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आत्मकथा

मेरी आत्मकथा
चार्ली चैप्लिन

अनुवाद - सूरज प्रकाश


1899 बरस गलमुच्छों का बरस था। गलमुच्छों वाले राजा, राजनयिक, सैनिक और नाविक, क्रूगर, सेलिसबरी, रसोइये, कैसर, और क्रिकेट खिलाड़ी। दिखावे और शोशेबाजी का वाहियात बरस। बेइंतहा अमीरी और बेइंतहा गरीबी का बरस। कार्टून और प्रेस, दोनों की शून्यता से भरे राजनैतिक हठधर्मिता से भरे बरस। लेकिन इंगलैंड को कई धक्के और बदमगज़ियां सहनी थीं। अफ्रीकी ट्रांसवाल में कुछ बोअर किसान बिला वज़ह युद्ध छेड़े हुए थे और बड़े-बड़े पत्थरों के और चट्टानों के पीछे से शानदार निशाने लगाते हुए हमारे लाल कोट धारी सैनिकों को मार रहे थे। तब हमारे युद्ध कार्यालय वालों के दिमाग की बत्ती जली और उन्होंने तुरत-फुरत लाल को खाकी में बदल दिया। अगर बोअर उन्हें इस रूप में मारना चाहें तो भले ही मार सकते हैं।
मुझे युद्ध की थोड़ी बहुत ही जानकारी थी और ये मुझे मिली थी देश भक्ति के गीतों, विविध मंचों पर हास्यमय प्रस्तुतियों और सिगरेट की डिब्बियों पर छपी जनरलों की तस्वीरों के माध्यम से। अलबत्ता, हमारे दुश्मन खत्म न होने वाले विलेन थे। कभी सुनने में आता कि बोअर लोगों ने लेडी स्मिथ को घेर लिया है तो इंगलैंड मेफकिंग को मुक्त करा लेने के बाद खुशी के मारे पागल हो गया है। आखिरकार हम जीत ही गये, बेशक ये जीत भी परेशान ही करने वाली थी। अलबत्ता, मैं ये सारी बातें सबसे सुनता था लेकिन मां इस बारे में कुछ नहीं बताती थी। उसने कभी भी लड़ाई का ज़िक्र नहीं किया। उसके पास लड़ने के लिए खुद की लड़ाइयां थी।


सिडनी अब चौदह बरस का हो चला था। उसने स्कूल छोड़ दिया था और उसे स्ट्रैंड डाक घर में तार वाले के रूप में काम मिल गया था। सिडनी की पगार और मां की सिलाई मशीन की वज़ह से होने वाली कमाई से हमारा घर किसी तरह ठीक-ठाक चल रहा था लेकिन इसमें मां का योगदान मामूली ही था। वह मज़दूरों का खून चूसने वाली किसी दुकान के लिए काम करती थी और उसे वहां पर ब्लाउज सीने के एवज में एक दर्जन ब्लाउज के लिए एक शिलिंग और छ: पेंस मिलते थे। हालांकि उसे डिजाइन पहले से ही कट कर मिला करते थे, फिर भी एक दर्जन ब्लाउज सीने में उसे पूरे बारह घंटे लग जाया करते थे। मां का रिकार्ड था एक हफ्ते में चौदह दर्जन ब्लाउज सी कर देने का। इससे उसे छ: शिलिंग और नौ पेंस की कमाई हुई थी।
अक्सर रात को मैं अपनी दुछत्ती में लेटा जागता रहता और उसे अपनी मशीन पर झुके काम करते देखा करता। उसका सिर तेल की कुप्पी की रौशनी में झुका रहता और उसका चेहरा नरम छाया में नज़र आता। उसके होंठ तनाव के कारण थोड़े से खुले होते और वह अपनी मशीन पर तेज़ी से सिलाई का काम करती रहती। और उसके इस काम की उबा देने वाली भिन-भिन की आवाज की वजह से मुझे झपकी आ जाती। वह जब भी रात-बेरात इस तरह से देर तक काम करती थी तो उसके सामने एक ही मकसद होता - पैसों की अगली किसी न किसी किस्त की मीयाद सिर पर होती। हमेशा किस्तों की अदायगी की समस्या सिर पर खड़ी होती।
