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कहानी

ख़ूँखार लोग
हरि भटनागर


नंदकिशोर पांडे के लिए

बाबूलाल का बायाँ गाल झन्ना रहा है। आग का भभका उठ रहा हो जैसे। अभी पंद्रह-बीस मिनट पहले उसे थप्पड़ मारा था कस्बे के एक आदमी ने, जिसके यहाँ उसने पुताई की थी। उस आदमी को बाबूलाल का काम पसंद नहीं आया था। यद्यपि उसका मकान पुराना था, दीवारें खब्ती थीं, उन पर रंग सूखने पर ही उभरता, वह भी थोड़ा-बहुत, यह जानता था, बावजूद इसके उसे लगा कि लौंडे ने बेगारी की और मूँड़ लिया... उसकी आँखों में खून उतर आया। उसने पलट कर तड़ाक-से बाबूलाल के गाल पर थप्पड़ मारा। यह थप्पड़ इतना जबरदस्त था कि बाबूलाल चकरा-सा गया। आँखें आसमान में टँग-सी गईं और साँसें रुक। जब उसकी चेतना लौटी, उसने देखा वह आदमी दाँत पीसता गुस्से में लहराता उससे दुबारा पुताई के लिए कह रहा था। बाबूलाल डर गया। बेमन से काँपते हाथ पुती दीवार पर फिर से कूँची फिराने लगा। तकरीबन आधी दीवार पोत डाली तो उस आदमी ने उसका गरेबान पकड़कर झटके से अपनी तरफ खींचा। जेब से निकालकर उसने उसके चूने से गीले हाथ पर आठ रुपये की जगह चार रुपये रखे और धक्का दे घर से बाहर कर दिया। धक्का देते-देते उसने यह भी कहा कि अगर कोई हरामीपंती की तो खैर नहीं। उसने बहुत जोरों से किवाड़ बंद किया, जिसकी धमक से बाबूलाल काँप गया...

बाबूलाल के साथ ऐसा अक्सर ही होता। लोग कलई करने, ईंटा-गारा ढोने, गिट्टी फोड़ने वगैरह के लिए ले जाते और काम में बेवजह नुक्स निकालते। यह नुक्स आधा तिहाई पैसा काट लेने के लिए ही होता। लोग पैसा काटते, ऊपर से मुँह में, सिर में गुच्चे मारते - इन रवैयों से वह आजिज आ गया था। ऐसे मौकों पर वह अपने को निरा अकेला महसूस करता। सोचता कि दस-बारह के गोल के साथ काम करे तो कभी ऐसा न हो, पर गोल थे कहाँ? लोग होते हुए भी बिखरे थे...

वह किसी दूसरे धंधे में निकल जाने की सोचता। पर कहाँ जाए? यह ऐसा सवाल था जो उसके दिमाग में सूराख कर देता जिसमें से सारा सोच हवा बन निकल जाता। उसके कई साथी थे जो रिक्शा-हथठेला खींचते और तंगहाल थे। उनके साथ कई दिक्कतें थीं - एक तो रिक्शा-हथठेला खींचने वालों की भारी तादाद, दूसरे इतना भाड़ा कि उसे चुकाने के बाद कुछ बचता नहीं था। उस पर गाहे-बगाहे अगर काम नहीं मिला, बीमारी-दिक या नागा हो गया तो भाड़ा उल्टे सिर चढ़ता जाता था...

फिर कौन-सा काम करे? बाबूलाल ने गहरी साँस छोड़ी। यकायक उसकी आँखें चमक उठीं। अभी कल ही उसने सड़क पक्की करने वाले मजदूरों को देखा। उनके बारे में सुना है कि वे एक दस्ते में रहते हैं, इसलिए उन्हें कोई तंग नहीं कर पाता और उनकी मजदूरी पर डाका पड़ने का संकट भी नहीं रहता। हाँ, मेट रोजाना की दहेड़ी से चवन्नी जरूर काटता, पर इसके बाद पूरे पैसे हाथ आते... ऐसी जगह काम मिल जाए तो कितना अच्छा हो, जिंदगी बन जाए - उसने पुनः सोचा - लेकिन वहाँ जाओगे नहीं तो काम मिलेगा कैसे? दौड़ के तो आएगा नहीं।

अभी तक वह काम पर रखे जाने, न रखे जाने की पशोपेश में था, लेकिन आज जो घटा उसने मेट से मिलाने के लिए उसे बेचैन कर दिया। यद्यपि काम पर रखे जाने की बात दुविधा में थी, पर नए काम के सोच भर से वह उमंग से भर उठा। दर्द के बाद भी मुस्कुराने लगा। पहाड़-से रोलर के गिर्द तूफानी गति से काम में लगे मजदूर, लगा - उसे अपनी तरफ खींच रहे हैं!

