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कहानी

बिल्ली नहीं दीवार
हरि भटनागर


यह एक अजीब सी बात है कि मैं अपने दरवाजे पर खड़ा नहीं हो पाता। खड़ा होता हूँ तो गुस्से से भर जाता हूँ और उसका असर यह होता है कि मैं सामान्य नहीं रह पाता। लगता, किसी को नोच खाऊँगा। उसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा। यही वजह है कि दाँत पीसता हुआ मैं भद्दी गालियों की बौछार करने लगता हूँ।

ऐसे में कोई मुझे देखे तो निश्चय ही यह धारणा बना ले कि मैं कोई खब्ती हूँ। खब्ती ही ऐसी हरकत कर सकता है या यह सोचे कि मैं कोई जुनूनी हूँ - हिंसक-हत्यारा, लेकिन भाईजान, इनमें से मैं किसी सीगे में नहीं आता। एक निहायत सीधा-साधा इनसान हूँ। निम्न-मध्य तबके का हिंदुस्तानी इनसान जो दस बजते-बजते ऑफिस के लिए निकल पड़ता है, दिन भर ऑफिस की मेज पर मक्खियाँ मारता है या काम में भिड़ा रहता है। सच बात तो यह है कि मैं कोशिश में रहता हूँ कि कम से कम काम मिले - कम से कम काम करूँ। और इस कोशिश में मैं सफल भी होता हूँ। मुझे बहुत ही कम काम करने को मिलता है। लेकिन मैं रोता ज्यादा हूँ। हाहाकार ज्यादा करता हूँ कि काम के बोझ से मरा जा रहा हूँ। दूसरे बाबुओं को नीचा दिखाने में ज्यादा वक्त लगाता हूँ और सोचता हूँ कि बड़ी फतह हासिल कर ली। शाम होते-होते मैं घर पहुँचता हूँ और उटकापेंची में लग जाता हूँ। पत्नी को प्यार भी करता हूँ, झगड़ता भी हूँ। बच्ची के साथ भी यही सुलूक करता हूँ... कहने का लुबलबाब यह कि मुझमें अच्छाइयाँ कम से कम और बुराइयाँ ज्यादा से ज्यादा हैं। खैर, इन सब बातों का खुलासा यह है कि मैं अपने दरवाजे पर सहज-सामान्य नहीं रह पाता तो उसकी खास वजह है। उसका एक मुख्तसर-सा किस्सा है।

मेरे घर के बाजू में पहले एक गली थी। चालू रास्ता था। पानी निकास की व्यवस्था न होने के कारण अगल-बगल के घरों का गंदा पानी धीरे-धीरे यहाँ भरने लगा। कीच और जंगली घास-पात और बेशरम के झाड़ ने अपने पैर जमाए - यही वजह थी कि रास्ता पूरी तरह से बंद हो गया। यह अपने आप, सहज रूप में हो गया। किसी ने रास्ता बंद करने के लिए कोई हिकमत-जुगाड़ न की। खैर, यह सब हो गया और किसी ने इस तरफ ध्यान भी न दिया। दिक्कत तो तब खड़ी हुई जब इस जगह पर खालिद ने अपना हक जतलाकर, कमरा बनाना चाहा। ईंट-गिट्टी सीमेंट-रेत सब सामान आ गए और नींव खोदी जाने लगी। मेरा माथा ठनका। यह असहनीय बात मैंने पत्नी से कही। पत्नी ने आँखों में रोष भरा। यकायक हम दोनों गुस्से में आ गए। हम नहीं चाहते थे कि खालिद यह जगह हथियाए। बस क्या था, बदहवास-सा मैं बाहर आया और चीखकर मजदूरों से काम रोकने के लिए कहा। मजदूरों ने जब मेरी चीख पर ध्यान न दिया तो मैं और जोरों से चीखा। इस पर एक मजदूर जो बदन पर सिर्फ गमछा बाँधे था, और पसीने से तर जैसे नहाकर आया हो, बोला - मैं तो मजदूर हूँ साहब, मियाँ साहब से कहें जो यह काम करवा रहे हैं। मैंने कहा कि तू बुला उन्हें। उसने कहा कि - मैं क्यों बुलवाऊँ। इतने में खालिद आ गया। बोला - क्या बात है? मैंने कहा कि यह काम बंद करवा दीजिए। उसने पूछा -क्यों? मैंने कहा - इसलिए कि यह जगह मेरी है! उसने पूछा कि आपकी कैसे है? मैंने पूछा कि आपकी कैसे हैं? बस यह पूछा - पाछी तू-तू, मैं-मैं से निकल फुँफकार में बदल गई। वजनी गालियों का आयात-निर्यात होने लगा। मैं तड़प उठा। सीमेंट की बोरियों पर पानी का ड्रम उलटना चाहा। कोशिश की लेकिन उसको हिला न पाया। हारकर मैंने बाल्टी उठाई और सीमेंट की बोरियों पर दो-चार बाल्टी पानी डाल दिया। इसके जवाब में खालिद ने दौड़कर दाँत पीसते, गालियाँ बकते हुए मुझे एक जबरदस्त रसीद किया।

