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कहानी

चूहा
हरि भटनागर


( कवि सोमदत्त की स्मृति को)

तीन लड़के हैं। उनके नाम कद-कामद और आचरण के मुताबिक रखे गए थे। चवन्नी सिंह चवन्नी की तरह छोटे-से थे, इसलिए उनके बाप ने नाम खोजने के लिए जरा भी सिरमगजन नहीं किया। वैसे उनका घर का नाम चुन्नू था, किंतु जब उनकी बाढ़ मारी गई, तो चवन्नी गिनते-गिनते उनका नाम नवन्नी सिंह रख दिया। घर का नाम खोटा निकल गया। यही चल पड़ा।

संग्राम बचपन से ही लड़ाकू किस्म के थे। जहाँ जाते संग्राम खड़ा कर देते। खेल-खेल में किसी बच्चे का सिर लट्टू से छेद देते या सींक से आँख। इस वजह बड़े-बड़ों में संग्राम छिड़ जाता। संग्राम नाम पड़ने के पीछे यही कारण था। वैसे उनका पहला नाम बजरंगी था। लेकिन आचरण के कारण दब गया।

मुलायम सिंह रुई के फाहे की तरह मुलायम और नाजुक थे। लोगों का कहना है कि मुलायम जब पैदा हुए, तब इतने नाजुक थे कि उन्हें रुई के फाहे में लिटाया जाता था। इस वजह उनकी दादी ने इसी नाम का ठप्पा लगा दिया। हालाँकि अब अत्यंत सख्त होने के कारण लोग उन्हें बज्जर सिंह कहते।

तीनों की उमर लगभग बीस-बीस बरस की है।

चवन्नी सिंह ने बीस बरस की उमर में कई बार उस्तरा फिरवाया फिर भी दाढ़ी-मूँछ नहीं आई, तो सिर घुटवा लिया। सिर्फ चुरखी भर रहने दी। घुटे सिर पर वे लाल अँगौछा पगड़ी की माफिक बाँधते हैं। कभी कुर्ता-पायजामा पहनते, कभी कुर्ता-लुंगी, कभी कुर्ता-पैंट। लेकिन वे जूता-चप्पल कतई नहीं पहनते। उन्होंने शपथ ली थी - काली माई के सामने। जब तक हाईस्कूल पास नहीं कर लेंगे, जूता-चप्पल नहीं पहनेंगे। चार साल लगातार फेल हुए। पढ़ाई से दिल टूट गया, किंतु शपथ से नहीं। उनकी तमन्ना थी कि हाईस्कूल पास करके शहर के किसी कॉलेज में पढ़ेंगे, किंतु असफलता ने उनकी तमन्ना को पंगु बना दिया। उन्होंने ठेकेदारी करने की सोची, किंतु यह काम न करके उन्होंने शहर में एक बहुत बड़ी मोटर-पार्ट्स की दुकान खोल दी। उनमें यह सोच तब जागी जब गाँव के ही एक ठाकुर ने शहर में स्कूटर-पार्ट्स की दुकान खोली। उन्होंने उसे - चंद्रवंशी को - नीचा दिखाने की खातिर दुकान में स्कूटर-पार्ट्स भी रखे, साथ ही अपने से - सूर्यवंशी से - सैकड़ों कदम नीचे बरकरार रखने की मन में ठान ली। लेकिन दुकान में आने वाले फटे, गंदे कपड़ों में लिपटे, नींद से बोझिल ड्राइवरों और क्लीनरों के बात करने के भद्दे ढंग, बंदरों की तरह खसर-खसर खुजलाने और मुँह पर ही छींक देने के कारण वे इस काम से ऊब गए। ऐसा नहीं था कि वे गाँव में हरवाहों-चरवाहों का इसी तरह का आचरण बरदाश्त करते रहे हों। वहाँ वे उनकी छाया से कोशिश भर दूर रहते थे, किंतु यहाँ ऐसा संभव न था। एक दिन एक सिख ने जो लंबा सफर तय करके आया था, पसीने और धूल से लिपटा, ठीक मुँह पर खटांध भरी डकार छोड़ी कि उनका जी मितला उठा। वे सिख की इस हरकत से कई दिन परेशान रहे। दुकान से जी उचट गया। एक दिन घर-गाँव चले आए। फिर वापस नहीं गए। बाप ने दूसरे धंधे के लिए कई बार ठेला, किंतु वे टसके नहीं। अब वे गाँव में ही रहते हैं।