कस्बे के दूसरे छोर पर, पावर हाउस से करीब के गाँव की सड़क पक्की की जा रही है। यह काम एक निश्चित अवधि से पहले पूरा किया जाना है। मिनिस्टर आने वाले हैं इस पर से होकर, गाँव में ताजा बनी हायर सेकेंडरी स्कूल की इमारत का उद्घाटन करने।

एक बड़ा-सा रोलर सीटी छोड़ता, धुआँ उगलता, कर्कश स्वर में घड़घड़ाता चल रहा है। उसके दाएँ-बाएँ चकों के समानांतर दो मजदूर चल रहे हैं - चलते चकों पर पानी से तर बोरों को पकड़े, ताकि डामर सना गिट्टी-चूना न फँसे। रोलर से काफी आगे दस-बारह मजदूर जिनमें औरत-मर्द शामिल हैं, बड़े-बड़े ब्रशों से सड़क की धूल साफ कर रहे हैं। इनके पास ही सफारी सूट पहने सुपरवाइजर खड़ा है प्रफुल्ल और मस्त। किसी ख्वाब में डूबा हुआ। उसके पीछे ढीली-ढाली हाफपैंट पहने खड़ा मेट अपने बाल भरे मजबूत पैरों को रह-रह पटकता, छड़ी हिलाता टार-मिक्सर को चलानेवाले मजदूर पर बरस रहा है, क्योंकि काम के वक्त उसने बीड़ी पीने की गुस्ताखी की। फटकार के बाद भी मजदूर पीले-पीले दाँत चमकाता हँस रहा है और बाईं आँख का कोर दबाता जा रहा है।

यकायक ही-ही कर वह जोर से हँसकर चुप हो गया। दोनों हाथों से उसने टार-मिक्सर का हैंडिल पकड़ा और बिना साँस लिए पाँच-छै बार सपाटे से चलाया। टार-गिट्टी का बना मसाला बाहर गिरा, उसने मेट को तिरछी नजरों से देखा जैसे कह रहा हो कि यह है बीड़ी का कमाल! दो हाथ में मसाला तैयार!!

मसाले से गर्म-गर्म भाप उठ रही थी जिसे पंजे और फरुहे सड़क पर फैलाने लगे। मेट ने रोष में यहाँ से निगाह हटा उस ओर गड़ा दी जहाँ जमीन खोदकर बनाए गए धुँधुआते चूल्हे पर एक बहुत बड़ा कबाड़नुमा पीपा रखा है। पीपे पर बाँस के लट्ठों के सहारे दो ड्रम उलटे हुए हैं। उनमें से धीमी रफ्तार से डामर सरक रहा है। पास ही धुएँ और भाप में खोया एक नौजवान मजदूर खड़ा है। वह रह-रह पीपे में किरासन डालता ताकि डामर को टहकने में आसानी हो।

सड़क की दूसरी पल्ली पर तसलों के पटके जाने और गिट्टियों के भरे जाने की आवाज उठ रही है।

सुपरवाइजर ने घड़ी देखी और ठीक इसी वक्त रोटी खाने की छुट्टी हो गई। तूफानी गति से चलता काम यकायक लड़खड़ाकर रुक गया। शोर-गुल शांत हो गया।

सुपरवाइजर झूमता हुआ तेजी से चलता अपनी मोटरसाइकिल के पास आया। उसके पीछे मेट था। मजदूर नीम की चितकबरी छाँह की ओर सरकने लगे।

***

बाबूलाल सुपरवाइजर के सामने ऐसी दयनीय मुद्रा में खड़ा हुआ जिसे समझने में सुपरवाइजर को तनिक देर न लगी। उसने बाबूलाल से मीठे स्वर में पूछा - काम चाहता है?

बाबूलाल को यकीन नहीं था कि सुपरवाइजर उसे देखते ही इतना रहम खाएगा। उसकी बात से उसका रोवाँ-रोवाँ खुशी से फरक उठा। वह कुछ बोलता कि सुपरवाइजर ने मेट से उसे काम पर रखने के लिए कहा।

मेट ने बाबूलाल पर एक नजर डाली - औसत से ज्यादा लंबे और पतले हाथ-पैर वाला छोकरा। गाल और सीने की उभरी हड्डियों पर चमड़ी चमगादड़ के पंखों की तरह धुआँखाई और झीनी थी।

चुटकी बजाकर उसने बाबूलाल को अपने पीछे आने को कहा।

मेट नीम की चितकबरी छाँह की ओर बढ़ा जहाँ मजदूरों ने कागज और गंदे कपड़ों में लिपटी रोटियाँ निकालकर खाना शुरू कर दी थी। नीम की उभरी हुई जड़ पर बैठ उसने जेब से तुड़ी-मुड़ी डायरी निकाली और बाबूलाल से पूछा - का नाम है?

