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आलोचना

ब्रेकडाउन और ब्लैकआउट के बीच कहीं (!)
सुबोध शुक्ल


(राजकमल चौधरी की कविता पर कुछ रफ नोट्स)

कविता हमारे संदेहों और विश्वासों का एकजुट जोखिम है। वह कोई सरल रेखा नहीं खींचती। किसी प्रस्थान बिंदु और गंतव्य का हिसाबी जोड़-तोड़ नहीं है उसके पास। उसके भूगोल की अपने आकाश से ठनी ही रहती है ज्यादातर। नियत ढाँचों के प्रतिपक्ष में, कविता खुद को उन आवाजों के लिए तैयार करती है जो तयशुदा मुठभेड़ में अनामंत्रित और निहत्थी हैं। सरोकारों के अघोषित से युद्ध के बीच में, कविता भले ही किसी प्रतिहिंसक दृश्य की तरह न खड़ी हो पर उसकी उपस्थिति, चुनौतियों को अपदस्थ करने वाली उन मुद्राओं को नग्न जरूर करती है जो एक साथ खून और पानी दोनों हैं। इसलिए जब हम कविता पर बात करते हैं तो उस डर की बात भी करते हैं जो बचा लिए जाने की कामना और चुकती जा रही अस्मिता के बीच एक अबूझ रूपक की तरह खड़ा है। कविता इसी रूपक की हिस्सेदार है, कविता की इसी रूपक से होड़ है।

जरूरत से ज्यादा सफेद इस समय में जब नकाबों और चेहरों में फासला लगभग मिटता जा रहा है, उल्लास और उन्माद एक ही सिक्के के पहलू माने जाने लगे हैं और अराजकता, स्वतंत्रता को उपलब्ध कर लेने का सुविधापरस्त प्रयोग समझी जाने लगी है; कविता से उम्मीद या तो किसी बेरोजगार से स्वप्न का भग्न सुख है या फिर निस्पंद सौंदर्य का भयभीत सा बोध। खैर, धारणाएँ कुछ भी कहें पर कविता मनुष्यता के स्वप्न और और उसके सौंदर्य की एक अकुंठ और उन्मुक्त योजना रही है। ऐसे स्वप्नहीन और बंद से वक्त में भी तमाम इकहरी चिड़चिड़ाहटों के साथ विकल्पों की अविकसित भीड़ के बीच कविता का अब भी कोई विकल्प नहीं। भले ही वह कितनी आशंकाग्रस्त, जिद्दी और विस्थापित होने की हद तक विडंबनापरक हो चुकी हो, उसमें हमारी आस्थाओं की धूप उतनी ही शामिल है जितनी हमारी स्वप्नहीनता की धूल।

हिंदी कविता के भूत में थोड़ा पीछे लौटते हुए, मोटे तौर पर उसकी संभावित भूमि को दो तरह से समझा जा सकता है - पहला, परंपरा के भावावेश के साथ वस्तुपरक असहमति को बनाए रखने वाली सौंदर्य-दृष्टि के रूप में और दूसरा, वर्तमान के नैरेटिव में तैयारशुदा आरोपित व्याख्याओं के विरुद्ध एक मूर्त माध्यम में संवाद कर सकने वाली द्वंद्व-दृष्टि के रूप में। औदात्य के पूर्वाभासों तथा कला के खुशामदी समुदायों के विपरीत, व्यवस्था के विपन्न ताने-बाने को, मनुष्यगत शोक और सामाजिक विसंगति की भाषा में अनूदित करने का एक बड़ा काम भी यह कविता करती है।

भारत की आजादी हिंदी कविता में एक विभाजक रेखा की तरह मौजूद है। यह रेखा प्रतीकात्मक स्तर पर जितनी धुँधली है विचार के स्तर पर भी अनेक किस्म के घाल-मेल इसमें शामिल है। हिंदी कविता में आजादी को लेकर जितनी भावुक ललकारें और आत्मपीड़ित उन्माद मिल जाएगा उतनी ही सावधानी के साथ इस उन्माद और कोलाहल के समानांतर उनके विरोधाभासों के साथ जल्दबाज राजनीतिक निष्कर्ष और समाज का अशुद्ध पाठ कह कर ठुकराने वाला वर्ग भी प्रस्तुत दिखेगा। इसलिए इसमें दो राय नहीं कि आजादी हिंदी कविता का जितना रोमेंटिक आश्चर्यलोक है उतनी ही संदिग्ध नाटकीयता भी है।

कविता के लिए भारत की आजादी जहाँ एक यांत्रिक किस्म के सांस्कृतिक तर्क से मोहभंग था वहीं जीवन-संस्कृतियों की पुनर्स्थापना के लिए वैज्ञानिक आत्मनिरीक्षण भी। आजादी हिंदी कविता के लिए प्रतिमान के रूप में विचार को संघर्ष का औजार बना रही थी और प्रोटेस्ट के रूप में एक सर्वग्रासी सत्ता-केंद्रित समाजशास्त्र के विरुद्ध निर्भीक रचनाधर्मी प्रतिनिधित्व का। ऐसे कच्चे और अबोध दौर में जहाँ आग्रहों-आशयों की शिनाख्त को समाज संरचनाओं में अप्रासंगिक हो चुकी गतिविधियों के तौर पर देखा जा रहा था, राज्य राजनीतिक अभिव्यक्ति के बहाने निर्जीव किस्म के मानवतावाद का तर्क उपयोगिता और लोक कल्याण की केंचुल में पालने लगा था। यह समय कविता का स्वयं को विचार के सबसे अभावग्रस्त और अनुपस्थित से इलाके में उत्खनित करने का भी है। यह उत्खनन एक ओर निषेध की अंतर्क्रिया में जितना आलोचनाधर्मी था उतना ही इतिहास की बुनियादी त्रासदी को भी व्यक्त कर रहा था। इसे मानने में कोई गुरेज नहीं कि आजादी कविता के चरित्र को 'अवधारणा' से निकालकर 'विमर्श' का चेहरा देती है। निजता के 'केंद्र' से झटककर समूह के 'हाशिये' पर खड़ा कर देती है।

राजकमल कविता की इस पीढ़ी के सबसे अबूझ और आत्मघाती कवि रहे हैं। संभवतः इन्हीं वजहों से वे सर्वाधिक अपरिचित और गुमशुदा कवियों में से भी एक रहे। कवियों की सूची में संशोधित भरपाई की तरह या फिर कविता में एक ऐसी बेवजह पंक्ति की तरह जिसके न होने से कविता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना था पर इन सबके बावजूद राजकमल की हिंदी कविता में व्याप्ति किसी दंतकथा से कम नहीं रही है।