मेरे वजूद की चूलें हिल गईं। तेरी मियाँ की... मैं बेकाबू था। साँस बेतरह चलने लगी। होंठ भिंच आए और बदन में गुस्से की वजह से खिंचाव आ गया। बदहवास-सा मैं घर के अंदर दौड़ा गया और फरसा उठा लिया। इस बीच खालिद भी घर से लट्ठ ले आया।

युद्ध छिड़े इसके पहले ही पड़ोसियों ने हमें पकड़ लिया। हम हथियार नहीं चला सकते थे लेकिन हमारी जबानें किसी घातक हथियार से कम न थीं। दोनों घरों के अन्य सदस्य भी यही हथियार चलाने लगे।

खैर, कोई हिंसक वारदात हो पाती, इसके पहले ही पुलिस आ गई और हमें पकड़कर ले गई।

थोड़ी देर बाद हम छूटकर आ गए लेकिन मैं जो चाहता था, वह काम हो गया। पुलिस ने फिलहाल ऊपरी आदेश के पालन के तहत सरकारी संपत्ति घोषित करते हुए उस जगह की कंटीले तारों से घेराबंदी कर दी और किसी भी तरह का निर्माण कानूनन अपराध का बोर्ड लगा दिया।

जैसा कि मैंने कहा, मैं जो चाहता था, हो गया। और वह भी हो गया जिसे नहीं होना था। खालिद से हमारी जिगरी दोस्ती थी - मिट्टी में मिल गई। हम एक-दूसरे के जानी दुश्मन हो गए। एक-दूसरे की शक्ल देखना हमें गवारा न था। एक-दूसरे के नाम से हमें घिन थी। गुस्सा था, नफरत थी।

यही वजह थी कि मैं दरवाजे पर सहज-सामान्य नहीं रह पाता।

लेकिन आप सहज हो या असहज बच्चों को इससे क्या लेना-देना। मेरी चार वर्षीय बेटी, सिल्लू मेरा हाथ पकड़कर खींच रही है और मुझे बाहर चलने के लिए कह रही है। मैं हूँ कि जाना नहीं चाहता। वह जिद में है। रो पड़ती है। फर्श पर लोट जाती है, ठुनकती है।

- चले जाइए, ऐसा भी क्या है? - पत्नी कहती है।

- कहाँ जाऊँ?

- सिल्लू जहाँ कह रही है।

विवश-सा मैं सिल्लू को गोद में लिए बाहर आता हूँ।

-कहाँ चलना है?

- बो वहाँ।

कहाँ?

सिल्लू अपना कोमल हाथ घिरी जगह की ओर उठाकर इशारा करती है - वहाँ! और फिर ठुनकते लगती है जैसे मैं वहाँ नहीं जाऊँगा।

सिल्लू की जिद अब समझ में आई। बिल्ली का निहायत सुंदर चितकबरा बच्चा था जो उनींदा सा कंटीले तारों के पीछे निषिद्ध जगह पर बैठा था, सिल्लू उसे देखना और गोद में लेना चाहती थी।

मुझे इस बात की कचोट हुई कि जिस जगह पर जाने की सख्त मनाही है, वहाँ एक बिल्ली आराम से बेफिक्र बैठी है और इनसान होकर मैं वहाँ जा नहीं सकता!

