डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

विमर्श

उसने कहा तो, पर ऐसा क्यों नहीं कहा...
कबीर संजय


ये इंडिया गेट की एक शाम थी...

गोल-गोल चक्कर लगाते हुए तेजी भागते वाहनों के बीच सिर उठाए यह इंडिया गेट है। दिल्ली के बीच यह जगह काफी खुली-खुली सी लगती है। हर तरफ भागता ट्रैफिक। तेज रफ्तार गाड़ियाँ। तेजी से दौड़ते-भागते इन वाहनों के बीच से भागकर सड़क पार करने में भी हिचकिचाहट होती है। अक्सर ही लोग सड़क पार करने के लिए कई-कई मिनट तक वाहनों का रेला थमने का इंतजार करते हैं। कभी कदम आगे बढ़ाते हैं तो कभी वापस खींच लेते हैं। कई बार जी कड़ा कर किसी तरह से सड़क पार करते हैं। ऐसे समय में यह भी होता कि सड़क पर अपनी तरफ तेजी से आ रहे वाहनों से आदमी नजरें चुराता हुआ तेजी से निकलने लगता है। कि जैसे अब जो कुछ करना है, गाड़ीवाला ही करे। लाल और हरी बत्तियों से नियंत्रित जनप्रवाह।

बाहर से आने वाले के लिए दिल्ली किसी भीड़ में खो जाने जैसा है। ऐसे में इंडिया गेट पर तो चारों तरफ सिर्फ सड़कें ही हैं। सड़कों का एक गोल घेरा और उससे जुड़ी हुई चौड़ी सड़कें। हर सड़क से भागे आ रहे वाहन इस गोल सड़क में समाकर घूमने लगते हैं। फिर घुमाकर फेके गए किसी ढेले की तरह एक तरफ से निकल जाती हैं। इनके बीच काफी ढेर सारी खुली जगह। ऊँचा सा इंडिया गेट। आगे जल रही अमर जवान ज्योति। सैंडस्टोन के चुनिंदा पत्थरों से बनी। एक-एक पत्थर करीने से सजा इंडिया गेट एक बड़े से तोरणद्वार जैसा ही है। घूमने आए तमाम लोग इसके सौंदर्य में खो से जाते हैं। अंग्रेजी स्थापत्य का यह अनूठा नमूना। गौर से देखने पर पत्थरों पर साफ-सुथरे अंग्रेजी के अक्षरों में उत्कीर्ण कुछ नाम पढ़े जा सकते हैं। बहुत सारे लोगों के नाम। एक के ऊपर एक। कोई एक नाम किसी एक पत्थर की ईंट या फिर टाइल से बाहर निकल जाता तो उसे दूसरे में पूरा कर दिया जाता। सुंदर लिखावट। आगे जल रही अमर जवान ज्योति। सीधे-सतर खड़ा हुआ सिपाही। दिल को जज्बाती बना देने वाला यह दृश्य है।

आमतौर पर हम इसे भारतीय सैनिकों के शौर्य का प्रतीक मानते हैं। ऐसा है भी। लेकिन, इसके बारे जब हमारी जानकारी बढ़ती है तो कई बार झटका भी लगता है। यह उन सिपाहियों की याद में बनाया गया स्मारक है जो प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद हो गए थे। और यह संख्या कितनी बड़ी थी। एक आँकड़ा कहता है कि प्रथम विश्व युद्ध में 82 हजार से ज्यादा भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। वे फ्लांडर्स में लड़े, फ्रांस में लड़े, पूर्वी यूरोप और इजराइल में लड़े। उन्होंने कई सारी जीतें हासिल कीं। कई सारी हार भी उनके हिस्से में आई। वे मारे गए। उनके हाथ-पाँव कट गए। वे जीवन भर के लिए विकलांग (नए चलन के मुताबिक दिव्यांग) हो गए। यूरोप की सर्द खंदकों में, बारिशों में भीग कर बार-बार होने वाले बुखार ने उनका दम तोड़ दिया। वे कमजोर होकर मर गए। कभी भूख ने भी उनका दम तोड़ दिया। कभी दुश्मनों की सौ-सौ मक्कारी भरी चालों से वे मात खा गए। उनमें से तेरह हजार से ज्यादा फौजियों के नाम इस स्मारक पर उत्कीर्ण हैं। वे सिपाही जो यूरोप की धरती पर मार दिए गए।

यूरोप उनकी जमीन नहीं थी। युद्ध उनका अपना नहीं था। न ही युद्ध उन्होंने छेड़ा था। न ही युद्ध की वे इच्छा रखते थे। फिर भी जीत का उल्लास भी उनके अंदर होता होगा। हार उनको कितने अंदर तक हरा देती होगी। न हार उनकी थी और न ही जीत उनकी थी। यूरोप के कुछ देशों ने दुनिया पर कब्जा करने के लिए, उसके बँटवारे के लिए युदध छेड़ रखा था। वे आपस में लड़ रहे थे। वे हर उस हिस्से पर कब्जा करना चाहते थे, जहाँ पर प्राकृतिक संसाधन मौजूद थे। जहाँ पर अपना माल बेचने की संभावना थी। जहाँ पर कच्चा माल भी नहीं था, बाजार भी नहीं था। वहाँ पर ऐसे लोग थे, जिन्हें ही गुलाम बनाकर बेचा जा सके। वे ऐसे देशों को, ऐसी धरती को ज्यादा से ज्यादा अपने अधिकार में कर लेना चाहते थे। यूरोप में देर से जवान हुए कुछ देशों की मांसपेशियों में जब ताकत आई तो उन्होंने देखा कि दुनिया का तो पहले ही बँटवारा हो चुका है। अब वे नए सिरे से बँटवारा चाहते थे। मोटा-मोटी यही कारण थे, जिसने पहले विश्वयुद्ध को जन्म दिया।

भारतीय सैनिक भी युद्ध में शामिल एक देश की तरफ से लड़ रहे थे। इस जीत से उनकी अपनी धरती पर कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला था। कहा जाता है कि देशभक्ति की भावना ही वह भावना है, जिसके चलते कोई सैनिक अपनी जान कुर्बान कर देता है। अपनी मातृभूमि की रक्षा का खयाल ही सैनिकों के दिल में जान पर खेल जाने की भावना भर देता है। पर यहाँ पर वो भावना कहाँ थी।

विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद, वर्ष 1921 में इस स्मारक का निर्माण शुरू किया गया और युद्ध में शहीद होने वाले सैनिकों के नाम यहाँ पर उत्कीर्ण किए गए। भारतीय सैनिकों की यह ऐसी विजयगाथा है जो उन्होंने यूरोप की धरती पर लिखी। निश्चित तौर पर इनमें से कई कहानियाँ ऐसी भी हैं जो जाहिर हैं और कई सारी ऐसी भी होंगी जिनके बारे में शायद हम कभी भी जान नहीं पाएँगे। वे कहानियाँ भी खून और आँसुओं में डूबी होंगी। इस भव्य स्मारक की भव्यता, सामने दिखने वाले विजय चौक की छतरी और रायसीना हिल्स के टीले पर बना राष्ट्रपति भवन। जो यहाँ से थोड़ा धुंधला पर ज्यादा ऐश्वर्यशाली हो जाता है। यह तमाम दृश्य भी उन सैनिकों की बेबसी के बारे में सोचने से रोक नहीं पाता है जो विदेशी धरती पर, विदेशियों के लिए, विदेशियों से लड़ते हुए मर-खप गए। उस लड़ाई में उनका अपना क्या था। निश्चित तौर पर जिस युद्ध में 82 हजार से ज्यादा भारतीय सैनिक मारे गए हों, उस युद्ध में शामिल होने वाले भारतीय सैनिकों की बड़ी तादाद का अंदाजा लगाया जा सकता है।

हाल ही हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी फिलीपीन्स की राजधानी मनीला में आयोजित एक समारोह में इसका जिक्र किया। उनके द्वारा दिए गए भाषण के अनुसार दोनों विश्वयुद्धों में भारत के डेढ़ लाख से भी ज्यादा सैनिक शहीद हुए हैं। हालाँकि, सकारात्मक नजरिया रखने वाले हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री यहाँ पर इस बात का उल्लेख करना नहीं भूले कि हम लोग सिर्फ देते हैं। दुनिया से लेते नहीं है। यानी बिना कुछ लिए ही हमारे डेढ़ लाख सैनिकों ने दो विश्वयुद्धों में अपने प्राण कुर्बान कर दिए। कर्म करो और फल की इच्छा मत करो, इसका ऐसा अद्भुत आख्यान बिरले ही मौजूद होगा।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक पहले विश्व युद्ध में पंद्रह लाख से ज्यादा भारतीय सिपाही अंग्रेजों की तरफ से युद्ध में शामिल हुए थे। जबकि, दूसरे विश्व युद्ध में उनकी संख्या पच्चीस लाख के लगभग थी। यह संख्या युद्ध में शामिल कई देशों की उनकी अपनी फौज की संख्या से ज्यादा थी। अंग्रेजी फौज में बाकायदा हिंदुस्तानी जातियों के नाम पर अलग-अलग रेजीमेंट थीं। जिन्हें युद्ध में शामिल होने के तमाम तमगे भी दिए जाते थे। कुछ अँग्रेज अधिकारी तो इस बात को स्वीकार भी करते थे कि पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में उनकी जीत के पीछे भारतीय सैनिकों की महती भूमिका रही।

(क्या इसे इस तरह से कहा जा सकता है कि एक गुलाम ने अपने मालिक को दूसरे का गुलाम बनने से या फिर उसका अधीनस्थ बनने से रोक दिया। अपने मालिक की श्रीवृद्धि और रुतबे में जी-जान से जुटा रहा)

आखिर उसने ये क्यों नहीं कहा था...