वे जीवन के स्थूल में चेतना के सामूहिक उद्योग को चिन्हित करने वाले कवि हैं। यह स्थूल उनकी कविताओं में जितना विस्मृति की एक प्रविधि के तौर पर उपस्थित होता है उतना ही असंदिग्ध आत्म-स्वीकृति के तौर पर भी। यह कई अंतर्विरोधी आयामों से बना डिवाइड है। स्थूलता की निर्मिति के लिए यह डिवाइड इतिहास की उदासीनता और समकालीनता की आक्रामकता के बीच एक जटिल संतुलन बनाने का प्रयास करता है। ऐसे में राजकमल स्थूलता को काव्यात्मक चुनौती की तरह पेश करते हैं। ज्यादातर स्थूलता को कविता में संवेदना के कामचलाऊ प्रसंगों के साथ नत्थी कर दिया जाता है जिससे वह कविता को एक गैर-जरूरी खुलेपन की और ढकेल देती है। राजकमल के लिए स्थूलता का आग्रह, कला के आत्मग्रस्त वातावरण के बीच संभावनाओं की अपरिभाषित पक्षधरता का है जो कि समर्पित हो जाने के विरुद्ध कविता में प्रत्याक्रमण की तकनीक के साथ प्रस्तुत होता है और वस्तु को उनके आंतरिक सातत्य में यथार्थ की सार्वजनिक प्रतिक्रिया से परिचित कराता है।

इन कविताओं में स्थूल दैनंदिन संशय और आरोपित प्रश्नाकुलताओं का प्रतिपक्ष गढ़ने वाले काव्य-रूप की तरह आता है। संशयग्रस्तता की आड़ में जब यथार्थ का नैरेशन प्रतिरोध को पवित्रता-बोध और अभिव्यक्ति को नैतिक रोजनामचे के घालमेल में डाइल्यूट करने लगता है तो ऐसे में यह काव्य-रूप, कविता के अंतर्गत एक नैसर्गिक भरोसे के रूप में सांस्कृतिक जिम्मेदारी की व्याख्या में स्वयं को ढालने लगता है। यह अगस्त भी आज की ही रात, बारह बजे / बीत जाएगा । मैं सतरह साल / और, चार योजनाओं के दुख स्वप्न / भूलकर, इस बार भी कहूँगा / तुमसे, कि सुनो, / बादल खुल गए हैं, आकाश में / चाँदनी के पेड़ / उग आए हैं । (तीन, अगस्त' 65 की आखिरी कविता) इससे विवरणों की आवाजाही के बीच सत्ता और सत्य की बर्बर गलतफहमियाँ छँटने लगती हैं। और यह भी ध्यान रहे कि यह स्थूलता चिंतन की कोई इकहरी स्थिति नहीं है। राजकमल की कविताओं में इसकी उपस्थिति, प्रचार आधारित प्रतिस्पर्धाओं की क्रीड़ापरकता का अस्वीकार है। वह औपचारिक सी दिखने वाली उन विपरीत विकलताओं को ऐसे देशकाल में देखने का प्रयास है जिसमें समूह के प्रतिवाद अपने विभक्त परिवेश में एकजुट होते जाते हैं और द्वंद्व को जातीय अनुभवों का हिस्सा बनाने में जुट जाते हैं।

कविता जैसे महीन मैकेनिज्म में इस किस्म का ठोस और बोझिल प्रयोग किसी दुस्साहस से कम नहीं है - एक ऐसा अस्फुट दुस्साहस, जो समय के उपादानों को भाषा के इलाके में पुनर्रचित करता हुआ विनिर्मित भी करता जाता है। बुनता हुआ उधेड़ता भी जाता है। राजकमल की कविताओं से गुजरते हुए यह संभव दिखता है कि कैसे विस्मय की अनसुलझी दार्शनिकता से मढ़े हुए सवालों के बीच भी संयोगों के सलीके को तराशा जा सकता है।

वे ऊसर समाधानों से भरी सार्वभौमिकता के आरोपित दायरे में ही मनुष्यता की तात्कालिक गरिमा को कविता का विषय बनाने का प्रयास करते हैं। इस तरह से उनकी रचनाशीलता के सामने दो संकट भी खड़े होते हैं - पहला, सामाजिक तर्क, विचारधारा की सार्वकालिक इमेजरी के बीच बगावती दिखने लगता है जिससे कि विचारधारा और समाज के मध्य असंवाद की सी स्थिति पैदा हो जाती है और दूसरा वर्तमान को इतिहास के उपभोगमूलक उत्पाद की तरह प्रस्तुत करने का। ध्यान रहे कि यह दोनों संकट, राजकमल की कविताओं में हठधर्मिता की हद तक प्रतिरोध के औजारों के रूप में सामने आते हैं। इन कविताओं में आधुनिकता के दुर्घटनाग्रस्त अँधेरे मौजूद हैं जो सभ्यताओं के अपराध को संदेह की कसौटी पर कसते हैं। होटल का बेरा बाहर चला गया है । कोई आवाज / नंगी और कमजोर और बदसूरत / धीरे-धीरे नजदीक आती जा रही है... / उम्मीद अंधे अजगर सी मुझसे लिपट जाती है। / और, वह आवाज फर्श पर बिखरी हुई / बेहोश - यह नाटक कैसा है? मैं टूटता हूँ, / उसे अपनी बाँहों में थाम लेता हूँ / खून के छींटों से फर्श भीगी है / दागों से मेरी बाँहें... / लेकिन, / सुबह होगी और रोशनी में फर्श धुल जाएगी। / आवाज खुले दरवाजे से बाहर जाकर / फुटपाथों पर बेचने लगेगी ताजा फूल और अखबार / सुबह होगी और यह नगर / मेरा दोस्त हो जाएगा (अजनबी शहर) इन जगहों पर करुणा संदेह की बुनियादी अवधारणा के रूप में मौजूद होती है और सरोकारों की हताशा की पड़ताल करने की कोशिश करती है। इस प्रक्रिया में कवि के अनुभव-संसार की छायाएँ एकांतिक से लगने वाले उसके अंतर्जगत की भी घेराबंदी करनी लगती हैं। कोई शक नहीं कि इसीलिए आशयों को उनकी निपट नग्नता में पकड़ने वाली ये कविताएँ अपने समकालीन अनुशासन में भी बेहद तोड़-फोड़ से भरी हैं। ये प्रासंगिकताओं को सामाजिक संघर्ष का माध्यम बनाने की कोई लुभावनी योजना नहीं है बल्कि हस्तक्षेप के नाम पर दुनियादारी की गुंजाइश को टटोलने वाले एक स्मृतिहीन जुलूस से बचकर निकल जाने कवायद है।

