डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

लेख

जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन का हिंदी साहित्य में योगदान
डॉ. महीपाल सिंह राठौड़


श्री ग्रियर्सन जी,
आपने विदेशी होते हुए भी, हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास लिखा।
अनुवाद तो आपका ही है उसे क्या समर्पित करूँ? हाँ टिप्पणियाँ मेरी है
उन्हें स्वीकार करें।1

डॉ. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन कृत द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान का सं. टिप्पण अनुवाद प्रस्तुत करते हुए किशोरीलाल गुप्त ने उस पुस्तक का समर्पण ग्रियर्सन को इन्हीं शब्दों के साथ किया है। ग्रियर्सन का जन्म आयरलैंड के डब्लिन परगने में, राथफर्नहम घराने में 7 जनवरी 1851 ई. में हुआ था।2 इनका पूरा नाम जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन था। यही नाम इनके पिता का भी था। 17 वर्ष की उम्र में इन्होंने उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध ट्रिनिटी कॉलेज में प्रवेश लिया और वहाँ से स्नातक उत्तीर्ण की। ग्रियर्सन ने सन् 1868 में 'राबर्ट एटकिंसन' से संस्कृत वर्णमाला 3 का ज्ञान प्राप्त किया और बाद में मीर औलाद अली से हिंदुस्तानी भी सीखी। सन् 1871 ई. में ग्रियर्सन ने भारतीय सिविल सर्विस परीक्षा उत्तीर्ण की और 1873 ई. में यह भारत आए और बंगाल में नियुक्त हुए।

1886 ई. में वियना में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्राच्य विद्या विशारद सम्मेलन में भारत की ओर से भाग लिया4 और हिंदी भाषा-भाषी प्रदेश के मध्यकालीन भाषा-साहित्य और तुलसी पर एक लेख पढ़ा इस लेख की शोधपरक दृष्टि के फलस्वरूप ग्रियर्सन को प्रोत्साहन मिला और इसी से प्रेरित होकर 'द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान' ग्रंथ का निर्माण हुआ जो सर्व प्रथम 1888 ई. के रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के जर्नल के प्रथम भाग में प्रकाशित हुआ। और इसके पश्चात 1889 ई. में सोसाइटी ने इसे स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया।

ग्रियर्सन ने सर्वाधिक महत्व के तीन कार्य किए -

1. लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण)

2. द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान

3. तुलसीदास का वैज्ञानिक अध्ययन

ग्रियर्सन ने (लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया) भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण का कार्य 1894 ई. से आरंभ 1927 में समाप्त किया इसकी विशालता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि यह ग्यारह बड़ी-बड़ी जिल्दों में प्रकाशित है कई जिल्दें तो कई-कई भागों में विभक्त है। यह विशाल ग्रंथ भारतीय सरकार के केंद्रीय प्रकाशन विभाग की कलकत्ता शाखा के द्वारा प्रकाशित हुआ था। इसकी भूमिका में ग्रियर्सन ने लिखा है - It is a comparative Vocabulary of 168 selected words. in about 368 different languages and dialects. …gramophone records are available in this Country and in Paris.5

इसमें भारतीय भाषाओं, उप-भाषाओं और बोलियों के उदाहरण संकलित हैं। जिसमें तिब्बती, चीनी, बर्मी और ईरानी भाषा परिवार को भी सम्मिलित किया गया है। उन भाषाओं की सूची जिनके ग्रामोफोन रेकार्ड इस देश में तथा पेरिस में उपलब्ध है। भारतीय आर्य भाषाओं के इतिहास का सबसे अधिक प्रामाणिक तथा क्रमबद्ध वर्णन इस भूमिका में सुगमता से मिल सकता है। ग्रियर्सन लिखते हैं - Finish a work extending over thirty years. that after writing this Preface, the pen will be laid down. ...I plead guilty to a vain boast whom I claim that what has been done in it for India has been done for no other country in the world. 6 मैथिल कोकिल विद्यापति की 'कीर्तिलता' और 'कीर्तिपताका' नामक दो ग्रंथों का परिचय साहित्य जगत को करवाने वाले ग्रियर्सन ही थे।7

ग्रियर्सन ठेठ हिंदुस्तानी को साहित्यिक उर्दू तथा हिंदी की जननी मानते थे। इतिहास को लिखते समय उन्होंने शिवसिंहसरोज को आधार माना जिसका उल्लेख शुक्ल जी ने भी किया है।