संग्राम सिंह जब हाईस्कूल थर्ड क्लास पास हुए, तो उनके बाप ठाकुर रणबहादुर सिंह ने पूरे गाँव को दावत दी। रणबहादुर के पिता बहुत बड़े जमींदार थे। उनके पास कारूँ का खजाना था। सैकड़ों बीघा जमीन थी। सैकड़ों पक्के मकान, वह भी शहर में। रणबहादुर खुद एक दर्जा भी नहीं पढ़े थे, किंतु लड़के को पढ़ा-लिखाकर गवर्नर बनाना चाहते थे। इसीलिए संग्राम को शहर के अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलाना तय किया और इसी खुशी में सारे गाँव को दावत दी जिसमें उन्होंने हुक्का गुड़गुड़ाते, गिलहरी की पूँछ की तरह मूँछ में मुस्कुराते हुए कहा था कि ठाकुर चंदबली का लड़का इम्तहान में एक लकीर पाया है जबकि हमारा लड़का तीन लकीर पाया है! तीन! हम उसे गौरनर-बरिस्टर बनाएँगे ताकि दुनिया देख ले कि ठाकुर के यहाँ खालिस लक्ष्मी ही नहीं, सरस्वती भी वास करती हैं।

तीन लकीर का आशय वे तब समझ पाए जब संग्राम ग्यारहवें में बुरी तरह फेल हो गए।

संग्राम को शहर की हवा लग गई थी। शुरू-शुरू में जब वे साधारण वेश में क्लास में आए, तो साथ पढ़तीं बड़े-बड़े घरों की लड़कियों ने उन्हें देहाती समझा। साथ ही देखना तो दूर, बात करना पसंद न किया। जबकि दूसरे सूटेड-बूटेड लड़कों से खूब चोंच लड़ातीं। संग्राम को यह बात खल गई। उन्होंने गहन चिंतन-मनन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि फैशनुबेल लड़कों पर ही लड़कियाँ मरती हैं। वे तुरंत ही नए फैशन में ढल गए। उन्होंने नई कॉट की दर्जनों पैंट-कमीज और रंग-बिरंगी टाइयाँ खरीदीं। दसियों कोट सिलवाए। कुछ ही दिनों में उनकी क्लास की एक लड़की से मुहब्बत हो गई। लड़की गुलाब की पाँखुरी की तरह हल्की और नाजुक थी। संग्राम चौबीसों घंटे उसी के ख्वाब में डूबे रहते। दुर्भाग्य से सालाना इम्तहान के एक माह पूर्व उस लड़की ने संग्राम को धोखा दे दिया और दूसरे से मुहब्बत कर ली। संग्राम का दिल टूट गया। सालभर पढ़ाई से दूर रहे, इम्तहान के दरयान यह दुर्घटना घट गई, सो फेल हो गए।

यही नहीं, उन्होंने आगे पढ़ाई न करने का फैसला ले लिया और गाँव वापस आ गए। यहाँ आकर उन्होंने बाल बढ़ा लिए। दाढ़ी-मूँछों को बेतरतीब बढ़ने दिया। पैंट, कमीज, कोट, टाई और नुकीले ऊँचे जूतों से घृणा हो गई थी, लिहाजा वे धोती-कुर्ता पहनते और हवाई चप्पल। काली माई से भक्ति हो गई, इसलिए वे माथे पर सिंदूर का अँगूठा टाँकते और गला तर करके उनकी आराधना करते।

मुलायम सिंह का पढ़ाई में शुरू से मन नहीं लगा। दसवीं कक्षा में उनका दिल पहलवानी में रमा, तो वे पढ़ाई छोड़कर सुबह-शाम रियाज मारने लगे।

पाँच किलो दूध, एक पाव बादाम, एक पाव मलाई और चार प्लेट भीगा चना - यह उनका दोपहर के भोजन को छोड़कर सुबह का नाश्ता है जिसने वर्जिश के साथ बदन को कच्चे कटहल की तरह सख्त और कँटीला बना दिया है जिसे देखकर अन्य लोगों की बात दीगर, उनके बाप तक भयभीत हो जाते।

मुलायम सिंह के गले में काला गोल धागा पड़ा है। बाँह में ताबीज। चारखाने की तहमत के ऊपर रेशमी कुर्ते के सोने के बटन को खोलकर जब वे चलते, तो अपना बना हुआ शरीर निहारते और खुश होते।

तीनों में गाढ़ी दोस्ती है। यह दोस्ती तब प्रारंभ हुई जब मुलायम सिंह ने एक बार गाँव के विशाल कुश्ती दंगल को जीतकर 'केसरी' का खिताब अर्जित किया था। वैसे तीनों एक ही गाँव के थे और उनमें दूर का परिचय था - गाढ़ी दोस्ती नहीं थी। इस दंगल के होने से चवन्नी सिंह और संग्राम ने मुलायम सिंह की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया।

हालाँकि तीनों धनकुबेरों के बेटे थे, तीनों की दोस्ती में एक-दूसरे का बड़प्पन आड़े आ रहा था, इसके बावजूद तीनों अनन्य मित्र हो गए।