इंडिया गेट को यहीं पर छोड़कर अब हम इससे भी आगे चल सकते हैं। 'उसने कहा था'। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की यह कहानी हमारे उत्तर प्रदेश बोर्ड के पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। कक्षा कौन सी थी, अब यह तो याद नहीं। कहानियाँ पढ़ने का यूँ भी शौक था। तो एक-एक कहानी कई-कई बार पढ़ी। पंजाब के किसी शहर में एक छोटा सा बच्चा एक छोटी सी बच्ची से पूछता है, तेरी कुड़माई हो गई।

और वो छोटी सी बच्ची शर्मा जाती है। उस छोटे से शहर में वे दोनों अक्सर ही किसी न किसी दुकान या कहीं पर टकराते हैं और लड़का अपनी शरारती नजरों से वही सवाल पूछता है। तेरी कुड़माई हो गई। और लड़की शर्मा कर धत्त कहकर भाग जाती है। ये सिलसिला कोई बहुत ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। आखिर एक दिन फिर जब लड़के ने लड़की से वही सवाल पूछा तो लड़की ने कहा कि हाँ। ये देख हाथ में ये धागा (कढ़ा हुआ सालू)। अब जो लड़के की प्रतिक्रिया है, शायद वही कहानी का सबसे खूबसूरत और सहज हिस्सा है। घर वापसी कर रहा लड़का एक छोटे बच्चे को नाली में धकेल देता है। एक कुत्ते के पीठ पर पत्थर जड़ देता था। छुआछूत मानने वाली किसी वैष्णवी से जबरन जाकर टकरा जाता है।

यहीं पर दृश्य बदल जाता है। दूसरा दृश्य यूरोप में किसी युद्ध स्थल का है। शायद टर्की या फिर पूर्वी यूरोप के किसी अन्य देश के किसी हिस्से का। यहाँ पर भारतीय सैनिक बरसात से गीली, ठंडी खंदकों में डटे हुए हैं। अपने देश की मिट्टी की खुशबू से वे लबरेज हैं। वे एक-दूसरे का खयाल रखते हैं। गाते हैं, बजाते हैं। एक-दूसरे के साथ से ही उनको सहारा मिलता है। उसी सहारे से वे उस विदेशी धरती पर भी लड़ने के हौसले से भरे हुए हैं। दुश्मनों की मक्कारी भरी चालें भी युद्ध भूमि जैसी ही है।

दुश्मन चालाकी से ज्यादातर सिपाहियों को खंदक से बाहर किसी काल्पनिक चौकी पर हमला करने के लिए भेज देता है। लेकिन, इस बीच एक सिपाही इस चाल को भाँप जाता है। वह भारतीय सैनिकों को वापस बुलाने के लिए संदेश भी भेजता है और दुश्मन से लोहा भी लेता है। अपने सूबेदार को बचाने के लिए वह बुरी तरह से घायल हो जाता है। दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए जाते हैं।

अब यहाँ पर कहीं जाकर इस बात की पहचान होती है कि अपनी जान पर खेलकर दूसरों की जान बचाने वाला यह सिपाही वही छोटा सा बारह साल का लड़का है जो बचपन के दिनों में पंजाब के एक छोटे से शहर अमृतसर में अक्सर ही दुकानों पर मिल जाने वाली आठ साल की लड़की से पूछता था, तेरी कुड़माई हो गई। वही लड़का जब युद्ध में शामिल होने के लिए यूरोप जाने से पहले अपने सूबेदार हजारा सिंह के गाँव गया था तब कहीं जाकर उसे पता चला कि सूबेदारनी तो वही लड़की है। जिसकी कुड़माई उस रोज हो गई थी। जिसके बाद उसने एक छोटे बच्चे को नाले में धकेल दिया था और कुत्ते की पीठ पर पत्थर रसीद दिए थे। सूबेदारनी ने उससे कुछ कहा था। इस सिपाही के सामने उसका कहा पूरा करने की, उसके वायदे पर खरे उतरने की चुनौती थी। निश्चित तौर पर कहानी में यह सिपाही इस संतोष के साथ मरता है कि उसने वो पूरा कर दिया जो उससे कहा गया था।

प्रेम, कुर्बानी और साहस से भरी हुई यह कहानी हिंदी साहित्य में किसी मील के पत्थर से कम अहमियत नहीं रखती। चरित्रों का चित्रण और उनकी मनोदशाओं का वर्णन यहाँ पर बेहद खूबी के साथ सधे हुए हाथों से किया गया है। पहले पंजाब के उस छोटे से शहर का वातावरण और बाद में युद्ध में डूबी किसी मनहूस धरती की सारी निराशा-हताशा इस कहानी में उतर सी आई है। मानो जैसे शब्दों से कोई चित्र से खींच दिए गए हों। लेकिन, इन सारे चित्रों के तमाम प्रभावों के बावजूद अक्सर ही एक सवाल मन में घुमड़ने लगता है कि किसी छोटी लड़की से किए गए प्यार को इतनी ज्यादा संवेदनशीलता के साथ महसूस करने वाला और उसके साथ इतना समर्पण महसूस करने वाला यह पात्र क्या कभी यह भी सोचता होगा कि जिस धरती पर हो रहे युद्ध के लिए वह प्राण दे रहा है, उसमें उसके लिए रत्ती भर भी कुछ नहीं छिपा हुआ है। वो क्यों लड़ रहा है। क्या यह अंग्रेजों की गुलामी नहीं है, जो उससे यह सब करवा रही है।

हाँ, ये भी संभव है कि 1915 में जब यह कहानी छपी थी, उस समय अंग्रेजों पर और उनके द्वारा किए जा रहे युद्ध पर सवाल उठाना हो सकता है कि मुसीबत भरा साबित होता। हो सकता है कि कहानी छपने भी नहीं पाती। या क्या पता कि क्या होता। लेकिन, निश्चित तौर पर इसका जिक्र नहीं किए जाने से एक कसक सी मन में तो बनी रह ही जाती है।

आखिर उसने ये क्यों नहीं कहा था।

दुनिया पर बरपा है इस पौधे का कहर...

दुनिया में अलग-अलग संस्कृतियाँ और धर्म अलग-अलग पेड़-पौधों की पूजा करती हैं। कहीं पर नारियल पवित्र है तो कहीं खजूर। किसी के लिए जैतून सबसे महत्वपूर्ण है तो किसी के लिए तुलसी की पूजा ही धर्म है। लेकिन, जिस एक पौधे ने दुनिया को सबसे ज्यादा बदला है वह निस्संदेह अफीम का पौधा है। यही वह पौधा है जो हजारों साल से इनसानों के साथ रहा है। इसने तमाम महाद्वीपों और महासागरों की सीमाओं को लाँघकर शायद ही पृथ्वी का कोई हिस्सा अछूता छोड़ा हो। इस एक पौधे ने पूरी दुनिया की ऐसी की तैसी कर दी। कत्लोगारद कर दिया। समृद्धि की अट्टालिकाएँ खड़ी कर दीं। साम्राज्यों को बुलंदियों तक पहुँचा दिया। तो इसी की वजह से कुछ साम्राज्य धूल में भी मिल गए।

इस एक पौधे ने राष्ट्रों की किस्मत बदल दी। लाखों-करोड़ों लोग इसके प्रभाव में आए बिना नहीं रह सके। कुछ को इसके चलते मौत मिली तो कुछ को इसने जीवनदान दिया। जी हाँ, अगर किसी पौधे को शापित कहा जा सकता है तो वह शायद अफीम का ही पौधा होगा। इसके वरदान भी इतने कम नहीं, जितने के इसके अभिशाप हैं। मानव सभ्यताओं द्वारा तीन हजार से ज्यादा सालों से इसका चिकित्सकीय इस्तेमाल किया जाता रहा है। लोगों को इसके सेवन से असहनीय दर्द को सहने की ताकत मिलती है। लेकिन, इसी ने चीन की पूरी की पूरी एक पीढ़ी को अपने नशे में गिरफ्तार करके उसे औपनिवेशिक गुलामी की तरफ धकेल दिया। इसी के चलते चीन को ब्रिटेन के हाथों दो-दो अफीम युद्ध झेलने पड़े। जिसने चीन के महान साम्राज्य को मिट्टी में मिलाने की शुरुआत कर दी।

अफीम एक छोटा सा मौसमी पौधा होता है। इसके फूल की पंखुड़ियाँ जब झड़ जाती हैं तब इसके फूले हुए भाग यानी पोपी पर हल्का सा चीरा लगाने से यहाँ से दूध जैसा चिपचिपा पदार्थ रिसने लगता है। पोपी पर निकलता यही पदार्थ सूख जाता है और भूरे रंग का हो जाता है। इसे ही खुरचकर निकाल लिया जाता है। यही अफीम है। इस अफीम में खुद को भूल जाने वाला नशा होता है। इसी के चलते सदियों से इसे सर्जरी व अन्य प्रकार के दर्द को सहन करने के लिए मरीजों को दिया जाता रहा है। नशे के लिए भी इसका प्रयोग चलता रहा है। अफीम के बीज यानी पोस्त का भी इस्तेमाल व्यंजनों और दवाइयों में किया जाता है। लेकिन, अफीम का इस्तेमाल किसी देश को गुलाम बनाने के लिए भी किया जा सकता है। इसकी पहली मिसाल ब्रिटेन द्वारा चीन पर थोपे गए अफीम युद्ध में ही मिलती है।

