा मानने वाले हिंदू। गांधी जी संभवतः पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने यह बात समझी और समझाई कि आधुनिक भारत में सेक्युलरिज्म का मतलब सिर्फ यह नहीं कि सरकार धर्म से उदासीन रहे, बल्कि यह है कि विभिन्न धार्मिक आस्थाएँ एक-दूसरे के प्रति खुलापन रखें। एहसान के तौर पर नहीं, कर्तव्य के रूप में।'' अयोध्या और उससे आगे, संपा. राजकिशोर, पुरुषोत्तम अग्रवाल, 1948 और 1992 का फर्क', पृ. 39

8. भगवान सिंह, उन्माद, पृ. 148

9. तसलीमा नसरीन, द्विखंडित, पृ. 54

10. उल्लेखनीय है कि इसीलिए किरणमयी न सिंदूर लगा सकती है, न सुहाग की लोहा, शंख की चूड़ियाँ पहन सकती है। यही नहीं सुधामय को भी धोती की बजाय पाजामा पहनना पड़ता है। तसलीमा नसरीन, लज्जा, पृ. 56 एवं 82

यही नहीं सरकारी नौकरियों में यथासंभव हिंदुओं की भर्ती नहीं की जाती, और यदि कभी ऐसा हो भी जाए तो उन्हें पदोन्नति नहीं मिलती। उच्चतम सेवाओं में उनकी संख्या नगण्य है। तसलीमा नसरीन, लज्जा, पृ.20 एवं 44

11. अयोध्या और उससे आगे, संपा. राजकिशोर, मस्तराम कपूर, 'धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति', पृ. 104

12. ''हिंदुओं के स्वार्थ रक्षकों को क्या मालूम नहीं है कि कम से कम दो-ढाई करोड़ हिंदू बांगलादेश में हैं? सिर्फ बांगलादेश में ही क्यों, पश्चिम एशिया के प्रायः सभी देशों में हिंदू हैं। उनकी क्या दुर्गति होगी, क्या हिंदू कठमुल्लों ने कभी सोचा भी है?'' तसलीमा नसरीन, लज्जा, पृ. 7

13. ''पुलिस अगर बैठानी ही थी तो 6 दिसंबर की रात को ही क्यों नहीं बिठाई गई?'' तसलीमा नसरीन, द्विखंडित, पृ. 345

14. ''मार पाऊँगा या नहीं, यह बाद की बात है, पर मार सकता हूँ, यह भय पैदा करना बहुत जरूरी हो गया है अब।'' प्रियंवद, 'वे वहाँ कैद हैं', पृ. 21

15. हमारा शहर उस बरस, पृ. 66

16. कुर्रतुल ऐन हैदर, आग का दरिया, भूमिका

17. प्रियंवद, वे वहाँ कैद हैं, पृ. 24

18. गीतांजलि श्री, हमारा शहर उस बरस, पृ. 29

19. ''जानते हो यह झंडा कहाँ कहाँ गाड़ेंगे? तुम्हारी बिटिया की जाँघों के बीच में ...लो देखो झंडा।'' लड़के ने एक झटके से दादू का हाथ खींचा और शिश्न से छुआ दिया।'' प्रियंवद, वे वहाँ कैद हैं, पृ. 108

20. ''धर्म जीवन में महत्वपूर्ण समझा जाता है, लेकिन प्रेम दिखावटी धर्म से बहुत ऊँची चीज है।'' कुर्रतुल ऐन हैदर, आग का दरिया, पृ. 96

21. भगवान सिंह, उन्माद, पृ. 189

22. गीतांजलि श्री, हमारा शहर उस बरस, पृ. 315

23. ''तुम भेदभाव नहीं करते, हम करते थे, मगर हम हिंदू-मुसलमान में कहीं ज्यादा अपनापा था।'' गीतांजलि श्री, हमारा शहर उस बरस, पृ. 60

24. ''न समाज की खबर, न संस्कृति की, मगर लंबे-लंबे बयान चलाएँगे। शब्दों का मायाजाल खूब रचना आता है तुम्हारी पीढ़ी को। ...जब तक चुप रहना नहीं सीखोगे तुम लोग, कुछ देर शब्दों से अलग होकर नहीं बैठोगे, कहाँ से कुछ घुसेगा अंदर? शब्दों से परे ही तो असल है, जीवन है, आत्मा है।'' गीतांजलि श्री, हमारा शहर उस बरस, पृ. 146

25. ''धर्म हल्लेबाजी है ही नहीं... धर्म अपने रीति-रिवाजों से लोगों को जुड़ने का सुंदर सलीका देता है... कट्टरता धर्म का हिस्सा नहीं है, प्रभुत्व का है ...मैं भगवान को नहीं पहचानता था, पर भक्त था।'' गीतांजलि श्री, हमारा शहर उस बरस, पृ. 262

26. अयोध्या और उससे आगे, संपा. राजकिशोर, सच्चिदानंद सिन्हा, 'धर्मनिरपेक्षता : परंपरा और प्रासंगिकता', पृ. 118-120

27. ''तुम हिंदू हो, किसने कहा? तुम मनुष्य हो। मनुष्य से बड़ा इस दुनिया में कोई नहीं।'' तसलीमा नसरीन, लज्जा, पृ. 102

28. ''मृत्यु के लिए एक तरह का विरोध उसके अंदर जन्म लेने लगा। जहाँ मृत्यु है, वहाँ वह झपट पड़ती उस पर, उसे पराजित करने के लिए। ...मनुष्य जीवन का महत्व उसके लिए बढ़ने लगा, एक जिद की तरह। ...किसी भी मनुष्य जीवन को लेकर एक अद्भुत आस्था जन्म ले चुकी थी उसके अंदर।'' प्रियंवद, वे वहाँ कैद हैं, पृ. 123

29. ''शायद हम सभी की माँ सेकुलर रहीं और बाप कट्टर, तभी इतनी सादगी से हम दोगली संतान थे।'' गीतांजलि श्री, हमारा शहर उस बरस, पृ. 254

30 . प्रियवंद, पृ. 73

31. अयोध्या और उससे आगे, संपा. राजकिशोर, विष्णु नागर, हिंदू राष्ट्र के मायने, पृ. 64


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