इन कविताओं में बेलगाम भावुकता का अपरिहार्य हिस्सा बन चुके वर्ग-विवेक का चेतावनी और बेचैनी से भरा प्रतिकार भी उपस्थित है। सभ्यताओं की जगमगाती कत्लगाहों में जीवन के स्वीकार और अवसर का बेआवाज नक्शा खींचतीं हैं ये कविताएँ। यह स्वीकार, पनाह माँगते विश्वासों के बीच एक बेचैन सा इंतजार है। उपेक्षाओं के ऐसे ऊष्माविहीन परिदृश्य में इन कविताओं के जरिये अपने सबसे संकटग्रस्त पश्चातापों का एक क्षुब्ध कर देने वाला शिल्प तैयार होता है। ये शिल्प, क्रोध को ग्लानि के रास्ते से पकड़ते हैं और संकीर्णता को बिखराव के रास्ते से। तुमने कहा था, बर्फ को अब पिघलने की / इजाजत नहीं देंगे; / सूरज कैद रह जाय नदी के पार उस काली / गुफा में - / कोई फर्क नहीं पड़ता जब यहीं / कहीं अँधेरे में / अपना ही चेहरा तैरने लगता है / आँखों के सामने ! एक साथ कितना कुछ / तुमने कहा था। एक साथ उलझे हुए इतने सभी / उपमा उपमेय / मैं स्वीकार नहीं कर पाया; (अलका नहीं समझ पाएगी अंधकार)

इन कविताओं में शब्द कम ध्वनियाँ ज्यादा हैं। ये अपनी अर्थमयता में कम अपने अनुनाद में अधिक खुलती हैं। ऐसे में यदि इन कविताओं को भाषा के प्रचलित आस्वादक की तरह थामने का प्रयास किया जाएगा तो संभव है चूक हो जाय, चोट लगे। क्योंकि ये अपनी उपस्थिति के प्रति आगाह करती कविताएँ नहीं हैं। यह सँभलने का अवसर नहीं देंगीं। खुशामद करके इन्हें न तो पास बुलाया जा सकता है और न मजबूर करके अपने नाप का बनवाया जा सकता है। अपने समय की आहत अभिव्यक्तियों और घुटी हुई चुप्पियों का लेखा-जोखा दर्ज है इनमें। ये बदतमीज कविताएँ हैं। इसलिए अपने गढ़े गए संस्कारों पर परतों की तरह चढ़ाने की व्यग्रता इन कविताओं का सामना करने का सबसे कमजोर और पराजित तरीका साबित हो सकता है

राजकमल संरचनाओं के दुभाषियेपन, निष्ठाओं, मिजाजों और परस्पर विजातीय दिखते संवेगों को कठिनाई से साधे जा सकने वाले बोध में आइसोलेट करते हैं, और वह है निरर्थकता। निरर्थकता इन कविताओं में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आत्मतुष्टि के विरुद्ध एक दीर्घकालिक सैद्धांतिकी के रूप में सामने आती है। यह 'पेशेवर' के खिलाफ 'अटपटेपन' की मौजूदगी है। ये कविताएँ त्रासदियों को रचनात्मक संस्कार से पकड़ने की कोशिश हैं। किस तरह से सियासत भौतिकता के साहचर्य को रोजमर्रा की श्रृंखलाबद्ध आदतों में विश्वास कराने के लिए बाध्य करा देती है और तमाम जानी-बूझी ऑब्जेक्टिव सी प्रवंचनाओं के लिए एक खामोश और आततायी रजामंदी दे देती हैं जिसके कारण अपनी ही संवेदनाओं से खदेड़ दिए गए फलसफे अपने संस्कारों के खोल में गिरफ्तार होते चले जाते हैं। खूबसूरत बेतरतीबी से डालियों पर लटकाए गए हैं / सतरंगे बल्ब / नीम के पेड़ों की कतारों में / रोशनी का डरा हुआ खरगोश भागता है । आँखें / ढूँढ़ती रहती हैं अंधकार। / ग्लासों के पीछे / या, टेबुलों के नीचे / अधजले साँप मिलते हैं, / बिछुड़ते हैं। और, / किसी अनकहे मजाक पर यों ही, / हम सभी हँस पड़ते हैं। (गार्डेन-पार्टी)

ऐसे में कविता उन अनछुए, वर्जित और अकथ इलाकों में प्रवेश करती है जहाँ आजादी और मूल्यों के नोचे-खसोटे चेहरे अपनी रिहाई के धोखे में भटक रहे हैं। इस प्रक्रिया में जगह-जगह पर संदर्भ ओझल हो जाते हैं, सत्य के बिंदुओं पर मुद्राओं के वृत्त गहराने लगते हैं, विचारों की रिहाइशें जर्जर होती दिखती हैं और सौंदर्य का पाठ जीवन जीवन के आधारभूत इतिहास को अपठनीय बना सकने की हद तक औपचारिक हो जाता है। इन जगहों पर राजकमल कविता को शुद्धता की कुलीन प्रक्रिया से विघटित करते हैं। वे काव्य-दृश्य को स्मृति के सामुदायिक आघात और चेतना के सिलेक्टिव आतंक के ढके-मुँदे खोखलों से बाहर लाने का प्रयास करते हैं। इससे मनुष्य का पूर्वनिर्धारित अंतर्जगत, बहुआयामों में अपने स्वप्न और आदर्श के विषय में फैसला लेने लायक हो जाता है।

ये कविताएँ विकल दायित्व-बोध के साथ स्वयं के पक्ष में सर्वसामान्य के हक में गैर-प्रासंगिक बना दी जा चुकी बहस की संस्कृति का भी आवाहन करती हैं। उत्पीड़न को आत्मनिष्ठ उद्योग के अनुकूलन में समावेशित कर लेने वाली व्यवस्था के सामने ये अवसाद और तिक्तता के मिलेजुलेपन के साथ उभरती हैं। अस्तित्व के राजनीतिक रेखांकन के मध्य अमानवीयता के शक्ल में तब्दील होता जाता मर्म इन कविताओं का साध्य है। यह ख्याल रहे कि यह मर्म ही इन कविताओं को स्टार्ट देता है। और इसी वजह से राजकमल की कविताओं का अंडरटोन कुछ भी नहीं है। ज्यादा से ज्यादा वे तनाव के उतार-चढ़ाव को अपनी प्रचलित या कहें कुख्यात लाउडनेस के साथ मीडिएट भर करते हैं। लेकिन यहाँ भी आवाजाही, बोध के वस्तु-चरित्र से तालमेल बिठाकर नहीं वरन उसको अतिक्रमित करने के अर्थ में होती है। पैरांबुलेटर नहीं है जीवन / कि जिसमें बैठकर अनुक्षण / घूम आया जाए आयायों के साथ / सांझ की मद्धिम छायायों के साथ / माँ की ममता-मायाओं के साथ / शहराहों पर / चौराहों, तिराहों, दुराहों पर / दोस्त, अपना जीवन तो खंडहर है / या हबड़ा टेशन का टिकट-घर है / लगकर जहाँ कतारें / बेचकर चौरंगी की रात की बहारें / छोड़कर वो निगाहें, वो चंचल इशारे / मिलता है हमें घर का टिकट / बंधु, जीवन की राह है विकट (जीवन एक भाष्य)