अफीम के पौधे और नशे के बारे में मुझे इतनी सारी बातें सिर्फ इसलिए करनी पड़ी क्योंकि ब्रिटिश व्यापारी चीन में अफीम बेच सके, इसके लिए भी बहुत सारे भारतीय सिपाहियों ने अपनी जान कुर्बान की है। यह पहले विश्वयुद्ध से भी काफी पहले की बात है। चीन में ब्रिटेन के व्यापारियों के हित सुरक्षित कराने के लिए भारतीय सैनिकों की टोलियाँ पर टोलियाँ गईं। उनमें बहुत सारे सिपाही थे। तो बहुत सारे किसी फौजी यूनिट के साथ चलने वाले दुकानदार, कुली, नफीरीवादक व अन्य लोग थे।

अँग्रेज उपन्यासकार अमिताभ घोष अपनी उपन्यास त्रयी में इस अफीम के कारोबार और इसके व्यापार पर लगने वाली पाबंदियों को समाप्त करने के लिए किए जाने वाले जोड़-तोड़ और युद्ध पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। आईबिस त्रयी के नाम की इस उपन्यास शृंखला के पहले भाग 'अफीम सागर' के केंद्र में हुगली नदी के मुहाने पर बसा कलकत्ता शहर है। यहाँ पर अफीम के कारोबार के चलते तमाम लोगों के उजड़ने और उनकी किस्मतों के बदलने का अनोखा वर्णन है। गाजीपुर की एक महिला दीती अपने अफीमची पति की मौत के बाद अपने देवर के हाथों यौन शोषण का शिकार होने से बचने के लिए सती होने का संकल्प लेती है। गाँव के ही एक नीची मानी जाने वाली जाति के व्यक्ति ने उसे बचा लिया लेकिन वे दोनों भागकर गिरमिट के तौर पर मारीच देश (मारीशस) जाने को मजबूर हो जाते हैं। एक राजा है जिसका राजपाट अंग्रेजों द्वारा छल से जीत लिया गया है और उसे काले पानी की सजा के तौर मारीशस भेजा जा रहा है। एक चीनी युवक है जो बेतरह अफीम के नशे की गिरफ्त में है और अफीम नहीं मिलने के चलते उसकी हालत खराब हो गई है।

अफीम ढोने के लिए आईबिस जहाज कलकत्ता के लिए चला है लेकिन पेटागोनिया की बजाय उसे केप ऑफ गुड होप का रास्ता लेना पड़ता है। रास्ते में ऐसी परिस्थितयाँ बनती है कि एक संकर नसल का अमेरिकी युवक जैकरी ही जहाज का कमांडर हो जाता है और अराकान का रहने वाला, हर समय पान से रँगे हुए दाँतों वाला सेरंग अली उसका मुख्य नाविक बन जाता है। फ्रांसीसी वनस्पतिविज्ञानी की बेटी पौलेट और उसके साथ पला-बढ़ा बंगाली मुसलमान जोड़ू। कुल मिलाकर अफीम एक सूत्र है, सभी पात्रों और इतिहास के उस दौर के बीच में। दूसरा भाग 'नशे का दरिया' के केंद्र में चीन का शहर कैंटन है। यह शहर पर्ल नदी के मुहाने पर बसा है। ब्रिटेन, अमेरिका व अन्य देशों के व्यापारी चीन को अफीम बेचने पर अड़े हुए हैं। अफीम के दुष्परिणामों को देखते हुए चीन उस पर अपने यहाँ पाबंदी लगाना चाहता है। चीन में अफीम बेची जा सके, इसके लिए ब्रिटेन उस पर हमला भी कर देता है। पहले अफीम युद्ध के बाद ब्रिटेन को ढेरों छूट मिल जाती है, हांगकांग जैसे द्वीप पर ब्रिटेन का कब्जा हो जाता है और दूसरे अफीम युद्ध के बाद तो अफीम के कारोबार से पाबंदी ही समाप्त हो जाती है। सवाल यह है कि अफीम का यह कारोबार ब्रिटेन के लिए आखिर इतना महत्वपूर्ण बना कैसे।

अफीम के व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण दौर यानी उन्नीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की मुद्रा चाँदी थी। यह चाँदी आती कहाँ से थी। चाँदी लातिन अमेरिका में स्थित स्पेनी उपनिवेशों से आती थी। यहाँ की खदान से सोना-चाँदी निकालने के काम में लगा-लगाकर व अन्य तरीकों से स्थानीय रेड इंडियन आबादी को स्पेनियों ने लगभग समाप्त कर दिया। लातिन अमेरिकी लेखक एदुआर्दो गालियानों अपनी किताब 'ओपेन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका' में बहुत ही गहराई और सटीकता से आँखें खोल देने वाले इन अत्याचारों और क्रूरताओं के विवरण प्रस्तुत करते हैं। स्थानीय आबादी के समाप्त होने के साथ ही उन्हें खानों में काम करने के लिए आदमी चाहिए होते थे। इसके लिए अफ्रीका से लोगों को गुलाम बनाकर उन्हें लातिन अमेरिका में ले जाकर बेचा जाने लगा। इस काम में ब्रिटेन की कई कंपनियाँ अग्रणी भूमिका में रहीं। इस तरह से स्पेन जो चाँदी लातिन अमेरिका की खदानों से निकालता था, उसका काफी हिस्सा ब्रिटेन के पास पहुँच जाता।

उस समय तक यूरोपीय लोगों के साथ व्यापार में चीन का पलड़ा भारी था। चीन की रेशम, चायपत्ती, चीनी मिट्टी के बर्तन आदि की यूरोप में जबरदस्त माँग थी। जबकि, यूरोप या इंग्लैंड ऐसा कुछ भी नहीं बनाते थे, चीन में जिसकी जरूरत भी महसूस की जाती रही हो। अपनी किताब 'अफीम युद्ध से मुक्ति युद्ध तक' में इजराइल एप्सटाइन ने चीन के सम्राट झ्येन लुंड द्वारा वर्ष 1796 में इंग्लैंड के राजा जार्ज तृतीय को लिखे पत्र का उद्धरण देते हैं। इसमें चीन के सम्राट इंग्लैंड के राजा को लिखते हैं कि... 'हमारे देश में सभी चीजें मौजूद हैं। विचित्रता या कौशल वाली चीजों का हमारे सामने कोई मूल्य नहीं है और आपके देश के तैयार माल का हमारे लिए कोई उपयोग नहीं है।' यानी यह एक ऐसी स्थिति थी जिसमें चीन को माल खरीदने की जरूरत नहीं थी और वह माल बेचता था। इंग्लैंड और यूरोप की चाँदी का प्रवाह चीन की तरफ था।

चाँदी के सिक्कों के इस प्रवाह को चीन की तरफ से मोड़कर अपनी तरफ करने का इंग्लैंड को एक ही हथियार मिला। वो हथियार था अफीम। ऐसा नहीं है कि इंग्लैंड से पहले चीन में अफीम का सेवन नहीं किया जाता था। लेकिन, बेहद मुश्किल से होने वाली इसकी उपलब्धता और अफीम के महँगा होने के चलते नशे के तौर पर इसका इस्तेमाल बहुत ही कम होता था। इंग्लैंड ने चीन को अफीम की उपलब्धता से पाटना शुरू कर दिया। इससे पहले अफीम को चबाकर खाया जाता था। लेकिन, एक पाइप के जरिए अफीम को जलाकर उसका धुआँ पीने का एक चलन शुरू हुआ। जिसने कुछ ही समय में चीन में बहुत सारे लोगों को अपने नशे की जद में ले लिया। अफीम ने व्यापार के पुराने संतुलन को पलट दिया। कुछ ही दिनों में चीन की चाँदी खिंच-खिंचकर इंग्लैंड जाने लगी।

भारत के अलग-अलग भूभाग पर कब्जा करने मे लगी ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने कब्जे वाले कई हिस्सों में भारतीय खेतिहरों की खेती तबाह कर दी। उन्हें कर्ज के बोझ तले लाद दिया। उनसे जबरदस्ती अफीम उगाई जाने लगी। बनारस, गाजीपुर जैसे बिहार व उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में लोग अपने खाने के लिए गेंहू-चावल और दाल उगाने की बजाय अफीम उगाने पर बाध्य हो गए। इसके चलते उनकी पीढ़ियाँ उजड़ गईं। वे नशे की लत का शिकार हो गए। उनके पौरुष समाप्त होते गए। जबकि, इसी अफीम को गंगा नदी पर ढोकर बड़ी-बड़ी नावों और बजरों के जरिए कलकत्ता पहुँचाया जाता। जहाँ से इस अफीम को सिंगापुर, हांगकांग, मकाउ से होते हुए चीन के कैंटन शहर में पहुँचाया जाता था।

इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहली बार 1781 में पूरी तैयारी के साथ अफीम की भारी खेप चीन भेजी। वर्ष 1810 से लेकर 1839 तक ब्रिटेन का यह कारोबार बुलंदियों पर था। अमेरिका और यूरोप की अन्य साम्राज्यवादी शक्तियाँ भी चीन को अफीम बेचने लगीं। बंबई के कुछ पारसी व्यापारी (उपन्यास में बहराम मोदी) भी इस व्यापार में लगे हुए थे। लेकिन, चीन में तेजी से नशे का गुलाम होती हुई पीढ़ी को देखकर सम्राट ने इस पर पाबंदी लगाने का फैसला लिया। इससे पहले भी अफीम के कारोबार पर पाबंदी लगाने के प्रयास हुए। लेकिन, अधिकारियों के भ्रष्टाचार और घूसखोरी की वजह से सबकुछ चलता रहा। तस्करी के जरिए अफीम चीन पहुँचती रही।

चीन के सामने भारत का उदाहरण था। जहाँ पर व्यापार के नाम पर घुसी विदेशी ताकतों ने धीरे-धीरे उसके ज्यादा से ज्यादा भूभाग पर कब्जा कर लिया था। चीन के सामने विदेशियों के इस मंसूबे पर लगाम लगाने की चुनौती थी। वर्ष 1839 में एक नए कमिश्नर लिन को विशेष तौर पर अफीम के कारोबार को बंद कराने के लिए ही चीन के सम्राट द्वारा तैनात किया गया। इस कमिश्नर ने अफीम के कारोबारियों को एक तरह से कैंटन में ही बंधक बना लिया और बीस हजार से ज्यादा पेटी का अफीम जब्त कर लिया। इस पूरे अफीम को नष्ट करके सागर में बहा दिया गया।

इसके बाद इंग्लैंड ने चीन पर हमला बोल दिया। वास्तव में यह हमला चीन में अफीम बेचने के अधिकार को हासिल करने के लिए किया गया था। 1839 से लेकर 1842 तक चलने वाले इस युद्ध में चीन को खासा नुकसान हुआ और उसे कई अपमानजनक संधियाँ करनी पड़ी। इसे ही पहले अफीम युद्ध के नाम से जाना जाता है। जबकि, 1856 से 1860 तक चले द्वितीय अफीम युद्ध के बाद चीन में अफीम के कारोबार को पूरी तरह से मान्यता मिल गई। चीन में अफीम के कारोबार में भारी तेजी आई। यहाँ तक कि एक समय में चीन की पुरुष आबादी का एक चौथाई इसके नशे में डूबा हुआ था। चीन को अफीमचियों का देश भी कहा जाने लगा।

खैर, चीन को अफीम के इस कलंक से कैसे मुक्ति मिली और अपनी सारी ताकत जुटाकर चीन ने आखिरकार विदेशी ताकतों को धूल चटा दी, यह सब लंबे इतिहास का विषय है। इस इतिहास पर गहराई से विवेचन की जरूरत है। पर अफीम आज भी एक ऐसा पौधा बना हुआ है जो पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। ज्यादातर मादक पदार्थ दो पौधों से तैयार होते हैं। भाँग या गाँजे के पौधे से सुल्फा, चरस जैसे नशीले पदार्थ तैयार होते हैं। तो अफीम के पौधे से हेरोइन से लेकर तमाम किस्म के मादक पदार्थ बनाए जाते हैं। अभी भी दुनिया इस नशे को जड़ से समाप्त करने का उपाय ढूँढ़ने में लगी हुई है। अफीम की अवैध तरीके से होने वाली खेती को आमतौर पर सेटेलाइट मैपिंग के जरिए चिह्नित किया जाता है और उसे मौके पर जाकर नष्ट कर दिया जाता है। भारत के उत्तराखंड व अन्य दुर्गम क्षेत्रों में भी अफीम की खेती को नष्ट करने के लिए कुछ ऐसे ही तरीके अख्तियार किए जाते हैं। औषधीय उपयोग के लिए सरकार कुछ किसानों को बाकायदा लाइसेंस देकर अफीम की खेती करवाती है और पूरी फसल खुद खरीद लेती है। निर्धारित से ज्यादा अफीम की खेती करना अपराध की श्रेणी में आता है।

अभी भी यह अनुमान किया जाता है कि अफगानिस्तान और दक्षिणी चीन सागर में स्थित कुछ देशों में कुल मिलाकर नौ हजार टन से ज्यादा अफीम हर साल पैदा की जाती है। इसी अफीम को ज्यादा शुद्ध करके मार्फीन तैयार की जाती है, जिससे बाद में हेरोइन व अन्य मादक पदार्थ तैयार होते हैं। अपनी उपन्यास शृंखला आईबिस त्रयी के दूसरे भाग नशे का दरिया में अमिताभ घोष कैंटन में व्यापार करने वाले एक विदेशी (इंग्लैंड के) व्यापारी से एक पत्र लिखवाते हैं। इस पत्र में वो व्यापारी अफीम के व्यापार को चीन पर जोर-जबरदस्ती से लादने का पुरजोर विरोध करता है। वो यहाँ तक कहता है कि इसका परिणाम खुद इंग्लैंड के लिए अच्छा नहीं होगा। पत्र में लिखता है कि... 'हमें बताया गया है कि अफीम का प्रयोग पश्चिमी समाज के एक बीमार हिस्से की आदतों में पैठ बनाने लगा है। (1831-32 में ग्रेट ब्रिटेन में अफीम की सालाना खपत 28 हजार पाउंड थी) इस तरह की रुचि एक या दो पीढ़ियों में हस्तांतरण से यदि एक बार फैल गई और स्थापित हो गई तो उसका उन्मूलन कैसे किया जाएगा।'

इतिहास गवाह है कि यह चिंताएँ निर्मूल नहीं थीं। आज भी पश्चिमी समाज मादक पदार्थों के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माने जाने वाले समाजों में से एक हैं। अफीम का शापित पौधा अभी भी अपने वरदान और अभिशाप दोनों के साथ वैसे ही मौजूद है। बस अगर उसके पोपी से वो चिपचिपा सा दूध नहीं निकलता तो वह एक आम पौधा होता। जिसकी पंखुड़ियाँ झड़ जाने के बाद शायद ही कोई उस पर ध्यान देता। लेकिन, हल्के से लगाए जाने वाले एक चीरे से वह करामाती पदार्थ अभी रिसने लगता है जो कि दुनिया में लाखों लोगों की तबाहियों और बर्बादियों का जिम्मेदार रहा है। हाँ, लाखों लोगों की राहतों का भी।

अँग्रेज अफीम बेच सकें इसलिए चीन से लड़ा था केसरी सिंह...

लेकिन अफीम के इस पूरे किस्से को कहने के पीछे जो बात थी, वह तो रह ही गई। 'उसने कहा था' के लहना सिंह की याद अभी हमारे जेहन से उतर भी नहीं पाती है कि केसरी सिंह आ मौजूद होता है। जी हाँ, ये केसरी सिंह उसी आईबिस ट्रायलोजी का पात्र हैं, जिनकी रचना अमिताभ घोष ने की है। खासतौर पर उपन्यास त्रयी के अंतिम हिस्से यानी अग्निवर्षा में हवलदार केसरी सिंह का पूरा चरित्र प्रमुखता से साकार हो जाता है।

यह अफीम युद्ध के पहले की बात है। फौजियों की जीवनशैली के प्रति आकर्षण रखने के चलते केसरी सिंह को हमेशा ही सेना में भर्ती होने का शौक था। लेकिन, उसके पिता चाहते थे कि वह तो घर पर रहकर खेती करे और दूसरे भाई को सेना में भेज दिया जाए। उस समय अलग-अलग राजाओं की सेना में भर्ती होने का चलन था। यहाँ तक कि किसी-किसी परिवार में कोई एक भाई किसी एक सेना में सिपाही होता था तो दूसरा किसी और राजा की सेना में सिपाही होता था। मुगल सेना की रंगरेलियों और रुतबे के किस्से सुनकर बहुत सारे नौजवान उस सेना का हिस्सा बनने को लालायित रहते थे। जबकि, अँग्रेज अपनी सेना में भर्ती करने के लिए गाँव-गाँव में अपने कारिंदे भेजा करते थे। इसी में से एक कारिंदे की नजर केसरी सिंह के ऊपर पड़ती है। तमाम जद्दोजहद के बाद केसरी सिंह अँग्रेज सेना में शामिल हो जाता है। धीरे-धीरे तरक्की करता है। अंग्रेजी सेना में वह एक भारतीय चेहरा बन जाता है। फिर भारतीय सैनिकों के बीच से भरती करने वाला। फिर उनको अनुशासित करने वाला। फिर उनको सजा देने वाला। कुल मिलाकर वह अंग्रेजों के एक उपकरण के तौर पर एकदम फिट सिपाही की भूमिका अदा करता है। किसी भी स्वामिभक्त की तरह ही उसके भी अँग्रेज अधिकारियों में से किसी एक के साथ स्वामिभक्ति जुड़ी होती है। अफसर खुश होता है तो केसरी सिंह को अपना जीवन सार्थक लगने लगता है। अफसर गुस्सा हुआ तो उसे अपनी क्षमताओं को और बढ़ाने की जरूरत लगने लगती है।