अब एक और संकट सिर पर आ खड़ा हुआ था। सिडनी को कपड़ों के नये जोड़े की ज़रूरत थी। वह अपनी टेलिग्राफ वाली यूनिफार्म हफ्ते के सभी दिन, यहां तक कि रविवारों को भी डाटे रहता था और आखिर एक ऐसा दिन भी आया कि उसके यार दोस्त उसे इस यूनिफार्म को लेकर छेड़ने लगे। इस वज़ह से वह दो हफ्ते तक, उस वक्त तक घर पर ही रहा जब तक मां के पास उसके लिए नीले सर्ज का सूट खरीदने लायक पैसे नहीं हो गये। उसने किसी तरह से अट्ठारह शिलिंग का बंदोबस्त कर ही लिया था। इससे हमारी अर्थव्यवस्था में भारी दिवालियेपन की हालत आ गयी थी। इसलिए मां को मजबूरन हर सोमवार को, जब सिडनी टेलिग्राफ आफिस चला जाता था, सूट गिरवी रखना पड़ता था। उसे सूट के लिए सात शिलिंग मिलते थे। और हर शनिवार को सूट छुड़वा लिया जाता ताकि सिडनी उसे हफ्ते की छुट्टियों के दौरान पहन सके। यह साप्ताहिक व्यवस्था पूरे साल तब तक चलती रही जब तक सूट फट कर तार तार नहीं हो गया। तभी ये झटका लगा।
सोमवार की सुबह मां हमेशा की तरह गिरवी वाली दुकान पर गयी तो दुकानदार हिचकिचाया,"माफ करना, मिसेज चैप्लिन, लेकिन अब हम आपको सात शिलिंग उधार नहीं दे सकते।"
मां हैरान रह गयी थी,"लेकिन क्यों?" उसने पूछा था।
"अब इसमें अच्छा-खासा जोखिम है। पैंट तार-तार हो रही है। देखो तो ज़रा," दुकानदार पैंट की सीट पर हाथ रखते हुए बोला,"आप उसके आर-पार देख सकती हैं।"
"लेकिन इन कपड़ों को अगले हफ्ते छुड़वा लिया जायेगा।" मां ने कहा था।
गिरवी वाले ने सिर हिलाते हुए कहा,"बहुत हुआ तो मैं आपको कोट और वेस्टकोट के लिए तीन शिलिंग दे सकता हूं।"
मां कभी भी रोती नहीं थी लेकिन इस तरह के अचानक आये धक्के को सह न पाने के कारण वह आंसूं बहाती घर वापिस आयी। पूरा हफ्ता घर की गाड़ी खींचने के लिए उसे इन सात शिलिंग का ही सहारा था।
इस बीच मेरे खुद के कपड़े, कम से कम कहूं तो चीथड़े हो रहे थे। हम अष्टम लंकाशायर बाल गोपालों की जो पोशाक थी, उसकी वाली मेरी पोशाक अब तार तार हो चली थी। जहां-तहां थिगलियां लगी हुई थीं। कुहनी पर, पैंट पर, जूतों पर और मोजों पर। और अपनी इसी हालत में मैं स्टॉकवैल के अपने खास नन्हें दोस्त से जा टकराया। मुझे नहीं पता था कि वह केनिंगटन रोड पर क्या कर रहा था, लेकिन उसे देख कर मैं बहुत परेशानी में पड़ गया था। हालांकि वह मुझसे बहुत प्यार से मिला लेकिन मैं अपनी खस्ता हालत के कारण उससे आंखें भी नहीं मिला पर पा रहा था। अपनी परेशानी को छुपाने के लिए मैंने अपना आजमाया हुआ तरीका अपनाया और अपनी बेहतरीन, सधी हुई आवाज में उसे बताया कि चूंकि मैं बढ़ईगिरी की अपनी कक्षा से आ रहा हूं इसलिए मैं ये सब पुराने कपड़े पहने हुए हूं।
लेकिन उसे मेरी इस सफाई में ज़रा सी भी दिलचस्पी नहीं थी। वह जैसे आसमान से गिरा लग रहा था और अपनी हैरानी-परेशानी को छुपाने के लिए दायें बायें देखने लगा। उसने तब मां के बारे में पूछा।
मैंने तत्काल जवाब दिया कि मां तो आजकल गांव गयी हुई है और तब मैंने उसी की तरफ ध्यान देना शुरू किया,"और सुनाओ, आजकल वहीं रह रहे हो क्या?"
