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कविता

पहचान
संदीप तिवारी


क्या पता?
कल तुम जब ट्रेन में हो
तुम्हारे हाथ का धागा
तुम्हारी मौत का कारण बन जाए।
क्या पता?

तुम बस में हो
और तुम्हारी टोपी हवा में
लहरा दी जाए
क्या पता?

तुम्हारा टीका
तुम्हारी हँसी
तुम्हारी दाढ़ी
तुम्हारा कुर्ता
तुम्हारा पैजामा
उनकी शिनाख्त के लिए काफी हो
क्या पता वे उठें
और इस पर टूट पड़ें
और तुम बेवजह मारे जाओ
क्या पता?

स्कूल गया तुम्हारा बच्चा
कल लौटने में देर कर दे
क्या पता इस हत्यारी भीड़ का
जो तुम्हारे सालों की मेहनत से बने इस घर को
मिनट भर में खाक कर दे
क्या पता!

मेरे प्यारे देशवासियों
उठो, चुप मत रहो
उठो,
इस हत्यारी भीड़ के खिलाफ
अपनी और सबकी जिंदगी के लिए
उठो मानवता के लिए
चुप मत रहो
उठो इस साझी संस्कृति के लिए
बोलो...
तुम बोलोगे तो बची रहेगी हँसी
बचे रहेंगे लोग
बची रहेगी खुशी
बोलो कि
मुझे मौत नहीं जिंदगी चाहिए...!


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