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कविता

फटिक सिलानि सौ सुधारयौ सुधा मंदिर
देव


फटिक सिलानि सौ सुधारयौ सुधा मंदिर,

उदधि दधि कौ सो अधिकाई उमँगै अमंद।

बाहर तें भीतर लौं भीति न दिखैए 'देव',

दूध को सो फेन फैल्यौ आँगन फरस बंद।

तारा सी तरुनि तामे ठाढ़ी झिलमिल होति,

मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका कौ मकरंद।

आरसी से अंबर में आभा सी उज्यारौ लागै,

प्यारी राधिका को प्रतिबिंब सो लागत चंद ।।


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हिंदी समय में देव की रचनाएँ