चवन्नी सिंह चूँकि हाईस्कूल कई बार कोशिश के बाद भी पास नहीं हो पाए थे, इसलिए वे उन लोगों से नफरत करने लगे जो दसवीं कक्षा पास होते या उनसे अधिक पढ़े होते। उनकी इससे कम पढ़े-लिखों के प्रति पूरी सहानुभूति थी, किंतु इससे ऊपर के लोगों को देखते ही, वे अपना नंगा भारी पैर जमीन पर पटकने लगते और अँगौछा सिर पर पुनः कसकर कहते - पहले के लोग आठवीं पास करके तहसीलदार हो जाया करते थे, आज कितना भी पढ़ो - बेकार, क्योंकि लोगों को अप्लीकेशन लिखने तक की तमीज नहीं है।

यह बात अलग थी कि स्वयं चवन्नी सिंह ने अप्लीकेशन कभी न लिखा और न लिखना जानते हैं।

चवन्नी सिंह की घृणा केवल दसवीं कक्षा से कम या अधिक पढ़े लिखों तक ही महदूद न थी, उन्हें उन हरवाहों-चरवाहों से सख्त नफरत थी जो उठने-बैठने और बात करने का सलीका तक नहीं जानते थे। उन्हें वे दूर से देखते ही आगबबूला हो जाते। मुट्ठी भींचकर हवा में चला देते गोया उनके जबड़ों पर वार कर रहे हों।

संग्राम सिंह ही एक ऐसे अपवाद थे जो उनकी घृणा से बरी थे। हालाँकि वे उनसे एक दर्जा अधिक पढ़े थे, लेकिन चवन्नी सिंह उनसे इसलिए घृणा नहीं करते थे, क्योंकि वे ग्यारहवीं में बुरी तरह फेल हो गए थे और असफल होकर उन्हीं की तरफ गाँव वापस आ गए थे। यदि वे आगे पढ़ते, तो अवश्य चवन्नी सिंह की घृणा की हद में आते।

यद्यपि वे चवन्नी सिंह से एक दर्जा अधिक पढ़े थे, फिर भी चवन्नी सिंह उन्हें अपने समकक्ष ही महसूस करते।

संग्राम का चूँकि लड़की ने दिल तोड़ा था, इसलिए वे समूची लड़की जाति के विरुद्ध हो गए थे। वे अपना गुस्सा किसी भी जाति की लड़की के साथ अवैध संबंध कर ठंडा करते। वे कहते कि पुराने जमाने में भारत में जब-जब युद्ध भड़का और खून-खराबा हुआ, उनके कारणों के बीच लड़की थी।

मुलायम सिंह को अगर किसी से नफरत थी तो उस पहलवान से जो उनसे देह और जाँगर में बीस होता। वे उसे देखते ही ताल ठोंकने लगते और कुश्ती लड़ने के लिए उकसाते और जब तक चित न कर देते, चैन न लेते।

तीनों के पास कोई काम नहीं था, इसलिए तीनों एक ही मोटर-साइकिल पर बैठकर गाँव भर में घूमते नजर आते। अगर ये कहीं बैठते तो जुम्मन मियाँ के आम के दरख्त के नीचे, खाट पर या रमेसर साहू के ट्यूबवेल पर जहाँ तेज आवाज में टेपरिकार्ड से फिल्मी गाने सुनते और बदमस्त होकर तरह-तरह के अभिनय करते हुए नाचते। जब ये थककर चूर हो जाते तो गाँव, प्रदेश, देश और विदेश की राजनीति पर बहस करते। ये अक्सर इस बात पर खेद प्रकट करते कि इस गाँव के छोटे तबके के लोग सीधे मुँह बात नहीं करते। अकड़ू हैं। सब ढीठ हो गए हैं। किसी में पुराने जमींदारों व ताल्लुकेदारों के प्रति जरा भी आदरभाव नहीं रह गया है।

ये कहते हैं कि गाँव से इस तरह की रब-ढब का विच्छेद होना जरूरी है।

ये कहते हालाँकि लोगों पर इस 'अकड़' के बावजूद उनके बाप-दादों का दबदबा है, लेकिन यह दबदबा अब उनके हाथों में आना चाहिए, क्योंकि वे नई पीढ़ी के हैं और नई पीढ़ी को अपना अधिकार मिलना चाहिए।

ये हमेशा इस बात पर चिंतित रहते कि कौन-सी नीति अख्तियार की जाए जिससे समूचा गाँव उनकी मुट्ठी में आ जाए। लोग उनके खाँसने-भर से थरथरा उठें। सब उन्हें अपना मालिक समझें।

उनमें यह बात तब पनपी जब चवन्नी सिंह और संग्राम सिंह के हरवाहों-चरवाहों ने बेगार न करने और दहेड़ी बढ़ाने की हिमाकत की। इस पर बड़ा बावेला मचा। चवन्नी सिंह के बाप ने एक हरवाहे को इतना पीटा कि उसके मुँह से तीन दिन तक लहू गिरता रहा। उन्हें विश्वास था कि कुटम्मस से बात बन जाएगी लेकिन बात न बनी। जुताई-बुआई का समय था - ऐसे में हरवाहों-चरवाहों का अकड़ जाना फसल के लिए जहर हो रहा था। वे बौखला उठे। उन्होंने हरवाहों-चरवाहों को अपनी आराजी से लात मार भगा देने और दूसरे हरवाहों-चरवाहों को रखने की योजना बनाई कि उनके मुंशी ने फिलहाल एक रुपया दहेड़ी बढ़ा देने और बेगार न करने की शर्त कर मामला सुलझवा दिया।