ग्रियर्सन की यह मान्यता थी कि - 'मैं इसको एक ऐसे सामग्री संग्रह के रूप में ही भेंट कर रहा हूँ जो नींव का काम दे सके।' जिनके लेखकों का नाम हम जानते तक नहीं किंतु वे जनता के हृदयों में जीवित वाणी बनकर बचे हुए हैं क्योंकि उन्होंने जन की सत्य और सुंदर की भावना को प्रभावित किया।

ग्रियर्सन ने भाषा-शास्त्र के साथ ही साथ लोक साहित्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया।8 इन्होंने सन 1884 ई. में 'सम बिहारी फोक सांग्स' तथा सन 1886 ई. में 'सम भोजपुरी फोक सांग्स' नामक दो प्रामाणिक लेखों को प्रकाशित किया। इसमें भोजपुरी लोक गीतों का मूल पाठ व उनका अँग्रेजी अनुवाद व टिप्पणियाँ दी है। यह भोजपुरी लोकगीतों का प्रथम संग्रह माना जाता है। सन 1885 ई. में इन्होंने 'दि सांग ऑफ आल्हाज मैरेज' लेख इंडियन एंटीक्वेटी पत्रिका में प्रकाशित करवाया। इसी वर्ष इन्होंने 'टू वर्शन्स ऑफ दि सांग ऑफ गोपीचंद' को संकलित किया। सन 1889 ई. में जर्मनी की सुप्रसिद्ध पत्रिका जे.डी.एम.डी. में 'नयकवा बनजारा' गीत प्रकाशित करवाया।

डॉ. ग्रियर्सन की एक मौलिक कृति है 'बिहार पीजेंट्स लाइफ' यह बिहारी लोक जीवन का विश्वकोश माना जाता है। इस ग्रंथ की शैली नागरी और रोमन दोनों लिपियों में है। सचित्र व्याख्या से ग्रंथ बड़ा उपयोगी बन गया है। सन 1885 ई. में कलकत्ता के बंगाल सेक्रेटेरियेट प्रेस से यह पुस्तक प्रकाशित की गई थी।

ग्रियर्सन ग्राम गीतों को भी साहित्य का हिस्सा मानते थे। इतिहास लेखन की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि अगणित एवं अज्ञात कवियों द्वारा विरचित स्वतंत्र महाकाव्यों एवं ग्राम गीतों (जैसे कजरी, जँतसार और इसी प्रकार के अन्य भी) को जो संपूर्ण उत्तरी भारत में प्रचलित है मैंने इसमें सम्मिलित करने से अपने को रोका है।

तुलसी की उदारता ने ग्रियर्सन का मन मोह लिया। ग्रियर्सन ने वर्नाक्युलर लिटरेचर में तुलसी पर लिखा है -

'as a father and mother delight to hear the

lisping practice of their little one.'9

तुलसी ने चिर सौरभ की माला गूँथी और जिस देवता की भक्ति वे करते थे, उसके चरणों पर उसे दीनतापूर्वक चढ़ा दी।

ग्रियर्सन ने भाषा, साहित्य और लोक संस्कृति के संरक्षण में उल्लेखनीय कार्य किया। इस हिंदी प्रेमी अँग्रेज का 90 वर्ष की वय में 8 मार्च 1941 ई. को निधन हो गया।

संदर्भ

1. हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास, डॉ. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन कृत 'द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान' का सं. टिप्पणी अनुवाद किशोरीलाल गुप्त हिंदी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी 2 नवंबर 1957 (समर्पण पृष्ठ)

2. वही पृ. 19

3. हिंदी साहित्य कोश भाग 2, संपादक - धीरेंद्र वर्मा, ज्ञानमंडल लिमिटेड वाराणसी, द्वि.सं. 1986 ई. पृ.

4. वही, पृ. 25

5. Linguistic Survey of India, Vol I PART I, Introductory by G.A. GRIERSON Motilal banarsidass, Delhi Reprint 1967 Page Preface.

6. वही पृ.

7. हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी संवत 2056 वि.पृ. 15

8. लोक संस्कृति की रूपरेखा : कृष्णदेव उपाध्याय, लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद, सन 1988 पृ 37

9. हिंदी के विकास में विदेशी विद्वानों का योगदान : डॉ. जोस आस्टिन अनुराग प्रकाशन, नई दिल्ली सन 1988 पृ. 107


End Text   End Text    End Text