बाबूलाल के मुँह से 'बाबू' शब्द ही निकला कि मेट ने मुँह बनाकर लगभग निढाल हो 'एह' शब्द इस तरह लबा खींचते हुए कहा जैसे उसके मुँह से कोई आपत्तिजनक वाक्य निकल गया हो कि सभी मजदूर खिलखिलाकर हँस पड़े। कुछ ने पास पड़े तसलों को बजाकर अपनी खुशी जाहिर की।

बाबूलाल सिटपिटा गया। उसने सिर नीचा कर लिया। मेट ने हाथ मटकाकर भारी आवाज में कहा - इहाँ कोई बाबू-फाबू नहीं, क्या? - उसने गरदन झटकी - इहाँ सब मजूर हैं! मजूर! और मजूर रहना है तो कानून मानना होगा इहाँ का, क्या? - उसने फिर गरदन झटकी और रिफिल से डायरी में उसका नाम दर्ज किया। इसके बाद उसने रोजाना मिलने वाला पैसा बताया और अपना कमीशन! 'कमीशन' शब्द पर उसने बाईं आँख का कोर दबाया और ठठाकर हँस पड़ा।

रोटी खाने की छुट्टी खत्म हो गई। और पहले जैसी गति में काम फिर शुरू हो गया!

बाबूलाल को गिट्टी ढोने के काम में लगाया गया। गिट्टी सड़क उस पार से लाकर टार-मिक्सर तक पहुँचानी थी। उछाह में भरा बाबूलाल काम में जुट गया। काम करते उसे खुशी का एहसास हुआ।

***

टार-मिक्सर के पास एक चेचकमारा, आबनूस-सा काला मजदूर खड़ा है जो बाबूलाल को प्यार भरी नजरों से देखता जैसे दोस्ती गाँठना चाहता हो।

यह मजदूर बहुत फुर्त है। हाथ इसके बिजली की तरह चलते। नपे अंदाज में यह तसले को थामता और हल्का-सा चक्कर देता कि गिट्टी लहराकर टार-मिक्सर में जा बैठती - एक भी इधर-उधर न होती। सिर में इसने गर्द से बचाव के लिए गंदा-सा रूमाल बाँध रखा है। पसीना इंधौरी भरे शरीर से टप-टपा रहा है। सैंडो बनियान तर है। हाफ पैंट भीग चली है।

बाबूलाल को इसकी आँखों में दर्द नजर आया। जैसे यह सताया हुआ आदमी हो।

दोनों में बातचीत और अंतरंगता का दौर तब शुरू हुआ जब बाबूलाल को प्यास लगी और इस मजदूर ने जेब से निकालकर उसे गुड़ की डली दी।

बाबूलाल को चेचकमारे मजदूर का रवैया अच्छा लगा। उसके प्रति उसमें प्यार उमड़ा। एवज में उसने मेट से पैसा पाने पर पीपे के आस-पास बिखरे मजदूरों के बीच रोटी पकाई और इस मजदूर को खिलाई।

रोटी खाकर चेचकमारा मजदूर सो गया, लेकिन बाबूलाल को देर रात तक नींद नहीं आई। सुरक्षित जगह नौकरी पाने के एहसास ने उसकी नींद उड़ा दी थी। बार-बार वह उठकर लेटता, आँख न लगती। आँखें मूँदते ही लगता सामने खड़ा रोलर घड़घड़ा रहा है और वह उसे झूमता चला रहा है!

पूर्व दिशा में जब सिंदूरी रंग फैला और कौवे बोलने लगे, उसकी आँख लगी। लेकिन आध घंटे बाद ही चेचकमारे मजदूर ने उसे जगा दिया।

जगह-जगह चूल्हे जल रहे थे और मजदूर कुछ-न-कुछ पकाने में लगे थे। पीपे वाले चूल्हे से धुआँ उठ रहा था। सभी जग गए थे। सो रहा था तो सिर्फ रोलर का ड्राइवर। स्टियरिंग पर पैर फैलाए, सीट पर बदहवास पड़ा वह खर्राटे ले रहा था। दोनों हाथ उसके सीट के आजू-बाजू झूल रहे थे। चेचकमारे मजदूर ने बाबूलाल को सूखी लकड़ियाँ दीं, जो वह उसके लिए बीनकर लाया था। प्रेम की प्रगाढ़ता के लिए यह काफी था। बाबूलाल खुश हुआ और उसने पीपे के पास ही कल शाम की तरह तसले में आटा गूँथा, फरुहे पर रोटियाँ सेंकीं और उस मजदूर की ओर बढ़ा दीं।

रोटियाँ थामते वक्त मजदूर की आँखों में चमक थी और उसके हाथ एक अव्यक्त खुशी से लरज उठे। उसने दो रोटियाँ खाईं और शेष दोपहर के लिए गठिया लीं।

शाम को बाबूलाल ने जब उसे फिर रोटियाँ दीं, तो वह गदगद था और देर रात तक उसके कंठ से किसी गीत की कड़ी चील की टिंहकारी की तरह गूँजती रही।

दोनों में अंतरंगता बढ़ती गई। चेचकमारा मजदूर बाबूलाल को काम करने की नई-नई तरकीबें बताता जिससे कठिन से कठिन काम आसान लगता और उसमें मजा आता। उसका दोस्ताना व्यवहार उसमें स्फूर्ति भरता। लगता कि वह उसका बाप है जो इस दुनिया में न रहकर भी है और उसे लगातार प्यार कर रहा है।

बाबूलाल सुबह रोटी खिलाता तो वह शाम को!