अँग्रेज व्यापारियों की अफीम चीन में जब्त किए जाने के बाद अंग्रेजी सेना चीन से युद्ध की तैयारियाँ करने लगती है। इसी में केसरी सिंह को भी चीन जाने वाली यूनिट में शामिल होने का मौका मिलता है। अपने पसंदीदा अफसर के खातिर वह इसमें शामिल हो जाता है। भारतीय सैनिकों की पूरी यूनिट तैयार करता है। बैंड वाले और नफीरी वाले भी तय करता है। यह सेना सिंगापुर और मकाऊ होते हुए चीन पहुँचती है। गुआँगझाऊ पर होने वाले हमले में वह भी शामिल होता है। गुआँगझाऊ पर जीत हासिल करने के बाद नदी के किनारे चलते-चलते उसकी यूनिट भी किले पर कब्जे के लिए आगे बढ़ती है। यहाँ पर ग्रामीणों के आक्रोश से उन सभी का सामना होता है। यहीं पर मरते-जीते केसरी सिंह अपने पूरे सैन्य जीवन का एक तरह से लेखा-जोखा सा लेने लगता है।

यह कौन सी धरती है। वह खुद यहाँ क्यों है। बलिया-गाजीपुर के पास स्थित किसी गाँव का एक सिपाही यहाँ चीन में गुआँगझाऊ के पास क्यों इस तरह अपनी जान दे रहा है। इस लड़ाई में उसका क्या है। चीनी सैनिक और गाँव वाले भी बार-बार हैरत से हिंदुस्तानी सिपाहियों को देखते हैं। हर दम वे हैरान रह जाते हैं। इनसे तो हमारी कोई दुश्मनी नहीं है। हम तो बस यह चाहते हैं कि हमारे देश में अँग्रेज व्यापारी अफीम बेचने नहीं आए। इसमें इन भारतीयों को क्या परेशानी है। वे क्यों अंग्रेजों की तरफ से लड़ने चले आए हैं। उन्होंने क्यों अपनी स्वामिभक्ति इन अंग्रेजों के हाथों बेच दी।

यहाँ पर उस अँग्रेज शासन से चीनी लोगों की एक प्रकार की चैतन्यता भी है जिसने भारत को अपनी जकड़ में ले लिया है और अब चीन की तरफ अपना पंजा गड़ाए आगे बढ़ रहा है। अफीम के लिए युद्ध लड़ने वाली अँग्रेज सेना में केसरी जैसे भारतीय सिपाहियों की बड़ी तादाद रही है। यह 1840-42 के लगभग की बात रही होगी। यहाँ पर केसरी सिंह के मन में युद्ध के प्रति व्यर्थताबोध पैदा हो चुका है। तो फिर आखिर हम यह क्यों मान लें कि प्रथम विश्वयुद्ध यानी 1914-21 के बीच ब्रिटेन की तरफ से लड़ रहे किसी भारतीय सिपाही के मन में उस युद्ध की व्यर्थता का भाव क्यों नहीं पैदा हुआ। इस युद्ध से उसे कुछ मिलना नहीं था। हाँ, उसकी जान जरूर जानी थी।

कैसा होता होगा, एक पराई धरती पर, पराए लोगों के बीच, पराई आवाजों को सुनते हुए, यूँ ही बेबात मर जाना। केसरी सिंह के मन में यह खयाल गाहे-बगाहे हथौड़े की तरह बजते हैं। उसे अपने गाँव पहुँचने की ललक भी है। पर यह ललक लहना सिंह में क्यों नहीं है। क्या संयोग है कि 'उसने कहा था' कहानी का प्रकाशन वर्ष 1915 का रहा है। और जब 2015 में इस कहानी के प्रकाशन के सौ वर्ष मनाए जा रहे थे, लगभग उसी के आस-पास आईबिस त्रयी का यह तीसरा उपन्यास प्रकाशित हुआ और जिसमें केसरी सिंह और अंग्रजों की वजह से दर-बदर हुए मन की पूरी व्यथा एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह फूट पड़ी है।

अपनी धरती से दूर ऐसे दुश्मनों से लड़ना, जिनसे कोई दुश्मनी नहीं हो, कैसा होता है, यह आईबिस त्रयी के अंतिम भाग में केसरी सिंह के विचारों को दर्शाने वाली इन कुछ पंक्तियों से महसूस किया जा सकता है...

'पथरीली चढ़ाई पर लेटे हुए केसरी को अपनी साँस की गति तेज महसूस हुई। जब उसने अपनी ब्राउन बैस पर पकड़ कसी तो पसीने से भीगी हथेलियों से बैरल फिसल गया। उसके पेट में भी अजीब सा कसाव महसूस हो रहा था। इस अहसास ने उसे परेशान कर दिया था। जब तक कि उसे समझ में नहीं आया कि उसके पेट में हौल हो रहा है। उसने अपनी आँखें बंद कर ली और गाल जमीन पर टिका दिया। जिससे कंकड़ उससे दाँतों को धकेलने लगे।

उसके पुराने जख्म अब टीस मारने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे उसका जिस्म यादों का जखीरा दर्द का नक्शा बन गया हो। फिर भी जो बात उसे स्पष्ट रूप से याद थी वो वो सुलगती जलन नहीं थी जो हर चोट में साथ रही थी। बल्कि ठीक होने के दौर का धुंधला, दमघोंटू दर्द था। हफ्तों बिस्तर मे पड़े रहना। करवट भी नहीं बदल पाना, खुद को गंदा कर लेना। वो फिर उस सबसे नहीं गुजरना चाहता था। वो मरना नहीं चाहता था। अभी नहीं। बेवजह नहीं। और ये ऐसा ही था।

पास ही कहीं से किसी के थूक गटकने की अनियंत्रित आवाज आई।

आँखें खोलने पर केसरी ने देखा कि यह आवाज उसके पास में लेटे एक सिपाही की थी। एक ऐसा आदमी जो उससे बहुत छोटा नहीं था। यह पहाड़ का था। केसरी को याद था और वो बहुत सारे बच्चों का पिता था। क्या अभी ये उनके बारे में सोच रहा था। क्या ये पहाड़ों की छायाओं को याद कर रहा था। जो ठंडी शामों में वो वादी में फैलाते थे। केसरी को साफ दिख रहा था कि सिपाही भी डर की गिरफ्त में है। उसके होंठ सफेद पड़ गए थे। हाथ काँप रहे थे। और उसकी आँखों में उनकी सफेदी दिख रही थी। एक दो मिनट में यह सिकुड़ जाएगा। इसका सारा शरीर डर से पंगु हो जाएगा। जब चलने का वक्त आएगा तो यह अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पाएगा। कैप्टन मी को उसकी रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी केसरी पर आ पड़ेगी। कोर्ट मार्शल होगा। और शायद इस आदमी को कायरता दिखाने के लिए गोली मार दी जाएगी। और वो हवलदार केसरी सिंह भी उतना ही दोषी होगा जितना की यह आदमी। क्योंकि अपने जवानों को यथासंभव सुरक्षित रखना, यहाँ तक कि अपने आप से भी उसका काम, उसका फर्ज, उसका कर्म है।

एक कोहनी निकालकर केसरी ने सिपाही की पसलियों में कोंचा, चल अब समय आ ही गया है।'

यहाँ पर अपने साथ लड़ने वाले सिपाही की परवाह भी है और अपने देश की याद भी है। युद्ध के प्रति व्यर्थता बोध इन कुछ शब्दों में और मुखर हो जाती है, जब केसरी सिंह को अपनी जान के ही लाले पड़ते हुए दिखते हैं...

'केसरी की तलवार अभी भी उसके हाथ में थी। और उसने उस पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। वो जानता था कि शायद उसका वक्त आ गया है। लेकिन उसे कोई घबराहट महसूस नहीं हुई। बस एक मायूसी थी कि उसका अंत यहाँ उन लोगों के हाथों नहीं होना चाहिए। जिनसे उसका कोई झगड़ा नहीं है। ऐसे लोगों के हाथों जो सैनिक तक नहीं हैं। जो बस अपना गाँव बचाने की कोशिश कर रहे हैं। जैसा कि अपने गाँव में वह खुद भी करता।

उसने एक छाया को अपनी ओर बढ़ते देखा और अपनी तलवार से उसे काट डाला। तलवार ने जब मांस और हड्डियों को काटा तो उसे भी अपने पहलू में कुछ गड़ता महसूस हुआ। वो पलटने की कोशिश कर ही रहा था कि एक बरछा उसकी कलाई में घुसा और उसके हाथ से तलवार गिर गई। और फिर जब वो जमीन पर निहत्था और लाचार पड़ा था उसने एक भारी आवाज को अपना नाम पुकारते सुना। केसरी जी, और वो चिल्ला उठा। हाँ, यहाँ।'

रोहिंग्या लोग आखिर जाएँगे कहाँ...

