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कविता

बेखबर
भारती गोरे


कल उस गाँव की गँवई सड़क से
गुजरते हुए
मैंने एक झक्कास बोर्ड देखा
''हमारे यहाँ एकदम ताजा 'गावरान' मुर्गी का
गोश्त मिलेगा
हम रबड़ नहीं गोश्त बेचते हैं"
अपनी ईमानदारी को और मजबूत बनाती
एक टिपण्णी भी थी नीचे... मानो चैलेंज
''आप आइए... आजमाइए
अपनी इच्छा से मुर्गी चुनिए
हम आपकी चुनी मुर्गी
आप ही के सामने करेंगे हलाल
ईमानदारी पर हमारी भरोसा तो कीजिए
हम रबड़ नहीं गोश्त बेचते हैं
ताजा गोश्त चखिए
जीभ पर रखते ही ना गल जाए
तो फिर कहिए"
वाह जी वाह !
क्या दावा
क्या वादा
पढ़कर मजा आ गया

आज बेईमानों से भरी इस दुनिया में
ऐसी ईमानदारी
और वह भी सबूत के साथ
क्या बात है!
आगे ही बढ़ी
कि
दुकान के बाहर 'सजाये' मुर्गियों के
दबड़े पर
पड़ी नजर
जहाँ बड़ी नाजुक, पर
भरी-भरी मांसल मुर्गियाँ
बेहतरीन दर्जे का दाना चुग रही थीं

पसंद में
उनकी तरफ
उठी
किसी ग्राहक की एक उँगली के
इशारे के साथ
हलाल होने के खतरे से
बेखबर


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