राजकमल में उदासी के अनगिन टापू हैं - मामूली से दीखते, अनछुए, अपने अकेलेपन में उत्तप्त और पारदर्शिता में मद्धिम आँच की तरह सुलगते हुए। यहाँ इस बात का जिक्र अनिवार्य है उनकी कविताओं से गुजरते हुए हम वेदना के मुहावरे को कई तकनीकों में देखते हैं। इन कविताओं को अपनी बेफिक्री में जवाबदेह यह वेदना ही बनाती है। और हाँ, यह वेदना, यातना या संत्रास के साधारणीकृत मोहरबंद आख्याओं से विलग है। यह दुख है, मुठभेड़ है। लोकासक्ति को अंगीकार करने का राजनीतिक जोखिम है। दुविधाओं के बखेड़े के बीच एक ईमानदार भय की मंजूरी है। ये कविताएँ कला की पूर्वनिर्मित संपूर्णताओं के ढाँचे को हिलाती हैं, झकझोरती हैं और एक हद तक कला को परंपरा की नियंत्रणकारी प्रक्रिया से मुक्त करती है। इसलिए इन कविताओं में न तो अतार्किक होकर प्रवेश किया जा सकता है और न ही भावुक होकर। यह दोनों तत्व इन कविताओं के उम्मीदवार नहीं हैं।

राजकमल अपने वक्त के न्यूरॉटिक कवि हैं। उनकी कविताएँ घटनाओं के नकली फासलों के बीच अनुभवों की रिक्तता की तरह हैं। ये रिक्तताएँ इन कविताओं में 'अवाक' की स्थिति पैदा करती हैं और लौकिकता के अविभक्त रूपाकारों में, भाषा के बुनियादी संशय को बचा ले जाने का विट भी रखती हैं। इन कविताओं में विडंबनाओं की उन अधूरी यात्राओं की पड़ताल भी है जो संस्कृतियों के सबसे धूल-धूसरित स्मरणों में भी कहीं दर्ज नहीं दिखतीं। मैं वापसी के लिए उठकर खड़ा हो गया / बीच कमरे में टँगे पिंजरे के द्वार / उसने खोल दिए । मगर, / लाल-हरे पंखोंवाली वह नन्हीं-सी अजनबी चिड़िया / डरी हुई / दूर एक कोने में छिपी रही...। / मैं अपनी वापसी के लिए, वह नन्हीं सी चिड़िया आजादी के लिए।। / और, / हम दोनों अपमानित । (मुक्ति)

राजकमल के पास निजता एक व्यक्तिवाची उद्यम से अधिक ऐतिहासिक कर्म है। वे निजता को किसी बौद्धिक पीड़ा का संवाहक नहीं बनाते। यद्यपि उसके साथ अपने व्यक्ति और काल के बीच वस्तुपरक समत्व खोजने की भूमिका में वे हमेशा उद्यत रहे हैं। परंपरा से कविता में निजता का प्रयोग ज्यादातर रूमानी मध्यस्थता के रूप में ही होता रहा है। राजकमल उसे संघर्ष की जिज्ञासा से जोड़ते हैं। यहाँ निजता मूल्यों की भावदशा में जितना परंपरा के एकायामी नतीजों को प्रभावित करती है उतनी ही कविता की जातीय मानसिकता में रटे-रटाए विन्यासों के आतंक को संयत करने में सहायक की भूमिका में भी रहती है। यह निजता अपने प्रश्नाहत संक्रमण में लगातार कविता की योजना को दृढ़ से दृढ़तर करती जाती है। चूँकि यह नित्य भी है और तात्कालिक भी इसलिए यह प्रभावों के मामले में एक चुनौतीपूर्ण फैसला लेती है और वह है समय और यथार्थ के स्वराघातों की आवृत्तियों का क्रम। यह एक तरह के मोनोलॉग की दशा है। जिसमें वह सांसारिक विकल्पों के सापेक्ष परिधियों पर विस्थापित और अफवाहों में बदलते जाते जीवन की आत्मपीड़ा से जा मिलती है। कविता के कारण चाईबासा थाने के हाजत में बंद / रक्खा गया था मुझे सारी रात / दूसरे दिन हाथों में हथकड़ी, कमर में रस्सी बाँधकर / थाने के हाजत से मुझे ले आया गया / कचहरी के हाजत में / रास्ते में बार-बार मैं सोचता था, क्या करूँ... / अपना माथा ऊँचा करूँ या सर झुकाए / चलता रह जाऊँ / असंख्य उत्तरदायित्व डाले गए हैं मुझपर (असंख्य प्रश्न) / संस्कृति, ऐतिह्य, परंपरा के उत्तरदायित्व का / उत्तर देना ही होगा मुझे / किंतु / कवि उत्तर देगा संस्कृति के लिए अथवा / संस्कृति और ऐतिह्य से उत्तर माँगेगी कविता? (कविता के कारण)

राजकमल संदेहों की बर्बर तटस्थता में उस लापतापन को खुरच कर उकेरने की कोशिश करते हैं जो दुविधाओं की निपट निस्तब्धता में या तो बंधक बना लिए गए या विकलांग कर दिए गए। इसलिए ये कविताएँ अभिलाषाओं के मृत समर्पण के खिलाफ स्वाधीनता की विकल प्रार्थनाओं की तरह भी हैं। सूचनाओं में पस्त-व्यस्त एक समूचे वर्तमान को उसके ढके-मुँदेपन के साथ यहाँ पकड़ा जा सकता है। सिलसिलेवार ढंग से देखने पर राजकमल की कविताएँ अधिक विपर्यस्त होने लगती हैं। उन तक पहुँच बनाने के लिए स्मृतियों के अँधेरे को अधिक सांद्र और चटक बनाना पड़ता है। प्रतीकों को पेशेवर बनाती हुई एक पूरी पीढ़ी के समानांतर शोषण के घोषित कबीलों की निरंतर सक्रिय पद्धतियों से टकराने के इस क्रम में वे शोषण के बेचेहरा खतरों से अपनी कविता के दायरे में रू-ब-रू भी होते चलते हैं। इसलिए इन कविताओं में आत्मकेंद्रित होती जा रही प्रभुसत्ताओं की उन विद्रूपताओं से जूझ भी है जो स्वाभाविकता की आड़ में संस्कृतियों को लाचार और निर्जीव बनाने का काम करती आ रही हैं।

यही वजह है कि राजकमल इकाइयों के बिरादरीपन से टूटकर भिड़ते हैं। इन जगहों पर उनकी कविताएँ चौंकाती हैं। यह राजकमल की कविताओं की संवैधानिक प्रकृति है कि वे नम्र नहीं होतीं। अपने असंतोष को भी बड़ी बेतरतीबी से ध्वस्त करती हैं और फिर खड़ा करती हैं। इस प्रक्रिया में एक रचनात्मक विचलन का सहारा भी लेते हैं जिससे निजता की पड़ताल की यह अवस्था बड़ी रहस्यमयी और कई मायनों में पक्षपाती हो जाने को विवश कर देने वाली सिद्ध होती है। यह कवि इस तरह के रचनात्मक दुःस्वप्न को भी आपद्धर्म की तरह जीता चलता है। मुस्कानों के तहखानों में दुबकी हुई कायरताएँ और उनके आपसी अंतर्विरोधों को प्रतीकों के जाले में फाँसती रूढ़ियों का वस्तुनिष्ठ खनन यह सब कुछ राजकमल की कविता का निस्तब्ध सा पर जिम्मेदार आदर्श है। टेलीफोन के खम्भे आँधी में तिरछे हो गए हैं, और / मेरा पड़ोसी अपनी पत्नी की गोद में / सिसक रहा है (आज भी पी आया है) और / हमेशा भूँकने वाले उस बीमार कुत्ते की लाश / बरसात की सड़क पर तैर रही है, और / हम फ्लश खेलते हुए / सुन रहे हैं बेतार पर मौसम का हाल / कल रात भी किसी मकान पर नहीं गिरी / बिजली / नहीं हुई बमबारी ... ( शहर)