दोनों में अंतरंगता देख एक दिन एक नौजवान मजदूर जो सिर में हैट पहनता और जिस पर सिंदूर का टीका टाँकता, अंदर ही अंदर मुस्की मार खूब हँसा फिर यकायक संजीदा हो गया। दिमाग में उसके एक बात कौंधी। रहस्यात्मक ढंग से हँस-हँस कर उसने एक दूसरे, फिर तीसरे मजदूर के कान में यह बात कही। इस प्रकार लगभग सारे मजदूरों के कान तक यह बात पहुँची तो सब ठठाकर हँस पड़े - पेड़ू का रिश्ता! हा-हा-हा!!

इस बात पर कड़ी निगाह रखी गई और रंगे हाथ पकड़नेवाले को इनाम दिए जाने की घोषणा हुई, पर कोई रंगे हाथ पकड़ न सका। सबको दिखा सिर्फ दोनों जून बाबूलाल की रोटी झाड़ता चेचकमारा मजदूर!

यह बात तकरीबन सबको नागवार गुजरी। कोफ्त हुई कि वे क्यों महरूम रह गए इस फायदे से! एक-दूसरे से यह बात किसी ने कही नहीं, किंतु सभी अंदर-ही-अंदर दोनों से जल उठे और रुखाई से पेश आते हुए अपने-अपने ढंग से तंग करने लगे। कभी ज्यादती हो जाने पर इशारों से एक-दूसरे पर नाराज होते, पर थोड़ी देर बाद फिर वैसा ही करने लगते।

चेचकमारा मजदूर चूँकि पुराना था और उन्हीं के बीच का, उसने बाबूलाल से किनारा कर लिया, इसलिए बच गया, लेकिन बाबूलाल सारी दुर्गति का शिकार बनता।

एक दिन एक नौजवान मजदूर ने तो हद कर दी। उसने बाबूलाल से तसला एक साथ सिर पर रख ले जाने का आदेश दिया। एक तसला भारी होता है, दो की बात ही नामुमकिन थी। बाबूलाल ने मना कर दिया। इस पर नौजवान मजदूर ने आँखें निकालीं और फैट ताना। बाबूलाल ने परवाह न की और तसला उठाकर चलता बना।

नौजवान मजदूर रोष में भर उठा। लेकिन उसने इस रोष को एक मीठी मुस्कुराहट में बदल दिया और बाबूलाल को ऐसे अड़दब में डालने की मन में ठान ली कि बेटा को नानी याद आ जाए। वह मौके की तलाश में था। और उसे वह मौका मिल गया जब चेचकमारे मजदूर को गिट्टी भरने और उसे उसकी जगह यानी टार-मिस्सर चलाने के लिए तैनात किया गया।

चिलचिलाती धूप है। परिंदे तक नजर नहीं आ रहे हैं। चारों तरफ गुबार है और रोलर-मजदूरों की उठा-पटक का शोर। बाबूलाल थककर चूर हो गया है। उसकी इच्छा हो रही है नीम की छाँह में दो पल साँस लेने की, पर सामने ही मेट खड़ा है चूतड़ों पर हाथ बाँधे, रूल हिलाता!

गर्द में काँपती उसने सामने की धरती देखी और चिनगी भरी हवा से आँखें मूँद लीं। आँखें मूँदे-मूँदे ही उसने सिर पर तसला रखा और आगे बढ़ा। जैसे ही उसने तसला नौजवान मजदूर की ओर बढ़ाया कि मेट की जबरदस्त गरज ने उसका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया और उसके हाथ बढ़े के बढ़े रह गए। तसला वह नौजवान मजदूर के हाथों में नहीं दे पाया।

इधर नौजवान मजदूर ने अपने बढ़े हुए हाथ हाफपैंट पर जोरों से पटके। क्रोध में वह झल्ला उठा। थुर देने का उसे एक अच्छा मौका मिला। वह जोरों से चीखा।

अचकचाकर जब तक बाबूलाल तसला बढ़ाता, नौजवान ने लाल-पीली आँखें मटका बाँस की तरह हाथ उसकी तरफ बढ़ाए और एक झटके के साथ तसला उसके हाथों से छीना। यह क्रिया इतनी जबरदस्त थी कि बाबूलाल तसले के साथ दो-तीन कदम खिंचता चला गया।

यकायक उसे लगा कि बाएँ गट्टे में जोरों की टीस उठ रही है जैसे किसी ने छूरी से चीरा लगा दिया हो। उसने देखा - गट्टे में लंबी खरोंच थी। उसमें पहले सफेदी, फिर लाली फिर खून काँपने लगा।

बाबूलाल रुआँसा हो आया और बीच रास्ते में ही खड़ा हो गया कि शायद मजदूर अपने किए पर पछताएगा लेकिन मजदूर था कि झाड़ू जैसा हाथ फटकारता तीखे स्वर में उस पर बिफर रहा था - हट बे! हट्ट! बीच से हट्ट! गिट्टी आने दे!!