"हां।" उसने मुझे ऊपर से नीचे तक इस तरह से घूरते हुए देखा मानो मैंने कोई अपराध कर दिया हो।
"अच्छा, तो मैं जरा चलूंगा," मैंने अचानक कह कर अपनी जान छुड़ायी।
वह सहर्ष मुस्कुराया और अच्छा विदा कह कर चला गया। वह एक तरफ चला और मैं उसकी विपरीत दिशा में बढ़ा। मैं गुस्से और शर्म के कारण गिरते पड़ते भागा जा रहा था।


मां हमेशा कहा करती थी,"तुम हमेशा अपनी मर्यादा का त्याग कर सकते हो, लेकिन हो सकता है तुम्हें कुछ भी न मिले।" लेकिन वह खुद ही इस सूत्र वाक्य का पालन नहीं करती थी और अक्सर मेरी शिष्टता के बोध को ठेस लगती थी। एक दिन जब मैं ब्राम्पटन अस्पताल से लौट रहा था तो मैंने देखा कि मां कुछ सड़कछाप लड़कों को धकिया रही थी क्योंकि वे एक पागल औरत को सता रहे थे। उस औरत ने बुरी तरह से गंदे चीथड़े लपेटे हुए थे और खुद भी गंदी थी। उसका सिर मुंडा हुआ था और ये उन दिनों असामान्य बात समझी जाती थी। लड़के उस पर हँस रहे थे और एक दूसरे को उस पर धकिया रहे थे। और उसे छू नहीं रहे थे मानो उसे छू लेने से उन्हें गंदगी लग जायेगी। वह दुखियारी तब तक हिरणी की तरह सड़क के बीचों-बीच खड़ी रही जब तक जा कर मां ने उसे उन दुष्ट लड़कों से छुड़वा नहीं लिया। तब उस औरत के चेहरे पर पहचान के चिह्न उभरे। उस औरत ने कमज़ोर आवाज में मां को उसके स्टेज के नाम से पुकारा,"तुम मुझे नहीं पहचानती क्या? मैं इवा लेस्टॉक हूं।"
मां ने उसे तुंत पहचान लिया। वह मां के साथ की वैराइटी स्टेज की पुरानी दोस्त थी।
मां की इस बात से मैं इतना परेशान हो गया कि आगे बढ़ गया और आगे कोने पर जा कर मां का इंतज़ार करने लगा। बच्चे मेरे पास से गुज़र गये। वे फब्तियां कस रहे थे और खी खी करके हँस रहे थे। मैं गुस्से से लाल पीला हो रहा था। मैं ये देखने के लिए मुड़ा कि मां को क्या हो गया है। हे भगवान, वह औरत मां के साथ लग ली थी और अब दोनों मेरी तरफ चली आ रही थीं।
मां ने कहा,"तुम्हें नन्हें चार्ली की याद है?"