ये कविताएँ अबूझ दार्शनिकता के अल्प-विकसित असंतोष के साथ संवाद नहीं करतीं। राजकमल कृतघ्न अकेलेपन को विश्वासपात्र विरक्तियों से ज्यादा मूल्यवान मानते हैं। उनकी कविताओं की अर्थमयता में अकेलापन किसी बीमार इच्छा का अधखिला निर्णय नहीं है जैसा कि आमतौर पर समझा या माना जाता है। वे अकेलेपन को तृष्णा और राग के बीच आवागमन के अनुशासन की तरह जीते हैं। यह आवागमन तथ्य को काव्यानुभूति और लक्षित को विचार-सौंदर्य की अतियों में विखंडित करने का कॉमन-सेन्स है। इन कविताओं के पास सफलता का कोई दावा नहीं है बल्कि इसके उलट वह मनमाने हिसाबों के चापलूस गणित को ज्यादा से ज्यादा गलत करती चली जाती हैं। यह जानना दिलचस्प है कि अकेलापन राजकमल की कविताओं में जाने-अनजाने उस रैडिकल मुहावरे की तरह गतिमान होता है जो 'असंभव' के शिल्प को प्रतिपक्ष के मौसम में बदल सकने का सामर्थ्य रखता है। यह 'असंभव' जितना शक्ति के दायरे में प्रासंगिक है उतना ही जिजीविषा के निर्धारित प्रसंगों के बीच भी। वे इस 'असंभव' का शिल्प, क्षरण की संपूर्ण निरुपायता और समर्पण के समग्र 'विरूप' के मध्य साधते हैं। कविता के वितान में यह शिल्प, समय के प्रवाह में गुजरती उपेक्षाओं की डीफंक्ट अंतःक्रियाओं को जाँचता-परखता भी है। बमबारी के बाद खाइयों से निकले हुए शहर के लोग / अपना घर ढूँढ़ते रहते हैं / जैसे यह बीमार ढूँढ़ता रहता है सिरहाने में / किसी का कोई खत... (एक बीमार जिंदगी)

यह अतिरंजना में की गई रीडिंग नहीं है। यह कवि संवेदनाओं को भी श्लेष में कह सकने की क्षमता रखता है और अवचेतन को ठेठ में बता सकने की। कल्पनाओं के स्थापित आश्वासनों का साथ, राजकमल की मूल प्रतिज्ञा में कहीं शामिल नहीं है। 'स्थापित' में उलटफेर कविता की मूल चेतना होती है पर राजकमल उलटफेर को ही स्थापित करते हैं। वे मनुष्यता की सभी अपारदर्शी पवित्रताओं से लड़ते हैं। ये अपारदर्शी इसलिए हैं क्योंकि सहजता की प्रतिकूलता में खड़ी हैं और पवित्र इसलिए कि इनकी कोई जवाबदेही नहीं है। ठीक इसी जगह पर कवि प्रतिबद्धता को अमूर्त कर देता है और इससे विचार की तमाम सामयिक नियतियाँ जो दिग्भ्रमित भलमनसाहतों और मौकापरस्त जीवन-शैलियों की गिरोहबंदी में अनजाने में ही शामिल हो जाती हैं, खुद को रचना के स्तर पर अलगाने लगती हैं। ऐसे में प्रतिबद्धता का अमूर्त हो जाना जितना कलाधर्मी युक्ति की तरह प्रस्तुत होता है उतना ही सफेदपोश लोकवाद को नग्न करने की लीक की तरह भी। सबके बाद मरता है पीला साँप / पालतू बिल्लियाँ राख का ढेर तोड़ती रहती हैं... / एक टुकड़ा रोटी / एक अदद सड़ा हुआ सेव, और / लहूलुहान पंजे। / शीशों पर जमी रह जाती है धूल, वक्त / रुका रह जाता है / खड्ड में गिरे कोयले से लदे ट्रक / टैंक में मरे हुए बच्चे / लैंप-पोस्ट के नीचे मैथुन-रत कुत्ते।। / आदमी। काली सफेद बिल्लियाँ / और, सबके बाद मरता है पीला साँप / सबसे पहले जन्म लिया करता है / अक्सर (वासना)

इस प्रक्रिया में बहुत बार ऐसा लगने लगता है कि कवि सर्वनाश के लिए संकल्पित है। यथार्थ की ग्रंथियों को निबेरते हुए वह एक अनास्थापरक अतिवाद की ओर उन्मुख होता है और एक विषयांतर चुनता है कि यह यथार्थ की ग्रंथियाँ नहीं असल में यथार्थ ही ग्रंथियों का है। अब यहाँ बात कवि के हाथ से भी निकलती हुई लगती है और कविता को ऐसे वक्त में छोड़ देने के दो परिणाम निकल सकते हैं - पहला, उसका वृत्तांतों से भर जाना और दूसरा निरी ग्लानि से। इस तरह से राजकमल की कविता 'निषेध' के आत्यंतिक क्षितिज तक जाती है और फिर परावर्तित होने की प्रक्रिया में अपने समस्त पूर्वाग्रहों को बेदखल करती जाती है। एक कविता के सिलसिले में कवि इस समग्र रचना-प्रक्रिया से गुजरता है बिना संपादित हुए और बिना इस वायदे के साथ कि अगली कविता तक वह इसी राय पर कायम रहेगा। इस तरह वे कविता के भीतरी वातावरण में हो रहे संघर्षों और स्वयं के द्वारा दिए जा रहे धोखे के भी विटनेस होते हैं और इस पूरे प्रयोग में आस्वादक भी साझेदार की भूमिका में रहता है। अपने ही कंधों पर डाले हुए अपना शव / ...। ईश्वर / चीखता हुआ भागता रहता है। और / एक शिशु / अपनी अबोध मुस्कानों से हरदम / उसका पीछा करता रहता है (धर्म) यह कविता के सेल्फ और रैशनल के बीच एक बेरहम व्यवस्था को सुनिश्चित कर देने वाली कार्रवाही है। चूँकि कविता एक ही साथ कई अभियानों में लिप्त दिखने लगती है इसलिए अपने पाठ में उसकी उपस्थिति स्वयं के ही इर्द-गिर्द जितनी मूक दर्शक की तरह होती है उतने ही सरलीकृत भावक की तरह भी। कवि के लिए इसे साधना यंत्रणापरक है और भावक के लिए उसे अंगीकार करना भ्रम से भरा हुआ।