जब तक वह हटता, मजदूर हरहराता उसकी ओर बढ़ा। उसने पसीने से चिपचिपाती बाँहों से जोरों का धक्का दे उसे परे किया और मेट को कनखियों से देखता, टेढ़े होठों गाली देता बर्राने लगा - पता नहीं कहाँ के लौंडों को रख लेते हैं, इनकी माँऽऽ...

***

मजदूरों के रुखाई से बोलने और उनकी अड़चनों को बाबूलाल ने सहज रूप से लिया, किंतु नौजवान मजदूर की इस हरकत पर तिलमिला उठा। फिर सोचा, शायद अभी नया है, घुल-मिल नहीं पाया इसलिए सब तंग कर रहे हैं। धीरे-धीरे रच-बस जाएगा तो ऐसा कुछ न होगा। शुरू-शुरू में नए के साथ ऐसा होता ही है इस सोच ने जब उसे आश्वस्त किया और वह काम में लगा तो मजदूरों का दूसरा ही रूप नजर आया।

गिट्टी भरनेवाला एक मजदूर, जो पैरों में चिथड़ा होता खुले मुँह का जूता और सिर में फटा-सा नीला चादरा लपेटे हैं, उसे देखते ही खी-खी कर मसखरेपन से हँसता और तसला उठाते-उठाते इतनी सफाई से टेढ़ा कर देता कि लगता गिट्टी उससे नहीं, बाबूलाल से गिरी। यही नहीं, गिट्टी गिरने पर उल्टे वह जोरों से चीखता।

बाबूलाल दंग रह जाता। खुद ही बदमाशी, उल्टे डपट रहा है। उसकी इच्छा होती मेट के सामने पोल खोल देने की, पर चुपाई लगा जाता।

लेकिन यह चुप्पी उसके खिलाफ उस वक्त आ खड़ी हुई जब नौजवान मजदूर ने खी-खी करते हुए उसके पैर का अँगूठा बूट से दबा डाला जिससे तसला उसके हाथ से छूट गया। मेट ने भन्नाकर पूछा तो वह चुप रहा। होंठ चाभकर जब उसने एक जवान मजदूरिन को उसकी गिर्द डोलते देखा तो इसका गहरा अर्थ लगाया। उसने हरहराकर दौड़ के बाबूलाल को झिंझोड़ डाला - क्यों बेट्टा, अभी से चक्कर!!!

इस पर गिट्टी भरनेवाले मजदूर ने गिट्टी भरते-भरते 'हाय-हाय' कर हाथ को कमर पर रख भद्दे इशारे किए कि सारे मजदूर ठठा पड़े।

बचाव के लिहाज से बाबूलाल भी मुस्कुरा दिया था, पर मजदूरों ने इसे एक सच्चाई माना और उसे खाँटी रूप से चिढ़ाना शुरू किया। वह चिढ़ता तो और चिढ़ाते और बीच-बीच में आवाजें कस लुके-छिपे गिट्टियों का निशाना बनाते या टेढ़ी उँगलियों के ठुनके मारते जिससे वह परेशान हो गया और रुआँसा हो-हो जाता।

ऐसे ही एक दिन जब एक टपंखे मजदूर ने टेढ़ी उँगलियों से उसके सिर में जोरों का ठुनका मारा, वह दर्द से कराह उठा। यहाँ तक कि सिर पकड़कर बैठ गया। आँखों से आँसू चू पड़े।

इस पर पीपे के पास खड़ा धुएँ और भाप में खोये रहनेवाला नौजवान मजदूर जो काफी लंबा-चौड़ा था, हाथ-पैर जिसके फरुहे की तरह सख्त लगते थे, किसी जंगली जानवर की तरह दूर से चीखता-गुर्राता आया। यद्यपि वह बाबूलाल को तंग करने में पीछे न था, पर इस वक्त उसने बाबूलाल के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और परे हट दोनों पैर छितरा जलती आँखों से सारे मजदूरों को घूरा जिसका मतलब था कि आगे से इस छोकरे को किसी ने तंग किया तो खैर नहीं।

यह नौजवान मजदूर बहुत ही खूँखार था। सारे मजदूर इससे डरते थे। चेतावनी के बाद किसी ने बाबूलाल के साथ कोई हरकत नहीं की।

कोई हरकत भी न करे इसलिए नौजवान मजदूर ने बाबूलाल को डामर ढोने के काम में फँदा दिया।