सिल्लू फिर ठुनकी कि मैं मनाही को माथे की सल से परे ठेलता बागड़ की तरफ बढ़ा।

जीभ से च-च-च कर मैंने बिल्ली के बच्चे को अपनी तरफ बुलाया। बिल्ली के बच्चे ने मेरी तरफ देखा और याऊँ कर अपना गुलाबी मुँह खोला। चावल जैसे दाँतों के बीच जीभ गुलाब की पांखुरी जैसी थई।

मुट्ठी में खाने का सामान होने की लालच दे मैंने फिर च-च-च किया।

सुबह की पीली धूप में बिल्ली ने उनींदी आँखें झिपझिपाई गोया कह रही हो कि क्यों तंग कर रहे हो, आराम करने दो मुझे। और गुलाबी मुँह खोलकर याऊँ किया। यकायक बागड़ से निकलकर वह धीरे-धीरे चलती हमारे पास आई और मेरी मुट्ठी की तरफ लपकी। मुट्ठी में कुछ न था, बावजूद इसके मैंने उसे बंद रखा। मेरे छूने पर बिल्ली संकुचित सी हुई। फिर पूँछ तानकर इस तरह मुझसे लिपटने लगी जैसे पूर्व परिचित हो। सिल्लू ने डरते हुए किंतु प्रसन्न होकर उसे छुआ। जवाब में उसने याऊँ किया और गुलाबी मुँह खोला।

थोड़ी देर बाद बिल्ली मेरी गोद में थी। उसे लिए मैं घर में दाखिल हुआ। पत्नी ने देखा तो बोलीं - यह क्या?

- दिख नहीं रहा है।

- दिख तो रहा है मगर बिल्ली को कहाँ से ले आए?

- बाहर से! - मैंने कहा - कान न पकड़ो - सिल्लू से कहकर मैंने पत्नी से कहा -सिल्लू इसी की तो जिद कर रही थी।

- तो क्या? पत्नी प्रश्नवाचक थीं।

- पालूँगा इसे।

- बच्ची तो पल नहीं रही है, इसे पालेंगे! - पत्नी ने उलाहने के स्वर में कहा।

- बच्ची भी पलेगी और यह बिल्ली भी।

- दिक्कत आएगी।

- क्या दिक्कत आएगी। सिल्लू का बचा दूध पिएगी, रोटी खाएगी और बनी रहेगी।

- पड़ोसियों की है नहीं। कहीं और से भागकर आई है। कोई पूछने वाला है नहीं। घर के भीतर रहेगी... यह भी कह दीजिए आप।

मैंने हँसते हुए पत्नी के वाक्य दुहरा दिए। इसी बीच सिल्लू फ्रिज की तरफ बढ़ गई। फ्रिज खोलकर उसने दूध का भगोना उठाया। पत्नी चिल्लाई - दूध गिरा देगी। बढ़कर उन्होंने उसके हाथ से भगोना लिया। दूध कटोरे में डाला। बिल्ली के सामने रखा जिसे मिनटों में वह चटकर गई। गोश्त की एक बोटी दी जिसे वह लपककर मुँह में दाब कोने की ओर बढ़ गई।

रात में बिल्ली हमारे बिस्तर में सोई। सिल्लू उस पर हाथ रखे थी।

***

दो-चार रोज में बिल्ली हमसे इतनी घुल-मिल गई जैसे हम पुराने मित्र हो। हम लोगों के साथ उसका स्नेह था ही लेकिन सिल्लू से वह ज्यादा हिल गई थी। हर वक्त वह सिल्लू की गोद में आँखें मींचे बैठी रहती। तरह-तरह के खेल करती। अब वह हमारी दिनचर्या का अटूट हिस्सा थी। हमारे साथ उठती-बैठती, खाती-पीती, खेलती-सोती। अमूल्य पूँजी थी वह हमारी।

एक दिन शाम को जब मैं आफिस से लौटा, स्कूटर टिका रहा था तो पत्नी ने कहा - आज बिल्ली दिन भर गायब रही, खालिद के यहाँ थी।

- खालिद के यहाँ! आश्चर्य मिश्रित क्रोध से मैंने आँखें फाड़ी और घर में दाखिल होते हुए कहा - तुमने देखा था?