ऐसी कविताओं में प्रवेश के बहुत सारे रास्ते होते हैं लेकिन खतरा भी इन्हीं रास्तों का होता है। ऐसे में काव्यभाषा का पटाक्षेप हो जाता है और समकालीनता का यथासंभव पक्ष एक इनसाइडर के रूप में कविता के निर्वात और अवकाश को सुरक्षित करने लगता है। इससे तीन काम होते हैं - समय को तटस्थ बनाए रखने का जो अनैतिहासिक षड्यंत्र है वह उजागर होता है, पक्षधरताओं के मसीहाई ब्यौरों के समानांतर एक आलोचनात्मक प्रत्याशा का जन्म होता है और रोजमर्रापन के आउटसाइडर की स्थिति में रचना के भीतरी इलाकों में आनंदवादी घुसपैठ करने की योजना को ऑब्जर्व किया जा सकता है। इसीलिए ये कविताएँ सामाजिकता के स्वघोषित स्पेस में अँटती नहीं।

यह कवि संतुलन नहीं बैठाता। यथार्थ को समयांतरालों में साधने की कोशिश लगभग हर बार ही इस कवि को कविता के अभ्यासी आलंबनों से असंयमित कर देती है। इसलिए दमन, पराजय और अस्वीकार के जितने बेशर्म और खुद्कुश विजुअल्स इस कवि में उपलब्ध होते हैं उसके समकालीनों में नहीं। ऐसा नहीं है कि राजकमल के समकालिकों ने रचना के पारंपरिक काव्यानुभवों को चुनौती नहीं दी पर यह कवि भाव और अर्थ के स्तर पर दुसह्य हो चुके जीवन-राग को, निरे विचार के स्तर पर ही काम्य नहीं बनाता वरन संघर्ष के आभ्यंतरिक वस्तु-संसार में आत्म-सजग भी बनाता है। हमारी पराजय का प्रथम कारण है नैतिकता / धर्म हमारे सामूहिक अपराध की प्रथम स्वीकृति / अन्न-वस्त्र हमारे लिए प्रथम दंड / ज्ञान हमारा प्रथम अभाव .../ और ईश्वर ? / हमारी असहायता के सिवा और क्या ? / हम पराजित हैं / अपराधी हैं / दंडित हैं- / और हमारे कंधों पर तुम्हारा शव है (शव-यात्रा का मृत संगीत, स्मृति में महाप्राण निराला को समर्पित) कविता में इस किस्म का आचरण एक तरह का उत्पात ही माना जाएगा। पर इस उत्पात की योजना एक दीर्घकालिक तात्पर्य और लगभग महाकाव्यात्मक भावावेग से ही संभव हो पाती है। इस क्रम में यह कहा जा सकता है कि ये कविताएँ प्रतीतियों की सहिष्णुता के लिए जितनी आक्रामक हैं, परिस्थितियों की तुनकमिजाज सदाशयता का वयस्क गतिरोध भी इनमें उतनी ही परिपक्वता के साथ उपलब्ध है। यही उनकी कविताओं का नेटिव भी है। 'क्षोभ' के प्रदीर्घ वातावरण, इन कविताओं में लोकासक्ति की तर्कसंगत बेबसी को उजागर करते चले जाते हैं। संशय, एक मांसल नागरिकता में बदलने लगता है और अस्वीकार, भाव-युक्तियों की सामंती जुगलबंदियों को मानवीय बिंब के आर्द्र नाद में बदलता चलता है।

यह तकनीक कविता में करुणा के प्रचलित अदब को भी तोड़ती है। राजकमल की कविताओं में करुणा किसी तरह का अशक्त और तात्कालिक आर्ग्यूमेंट भर नहीं है किसी गलदश्रु तथ्य का। ज्यादातर कविता में करुणा को एक आपात मनोप्रभाव की तरह देखा जाता है - आकस्मिक सा। पर यहाँ इन कविताओं में करुणा एक सांस्कृतिक फिनोमेनन के सिलसिले में घटित होती है। इसे वह समूचे मानवीय पारिस्थितिकी में असभ्य समझे जाने वाली अनास्था की बद्धमूल चेतना के रूप में देखते हैं। यह कहना असंगत नहीं होगा कि अनिश्चय के प्रत्याघातों से आत्मपरकता को उपजीव्य की तरह इस्तेमाल करने का संकल्प ही इन कविताओं की कसौटी है। इतनी वीभत्स निस्तब्धता में भी (अगर) मुखर है / मेरी नैतिकता / प्रखर है यदि मेरा शब्द-सूर्य / तो इसका मात्र कारण यही है - परंपरा नहीं टूटी है; / अज्ञान अब तक है आवरण...। (नैतिकता : एक मध्यवर्गीय स्वरूप)

बेमतलबपन राजकमल की कविताओं का एक काव्य-बोध है। वे इसे अपनी रचनाशीलता में प्रतिकूलताओं के औपचारिक होते जाते आधारों के साथ कन्फ्रंट करते हैं। बेतरतीब और नकचढ़े युग-प्रतीकों के विघटित मंतव्यों को वे इसी बेमतलबपन के साथ साधते हैं। ख्याल रहे कि यहाँ बेमतलबपन, ऊलजलूलपन नहीं है। यह व्यक्तित्व की पराजय है, उत्तराधिकार का नकार है और आधुनिकता के अर्थशास्त्र का जन-चरित्र के संकल्प के साथ एकाकार है। इन सबके बावजूद विकल्पहीनता का बोध कवि में नहीं है। हालाँकि दिशा का बोध भी कम ही है। पर वह बिना किसी यांत्रिक संवेदन और नियतिबद्ध निस्संगता के साथ समावेशपरक राजनीति के अंतर्भ्रम को अभिव्यक्ति के सबसे असुविधाजनक विन्यासों से उजागर करते हैं। नींद की एकांत सड़कों पर भागते आवारा सपने / सेकेंड शो से लौटी हुई बीमार टैक्सियाँ / भोथरी छुरी जैसी चीखें / बेहोश औरत की ठहरी हुई आँखों की तरह रात /... / टैक्सी में भी हूँ और फुटपाथ पर खडा भी हूँ / मैं / सोये हुए शहर की नस-नस में / किसी मासूम बच्चे की तरह, जिसकी माँ खो गई है, / भटकता रहता हूँ; / (मेरी नई आजादी और मेरी नई मुसीबतें उफ...!) ( नींद में भटकता हुआ आदमी) बेशक यह अपनी रचना-प्रक्रिया को संवाद के कठिनतम और बदरूप परीक्षाओं से गुजारना है। लेकिन यही कवि का अपना सत्य है। वह नैतिकताओं के बातूनी चोर-दरवाजों से निकल भागने के रास्ते नहीं तलाशता बल्कि उन नैतिकताओं को सामयिकता के सबसे उच्छृंखल सौंदर्य-शास्त्र में परिवर्तित कर देता है। यह प्रक्रिया उस तमाशबीन पक्षधरता को कटघरे में खड़ी करती है जो विक्टिमाइजेशन के बहाने ट्रीटमेंट का छलावा रच रही है।

