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कविता

या चकई कौ भयौ चित चीती
देव


या चकई कौ भयौ चित चीती, चितौत चहूँदिसि चाय सौं नाची।
ह्वै गई छीन छपाकर की छबि, जामिनि जोन्ह मनौ जम जाँची।
बोलत बैरी बिहंगम, 'देव' सु बैरिन के घर संपति काँची।
लोहू पियो जु वियोगिनी कौ, सु कियो मुख लाल पिसाचिनि प्राची।।


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हिंदी समय में देव की रचनाएँ