चवन्नी सिंह के यहाँ हरवाहों-चरवाहों की दहेड़ी बढ़ते ही संग्राम सिंह के हरवाहों-चरवाहों ने भी अपने हल रख दिए। उनके यहाँ भी काफी मारधाड़ हुई। कई हरवाहों के सिर फूटे, उनके झोपड़े जला दिए गए। जुताई-बुआई सिर पर थी, इसलिए निष्कर्ष निकला- उनकी कुछ दहेड़ी बढ़ा दी गई, किंतु बेगार पूर्ववत् थी।

हरवाहों-चरवाहों की इस अकड़फूँ ने तीनों के दिमाग में एक तूफान-सा मचा दिया। साले, दो कौड़ी के हैं! और इस तरह सिर उठा रहे हैं। ये बौखला उठे। इसी का नतीजा था कि ये न केवल हरवाहों-चरवाहों, बल्कि समूचे गाँव के छोटे-मोटे दुकानदारों और किसान-मजदूर तबके के लोगों को कुचल देने और उन्हें अपनी मुट्ठी में लेने की योजना में व्यग्र हो उठे।

संग्राम सिंह को एक युक्ति सूझी। उसे अमल में लाया गया। तीनों ने शहर से आ रहे एक मजदूर को पकड़ा और उससे पूछा कि तुम किस देश में रहते हो?

मजदूर पकड़े जाने और यकायक सवाल किए जाने पर भौंचक-सा रह गया, फिर खिसियाया-सा बोला - हजूर, हम अपने मुलुक में रहते हैं।

चवन्नी सिंह उसके सामने तनकर खड़े हो गए। हालाँकि लंबाई में उसके आधे थे, लेकिन इस विचार को उन्होंने दिमाग में नहीं आने दिया। नंगा पैर जमीन पर पटककर अँगौछा कसते जोरों से बोले - अबे, यह तो मैं भी जानता हूँ कि तू अपने मुलुक में रहता है, पर मुलुक का नाम-गाँव कुछ है?

मजदूर गहरी सोच में पड़ गया। काले चुचके चेहरे पर घुच्ची आँखें मुलमुलाने लगीं। बचपन से वह ठाकुर गुरुचरण के यहाँ हरवाही करता रहा। ठाकुर की दी जमीन को वह अपना मुलुक समझता था। ठाकुर के सिधारते ही वह मजदूर हो गया और नीम के नीचे डाले छप्पर को अपना मुलुक समझने लगा।

गरदन झटककर बोला - हजूर, नीम के पेड़ के नीचे ही हमारा मुलुक है।

मुलायम सिंह कुर्ते के गिरेबान से झाँकती सीने की मछली को देखकर खुश हो रहे थे और सोच रहे थे कि इस दौरान मछली और बन गई है कि मजदूर के जवाब से क्रोध में उछल पड़े।

संग्राम सिंह ने अफसोस के स्वर में कहा - गद्दारी की भी हद है! साले अपने देश का नाम तक भूल गए!

चवन्नी सिंह ने उसे गगनभेदी गाली दी कि मुलायम सिंह ने उसका टेंटुआ पकड़ा और उसे चूहे की तरह टाँगकर नीचे छोड़ दिया। मजदूर चीखता हुआ नीचे आ गिरा कि चवन्नी सिंह ने एक करारी लात उसकी पीठ पर दे मारी। वह मुँह के बल गिरने को हुआ कि मुलायम ने उसके मुँह पर एक ऐसी ठोकर मारी कि वह जोरों से चीखा।

उसके मुँह से खून की धार बह निकली। सिर चक्कर खाने लगा। अगल-बगल साँय-साँय होने लगी - वह बेहोश हो गया।

इस घटना से इन्हें जरा भी आतंक नहीं दिखा, सिर्फ इतना दिखा कि कुछ लोग खाट की डोली बनाकर गमगीन से आए और चुपचाप मजदूर को लिटाकर ले गए।

इन्हें भयंकर गुस्सा आया। इतनी गजब की योजना बनाई और उसका कोई असर नहीं। इन्होंने पैंतरे बदले और एक नई युक्ति ईजाद की।

तीनों बीच बाजार में जाकर रास्ता रोककर खड़े हो गए। जब दोनों तरफ भीड़ हो गई तो इन्होंने मजबूत हाथों से आसमान की ओर बंदूक तानी और कई हवाई फायर किए।

