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कविता

एक कवि के कच्चे चिट्ठे
संदीप तिवारी


भूख-प्यास से मुँह मुरझाए
पैदल चले, चला न जाए
भाव उठें, पर रुक ना पाएँ
सारे बिंब चिढ़ाते जाएँ
पंक्ति शुरू हो बन न पाए
एक कवि के मुर्दे पर्चे
एक कवि के छोटे खर्चे
एक कवि के कपड़े-लत्ते
एक कवि के मन के छत्ते
एक कवि का घर-परिवार
एक कवि के लड़के-बच्चे
एक कवि जो ऊबड़-खाभड़
रस्तों में खाता है गच्चे
एक कवि चीनी का बोरा
जिसको चिंउटों ने है घेरा
एक कवि की दुनियादारी
जो उसके द्वंद्वों का झोरा
एक कवि की खेती-बारी
एक कवि पर चढ़ी उधारी
एक कवि से बढ़िया जीवन
बिता रहा है एक मदारी
एक कवि की सौ चिंताएँ
एक कवि को कई बिमारी
किसे दिखाए? किसे छुपाए?
एक कवि का मैला चादर
उसके लिए कफन बन जाए।
आप मिले हैं ऐसे कवि से?
नहीं मिले हैं!
मैं भी नहीं मिला हूँ उससे...
मैंने उन पर्चों को देखा,
मैंने उन टुकड़ों को जोड़ा,
एक कवि के उन टुकड़ों के महानोट्स का छोटा हिस्सा,
दिल दहला दे...
जो भी पढ़ ले उसे हिला दे!


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