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कविता

बुरा मत मानना
संदीप तिवारी


बुरा मत मानना,
कि लाखों की तादाद में
पैदा कर रही हैं
बेरोजगार, किताबें...
बुरा मत मानना

बुरा मत मानना,
कि खयालों की दुनिया में पहुँचा कर
एक जीती-जागती दुनिया से
हमें अलग कर रही हैं, किताबें...
बुरा मत मानना

बुरा मत मानना,
कि दो कमजोर आँखें
चश्मे का सहारा लेकर
देखती हैं कई सपने,
जिन्हें बेरहमी से तोड़ देती हैं, किताबें...
बुरा मत मानना

बुरा मत मानना,
कि शक्ल कीड़े की तरह हो जाती है
और आदमी को आदमी
नहीं रहने देती हैं, किताबें...
बुरा मत मानना

बुरा मत मानना,
कि एक होशियार पाठक
जिसे अब भी मुहब्बत है तुमसे
वह चला रहा है रिक्शा
कर रहा है मजदूरी
उसके हालात का जिम्मेदार कौन है?
गुनाह किसका है और गुनहगार कौन है?
उसे चैन से सोने नहीं देती हैं, किताबें...
बुरा मत मानना

बुरा मत मानना,
कि जो सजाकर रख लेते हैं तुम्हें
वह तुम्हें देखते हैं, परखते हैं
पढ़ते कम है
गलत क्या करते हैं?
सही तो करते हैं, किताबें...
बुरा मत मानना
अब हम भी चलते हैं,
बुरा मत मानना!


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