इस घटना से भगदड़ मच गई। तीनों इत्मीनान से चलते हुए सड़क के किनारे आ खड़े हुए और भीड़ में आतंक की लहर का मुआयना करने लगे।

थोड़ी देर में सब कुछ पूर्ववत् शांत हो गया। केवल कुछ लोग जो किसान मजदूर और किराना दुकानदार थे इस फायर के बावत बेखौफ से बातचीत कर रहे थे मानो किसी चिड़ीमार के बारे में बात कर रहे हों।

इनकी आँखें जल उठीं। सोचा कि इन्हें गोली से भून डालें, क्योंकि ये जरा भी आतंकित नहीं हुए और न उन्हें देखकर काँपे और न ही उनके सोच का अनुसरण किया।

इन्होंने गोली नहीं चलाई। तीनों मोटरसाइकिल पर जा बैठे और जलती आँखों गाँव-भर का चक्कर लगाने लगे।

चवन्नी सिंह ने कहा - पढ़े-लिखों और किसान-मजदूरों को गोली से उड़ा देने से ही लोगों में हमारे प्रति दहशत पैदा होगी।

संग्राम सिंह ने कहा - गाँव भर की जवान लड़कियों को घर से निकलवाकर नंगा करने से ही हमारा काम फतह होगा!

मुलायम सिंह कुछ नहीं बोले। वे कुछ नया कर दिखाना चाहते थे। उन्होंने फुलस्पीड में बहती गाड़ी रोकी और शहर से आ रहे चार मजदूर-किसानों को दौड़कर कई फैट, लातें और सिर मारे कि चारों बिखर गए।

मुलायम सिंह ने चवन्नी सिंह और संग्राम की ओर गौरवान्वित आँखों से देखा जैसे कह रहे हों कि इस तरह कमाल दिखाया जाता है कि जहाँ हाथ भाँज दिया, मैदान साफ! अब देखो, आतंक ही आतंक!!

उन्होंने मूँछ ऐंठी और गरदन टेढ़ी करके चलते हुए मोटर साइकिल के पास आए। एक किक में गाड़ी स्टार्ट की और दोनों को बैठाकर बस्ती की ओर बढ़ गए।

बस्ती में पहुँचकर मुलायम सिंह गंभीर मुद्रा में खड़े होकर आसमान की ओर देखने लगे। यकायक उनके दिमाग में एक क्रांतिकारी विचार कौंधा और वे ठठाकर हँस पड़े। सहसा वे एकदम गंभीर हो गए। उन्होंने चवन्नी सिंह और संग्राम की ओर कनखियों से देखकर चुटकी बजाई जिसका आशय था - अब बस्ती में कमाल दिखाना चाहिए।

तीनों मिर्ज़ा खलील की छान की ओर बढ़े। मिर्ज़ा भैंसों को दाना-भूसा दे रहा था। जब ये उसके सामने आ खड़े हुए और मुलायम सिंह ने उसे एक करारा थप्पड़ मारा कि वह भौंचक-सा रह गया, किंतु तुरंत भाँप गया कि कयामत आने वाली है। वह जान बचाकर भागा।

जैसे ही उसने बाहर निकलकर गुहार लगाई कि तीनों की भुजाएँ फड़क उठीं। साले कटुए की इतनी हिम्मत कि हमारे खिलाफ भीड़ खड़ी करे। ये क्रोध में उछल पड़े और इन्होंने भैंसों को घुटने मारने शुरू किए। अंत में उनके एन (थन) काट लिए।

भीड़ इकट्ठी हुई कि तीनों ने उसे धमकाने के लिए अगल-बगल फायर किए - भीड़ जान बचाकर भागी।

इस घटना का इन्हें आतंक दिखा, किंतु पूरा आतंक तब दिखा जब इन्होंने खुल्लमखुल्ला कई किसानों की खड़ी सफलें एक लाइन में फूँक डालीं। कइयों को बंद अँधेरी कोठरी में बिना अन्न-जल के बाँधकर रखा तथा भयंकर यातनाएँ दीं।

छोटा-सा गाँव था। ऐसी हरकत पर हल्ला मच जाना स्वाभाविक था। सो मचा। उनके दिलों में एक भय-सा डोल गया। लोग इन्हें देखते-काँप जाते और जान बचाकर भाग खड़े होते।

ऐसा नहीं था कि लोग इनकी यातनाएँ कड़वे घूँट की तरह आँखें बंद करके पी गए। लोगों ने चोरी-छिपे आपस में काफी शोर मचाया, पंचायतें कीं, मजबूरी यही थी कि तादाद में होने के बाद भी वे निहत्थे थे। उनके साथ न पुलिस थी और न इतना पैसा कि आगे थाना-कचहरी कर सकें जिससे न्याय की उम्मीद भी न थी। और इन तीनों के पास वह सब कुछ था जिसके आगे झुक-दब जाना लाजिमी था। लोग झुके-दबे और चुपचाप रो-धोकर जुल्म सह लेते। यह बात अलग थी कि इनके दिलों में इन तीनों के प्रति भयंकर आग धधक रही थी।