इस बचाव पर बाबूलाल खुश था, लेकिन बहुत जल्द दुखी हो गया। वह मजदूर उससे रोटी पकवाता और टिपवाता देर रात तक हाथ-पैर। रोटी पकाने में कोई दिक्कत न थी। दिक्कत थी तो बस हाथ-पैर टीपने की। दिन भर की थकान के बाद, वह भी देर रात तक! वह ऊँघ कर गिर-गिर पड़ता। और मजदूर था जैसे रात-रात सोता न हो। हाथ रुकते ही पैर झटकने लगता और चीखता। एक दिन बाबूलाल के औंघ जाने पर उसने जोरों की लात जमाई और उठकर बैठा दिया।

बेकसूर मार पर बाबूलाल सुलग उठा। गहरी साँस ले उसने फैसला किया कि हाथ-पैर नहीं टीपेगा, चाहे जो हो जाए!

और चेतावनी के बाद भी उसने हाथ-पैर नहीं टीपे। रोटी भी नहीं पकाई।

इस हरकत पर नौजवान मजदूर आगबबूला हो उठा। लेकिन वह एक नंबर का मूजी थी। अपना क्रोध प्रकट नहीं होने दिया। बात-बात में हँस-हँसकर बोलता जैसे क्रोध में न हो और पिछली बातों को भूल गया है पर अंदर दहकता लावा छिपाए था।

बाबूलाल मजदूर की इस बात को समझ रहा था। डरता और उसके किसी भी हाव-भाव के प्रति चौकन्ना रहता।

एक बार वह बेतरह डर गया जब नौजवान मजदूर ने अफसोस जाहिर करते हुए उसके हजारे को टूटा कहकर पीपे के पीछे फेंक दिया और एक दूसरे हजारे में डामर भरा।

हजारा साबुत था, कहीं से चू नहीं रहा था। उसका डर जाता रहा। उसने हजारा उठाया। उठा नहीं। पहले से बड़ा था शायद इसलिए। साँस भरकर उसने फिर उठाया। उठ तो गया, लेकिन दो-तीन कदम ही चलना संभव हुआ। हाँफ गया। हजारा नीचे रख दिया। बोरे के टुकड़े को उसने कंधे पर जमाया और उस पर हजारा रखा। मुश्किल से पाँच-छै डग रखा होगा कि हजारे से टहकता डामर भलभला कर चुआ और जब तक वह हजारे को नीचे पटकता, एक जलती आग ने उसके सीने को छेद डाला। वह गिर पड़ा और छटपटाने लगा।

मजदूर ने संतोष की साँस ली। हालाँकि उसकी आँखों में अभी भी रोष था। उसने हजारे में एक बड़ा-सा छेद कर उसमें कपड़े की क्षणिक रोक लगा दी थी। काम करते मजदूर दौड़ पड़े। हल्ला मच गया। सड़क पर डामर रमाने वाले एक मजदूर ने लपककर उसकी कमीज फाड़ दी और हँसुली से पेट तक चिपटे डामर की डेढ़ बालिश्त लकीर पर किरासन टपकाया। दो-तीन मुँह जले भाग पर फूँक मारने लगे। बाबूलाल की आँखों में आँसू ठहरे थे। हाथ-पैर फड़फड़ा रहे थे। उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। हाथ-पैर भी अब वह पटक नहीं पा रहा था। किसी ने मजबूती से पकड़ रखे थे। उसे जले भाग पर बूँद और फूँक का एहसास भर हो रहा था।

मेट और सुपरवाइजर ने उसे उठाकर बैठाया। डेढ़ बलिश्त लंबी लकीर की खाल बीच-बीच से उधड़ गई थी। भभका उठ रहा था। किसी ने उस पर धूल भुरक दी थी।

सुपरवाइजर ने उसकी पीठ थपथपाई। मेट ने उसे बाँह पकड़कर खड़ा किया और हँसकर कहा - जरा सी चोट बिरादर, तुम तो जूजू से डर गए, क्या! उसने गरदन झटकी।

***

इस जानलेवा हरकत से बाबूलाल काँप गया। सारे मजदूर उसे कस्बे के उन आदमियों की तरह, बल्कि उनसे खूँखार लगे जो उसे ईंटा-गारा-कलई वगैरह के लिए ले जाते थे और तरह-तरह की ईजा देते थे। यद्यपि कुछ मजदूर अच्छे भी थे। किंतु वे भी उन्हीं जैसा करने में लगे थे।

सारे मजदूरों से उसे नफरत हो गई। उन्हें देखते ही मुँह फेर लेता। उनकी कोई बात अच्छी न लगती। यहाँ तक कि कोई हमदर्दी जताता तो लगता छलना चाह रहा है। अपने यहाँ आने पर उसे खेद होता, खासकर इस बात पर कि उसने सुरक्षित जगह नौकरी पाने की बात कैसे सोच ली थी। और यह मजदूरों का गोल जिसे वह कवच मान बैठा था, छुपी कटार निकला।