- हाँ, अच्छे से! मैंने बुलाया भी तो वह आई नहीं - पत्नी ने शिकायत की।

- तो तुम्हें दरवाजे बंद करके रखने चाहिए।

- दरवाजे तो बंद थे, पता नहीं कैसे निकल गई।

बिल्ली सिल्लू की गोद में आँखें मींचे बैठी थीं। मैंने उसके मुँह पर हल्की चपत लगाते हुए कहा कि आगे से अब बाहर न जाना और उस गंदे मियाँ के घर तो हरगिज नहीं। गई तो पिटाई होगी। समझी!

चपत से बिल्ली ने आँखें खोलीं। याऊँ के साथ गुलाबी मुँह खोल दिया जैसे कह रही हो कि ठीक है, अब नहीं जाएँगे।

मैं खुश हुआ।

लेकिन दूसरे दिन शाम को जब मैं आफिस से लौटा, तो पत्नी ने वहीं शिकायत दुहराई।

मुझे बिल्ली पर गुस्सा आ गया। सिल्लू की गोद से लेकर मैंने उसे मेज पर बैठाया। मुँह पर एक चपत दी कि आगे से उस मियाँ के घर गई तो खैर नहीं। जानती है वह अपना जानी दुश्मन है। तू कहीं भी जा, मगर उस जालिम के यहाँ कतई नहीं। समझ गई? कहकर मैंने बिल्ली के कान पकड़े। खींचे। उसने निरीहता से मुँह खोला और दुबककर बैठ गई जैसे कह रही हो कि ठीक है, आगे से नहीं जाएँगे। बिल्ली आँखें बंद करती है, मैंने उसकी बात मान लेता हूँ और पत्नी को सख्त हिदायत देता हूँ कि वह ख्याल रखें और किसी भी तरह से उसे बाहर न निकलने दे।

लेकिन सबेरे जब मैंने आफिस जाने के लिए दरवाजा खोला और स्कूटर निकाल ही रहा था, बिल्ली दबे पाँव धीरे-धीरे दरवाजे के पास आई, पल भर को उकड़ूँ बैठी और पलक झपकते सर्र से बाहर निकल गई। मैं जोरों से चीखा। उसने परवाह न की। वह खालिद के दरवाजे की ओर बढ़ी और घर में घुस गई। मैं उसके पीछे दौड़ा और आवाजें देता रहा। लेकिन वह नहीं निकली।

पत्नी ने गुस्से में कहा - ऐसई करती है।

मैंने सिल्लू से कहा - जा उसे बुला।

सिल्लू ने कहा - मैं नहीं जाऊँगी, रजा मुझसे नहीं बोलता है।

- मैं रजा से बात करने के लिए थोड़ई कह रहा हूँ। तू तो उसे बुला ला, बाहर से आवाज लगाकर।

- नई, मैं नई जाऊँगी। रजा मारेगा।

- नई मारेगा, बेटा! जा तो।

- तुम बुला लो ना। उसने माथे पर बल डाला।

उसके जवाब पर मैं एकदम असहाय था। आफिस को देर हो रही थी इसलिए बेबस-सा आफिस निकल गया, बिना कुछ बोले। हालाँकि मन में यह बात थी कि लौटकर बिल्ली को देख लेंगे, आगे से घर से निकलना भूल जाएगी।

शाम को आफिस से लौटा तो बिल्ली सिल्लू की गोद में आराम से आँखें मीचे बैठी थी। पत्नी ने आँखें तरेरकर कहा - ये आ गई तुहारी चहेती। इतनी शरीर है कि कुछ कहते नहीं बनता।

मैं गुस्से से भरा था। बोला - मैं भी कम शरीर नहीं। अभी रास्ते पर ला देता हूँ। आगे से बाहर निकलना ही भूल जाएगी।