तीनों को पक्का विश्वास हो गया कि लोग पूरी तरह उनकी मुट्ठी में आ चुके हैं। कारण कि उन्हें देखते ही काँप जाते, रोनी शक्ल बना देते, गिडगिड़ाने-से लगते। इन्होंने चैन की साँस छोड़ी और आगामी योजना बनाने के पूर्व यह तय किया कि आतंक की आग जगाए रखने के लिए कुछ न कुछ सजा जारी रखना लाजिमी है। इसलिए ये कभी किसी किसान मजदूर को पकड़ लेते और उससे अपने दंड-विधान के अनुसार सैकड़ों बाल्टी पानी कुएँ से खिंचवाते या उसे मुर्गा बनवा देते या पेड़ से उल्टा लटकवा देते। यह क्रिया ये तब तक करवाते जब तक वह चीं न बोल दे।

अपनी इसी आतंक की आग जगाए रखने की नीति के तहत इन्होंने एक दिन एक ऐसी मिसाल पेश की कि उसका कुछ उल्टा ही असर हुआ।

हुआ यह कि चवन्नी सिंह के यहाँ चूहे भारी तादाद में बढ़ गए थे। उन्होंने बहुतों का सफाया दवा देकर कर डाला था। इसके बाद भी कुछ शेष थे, जो वस्तुओं का सर्वनाश किए दे रहे थे। उन्हें एक युक्ति सूझी। उन्होंने संग्राम सिंह और मुलायम को इसकी जानकारी दी। फिर सहमति पर पूरे गाँव में ढोल पिटवा दिया। ढोल का पिटना था कि आशंकित हादसे के भय में डूबे लोग मैदान के एक कोने में आ खड़े हुए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह ढोल क्यों पिटवाया गया? कोई हादसा होने वाला है क्या? सभी एक-दूसरे से खुसुर-फुसुर कर रहे थे।

बात तब स्पष्ट हुई जब चूहादानी के ऊपर से पीला कपड़ा हटाया गया और उस पर चवन्नी सिंह का अल्सेशियन कुत्ता पंजा मारने लगा।

चूहादानी में चूहों को देखकर एक हरवाहा जिसे चवन्नी सिंह के बाप ने इस कदर पीटा था कि उसके मुँह से तीन दिन तक लहू गिरता रहा और एक किसान जिसे संग्राम सिंह ने कोठरी में बंदकर नख खिंचवा लिए थे - यकायक घबरा-से गए। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और दोनों एकदम पसीने से नहा-से गए। हरवाहे ने भनभनाहट के स्वर में गरदन झटककर 'चूहा' कहा गोया वह खुद चूहा हो जिसे एक पल में कुत्ता अपने दाँतों के बीच किच्च कर देगा। उसने अगल-बगल खड़े अपने साथियों को देखा जिन्हें इन तीनों ने भयंकर यातनाएँ दी थीं और कुएँ से इतना पानी भरवाया था कि खाट पकड़ ली थी और जो इस वक्त होने वाले दृश्य से आतंकित हो उठे थे। वह विद्युत-गति से पीछे की ओर मुड़ा और 'हाय राम' कहकर गहरी साँस छोड़ता भीड़ में घुसता हुआ एकदम पीछे आ खड़ा हुआ। किसान ने भी इसी तरह हरवाहे का अनुसरण किया। उसने गरदन उठा-उठाकर पहले पीछे की ओर देखा, फिर चूहादानी देखी और एक चरवाहे के कान में कुछ कहा। बात सुनते ही चरवाहे ने संग्राम सिंह को देखकर तुरंत उसके कान में भुनभुनाया कि किसान काँप-सा गया। लड़खड़ाता हुआ वह एक-दो कदम आगे बढ़ा, फिर पुनः पीछे मुड़कर भीड़ चीरता हुआ भयभीत-सा पीछे आ खड़ा हुआ। उसने सामने देखा, संग्राम सिंह लपके आ रहे थे। उसे पक्का विश्वास हो गया कि संग्राम सिंह उसे मारने आ रहे हैं जिसकी संभावित जानकारी चरवाहे ने दी थी।

किंतु संग्राम सिंह उसे मारने नहीं आए। वे फुर्ती से चलकर चूहादानी के पास आ खड़े हुए और कुत्ते को परे खींचा ताकि चूहों को बाहर निकलने में दिक्कत न आए।

किसान ने राहत की साँस छोड़ी और पंजे से आँखों पर छाया करके चूहादानी की ओर देखा भयभीत निगाहों से।