उसने सोच लिया कि हफ्ता पूरा होते ही यहाँ से रवाना हो जाएगा। ऐसे लोगों के बीच रहना कसाइयों से घिरा होना जैसा लग रहा था।

उसके सामने अब नए काम की चिंता थी। कहाँ जाएगा, कौन-सा काम करेगा? यह सोचते ही सड़क साफ करते उसके हाथ रुक जाते।

मेट उसे टोकता। एक बार तो उसने रूल फटकारकर जोरों से कहा - तुझसे कित्ती बार कहा, तेजी से हाथ चला, तू है, जाँगरचोरी करता है, क्या? उसने गरदन झटकी और कहना जारी रखा - हमने तो तेरे साथ... यकायक उसका क्रोध भड़क उठा। उसने उसकी कलाई पकड़ी और उसे खींचता रोलर के पास ले गया। चक्के पर रखे तर बोरे को पकड़े मजदूर की जगह उसे खड़ा किया और आँखें लाल करता, रूल हिलाता जोरों से बोला - डूटी इहाँ! अब अलाली की तो...

उसने उसे माँ की गाली दी और तेजी से मुड़कर खाली हुए मजदूर को सड़क साफ करने के लिए दौड़ाया।

मेट जैसे ही मुड़ा, मजदूरों की खिलखिलाहट का जबरदस्त विस्फोट हुआ। गिट्टी भरनेवाला मजदूर दोनों हाथ-पैर ऐंठ, बौने की तरह चला। मेट की नजर बचाकर उसने बाबूलाल की तरफ ऐसे भद्दे इशारे किए कि हँसी का पुनः विस्फोट हुआ।

बाबूलाल सिटपिटा गया। लगा जैसे किसी ने उसे भाले की नोंक पर उठा लिया और जमीन पर दे पटका। बेतरह रोना आया। साँस तेज-तेज चलने लगी। होंठ फड़कने लगे। आँखों में आँसू भर आए। ऐसी स्थिति में कौन-सा काम कर रहा है, भूल गया। बावजूद इसके पैर चल रहे थे और हाथ तर बोरा पकड़े थे कि रोलर आगे बढ़कर पीछे की ओर सरका झटके से।

बाबूलाल सँभल न सका - लड़खड़ा गया। देखते ही सड़क पर गिरा और उसके हाथ का बायाँ पंजा चक्के के नीचे आ गया।

एक जबरदस्त चीख उभरी और सारा काम रुक गया। सब ठगे-से खड़े रह गए।

बाबूलाल बेहोश हो गया। चीखते-चिल्लाते हुए मजदूरों ने कंधों पर लाद उसे अस्पताल पहुँचाया।

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बाबूलाल को कंधों पर लादे मजदूरों की मटमैली छाया जैसे ही ओझल हुई, मेट ने देखा -सारे मजदूर गमगीन-से सिमटे बैठे हैं। काम की फिकर ही नहीं किसी को - यकायक वह पलटकर जोरों से चीखा - मातम हो चुका, काम शुरू करो!

चेचकमारा मजदूर जिले बाबूलाल के साथ होने वाले बदसलूक का गम था, सबसे अलग चुपचाप उदास, उकड़ूँ बैठा आँखें मुलमुला रहा था और बाबूलाल के बारे में सोच ही रहा था कि मेट की बात पर क्रोध में उठ खड़ा हुआ झटके से। हाथ उठाकर पूरी ताकत से चिल्लाया - ऐसी की तैसी काम की। कोई काम नहीं होना! उसने मजदूरों की तरफ देखा - छोकरा चोट खाया, नईं पूछा - दवा दारू! बस्स काम शुर्रू करो! काम शुर्रू! कमीनपन की हद्द! चार-पाँच कदम आगे बढ़ता वह बोलता गया - काम तभी होना जब दवा-दारू का पैसा-मुआजा मिलेगा। नईं घंट काम होगा...

चारों तरफ सन्नाटा छा गया। धीरे-धीरे सारे मजदूर उसके पास सिमट आए। अभी तक वे बाबूलाल की चोट की वजह गमगीन थे, लेकिन चेचकमारे मजदूर की चीख ने उन्हें सक्रिय किया और वे आपस में आँखें चमका-चमका हाथ लहरा-लहरा चीखते हुए बात करने लगे जैसे झगड़ रहे हों। चेचकमारा मजदूर बार-बार सबके बीच घुसता और आँखें निकाल चीखता मानो उनकी बात से सहमत न हो रहा हो।

यकायक एक बुढ़िया मजदूरिन जो नीम आस्तीन कमीज और तहमत लपेटे थी, झुर्रियों भरा लाल-हरी चूड़ियोंवाला गुदा हाथ जब जमीन पर पटक जोर से चीखी तब सब शांत हो गए। सबने उसकी बात मानते हुए सुपरवाइजर से दवा-दारू का खर्च और मुआवजा देने की माँग की।

