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कविता

वरुनि बघंबर में गूदरी पलक दोऊ
देव


वरुनि बघंबर में गूदरी पलक दोऊ,
कोए राते बसन भगोहेँ भेष रखियाँ।
बूड़ी जल ही में, दिन जामिनी हूँ जागैं भौंहें।
धूम सिर छायौ बिरहानल बिलखियाँ।
अँसवा फटिक माल लाल डोरी सेल्ही पैन्हि,
भई हैं अकेली तजि चेली सँग सखियाँ।
दीजिये दरस 'देव' कीजिये सँजोगिनि, ये,
जोगिनि ह्वै बैठी हैं बियोगिनि की अँखियाँ।।


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