चूहादानी में चूहों की भाग-दौड़ मची थी। एक-दूसरे पर चढ़ते-उतरते वे बेचैनी से चक्कर लगा रहे थे गोया जान गए कि मृत्युदंड दिए जाने के लिए उन्हें कुत्ते के बीच छोड़ा जाएगा। बार-बार हाथ मारने पर भी वे बाहर नहीं निकल रहे थे, किंतु चवन्नी सिंह थे कि उन्हें निकालने में लगे थे।

एक भी चूहा जब बाहर नहीं निकला, तो वे कुछ सोचने लगे, आँखें मूँदकर। सहसा सिर झटककर उन्होंने अगल-बगल देखा - सामने एक लंबी लकड़ी पड़ी थी। उँगली बढ़ाकर उन्होंने लकड़ी उठा ली और उससे चूहों को कोंचने लगे।

एक मोटा चूहा बाहर आ गिरा कि कुत्ता उस पर झटका। कुत्ते ने मुँह में भरकर उसे एक जबरदस्त झिंझोड़ा दिया कि चूहा दूर जा गिरा। चूहा जीवित-सा था। उसमें कंपन हो रहा था। कुत्ता फिर उसके पास पहुँचा। अबकी उसने एक ऐसा झिंझोड़ा दिया कि चूहा दूर जा गिरा और निर्जीव हो गया।

भीड़ का चेहरा सफेद कागज-सा हो गया। लगता है कि इस दृश्य ने उसे रुला दिया।

मुलायम सिंह का ठहाका गूँजा मानो उन्होंने अपने से बीस किसी पहलवान को पलक झपकते चित्त कर दिया हो।

संग्राम सिंह भी ठठाकर हँसे गोया उन्होंने शहर में धोखा देनेवाली लड़की का चिथड़ा बना दिया हो।

चूहादानी से दूसरा चूहा गिरा जिसे कुत्ते ने पूर्ववत् झिंझोड़ा दे-देकर मार डाला।

इसी तरह चूहादानी से चार और चूहे निकाल गए जिन्हें कुत्ते ने दाँतों के बीच कूँच डाला। यह अंतिम चूहा था जो बार-बार हाथ मारने और लकड़ी से कोंचने पर भी नहीं निकल रहा था।

मुलायम सिंह ने कहा - बहुत हरामी है साला, निकलना ही नहीं चाहता!

चवन्नी सिंह ने लकड़ी से कोंचते हुए कहा - निकलेगा इसका बाप! यह किस खेत की मूली है।

- देखो साला कैसा भाग रहा है, जैसे बच ही जाएगा - मुलायम सिंह ने कुर्ते की बाँह ऊपर चढ़ाते हुए कहा - ला, मैं निकालूँ!

- नहीं उस्ताद, यह हमारा शिकार है - कहकर चवन्नी सिंह ने पलभर के लिए आँखें बंद कीं मानो भवानी का स्मरण कर रहे हों। फिर वे झटके से उठ खड़े हुए। उन्होंने फुर्ती से फेंटा कसा, नंगा पैर जमीन पर जोरों से पटका और 'जय काली माँ' कहकर धम से जमीन पर बैठे और चूहे को लकड़ी से कोंचने लगे।

बार-बार लकड़ी से कोंचने पर भी चूहा नहीं निकला, तो उन्होंने सिर से अँगौछा उतारकर पंजे में लपेट लिया और चूहादानी में हाथ डाला।

चूहा बेतहाशा में चक्कर लगा रहा था। चवन्नी सिंह ने जैसे ही उसे मुट्ठी में भींच लेना चाहा कि वे जोरों से चीखे।

उन्होंने झटके से हाथ बाहर खींच लिया और एक लंबी कराह के साथ पंजे पर से अँगौछा हटाया कि खून की धार बह निकली। चूहे ने बीच की उँगली में दाँत जमा दिए थे।

भीड़ में हल्ला-सा मच गया मानो वह चूहे के इस कृत्य पर हँसी-ठिलठिलाई, लेकिन उस पर मुर्दनी उस वक्त छा गई जब मुलायम सिंह ने कुर्ते की बाँह चढ़ाई और भुजाओं पर हाथ फेरते हुए उसे घूर कर देखा।

पीछे खड़ा किसान धीरे-धीरे सरकता हुआ भीड़ के बीच में आ खड़ा हुआ था, मुलायम सिंह का रौद्र रूप देखकर बगटुट पीछे की ओर भागा।

चवन्नी सिंह उँगली से बहते खून को देखकर आपे से बाहर हो गए। उन्हें बेतरह गुस्सा आया, चूहे पर। साले ने कैसा काटा कि उँगली फटी जा रही है। उन्होंने दाँत पीस डाले, आव देखा न ताव, सामने पड़ी चूहादानी पर एक करारी लात मारी - चूहादानी खड़खड़ाती संग्राम सिंह के सामने आ गिरी। संग्राम सिंह चूहे की हरकत से अपनी जगह पर खड़े हुए रह-रहकर उबल रहे थे। उन्होंने खूनी आँखों से चूहे को देखा मानो भस्म कर देंगे। गहरी साँस खींचते हुए उन्होंने हाथ का कड़ा चढ़ाया, चेहरे पर लटक आए बालों को पीछे की ओर झटका ओर उझककर चूहादानी हाथ में ले ली और मुसलसल जमीन पर पटकने लगे।