सुपरवाइजर ने इनकार किया तो उन्होंने काम से हाथ खींच लिए। रोलर बंद कर दिया। चूल्हे की आग ठंडी कर दी।

सुपरवाइजर के चेहरे पर बेचैनी छा गई। पाँच-पाँच रुपये देकर मजदूरों को पटाने की बात भी धोखा दे गई। घबराहट से वह पसीना-पसीना हो गया। हफ्ता भर रह गया है काम पूरा होने को मंडे को उद्घाटन होगा। एक मिनट काम रुकने से तो गजब हो जाएगा - उसने सिर थाम लिया।

सुपरवाइजर को इस हालत में देख मेट गुस्से से बौखला गया। दस-दस रुपए और चाय पर भी थूक रहे हैं हरामखोर! यकायक वह सबको जूतों से मारने और नौकरी से फुटा देने की धमकी देने लगा। डायरी और रिफिल वह हाथ में लिए था जो धमकी के साथ ऊपर उठते थे।

नीम आस्तीन कमीज और तहमत वाली बुढ़िया मजदूरिन कलाई हिलाती पास की एक दूसरी बड़ी मजदूरिन से मुँह सटाकर चीखी - ये हरामी का पिल्ला जूता मारेगा। नौकरी से निकालेगा। पहले अपनी नौकरी तो बचा, कमीन!

इससे बेखबर मेट ने सुपरवाइजर की तरफ देखा - ताजा कुछ कर गुजरने के भाव से, फिर उस पर खुश होता हुआ पेड़ की जड़ पर जा बैठा। जैसे ऐसा करने से लोग डर जाएँगे। इस ख्याल से डायरी निकाल उस पर रिफिल घुमाते हुए उसने सबसे हिसाब लेने को कहा कि एक काफी मोटा मजदूर जिसकी उँगलियों तक में गझिन बाल थे, सिर से रुमाल उतार, गर्दन का पसीना पोंछता, झुककर उससे आँखें सटा, गुर्राकर बोला - किसमें गूदा है हम लोगों को हटाने का! जान ले लेंगे।

मेट को उसके मुँह से बास आई। वह परे हटा - धमकी! जलती आँखों उसने उसे घूरकर देखा!

- धमकी नईं तो फूल माला बरसाएँ तुम पर - बुढ़िया हाथ और गरदन मटकाकर बोली जिस पर जोरों का ठहाका गूँजा।

मेट सिटपिटा गया। वह पीछे पलटा कि धुएँ और भाप में खोए रहने वाला मजदूर जिसने बाबूलाल को डामर से जला दिया था, जिसके एहसास से इस वक्त शर्मिंदा था, यकायक मेट के मुँह के सामने पंजा लहराता बोला - देखो, बमको मत! मुआजा दे दो, किस्सा खतम हो। आखिर कुछ तो सोचो कैसे काम चलेगा उसका! कोई बेजा तो हम कह नईं रहे!

मेट सख्त हो बोला - हम उसकी बेवकूफी के पैसे नईं दे सकते!

- नई दे सकते तो सुन लो कान खोल के - मजदूर डामर के खाली ड्रम पर उकड़ूँ बैठ गया था बीड़ी सुलगाता हुआ, मेट की बात पर उचककर जमीन पर जबरदस्त मुक्का मारता बोला - काम होगा, न होने देंगे! जो करेगा, लहास गिरा देंगे! आँख के गट्टे उसके बाहर निकल आए। मुट्ठियाँ तन गईं।

मेट ने हाथ लहराया - जा-जा बड़ा आया!

इस पर लगभग सभी का समवेत स्वर गूँजा - जा-जा बड़ा आया!

मेट ने सबको फूँक देनेवाली नजरों से देखा। मजदूरों ने भी उसे ऐसे ही देखा। मेट ने मटककर जमीन पर थूका जैसे उन पर थूक रहा हो। मजदूरों ने भी ऐसा किया, जैसे वे उस पर थूक रहे हों।

यकायक सुपरवाइजर तमतमाता बूट पटकता आया और मजदूरों के सामने तनकर खड़ा हो दाँत पीसता बोला - बहुत गर्रा रहे हो तुम लोग! अभी एक मिनट में हुलिया टाइट करवा दूँगा!

हैटवाला मजदूर हैट उतारता एकदम तिरछा होकर बोला - ए साब, इहाँ हुलिया टैट को नईं डरते, क्या! पुलिस बुलाइए चाहे फौज पल्टन, चाहे लोफर-लबारी! हम गरीब को हक चाहिए बस्स!

- अभी देते हैं हक! सुपरवाइजर मुट्ठियाँ भींचता गुस्से में ऐंठता पीछे पलटा। सामने मेट था, काँख में रूल चाँपे! सुपरवाइजर ने डाँटते हुए कहा - चूल्हा जला... रोलर स्टार्ट कर... इधर आ... कहता वह बुड़बुड़ाता तेजी से मोटरसाइकिल की ओर बढ़ा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे! गुंडे बुलाए या नए मजदूर?


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