राजकमल प्रतिबद्धता के सवालों को आडंबरों के सरलीकृत उपनिवेश में तब्दील नहीं होने देते। ऐसे स्थानों पर उनकी कविताओं की मंशा रिफाइंड हो जाती है, उनके इर्द-गिर्द पसरे भाषा के अलगाववादी प्रभाव तेजी से छँटने लगते हैं। 'राहों के अन्वेषी' होने के अबोध से रोमान में बिलबिला रहे एक पूरे दौर को ये कविताएँ सजीव महसूस कराने के असली मकसद तक पहुँचाती हैं। प्रयोगों के भड़कीले कारोबार और परिवर्तन के इश्तिहारी प्रदर्शनों के बीच वस्तुनिष्ठता की सुविधाओं और मुद्राओं के कथाभास में जकड़ी हुई मनःस्थितियों की फलश्रुति सी हैं ये कविताएँ। ये कविताएँ अपनी समस्त स्नायविकता में आधुनिकता के उन ध्रुवों की खोज है जिसमें एक और स्थानीयता के अनियंत्रित और अतृप्त पूर्वाग्रह हैं और दूसरी और स्वाधीनता की आवेगहीन वास्तविकता की अभिव्यक्ति भी। कविता इन दोनों मनोदशाओं के साथ अपने बौद्धिक अन्तःसाक्ष्यों का तालमेल बैठाती हुई सामाजिक स्मृतियों के वंचित मूल्यों के बीच अपने को लोकेट कर लेती है। यह भाव-तंत्र के अवमूल्यित भरोसे के बीच वेदना के त्रासद राग की गुंजाइश पैदा करना भी है। एक बर्बर राजसत्ता से यह एक जीवन दर्शन का युद्ध है / द्वार खुले रखोगे तो बाहर की आग से पर जल जाएगा / अवरुद्ध करोगे, तो भीतर का कोहरा बन जाएगा / उन्मुक्त ज्वालामुख / फिर, क्या करोगे? क्या है उपाय? / निर्मम तटस्थता से भी तो रंजित नहीं रहेंगे प्राण / काल क्षमा नहीं करता है / समय रथ रुका नहीं रहता है / उनके लिए, जो हाथ पर हाथ धरे रहते हैं निरुपाय। / अपनी पृथ्वी और अपने जल का / हवा का, उजाले का, जीवन का पक्षधर बनना पडेगा हमें तुम्हें /...। / घर में रुके रहोगे तो / यह धरती मरुभूमि, यह उपवन आदिम जंगल बन जाएगा / पत्थर बन जाएगी फिर यह अहिल्या / और कभी कोई मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं आएगा (युद्ध : एक जीवन दर्शन के लिए) यही इस कवि की चिंता का मौलिक जोखिम है। इसलिए ये कविताएँ मनुष्यता की निचाट ज्ञान-मीमांसा का प्रगटीकरण हैं। अनिर्णय के चौतरफा स्पंदनों से घिरे और असहमतियों की अप्रकट लिप्साओं के बीच खड़े ऐसे विवश देश-काल का कातर स्खलन हैं जो सत्य के सामान्य और सहज संकेत को भी वैयक्तिक आस्वाद-प्रक्रिया की लीला-स्थली बना देता है। इस मामले में कवि स्वयं को भी भाषा के अंतःकरण में गवाह और मुजरिम दोनों की तरह खड़ा करता है। यह क्रिया कविताओं की रचना-पद्धति को तकनीक और संवेदनात्मक दोनों स्तर पर और अधिक क्रिटिकल बना देती है।

स्वीकार के सम्मोहन में जकड़े सामूहिक ठहराव जब मंतव्यों का संस्थानीकरण कर लेने की मुद्रा अपना लेते हैं तो मजाक बनती जाती मर्यादाओं और शोषण के उपकरणों का एक लाक्षणिक अंतर्पाठ प्रस्तुत करती हैं ये कविताएँ। यह अंतर्पाठ बहुधा अनुपस्थितियों और अंतरालों के मध्य एक हठधर्मी बहिष्कार की तरह प्रस्तुत होता है। राजकमल अंतर्पाठों की इस प्रक्रिया में विशेष तरह की फैंटेसी रचते हैं जो ऐंद्रिकता और रैटरिक को मिलाकर बनती है - मिथक। मिथक संस्कृतियों के व्यक्तिपरक मानकीकरण में समूह के यूटोपिया का क्रिटीक है।

इतिहास के विकास-क्रम में मनुष्यता के निजी असमंजस, हताशा, निषेध, स्वप्न, वर्जनाओं के लिए मिथक बाई-पास का काम करते रहे हैं। दृष्टिहीन करतबों और नृशंस आश्चर्यों से भरे इस टूल को कविता की परंपरा अपनी-अपनी सृजनात्मक छूट से उपयोग में लाती रही है। मिथक अराजक रूप से विलुप्त हो चले विश्वास को जीवन की अनुगूँजों के लिए विवेकसम्मत भी बनाते हैं और प्रासंगिक भी।

राजकमल मिथक को सभ्यताओं के अंतःसंघर्ष में चीन्हते हैं। यह मिथक को मेलोड्रामा से टेक्स्ट में उपलब्ध कराने का सबसे उम्दा तरीका है।दीगर यह भी है कि यह सबसे रैखिक और उदासीन तरीके में भी बदल सकता है अगर वृत्तांतों की कंडीशनिंग स्थानिकता के नियत तनावों की संगठित भूमिका के रूप में न की गई तो। राजकमल मिथक को उसकी संस्कारगत मजबूरियों से बेदखल करते है। उसे रचना के रैडिकल अंतरंग और बहिरंग के सापेक्ष असंदिग्ध बनाते हैं जिससे कि एकदिशात्मक विरक्त सा अक्ष कालधर्मी स्वाभाविकताओं की टकराहटों में व्यंजित होने लगे। जिससे कि मिथक का सपाटधर्मी आग्रह दुनियावी और जैविक संदर्भों में परंपरा और समकालीनता को देखने का एक सहानुभूतिपरक प्रतिवाद रच सके। यह प्रतिवाद, शुद्धतावादी उतावलेपन के विरुद्ध लिया गया लौकिक भागीदारी का एक स्टैंड भी है। तुम करोगे प्रवचन, नहीं प्राप्त हो पाऊँगा; / नहीं है मेरा स्थान / तुम्हारी मेधा का निर्धारित विचरण। / विलीन हो जाऊँगा ध्वनि की रहस्यमय घाटियों में / अर्थ की तरह; / तुम सुन भी नहीं पाओगे। / अर्थ, वचन, बुद्धि और श्रुति से नहीं; / मैं प्राप्त होता हूँ / इन सबसे विच्छिन्न, केवल / स्वीकृति से / अपने संपूर्ण अस्तित्व में तुम मुझे प्राप्त करो! / मैं न सही प्राण / न सही हिरण्यगर्भ देवता, / अग्नि हूँ - स्वीकृति से ही मुझे / धारण किया जाएगा (मुंडक 3-2-3)