बिल्ली को मैंने मेज पर बैठाया। याऊँ के साथ वह मेज पर दुबक कर बैठ गई और आँखें मींच लीं।

- मैंने मना किया था कि तू उस दुश्मन के घर न जाना, लेकिन तू मानी नहीं। मेरी आँख के सामने निकल गई।

बिल्ली मूर्तिवत बैठी रही। निर्विकार जैसे कुछ सुना ही न हो।

मैंने उसे जोरों का थप्पड़ मारा कि वह मेज पर कुछ दूर तक सरक गई। यकायक उठकर खड़ी हो गई। गरदन झटककर उसने निरीह भाव से मुँह खोला और मेरी ओर देखकर याऊँ किया जैसे कह रही हो कि क्यों जबरन मारते हो? मैंने क्या किया है?

- क्या किया है! इतनी बड़ी गलती कि माफ नहीं किया जा सकता!

आगे बढ़कर मैंने बिल्ली को फिर करारा थप्पड़ मारा और इस तरह कि मेज पर सरके नहीं। मार पर बिल्ली तिलमिलाई, गरदन झटकी और सपाटे से नीचे कूदी और कोने की ओर बढ़ी।

उसकी इस बदतमीजी पर मैं गुस्से से बेकाबू हो गया। उसकी तरफ बढ़ा तो उसने पूँछ हिलाते हुए मुँह खोला जैसे कह रही हो कि क्यों मारते हो। गलती हो गई, जाने दो, आगे से नहीं जाएँगे।

- नहीं, तू ऐसे माननेवाली नहीं है। दाँत पीसते हुए मैंने उसकी पीठ की चमड़ी पकड़ी और उसे टाँग लिया। मरी खाल-सी वह झूल रही थी। मैंने उसे मेज पर बैठाया। और दाँत पीसते हुए कहा - बोल, जाएगी उस मियाँ के घर?

वह आँख मींचे बैठी रही, स्थिर।

- बोल!!

वह स्थिर।

उसके रवैये से मेरा गुस्सा और बढ़ गया। मैंने एक जबरदस्त मुक्का मारा। मुक्का पीठ पर लगा था। दर्द की वजह से वह लचककर सिकुड़ गई। आँखें खोलकर उसने मुझे देखा लेकिन पल भर बाद वह पूर्ववत थी। आँखें बंद किए जैसे कुछ हुआ न हो। दुबकी बैठी रही।

यह अवमानना जैसा रवैया था। मैंने पुनः मुक्का ताना कि वह फुर्ती से मेज से फर्श पर कूदी। मैं उसके पीछे दौड़ा। सामने कुर्सी थी। सँभलकर फुर्ती से निकला, बावजूद इसके मेरा घुटना कुर्सी से टकरा गया और मैं एक असहनीय दर्द से भर उठा। बायाँ घुटना पकड़े फर्श पर बैठ गया और बेतरह कराहने लगा।

- लग गई। पत्नी ने हमदर्दी जताते हुए कहा - खैर छोड़ो, अब आगे से नहीं जाएगी? सजा काफी मिल गई है।

दाँत पीसते हुए मैंने सिर हिलाया, मन में कह रहा था कि इस कमीन की वजह से घुटने में चोट लगी और जान निकली जा रही है, तू है कि छोड़ने के लिए कह रही है।

सिल्लू ने भी पत्नी की बात कही। लेकिन मैंने दोनों की बात पर गुस्सा जाहिर किया। बिल्ली दूसरे कमरे में भाग गई थी। मैंने किवाड़ के पीछे से डंडा निकाला लेकिन पता नहीं क्या सोचकर रख दिया। बगलवाले कमरे की ओर बढ़ा।

कमरा अगड़म-बगड़म सामानों से ठँसा था। आमने-सामने दो उघारी चारपाइयाँ थीं जो इस वक्त बिछी हुई थीं जिन पर कपड़ों के ढेर थे।