चूहा निर्जीव दिखा इसलिए उन्होंने चूहादानी सामने फेंक दी जिस पर कुत्ता भौंकता हुआ पंजे मारने लगा।

सहसा उतान पड़े चूहे में हरकत हुई। उसके अगले-पिछले पंजे थरथराए और वह पलभर में पंजों के बल पर बैठ गया। उसने थुथनी घुमाकर बाहर की ओर निकली पड़ती आँखों से चारों ओर देखा और पिछले पंजों के बल खड़ा हुआ गोया कुत्ते, मुलायम, संग्राम और चवन्नी सिंह से कह रहा हो कि इतनी जल्द हम मरनेवाले नहीं हैं! और न ही हार माननेवाले!

मुलायम सिंह की आँखें माथे से सट गईं जैसे वे उसका आशय ताड़ गए। नथुने फुलाते उसकी ओर बढ़े मानो किसी पहलवान को चित्त करने जा रहे हों। उन्होंने चूहादानी अपने दोनों हाथों के बीच ले ली - ताकत लगाई कि चूर कर दें - चूहा बाहर आ गिरा।

जैसे ही चूहा बाहर आ गिरा और कुत्ता उस पर झपटा - एक अजीब दृश्य उपस्थित हो गया। लोगों ने देखा - कुत्ता बुरी तरह चिचिया रहा है और चूहा उसकी नाक में दाँत जमाकर चिपट गया है।

भीड़ उल्लास में उछल पड़ी। कुत्ता पगलाया-सा भीड़ में से राह बनाता भाग निकला।

संग्राम सिंह यह दृश्य देखकर तमतमा उठे। उन्होंने दौड़कर एक किसान से लाठी छीनी और कुत्ते की तरफ लपके। उन्होंने लाठी तानी और साधकर नाक में चिपके चूहे पर मारी कि निशाना चूक गया। लाठी हवा में भँजकर रह गई। चूहा कूदा और भागा। संग्राम सिंह फुर्ती से उसके पीछे दौड़े। उचकते-भागते चूहे पर वे दौड़ते हुए हन-हन कर लाठियाँ बरसाते जाते लेकिन हर वार खाली जाता। लाठी जमीन पर पड़ती और धूल उड़ती। यकायक चूहा पास की झाड़ी में जा घुसा। संग्राम सिंह क्रोध में इस कदर पागल-से हो गए कि उन्होंने समूची झाड़ी लाठियों के वार से उजाड़ डाली। उन्होंने जलती आँखों से देखा - आसपास झाड़ी की पत्तियाँ, काँटे और डगालें थीं। न था तो सिर्फ चूहा जिसकी उन्हें तलाश थी। वह कहीं फरार हो गया था। संग्राम गहरी साँस छोड़ते हुए पीछे पलटे।

सामने कुत्ता था जो चें-चें कर रहा था। उसकी नाक से खून की धार बह रही थी और नाक का बड़ा-सा मांस का टुकड़ा नुच गया था। वह बौखलाया-सा पंजे से नाक खुजलाता, कूँ-कूँ करता, दुम हिलाता चवन्नी सिंह के पास जा खड़ा हुआ मानो पनाह माँग रहा हो लेकिन उन्होंने उसे पनाह नहीं दी। दाँत पीसते हुए उन्होंने उसे माँ की गाली दी और उछलकर एक जबरदस्त लात मारी।

एक लंबी चें की आवाज करता कुत्ता भागा कि मुलायम सिंह ने लपक कर उसकी दुम पकड़ ली - कहाँ जाता है, नाक कटवाने का परसाद तो लेता जा... कह कर उन्होंने उसे बलिष्ठ हाथों से उठाकर अपने से काफी ऊपर उछाल दिया।

कुत्ता चिचियाता हुआ नीचे आ गिरा, किंतु तुरंत ही जान बचाकर भाग निकला।

भीड़ पूरी शांत खड़ी थी, किंतु सभी के चेहरों से लगता था मानो पलभर में हर्षोल्लास का सोता फूट पड़ेगा। किसान और हरवाहे जो पीछे दुबके खड़े थे, क्षण भर को भय भूलकर सरसराते हुए भीड़ के एकदम आगे आ खड़े हुए।

मुलायम, संग्राम और चवन्नी सिंह पसीने में तर-ब-तर खड़े एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे। वे एक-दूसरे से कुछ कहना चाह रहे थे, किंतु एक शब्द नहीं फूट रहा था। लगता था जैसे किसी ने जीभ निकाल ली हो।

तीनों को पहली बार महसूस हुआ कि किसी ने उनकी पीठ में धूल लगा दी है।


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