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कविता

यात्राएँ...
संदीप तिवारी


1.

बिना पैसे की यात्राएँ
ज्यादा रोचक होती हैं
ठीक वैसे ही,
जैसे जिंदगी!

2.

किताबें बोझ हो सकती हैं
मगर
यात्राएँ नहीं,
किताबों के पात्र
यात्राओं में
ज्यादा सहज होते हैं...

3.

किसान की भाषा में कहूँ, तो
यात्राएँ,
खाद-पानी होती हैं,
बिना इनके
लहलहाना संभव नहीं।
4 .

बिना कैमरे के भी
होती हैं
यात्राएँ,
गवाही के लिए
चाँद है, सूरज है
और तस्वीरें...
उसे रास्ते दफना के
एल्बम बना देते हैं।

5.

किताबों में बहुत हद तक
झूठ हो सकता है,
मगर यात्राएँ...
यात्राओं में ऐसा कुछ नहीं होता।
किताबों में भूत होते हैं
यात्राओं में नहीं होते,
कहीं नहीं
सिर्फ डराते हैं...

6.

कुछ करें न करें...
पर आदमी को
सूखने नहीं देती हैं,
यात्राएँ...

7.

छोटी-बड़ी नहीं होती,
सुरीली होतीं हैं
यात्राएँ...
सिर्फ यात्री पहचानते हैं,
इनके
सुर और ताल


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