सामनेवाली चारपाई के सिरहाने एक बड़ी मेज थी जिस पर टेबुल लैंप, ढेर सारे अखबार, मैगजीन, चूड़ियों से भरा चूड़ी स्टैंड, बिंदियाँ और खाली-अधखाली क्रीम की डिबियाँ - जैसे सामान अटे पड़े थे। बहुत सारी चीजें खारिज करने लायक थीं। लेकिन मेज पर अपना हक बनाए थीं। दूसरी चारपाई के पैतियाने लोहे की बड़ी आलमारी थी जिसके हैंडिल लॉक से हैंगर और सिल्लू के हेयर बैंड लटक रहे थे। उसी के बगल गेहूँ का ड्रम था जो ईंटों पर रखा था। दरवाजे के बाजू में छोटा सा मंदिर था जिसके अगल-बगल असंख्य देवी-देवताओं के छोटे-छोटे कैलेंडर जमाए गए थे।

मंदिर से निगाह हटाकर मैंने बहुत ही सतर्कता से सामने वाली चारपाई के नीचे झाँका - बिल्ली न थी। दूसरी चारपाई के नीचे भी न थी। मेज के नीचे भी नहीं। आलमारी के नीचे देखा, वहाँ भी न थी। कहाँ गई, सोचता खड़ा हुआ। सामने देखा तो गेहूँ के ड्रम के ऊपर रजाई में दुबकी बैठी थी। आँखें खुलीं और सतर्क थीं।

पास जाकर मैंने चुमकारा तो वह स्नेह से दुम हिलाने लगी। हाथ बढ़ाया तो वह खेल के अंदाज में अगला पंजा बढ़ाने लगी।

दरवाजे पर पत्नी और सिल्लू खड़ी थीं। संभव है, बिल्ली के इस रूप से उनके चेहरों पर प्रसन्नता खेल रही हो लेकिन इस प्रसन्नता के पीछे हौल था।

यकायक मैंने चुटकी बजाते हुए उसका अगला पंजा पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींचा। उसके नाखून रजाई के खेाल में फँसे थे।

- बोल जाएगी उस मियाँ के घर। - बिल्ली को मेज पर बैठाकर मैं फिर क्रोध के हवाले था।

बिल्ली दुम हिलाते हुए चंचल थी।

मैं समझ गया कि यह बात मानने से रही। दुश्मन के घर जाएगी, जरूर जाएगी। इसकी सजा इसे मिलनी ही चाहिए - यह सोचकर मैंने उसके गले की तरफ अपना पंजा बढ़ाया, बोला - अब भी मान जा!

बिल्ली ने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया। फिर क्या था, मेरा दिमाग खराब हो गया। यकायक मैंने अपने पंजे उसकी ओर बढ़ाए। बिल्ली अभी भी खेल के मूड में थी, दुम हिलाते हुए चंचल थी, लेकिन उसे मेरे क्रोध का तनिक भी भान न था।

मैंने उसका गला पकड़ा और पंजों का शिकंजा सख्त किया, इतना सख्त कि बिल्ली तड़पने लगी। बचाव में वह इधर-उधर पंजे चलाने लगी, मगर सख्त शिकंजे के आगे वह असहाय थी। दाँत पीसता मैं शिकंजा और सख्त करता जा रहा था। आँखों में आग बरस रही थी। मुँह से भद्दी गालियाँ निकल रही थीं।

बिल्ली अभी भी बचाव के लिए प्रयासरत थी।

थोड़ी देर में बिल्ली के मुँह से एक घुटी-सी चीख निकली। जुबान मुँह के कोर तक आई जैसे बचाव के लिए कुछ कहना चाह रही हो लेकिन कोर तक आते-आते लथर-सी गई। बदन में उसके कंपन शेष था जो धीरे-धीरे डूब रहा था। आँखें ऊपर टँग गई थीं। उनमें एक ठहराव-सा व्यापता जा रहा था।

यकायक घिन से भरकर मैंने बिल्ली को फर्श पर छोड़ दिया।

पत्नी और सिल्लू उसे इस रूप में देखकर रो पड़ीं। मैं तेज कदमों से कमरे से बाहर आ गया।

दोनों रो रही थीं। मैंने कानों में उँगलियाँ ठूँस लीं। अस्पष्ट-सा रुदन सुनाई पड़ रहा था।

मेरे चेहरे पर शांति थी।


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