'कितना बदनसीब है 'जफर' दफ्न के लिए, दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।' हिंदुस्तान के आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के ये शब्द हैं। 1857 के गदर को कुचलने केबाद अंग्रेजों ने उन्हें तब के बर्मा और आज के म्यांमार के रंगून में कैद करके रखा था। अपनी जन्मभूमि को याद करते हुए यहीं पर बादशाह ने अपनी अंतिम साँसें ली थीं। जहाँ पैदा हुए, वहाँ पर दो गज जमीन भी नहीं मिली। यह मलाल बहादुर शाह जफर के साथ ही चला गया।

हममें से बहुत सारे लोग हैं जिन्हें इतिहास के इस हिस्से की जानकारी है। लेकिन, शायद हममें से कुछ लोगों को इसका पता न हो कि जैसे हमारे बादशाह को म्यांमार की धरती पर दफन होना पड़ा था। उसी तरह से बर्मा यानी म्यांमार के राजा को भी हिंदुस्तान की धरती पर मौत नसीब हुई थी। अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार करके भारत से निर्वासित कर दिया। उन्हें रंगून में कैद रखा गया। जबकि, बर्मा के राजा तीबॉ को मांडले स्थित उनके राजमहल से कैद करके उनकी पत्नी और बच्चियों समेत महाराष्ट्र के रत्नागिरी में कैद रखा गया। यहीं पर बर्मा के राजा ने मातृभूमि की कसक लिए हुए अपनी अंतिम साँसें लीं। राजा की मौत के भी कई साल बाद रानी और उसकी दो बेटियाँ कहीं जाकर बर्मा लौट सकीं। अंग्रेजी उपन्यासकार अमिताभ घोष के उपन्यास ग्लास हाउस या शीश महल में इन घटनाओं का रोचक विवरण पढ़ा जा सकता है।

यह वह दौर था जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपने चरम पर था। दुनिया के हर संसाधन की उसे भूख थी। सभी पर वह अपना कब्जा करना चाहता था। बर्मा में सागवान के जंगल थे। उसकी लकड़ियों की भूख अंग्रेजों को थी। पृथ्वी पर कुछ ही ऐसी जगहें थीं जहाँ पर पेट्रोल प्राकृतिक रूप से धरती से रिसने लगता था। जैसे धरती से पानी का चश्मा फूटता है। उन जगहों में से कुछेक बर्मा में मौजूद थीं। इन सभी संसाधनों पर कब्जा करने की भूख में ब्रिटेन ने बर्मा को पूरा का पूरा हड़प लिया। उसने वहाँ की पूरी अर्थव्यवस्था अपने हितों के अनुरूप तैयार की। काम करने के लिए खासतौर पर भारतीय मजदूरों की भारी संख्या ले जाकर बर्मा में बसाई गई। इन मजदूरों में बंगालियों की संख्या सबसे ज्यादा थी। समय के साथ-साथ इनमें कुछ अच्छा-खासा पैसा कमाने वाले बन गए और संसाधनों की लूट की हिस्सेदारी में शिरकत करने लगे। लेकिन, इसी कारण से बर्मा की स्थानीय आबादी की आँखों में हिंदुस्तानी चुभने लगे। इसका एक और कारण यह भी था कि जब भी बर्मा के लोग विद्रोह करने या अंग्रेजों से लड़ने की कोशिश करते थे तो अँग्रेज विद्रोह को दबाने के लिए हिंदुस्तानी सिपाहियों का भी इस्तेमाल करते थे। इससे भी भारतीय लोगों के प्रति स्थानीय बर्मी आबादी में नफरत का संचार होता था।

यूँ तो बर्मा के रखाइन या अराकान प्रदेश में बंगाली व अन्य भारतीय प्रवासियों का आगमन 15वीं शताब्दी से भी पहले से माना जाता है। लेकिन उससे भी पहले बौद्ध या इस्लाम धर्म का प्रचार करने के लिए लोग भारतीय प्रायद्वीप से यहाँ पर आते रहे। हालाँकि 17वीं शताब्दी के बाद इसमें काफी तेजी आई। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की प्रतीक ईस्ट इंडिया कंपनी ने वर्ष 1799 में पहली बार रोहिंग्या समुदाय का नाम अपने रिकार्ड में दर्ज किया था। बर्मा पर ब्रिटेन का कब्जा होने के बाद भारतीयों की तादाद यहाँ और तेजी से बढ़ी। अनुमान है कि आज बर्मा के रखाइन प्रांत में लगभग 13 लाख रोहिंग्या बसे हुए हैं। हालाँकि, अंग्रेजों से लड़ने के क्रम में ही बर्मी लोगों के मन में भारतीय समुदाय के प्रति नफरत बैठने लगी थी, लेकिन बर्मा की आजादी के तुरंत बाद भी रोहिंग्या लोगों की हालत खराब नहीं हुई। रोहिंग्या लोगों की किस्मत के हिसाब से सबसे खतरनाक वक्त तब आया जब बर्मा की सत्ता पर सेना का कब्जा हो गया। सैन्य शासन ने 1982 के नए नागरिकता कानूनों में रोहिंग्या लोगों को बर्मा का नागरिक मानने से ही इनकार कर दिया। तब से ही रोहिंग्या लोग अपनी जमीन से दर-बदर हो गए हैं। सैन्य शासन द्वारा उन्हें लगातार अपने देश से बाहर करने की कोशिशें की जा रही हैं। सामूहिक हत्याकांड, अग्निकांड, सामूहिक बलात्कार आदि के जरिए उन्हें खदेड़ा जा रहा है। माना जाता है कि पाँच लाख से ज्यादा रोहिंग्या बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं। जबकि, भारत में चोरी-छिपे पहुँचे ऐसे रोहिंग्या लोगों की संख्या 40 हजार के लगभग है।

संयुक्त राष्ट्र भी रोहिंग्या लोगों को सबसे ज्यादा सताया हुआ अल्पसंख्यक समुदाय मानता है। संयुक्त राष्ट्र ने म्यांमार सरकार के कृत्य को जनजातीय नरसंहार कहा है। किसी एक नसल को चुन-चुन कर खतम किए जाने को शायद इन्हीं शब्दों में परिभाषित किया जाता है।

निश्चित तौर पर आज दुनिया में मानव समुदाय जिन कुछ बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है, जहाँ पर मानव आबादी हर दिन मौत के साए में अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर है, उनमें रोहिंग्या लोगों का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। लेकिन, इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण मसले पर गौर किए जाने की जरूरत है। दुनिया में जहाँ कहीं भी कोई विवाद या संकट दिखता है, उसके पीछे कहीं न कहीं से वही साम्राज्यवाद है, जिसे बचाने के लिए हमारे भी लाखों सिपाहियों ने अपनी जान दी है। भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्ते कब सहज होंगे, दोनों ही तरफ के कश्मीरी लोग कब सत्ता और स्वाभिमान के साथ अपनी जिंदगी गुजारने के साथ आजाद होंगे, कब चीन के साथ डोकलाम जैसे विवाद नहीं होंगे। भारत और चीन के बीच सीमा का विवाद कब सुलझेगा। इन सब समस्याओं की जड़ में वही साम्राज्य है, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता है।

भारतीय सैनिकों को मिला देशभक्ति का संबल...

हो सकता है कि लहना सिंह का कोई वंशज अर्जुन राय जैसा नहीं होता। या फिर हो सकता है कि अर्जुन राय जैसा होता भी। कम से कम अंग्रेजों की गुलामी में लड़ने वाली भारतीय फौज के सिपाही के तौर पर तो यह बात कही ही जा सकती है। अर्जुन राय एक और चरित्र है जो अमिताभ घोष की कलम से निकला है। अमिताभ घोष के उपन्यास ग्लास हाउस या शीश महल में म्यांमार और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों का बनता-बिगड़ता इतिहास सजीव रूप से आ उपस्थित हुआ है। उस समय देशों की सीमाएँ इतनी मजबूत नहीं थीं। लोग एक जगह से दूसरी जगह आते-जाते थे।

उपन्यास के कुछ मुख्य पात्रों की अगली पीढ़ी में अर्जुन राय शामिल हैं। अपनी पढाई लिखाई के बाद वह फौज में शामिल हो जाता है। उसे आर्मी में अधिकारी का रैंक मिलता है। वह उन कुछ पहले भारतीयों में शामिल है जो इंडियन आर्मी में अधिकारी बनते हैं। उससे पहले तक सिपाही और सूबेदार जैसे रैंक तक तो भारतीय पहुँचते थे। लेकिन अधिकारियों के पद अंग्रेजों के पास रहा करते थे। ऐसा करके अँग्रेज भारतीय सिपाहियों पर बेहतर नियंत्रण रखते थे। ऐसा करने के पीछे एक बड़ा कारण संभवतया यह भी रहा है कि अँग्रेज भारतीयों को अधिकारी बनने लायक ही नहीं समझते थे। गोरी नस्ल की श्रेष्ठता का गर्व सेना में कम नहीं था। बाद में जब मजबूरी बनी और भारतीय सैनिकों की स्वामी भक्ति पर अंग्रेजों का विश्वास अडिग हो गया तो भारतीयों को भी अधिकारी बनाया जाने लगा। हालाँकि, यहाँ भी गोरी नस्ल के अधिकारी की तुलना में भारतीय अधिकारियों को नीचा ही देखा जाता था। अंग्रेजों की तुलना में उनके अधिकार सीमित थे और उन्हें कम सुविधाएँ और वेतन मिलते थे।

द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने पर अर्जुन अपनी यूनिट के साथ दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में भेजा जाता है। यहाँ पर अर्जुन के पारिवारिक मित्रों में से कुछ पहले से बसे हुए हैं। उपन्यास में मौज-मस्ती और इश्क के क्षण बहुत हैं। लेकिन, उसके अंतरतम में इतिहास बह रहा है। युद्ध के इस मोर्चे पर जापान का हमला होने वाला है। उसके हमले का इंतजार पल-पल किया जा रहा है और एक दिन यह हमला हो ही जाता है। जापानियों ने जब हमला किया तो वे हर किसी चीज पर छाते चले गए। युद्ध के हर मोर्चे पर वे ब्रिटिश फौज को खदेड़ते चले गए। लेकिन, इस सब चीज के साथ एक और भी महत्वपूर्ण घटना हो रही थी। जापान की सेना द्वारा अंग्रेजों से लड़ने के साथ-साथ भारतीय सैनिकों के बीच यह सवाल भी पैलाया जा रहा था कि भारतीय अंग्रेजों की तरफ से क्यों लड़ रहे हैं। इस हार-जीत में उनका क्या हित है। जापान की तरफ से यह भी भरोसा दिलाया जाता है कि उनकी लड़ाई भारतीयों के साथ है ही नहीं। वे तो अंग्रेजों के साथ लड़ रहे हैं।

