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कहानी

फ़ाक़ा
हरि भटनागर


बीच सड़क पर वह आदमी गिरा। और जैसा कि होता है कि जिस गति से कोई गिरता है, यदि खास चोट नहीं आई तो उसी गति से उठ भी खड़ा होता है। वह आदमी चटपट उठ खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर शर्म जैसा कोई भाव न था। उसने साइकिल उठाई और बिना इधर-उधर ताके, हैंडिल को पकड़े, धकाता आगे बढ़ा।

जब वह आदमी गिरा था, उस वक्त मैं अपने ड्राइंग रूम में बैठा सिगरेट पी रहा था और सोच रहा था कि कालीन पुराना हो गया है, क्यों न इसे खारिज कर दिया जाए और खूबसूरत-सा नया कालीन बिछाया जाए...

बस किसी के साइकिल से गिरने की आवाज आई।

वैसे जो आदमी गिरा था, मामूली तौर से गिरता नहीं। वह तो बेचारा हैंडिल पर झुका, पैडल पर पैर मारता, आराम से जा रहा था। उसे क्या पता था कि उसकी साइकिल के आगे सुअरिया आ जाएगी औंचक और उसे पटखनी दे जाएगी। लेकिन गनीमत समझो कि उसे चोट नहीं लगी और वह मुस्कुराता, साइकिल बढ़ाता निकला। साइकिल पर वह बैठा नहीं। गली तक वह पैदल ही गया और ओझल हो गया।

मैंने दूसरी सिगरेट निकाली और कालीन के सोच में फिर से डूब गया कि सूअरों के चीखने की आवाज से ध्यान भंग हुआ। चीख इस कदर थी जैसे कोई हादसा हो गया हो।

मैं जाली वाला दरवाजा ठेलता, बाहर आ खड़ा हुआ। देखा तो बीच सड़क पर आटा फैला था जिसे हड़प लेने के लिए सूअरों में मारा-मारी मची थी। जाहिर था कि आटा उस आदमी का था जो साइकिल के कैरियर में फँसा था, उसके गिरते ही, वह भी गिर पड़ा था। लेकिन आदमी की निगाह आटे के पुड़े पर क्यों नहीं गई? खैर, आटे का अब नामोनिशान न था, सूअर पन्नी तक चट कर गए थे, बावजूद उसके गुरगुराते-हड़बड़ाते हुए बेचैन-से इधर-उधर थूथन मार रहे थे जैसे कहीं न कहीं आटा है जो उनकी नजर से रह गया है...

थोड़ी देर बाद सड़क सुनसान थी। सूअरों का कहीं पता न था कि कहाँ बिला गए।

मैं, बाहर सीढ़ियों पर बैठा, सिगरेट के धुएँ उड़ा रहा था कि वह आदमी गली में नमूदार हुआ जो कुछ देर पहले बीच सड़क पर साइकिल से गिरा था। दोनों हाथों से साइकिल ठेलता वह इधर-उधर गौर से ताकता आ रहा था जैसे किसी गुमी चीज को ढूँढ़ रहा हो!

डुगरता हुआ वह उस मुकाम तक आ गया, जहाँ थोड़ी देर पहले गिरा था।

अब मैंने उसे गौर से देखा। बिखरे बालों का वह एक मजूर जैसा था। बाल रूखड़ थे और उलझे हुए। लगता था महीनों से उन पर पानी न पड़ा हो। शरीर पर उसके एक लंबा-सा कुर्ता था जिसमें बटन नहीं थे जिसमें से छाती के काले-काले बाल झाँक रहे थे। वह पैंट पहने था जो निहायत ही गंदा था। पैर में प्लास्टिक के काले जूते थे। कपड़ों पर चूने-मिट्टी के धबे थे जिनसे यह अंदाजा लगता था कि वह पुताई करने वाला मजूर है। वह एकदम काला था, छुहारे जैसा सूखा, लेकिन उसकी आँखें चमकदार थीं। आँखों के कोरों में हल्की लालिमा थी जो अक्सर तेज धूप में रहने पर हो जाती है।

एक क्षण को उसने आस-पास नजर डाली और जब उसे कुछ नजर नहीं आया तो वह साइकिल धकियाता आगे बढ़ा। आगे बढ़ते-बढ़ते उसकी आँखें कुछ ढूँढ़ रही थीं - जाहिर था, वह पुड़ा हेर रहा था जिसमें आटा था।

गली के दूसरे मुहाने पर वह खड़ा हो गया। साइकिल उसके पेट से टिकी थी। जेब से उसने बीड़ी निकाली, उसे हथेली पर कुछ देर रगड़ता रहा, फिर उसने माचिस निकाली। उसके होंठ बुदबुदा रहे थे, सिर हिल रह था, लगता था जैसे अपने से कह रहा हो कि पुड़ा गया तो गया कहाँ? यकायक उसने तीली जलाई और पंजों से हवा को रोककर बीड़ी सुलगाने लगा। सिर हिलाते संभवतया इस वक्त भी वह वही वाक्य दोहरा रहा था कि पुड़ा गया तो गया कहाँ?

