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कविता

साहिब अंध, मुसाहिब मूक
देव


साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी, रँग रीझ कौ माच्यौ।
भूल्यो तहाँ भटक्यो घट औघट बूड़िबे को काहू कर्म न बाच्यौ।
भेष न सूझ्यो, कह्यो समुझ्यौ न, बतायो सुन्यो न, कहा रुचि राच्यौ।
'देव' तहाँ निबरे नट की बिगरी मति को सिगरी निसि नाच्यौ।।


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हिंदी समय में देव की रचनाएँ