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कविता

जूते
भारती गोरे


मैंने उस भली लड़की को बहुत समझाया
कि
भीतरी हकीकत चाहे जो हो
जूते
पाँवों की सलामती के लिए
बहुत जरूरी होते हैं
लेकिन
वो तो अपनी जिद पे अड़ी थी
जबान पे उसके एक ही रट चढ़ी थी
कि
''जूता कहाँ काटता है, पहनने वाले को पता होता है"
फिर मैंने अपना दाखिला दिया
कि
देखो, हम तो अपने जूतों को बड़े जतन से रखते हैं
क्यों ना रखे जी?
उन्हीं की वजह से हमारे पाँव
बाहर के काँटों से महफूज हैं
लेकिन वह ना मानी
जूता ही उतार फेंका
अब हम भी क्या करें
जूते की अहमियत समझाना अपना काम था
माने ना माने उसकी मर्जी
(अब पाँव उसके काँटों की चुभन से घायल है
अब वह भी जूतों की कायल है
पर जूता तो गया... उतार फेंका... अब भुगतो...)
ओह... एक बात कहें... किसी से ना कहना
हमारे भी पैरों में जूता काटता है
दर्द हम भी सहते हैं
पर चुप रहते हैं
अब आलम यह है
बाहर जूते से लकदक पाँव है
भीतर हरदम रीसता घाव है


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