जैसे ही मैं एक क्षण के लिए अंदर गया और वापिस लौटा, वह आदमी नदारद था।

मैंने सिगरेट का आखिरी कश खींचा कि गली के दूसरे छोर पर वह आदमी फिर दिखा। साइकिल धकियाता। इस बार उसके साथ उसका सात-आठ साल का लड़का था जो संभवतः पुड़े की खोज में उसकी मदद के लिए आया था। गली के मुहाने पर वह आदमी खड़ा था। बीड़ी का बुझा टोंटा उसके होंठ के कोर में था, वह लड़के को बता रहा था कि वो साहब जो सीढ़ियों पर बैठा है, सिगरेट खैंच रहा है, उसी के घर के आगे मैं सुअरिया के आगे आ जाने से गिरा था साइकिल से। मुझे पक्का भरोसा है कि कैरियर में आटे का पुड़ा कसा था, लेकिन पता नहीं कैसे वह ओझल हो गया, समझ में नहीं आता! यह तो गजब है, सरासर! गिरने पर कहीं कुछ तो बिखरता!

आँखें चमकाता दूर की कौड़ी लाता-सा लड़का बोला - साहब तो नहीं मार ले गया!

आदमी मुस्कुराया, लड़के की होशियारी पर, बोला कुछ नहीं।

लड़का बाप की आँखों में झाँकता बोला - आज तो तूने ताड़ी भी नहीं खैंची है कि नशे में गफलत हो जाए।

बाप अफसोस में ताड़ी के नशे के-से अंदाज में झूमता हुआ साइकिल की सीट पर हाथ मारता बोला - लाख ताड़ी खैंचे हों कभी कोई सामान नहीं गिरा!!!

इस बीच आदमी की घरवाली भी आ गई थी। वह दुबली-पतली सुक्कड़-सी थी। हवाई चप्पल पहने थी। पीले-पीले निचुड़े से पैरों में चाँदी के लच्छे थे।

तीनों गली के मुहाने पर खड़े बतिया रहे थे। कोई कुछ अटकलें भिड़ाता, कोई कुछ। जाहिर था तीनों पुड़े को लेकर चिंतित थे और परेशान।

तीनों गली के इस छोर से उस छोर तक चौकन्नी निगाहों से ताकते हुए, चहलकदमी करते रहे। आदमी बीच-बीच में रुककर अपने गिरने की जगह भी बताता जाता था सिर धुनता हुआ।

इन तीनों की हरकत मैं काफी देर से देख रहा था और सोच रहा था कि बिचारे कितने परेशान हैं! मैं यह भी सोच रहा था कि न आदमी ने और न ही औरत-बच्चे ने मुझसे कोई पूछताछ की! मेरे लिए यह एक हैरानी की बात थी। अगर वे मुझसे पूछते तो मैं साफ बता देता। यही नहीं, मैं दो-तीन किलो आटा दे देता या उतने का पैसा! मेरे लिए यह निहायत छोटी-सी बात थी; लेकिन इन तीनों ने मुझे दरकिनार रखा।

जब ये तीनों गली के मोड़ पर थे और मायूस होकर जाने ही वाले थे, मुझसे रहा नहीं गया। मैंने आगे बढ़कर आदमी से पूछा - क्या हुआ, तुम परेशान क्यों हो?

आदमी ने मुझे देखा, बोला कुछ नहीं। उल्टे उसके चेहरे पर जो भाव था, छिप नहीं रहा था, बोल रहा हो - तुझे सब पता है, फिर भी पूछता है कि क्या हुआ?

मैंने पूछा - कुछ खो गया है क्या?

आदमी ने उपेक्षा भाव बरतते हुए फिर कोई जवाब नहीं दिया।

मैं तीनों से मुखातिब था लेकिन तीनों चुप्पी साधे थे। बस ऐसे देखते जैसे कह रहे हों कि तू इत्ती दया आखिर किसलिए दिखला रहा है!

यकायक आदमी ने औरत से कहा - चल एक दिन भूखै सो रहेंगे! क्या फरक पड़ता है। आज फाका ही सही। क्या?

इस पर आदमी यकायक ठठाकर हँसा। औरत और बच्चा भी हँस पड़े।

मैं अपने में सिमटा था।


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