राजकमल मितव्ययिता के साथ मिथकों को खर्च करते हैं। उन्हें पता है कि जरा सी ढिठाई वैचारिक मंशा को सशंकित कर सकती है और जन-अस्मिता को बड़े सामंती चातुर्य के ढकोसलेपन में ढाल सकती है। वे मिथकों का इस्तेमाल कविता की प्रकृति में आत्म-संयम के रूप में करते हैं, आक्रामकता के रूप में नहीं। वे जानते हैं कि मिथकों का आक्रामक प्रयोग उन्हें सहूलियत के दकियानूसीपन में ढकेल देगा। इससे दृश्य आतुर हो जाते हैं, आघात का तापमान मंद्र हो जाता है और विवेक का नियमन डाँवाडोल होने लगता है। मिथकों का काव्यगत व्यवहार बड़ा असंयत होता है। यह एक रासायनिक संश्लेषण की तरह है उसके साथ प्रयोग में लाये जाने वाले तत्वों का भी एक सांबंधिक विश्लेषण आवश्यक है। कहीं विजातीयता विस्फोटक हो जाती है और कहीं सादृश्यता। तो संतुलन के लिए जरूरी है कि वैचारिक प्रामाणिकता और भावगत जातीयता की एक उपजाऊ और टिकाऊ जलवायु बनाए रखी जाय। इसी वजह से राजकमल वर्ग के सम्मिलित अभिप्रायों के बीच समय की सहानुभूति का संयोजन बैठाते हैं। ध्यान रखना है कि यहाँ अभिप्राय, चेतना और प्रकृति को देखने का कोई पूर्व-निश्चित एजेंडा नहीं है बल्कि इतिहास और अनुभव के पारस्परिक मंतव्यों का एक लोकतंत्रात्मक कायदा है। सिर्फ कोरम है कन्क्लूजन नहीं। क्योंकि निर्णय फिर से इस आलोचनात्मक चहलकदमी के बीच समझौते की शारीरिकी को प्रस्तावित कर देता है।

मिथक जैसी शक्ति और वजन के दो शब्द हैं राजकमल के यहाँ - प्रेम और मृत्यु। प्रेम तो कविता में लगभग क्लीशे की तरह पसरा हुआ तत्व रहा है और मृत्यु इंपल्स का। राजकमल कविता में दोनों के साथ बेरहम उलटफेर करते हैं। इन कविताओं में प्रेम एक बारिश की तरह है और मृत्यु भीगने की तरह। एक अवस्था है दूसरा सामर्थ्य, एक संवेग है दूसरा अभीष्ट, एक आश्वस्ति है दूसरा तनाव। दोनों एक ही श्रृंखला के आत्मानुशासन हैं। जहाँ राजकमल के लिए प्रेम स्वतंत्रता का सिविक-सेन्स है वहीं मृत्यु उस सेंस का ट्रिगर।

हम (मैं और तुम) स्वयं को संपूर्ण करते हैं / बाँहों के बीच की वह जमीन खोलकर / जिसे जमाने के सामने खोलते हुए डरते हैं / हमारे शरीर की तपन, हमारी ख्वाहिशों का बुखार / तुम्हारे स्तूप, मेरी कब्र के पास खड़े मीनार... / इनसे कभी एक दुनिया बनी थी / शारीरिक जड़ता और जंगलीपन की एक ख़ास स्थिति में / शुरू में शरमाई थीं तुम माँगते हुए । अंत में / बिना माँगे ही ले लिया था - क्यों? / दोस्ती बनने या टूटने में / कभी दीवार या हथौड़ा नहीं बना करती है नैतिकता ! / हम (मैं और तुम) अनैतिक हैं, क्योंकि / हम दोस्त हैं (प्रेम का अंतिम गीत) वे प्रेम को सांस्कृतिक सहजीवन के बीच अप्रचलित सी हो चलीं लोक-अपेक्षाओं के मनोबल के रूप में रचना का आग्रह बनाते हैं और इसी क्रम में मृत्यु को उस सहजीवन की प्रत्याशाओं के सिलसिले में एक संकोची पर स्वावलंबी क्लाइमेक्स की तरह देखते हैं। कहीं मिलता नहीं है उत्तर / मौत से डरकर चुप रह जाते हैं सभी पत्थर, / तब, / उठता है एक बुड्ढा हाथ, / करोड़ों हाथ उठ जाते हैं जिसके साथ, / धरा हिलती है, आसमान डोलता है / लो, मेरा कवि बोलता है- / जोर चल सकता नहीं / शमशीर का चट्टान से / मौत अब क्या लड़ सकेगी, / इस नए इनसान से / मौत महज वहम है, धोखा है, डर है, / जो अब काम नहीं कर सकता / मौत मर जाएगी एक दिन / इनसान नहीं मर सकता! ( मौत क्या है चीज?) राजकमल के लिए ये दोनों कला के अपरिभाषित खंडहरों में मनुष्यता के शिलालेख की भांति हैं।

राजकमल चौधरी हिंदी कविता में उस कर्मकांड की तरह हैं जो अप्रचलित होने के लिए अभिशप्त है। जो भुला दिए जाने के लिए रट भर लिया जाता है पर जबान पर नहीं चढ़ता। खुद को अपने ही समय की मुट्ठी से रेत की तरह फिसलते हुए देखने का दंश उनकी कविताओं में दिखता है। अपने खौफ को चकमा दे सकने का कोई कलात्मक भुलावा इस कवि के पास नहीं है। शरीफ होने की कोई शर्त नहीं है यहाँ पर यह दावे से कहा जा सकता है कि वह दगाबाज नहीं है। वह चुनाव के नाम पर न तो अपने पछतावों को सही साबित करने वाला कोई सफेदपोश है और न ही अपने असुरक्षा-बोध को फ़िज़ूल में खर्च करने वाला कोई दहशतगर्द। सभ्यताओं के विराट ढूह हों या समकालीनता की क्यारी यह कवि सब कुछ उलीचता-पाटता चलता है। अपनी कायरता को भी दस्तावेज बना सकता है और अपने साहस को भी घर-निकाला दे सकता है। राजकमल की कविताएँ जितना जीवन के हॉरर में संघर्ष का थ्रिल है उतना ही विचारधारा के विधा में बदल दिए जाने की घोषणा भी।

कहना न होगा कि राजकमल चौधरी हिंदी कविता के उन चुटकी भर कवियों में हैं जहाँ युद्ध, प्रेम और मृत्यु के सबसे आत्महंता बिंब मौजूद हैं। यह कवि न कोई सपना देगा आपको और न ही कोई विकल्प। यहाँ तक कि कोई सवाल भी नहीं। अवसाद का काव्यशास्त्र और क्रोध का छंद, दोनों मिलकर उनकी कविता की देह रचते हैं जिसमें सभ्यता के पक्षाघात और परंपराओं के गर्भपात अंकित हैं।


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हिंदी समय में सुबोध शुक्ल की रचनाएँ



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