यही वह समय है जब दक्षिण पूर्व एशिया के ही देशों में आजाद हिंद फौज का गठन हो रहा था। इंडियन आर्मी के बहुत सारे सदस्य इसमें शामिल हो गए। जबकि, दक्षिण भारत से आकर सिंगापुर, मलेशिया जैसे देशों में बसे भारतीय भी इसमें शामिल हुए। अर्जुन उन अधिकारियों में शामिल था जिसे ब्रिटेन की तरफ से लड़ने की निर्थकता साफ समझ में आ चुकी थी। वह भी बागियों में शामिल हो जाता है। एक यूनिट का नेतृत्व करता है।

एकबारगी तो जापान की सेना म्यांमार यानी बर्मा तक घुसती नजर आती है। लेकिन, कुछ ही दिनों में ब्रिटिश सेना की ओर से जवाबी हमला किया गया और पासा पलट गया। कुछ ही दिनों में ब्रिटेन ने पुराने क्षेत्रों पर अपना कब्जा फिर जमा लिया। जापानी फौज पीछे हट गई। बगावत करने वाले भारतीय सिपाहियों ने या तो समर्पण कर दिया या मारे गए। आजाद हिंद फौज के कुछ अधिकारियों की गिरफ्तारी और भारत लाकर उन पर चलाए गए मुकदमे की जानकारी आम जनमानस में है।

अमिताभ घोष के उपन्यास का यह नायक अर्जुन अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर देता है। वह अपने साथ कम प्रशिक्षित सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी लेकर अंग्रेजों का मुकाबला करने, उन पर हमला करने की कोशिश करता है। लेकिन, आखिरकार अपनी ही कनपटी पर अपनी पिस्तौल सटाकर आत्महत्या कर लेता है। यहाँ पर अर्जुन राय की कहानी का अंत हो जाता है।

मेरे खयाल से ब्रिटेन के अधीन लड़ने वाले इन तीन भारतीय पात्रों के चरित्र के गठन से हमारे समाज की बुनावट और उसके विकास को भी काफी कुछ समझा जा सकता है। अर्जुन राय का चरित्र धीरे-धीरे मनुष्य की उस गरिमा तक पहुँचता है जहाँ पर उसके लिए आत्मसम्मान और एक देश के तौर पर अपनी पहचान महत्वपूर्ण हो जाती है। इस पहचान के लिए अपनी जान की कीमत भी उसे कुछ खास ज्यादा नहीं लगती। वो ज्यादा मनुष्य है। ज्यादा भारतीय है। ज्यादा विद्रोही है। वो स्वामिभक्त नहीं है। वो अपनी जान अपने मालिक के लिए लड़ते हुए नहीं गँवाना चाहता। अपनी गरिमा और आत्मसम्मान की पहचान करने वाला ही सही मायने में प्रेम जैसी भावना को भी समझने का अधिकारी होता है। ऐसे में क्या यह कहा जा सकता है कि लहना सिंह की कहानी प्रेम की एक कहानी है। क्या एक ऐसा पात्र जिसे अपनी गुलामी और बेबसी की चेतना नहीं है, अपने मालिक के लिए जीत हासिल करने की ही जिसकी जिद है, वह प्रेम जैसी कोमल भावना को समझ सकता है। वो भी सालों पुराने प्रेम को। अपने बचपन के प्यार को। क्या इस बीच में उसकी शादी नहीं हुई होगी। उसके बच्चे नहीं हुए होंगे। बचपन की एक लड़की जब आखिर यह कहकर चली गई कि हाँ मेरी सगाई हो गई, फिर उसने क्या किया होगा।

क्या उस लड़की की याद में वह कुँआरा रह गया होगा। बचपन की उस छवि पर वह इस कदर मरता-मिटता रहा होगा कि जब लगभग पच्चीस सालों बाद वह लड़की अपने पति और बच्चे की हिफाजत का जिम्मा उसे सौंपती है तो वह उसे स्वीकार कर लेता है। मोर्चे पर अपनी जान गँवाते समय भी उसे सिर्फ इसी बात का संतोष है कि अपने बचपन के प्यार से किए गए अपने वायदे को वह पूरा कर सका। (प्रसंगवश, यहाँ पर चीनी लेखक मो यान के लघु उपन्यास हम तुम और वो ट्रक का भी जिक्र किया जा सकता है। इस उपन्यास में छोटा बच्चा अपनी क्लास में पढ़ने वाली लड़की के बारे में सोचता है कि वो जब बड़ा हो जाएगा तो उसी से शादी करेगा। लेकिन, बड़े होने पर भी कुछ प्रयास करता है। पर उनके रास्ते अलग-अलग हो चुके होते हैं। कई साल बाद जब किसी ज्यूरी में होता है तो वही लड़की अपने बेटे की सिफारिश लेकर उसके पास आती है। अपनी गुजारिश के साथ ही वो नोटों से भरा एक लिफाफा भी उसे पकड़ाती है और वो चुपचाप उसे रख लेता है। जाहिरा तौर पर यहाँ किशोरवय के प्रेम का एक अलग ही अंत देखने को मिलता है। हालाँकि, दोनों कहानियों के बीच भी सौ साल के लगभग का अंतर है और भारतीय और चीनी समाज में भी कुछ मूलभूत अंतर तो जरूर ही हैं।)

पहले विश्वयुद्ध और दूसरे विश्वयुद्ध के दरमियान वक्त का फासला चालीस सालों से भी कम का है। क्या भारतीय फौज के चरित्र के विकास में इतने समय में इतना ज्यादा फासला तय हो सका होगा। हालाँकि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि एक देश के तौर पर हमारी सामूहिक चेतना का इस इस कालखंड में अभूतपूर्व विकास हुआ। ये कुछ प्रश्न हैं, जो मेरे मन में तब आते हैं, जब मैं हिंदी साहित्य में मुख्य पात्रों के तौर पर भारतीय फौजियों की गैरमौजूदगी की समस्या पर विचार करता हूँ। आखिर इसके कारण क्या रहे होंगे।

उसने कहा था के बाद कोई ऐसी कहानी या उपन्यास मेरी आँखों के सामने से नहीं गुजरता जिसमें ब्रिटिश इंडिया के समय में भारतीय सिपाही मुख्य पात्र के तौर पर मौजूद हो। निश्चित तौर पर जिक्र कई जगह पर आए हैं, लेकिन वे मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन सके। आखिर ऐसा हुआ क्यों होगा।

शायद इसका बड़ा कारण हमारे समाज के गठन में ही मौजूद है। दरअसल, भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के समय भारत अलग-अलग रियासतों में बँटा हुआ था। मुगल साम्राज्य की सीमाएँ लगातार सिकुड़ती जा रही थीं। राजाओं की अपनी-अपनी फौजें हुआ करती थीं। इसके अलावा जमींदार और नवाब भी अपने लठैत रखा करते थे। यह वे लोग होते थे जो एक निश्चित रकम के बदले अपने मालिक के लिए युद्ध करते थे। उसके वर्चस्व में इजाफे में लगे रहते थे। अक्सर ही इन राजाओं में छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़े हुआ करते थे। आस-पास का कोई एक राजा या नवाब अगर थोड़ा भी महात्वाकांक्षी हुआ और उसने ताकत जुटा ली तो फिर लड़ाई का फैसला ताकत से होना ही तय माना जाता था। ऐसे समाज में सैनिकों की अहमियत को समझा जा सकता है। सैनिक कई बार तो अपने मालिक से मिलने वाली तनख्वाह के लिए तो कई बार किसी राज्य पर जीत के बाद हासिल होने वाली लूट की खुली छूट की खातिर उसमें शामिल हो जाते थे। इससे भी पहले जाएँ तो वर्ण व्यवस्था में कुछ खास जातियों को लड़ाकू बताकर समाज की रक्षा या आक्रमण करने की जिममेदारी उन पर आयद की हुई है। इसके चलते राजा और नवाबों को अपने लिए सिपाहियों की कभी कमी नहीं पड़ी। जिस वर्ण का काम ही लड़ने का है, वह कभी इस राजा तो कभी उस राजा के लिए लड़ता रहा। उनके लिए कभी जीतता तो कभी हारता रहा। इसके चलते हमारे यहाँ सिपाहियों की वैसी पूजा शायद कभी थी ही नहीं जैसी कि कई राष्ट राज्यों में होती है। ऐसे राष्ट्र राज्य जहाँ पर राष्ट्र के निर्माण में सेना का एक महत्वपूर्ण अदा करती है। अपनी जान गँवाकर कुर्बानी देती है। (यह भले है कि आजादी के बाद से हमारे देश में फौज के प्रति एक देवत्व स्थापित करने की तमाम कोशिशें की जाती रही हैं। हाल के कुछ सालों में यह प्रवृत्ति काफी तेज भी हो गई है और इसे आंशिक सफलता मिलती भी दिख रही है।)

