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कविता

तसल्ली
भारती गोरे


तुमने उस लड़ते झगड़ते
अलगाव की कगार पर खड़े
दंपति को बहुत समझाया कि
जिंदगी बहुत छोटी होती है कि
लड़ना-झगड़ना कितना फिजूल है
संवेदनशील हो भाई तुम
घर की अहमियत खूब जानते हो
आखिर एक लेखक हो तुम
तुम्हारी उनका घर बचाने की बेचैनी कितनी लाजमी थी
अफेयरों के तूफान में भी
एक अदद बीवी और बच्चे के साथ तुम्हारा घरौंदा सलामत था क्योंकि
बड़े संवेदनशील हो भाई तुम
तुम उस दंपति को समझा रहे थे
अपने सलामत घौंसले की कल्पना से बेहद राहत भी पा रहे थे
तुम उस दंपति को लड़ाई की फिजूलियत और जीवन की
क्षणभंगुरता जी जान से समझा रहे थे
पर
वे दोनों तो अलगाव पर अड़े
तब भी तुम उतने मायूस नहीं हुए
जितनी उस दंपति को जोड़ने की तुम्हारी
जद्द ओ जहद असफल होने पर तुम्हें
होना चाहिए था
बल्कि मन में थोड़ी निराशा और
ढेर सारा उत्साह
क्यों ना हो,
आखिर तुम्हे मानवीय संबंधों की गुत्थियों
से भरी
एक कहानी का प्लाट जो मिल गया था


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