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कविता

बाबूजी सुनिए
संदीप तिवारी


घर जाने की सोचना
बड़ी बात हुई
और उससे भी बड़ी बात हुई
दो जोड़ी बूढ़ी होती आँखों की टकटकी
वो भी डरा देने वाली...
जानता हूँ कि पढ़ने-पढ़ाने में
घूमने-कमाने में

और लौटकर घर जाने में
बहुत विरोधाभास है...
पर जाना तो है,
इतना सोचने में ही...
एक सिरे पर घबराहट होती है
और दूसरे पर बाबूजी आप
बीच में सिकुड़ी अम्मा बैठी होती हैं
दुनिया इतना बदल रही है

बाबूजी!
क्या आप अभी भी वैसे ही हैं...
जैसा पहले थे,
किसी पहाड़ सा ठोस
नदी जितना फक्कड़
और किताबों जैसे गूढ़
क्या अब भी देर से लौटते हो घर
क्या अब भी खाने के समय
थाली और माँ के भुनभुनाने में
बचा है
उतना ही सुर और तान
क्या अब भी बोलते हो
'तुम्हारी अम्मा महान...'

बाबूजी
क्या अभी भी
गाय, भैस, बछड़े आदि
पहचान जाते हैं आपकी आवाज
और आपके खाँसने पर करते हैं - बाँ... बाँ...
हाँ... हाँ... करते ही होंगे...
आप अपनी दवा भूल जाते होंगे
पर उन्हें कौरा देना नहीं...
है कि नहीं।
मुझे नहीं पता कि मैं क्या हूँ
बाबूजी!
पर पूरी दुनिया या तो सवारी है या फिर ड्राइवर
और घर जाने की हड़बड़ी किसे नहीं है?
है... दोनों को है,
सवारी को भी और ड्राइवर को भी
फर्क इतना सा है बाबूजी
कि सवारी को जल्दी घर जाने की है
और ड्राइवर को गाड़ी भर जाने की है...


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