अंग्रेजों ने भारत में प्रवेश करने के साथ ही राजा-रजवाड़ों और नवाबों-बादशाहों के अधीन भारतीय सैनिकों के अंदर मौजूद इस प्रवृत्ति को भाँप लिया। भारतीय सैनिक उस समय किसी भाड़े के टट्टू से कम नहीं थे। देश जैसा कुछ खास था नहीं, जिस राजा के साथ वे जुड़े हुए थे, उसी से उनकी वफादारी थी। बाद में उनके दम पर ही अंग्रेजों ने भी तमाम युद्ध जीतने की शुरुआत की। अंग्रेजों की सेना में बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक जमा हो गए। लेकिन, अभी उनका अखिल भारतीय स्वरूप तैयार नहीं हुआ था। वर्ष 1857 में जब गदर हुआ तो अंग्रेजों की आँखें फटी की फटी रह गई। भाड़े के टट्टू से इतर भी भारतीय सैनिक किसी और तरह से बर्ताव कर सकते हैं, इसका उन्हें अंदाजा नहीं था। खैर, विद्रोह के लिए उन्होंने कुछ अतिवादी कदमों को जिम्मेदार माना। अगले साल ही भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया और इसके कुछ सालों बाद बाकायदा इंडियन आर्मी का गठन किया गया। आज हम जो अपने देश की सेना का रूप देखते हैं, उसका काफी कुछ स्वरूप अँग्रेज ही बनाकर गए थे। इसके चलते कई-कई परंपराएँ तो अब भी सेना में ठीक उसी प्रकार स्वीकृत हैं जिस तरह से अंग्रेजों के समय में थी। अक्सर ही उनमें से कई पर सवाल भी उठते रहते हैं। लेकिन, यह कुछ इतना ज्यादा गहराई से जमा हुआ है कि अक्सर ही तमाम सवालों के बाद भी इन पर होता कुछ खास नहीं है। इसी तरह की एक व्यवस्था आर्डरली या अर्दली की भी है। जिस पर सवाल तो तमाम उठाए जाते हैं लेकिन जिसे मिटाने का कोई खास प्रयास नहीं किया जाता है।

भारतीय सैनिकों में हुए राष्ट्रवाद के विकास की इस प्रक्रिया का कुछ जायजा गुलेरी की कहानी उसने कहा था और ग्लास हाउस के फौजियों की इन कुछ झलकों से लिया जा सकता है।

प्रथम विश्वयुद्ध के समय पूर्वी यूरोप के किसी देश में अंग्रेजों की तरफ से युद्ध लड़ रहा लहना सिंह जर्मन अफसर को पहचान लेता है। उसकी साजिशों को नाकाम कर देता है और अपनी बंदूक के कुंदे से उस पर हमला भी कर देता है। यहाँ पर अंग्रेजों के प्रति उसकी स्वामिभक्ति ऐसे प्रगट हो रही है...

'साहब की मूर्छा हटी। लहनासिंह हँस कर बोला, क्यों लपटन साहब। मिजाज कैसा है। आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नील गायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं। और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो, ऐसी साफ उर्दू कहाँ से सीख आए। हमारे लपटन साहब तो बिना डैम के पाँच लफ्ज भी नहीं बोला करते थे।

लहना ने पतलून के जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनों हाथ जेबों में डाले।

लहना सिंह कहता गया, चालाक तो बड़े हो पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आँखें चाहिए। तीन महीने हुए एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज बांटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछा कर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़ कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गए हैं। गौ को नहीं मारते। हिंदुस्तान में आ जाएँगे तो गो हत्या बंद कर देंगे। मंडी के बनियों को बहकाता कि डाकखाने का रुपया निकाल लो। सरकार का राज्य जाने वाला है। डाक-बाबू पोल्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्ला जी की दाढ़ी मूँड़ दी थी। और गाँव से बाहर निकाल कर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रखा तो...।'

इसकी तुलना में अब ग्लास हाउस उपन्यास में द्वितीय विश्वयुद्ध में शरीक भारतीय सैन्य अधिकारियों की इस बातचीत पर ध्यान दीजिए। (हरदयाल यानी हार्डी और अर्जुन एक ही यूनिट में अधिकारी रहे हैं। दोनों युद्ध में शामिल होने को लेकर विचार कर रहे हैं)...

'हाँ। हार्डी ने सपाट आवाज में कहा। वह एक स्वतंत्र यूनिट बना रहा है। द इंडियन नेशनल आर्मी। 14 पंजाब के सभी भारतीय अफसर उसके साथ हैं। कुमार, मसूद और बहुत से। उन्होंने हम सब को भी बुलावा भेजा है।

तो क्या तुम उनके साथ शामिल होने को तैयार हो।

मैं क्या कह सकता हूँ, अर्जुन। हार्डी ने मुस्कुराकर कहा। तुम जानते हो मेरे विचार क्या हैं। मैंने उनको कभी भी छुपाकर नहीं रखा। जैसे तुम लोगों में से कुछ करते हैं।

हार्डी रुको। अर्जुन ने उसकी ओर उँगली उठाते हुए कहा, जरा एक मिनट के लिए सोचो, जल्दबाजी मत करो। यह ज्ञानी जी कौन हैं। तुम क्या जानते हो उनके बारे में। और वह मोहन सिंह के बारे में जो कुछ कह रहे हैं। वह सच है भी की नहीं। हो सकता है कि वह जापानियों की कठपुतली ही हो।

अमरीक सिंह भी सेना में थे। वह मेरे पिता को जानते थे। उनका गाँव हमारे गाँव से ज्यादा दूर नहीं है। यदि वह जापानी कठपुतली हैं तो इसके पीछे भी कोई कारण रहा होगा। खैर हम कौन होते हैं उनको कठपुतली कहने वाले। हार्डी ने फिर हँसकर कहा, हम भी क्या सबसे बड़ी कठपुतलियाँ नहीं हैं।

जरा ठहरो, अर्जुन ने अपने विचारों को क्रम से रखने की कोशिश की। उसे बहुत राहत महसूस हो रही थी कि आखिरकार उसे अपने दिमाग के भीतरी कोनों में अपने आप से हुई बहसों को खुले में रखने का मौका मिल रहा था।

तो इसका क्या मतलब निकला। क्या मोहन सिंह और उसके साथी जापानियों की ओर से युद्ध कर रहे हैं।

हाँ, बिलकुल अभी के लिए। जब तक अँग्रेज भारत छोड़कर नहीं चले नहीं जाते।

लेकिन, हार्डी, इस पर विस्तार से बात करने की जरूरत है। जापानी हमसे क्या चाहते हैं। क्या वे हमारी और हमारी आजादी की परवाह करते हैं। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि अंग्रेजों को बाहर निकालकर खुद अंदर आ जाएँ। वह हमें इस्तेमाल करना चाहते हैं। तुम्हें यह दिखाई नहीं पड़ रहा है।

हाँ, बिलकुल वे यही करेंगे। हार्डी ने हल्केपन से बात उड़ाते हुए कहा। यदि वे नहीं करेंगे तो कोई और करेगा। हमेशा कोई न कोई हमें इस्तेमाल करेगा। इसीलिए तो यह इतना कठिन है। यह पहला अवसर है जब हम अपने दिमाग के हिसाब से चल रहे हैं। किसी के हुक्म पर नहीं।

हार्डी सुनो। अर्जुन अपनी आवाज शांत करने की कोशिश कर रहा था। हो सकता है इस समय तुम्हे ऐसा दिख रहा हो लेकिन अपने से पूछो हम अपने लिए कुछ कर पाएँगे। क्या इसके अवसर हैं। संभावना तो यह है कि आखिर में हम सिर्फ जापानियों को अपने देश में घुसने में मदद करेंगे। तो अंग्रेजों से जापानियों को बदलने में क्या तुक। जहाँ तक उपनिवेश मालिकों की बात है अँग्रेज उतने बुरे नहीं हैं। निश्चित ही जापान से बेहतर हैं।

हार्डी अट्टहास कर उठा। उसकी आँखें चमक रही थीं। यार अर्जुन सोचो जरा। हम कहाँ तक गिर गए हैं। हम अच्छे मालिक और बुरे मालिक की बात कर रहे हैं। हम कुत्ते हैं या भेड़ें। कोई मालिक अच्छा-बुरा नहीं होता। और अर्जुन एक तरह से स्वामी जितना अच्छा होगा गुलाम की हालत उतनी ही खराब होगी। क्योंकि इससे वह भूल जाएगा कि वह असल में क्या है।'

निश्चित तौर पर पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के बीच के वक्त में भारतीय राष्ट्रवाद के अभूतपूर्व विकास को कुछ हद तक इन दोनों पात्रों की सोच में हुए अंतर से समझा जा सकता है। कहा जा सकता है कि 1857 में अँग्रेज फौज के सिपाही मंगल पांडेय से शुरू हुआ सिलसिला 1930 में हवलदार मेजर चंद्र सिंह गढ़वाली से होते हुए 1946 में बांबे के नौसेना विद्रोह तक पहुँचता है। सेना का बड़ा हिस्सा हालाँकि इससे अछूता रहा, फिर इससे भारतीय राष्ट्रवाद के विकास की कुछ समझ तो इससे हासिल की ही जा सकती है।


End Text   End Text    End Text