"तुम याद की बात करती हो, जब वो ज़रा सा था तो मैंने कितनी बार उसे अपनी बांहों में उठाया है।" उस औरत से लाड़ से कहा।
ये विचार ही लिजलिजे थे क्यों कि वह औरत इतनी गंदी और घिनौनी थी। और जब हम चले आ रहे थे तो मुझे इस बात से खासी कोफ्त हो रही थी कि लोग मुड़ मुड़ कर हम तीनों को देख रहे थे।
मां उसे वैराइटी के दिनों से 'डैशिंग इवा लैस्टाक' के नाम से जानती थी। वह उन दिनों आकर्षक और सदाबहार हुआ करती थी, मां ने मुझे ऐसा बताया था। उस औरत ने मां को बताया कि वह बीमार थी और अस्पताल में थी और अस्पताल छोड़ने के बाद से वह मेहराबों के तले और सैल्वेशन आर्मी के रैन बसेरों में ही सो रही थी।
सबसे पहले तो मां ने उसे स्नान के लिए सार्वजनिक स्नानघर में भेजा और उसके बाद, मेरे आतंक की सीमा न रही जब मां उसे अपने साथ हमारी दुछत्ती पर ले आयी। उसकी इस हालत के पीछे उसकी बीमारी ही थी या कोई और कारण, मैं नहीं जान पाया। इससे वाहियात बात और क्या हो सकती थी कि वह सिडनी की आराम कुर्सी वाले बिस्तर में सोयी थी। अलबत्ता, मां ने उसे वे कपड़े निकाल कर दिये जो वह दे सकती थी और उसे दो शिलिंग भी उधार दिये। तीन दिन बाद वह चली गयी और वही आखिरी बार थी जब हमने `डैशिंग इवा लैस्टाक ' के बारे में देखा या सुना था।


पिता के मरने से पहले मां ने पाउनाल टैरेस वाला घर छोड़ दिया था और अपनी एक सखी, गिरजा घर की सदस्या और समर्पित ईसाई महिला मिसेज टेलर के घर में एक कमरा किराये पर ले लिया था। वे एक छोटे कद की, लगभग पचास बरस की चौड़े बदन की महिला थीं। उनका जबड़ा चौकोर था और पीला झुर्रियोंदार चेहरा था। उन्हें गिरजा घर में देखते समय मैंने पाया था कि उनके दांत नकली थे। जब वे गातीं तो उनके दांत उनके ऊपरी जबड़े से जीभ पर गिर जाते। बहुत ही मोहक नज़ारा होता।
उनका व्यवहार प्रभावशाली था और उनके पास अकूत ताकत थी। उन्होंने मां को अपनी ईसाइयत की छत्र-छाया में ले लिया था और अपने बड़े से घर की दूसरी मंज़िल पर सामने की तरफ वाला कमरा बहुत ही वाजिब किराये पर दे दिया था। ये घर कब्रिस्तान के पास था।
उनके पति चार्ल्स डिकेंस के मिस्टर पिकविक की हूबहू प्रतिकृति थे और उनके घर की सबसे ऊपर वाली मंज़िल पर गणित में काम आने वाले रूलर बनाने का अपना कारखाना था। छत पर आसमानी रौशनी आती और मुझे वह जगह बिलकुल स्वर्गतुल्य लगती। वहां बहुत अधिक शांति होती। मैं अक्सर मिस्टर टेलर को काम करते हुए देखता जब वे अपने मोटे मोटे कांच वाले चश्मे से और मैग्नीफाइंग ग्लास से गहराई से देख रहे होते और स्टील का कोई स्केल बना रहे होते और इंच के भी पांचवें हिस्से को नाप रहे होते। वे अकेले काम करते और मैं अक्सर उनके छोटे मोटे काम कर दिया करता।
मिसेज टेलर की एक ही इच्छा थी कि वे किसी तरह अपने पति को ईसाई धर्म की ओर मोड़ दें। उनकी धार्मिक नैतिकता के हिसाब से तो उनके पति पापी ही थे। उनकी बेटी जो शक्ल-सूरत में ठीक अपनी मां पर गयी थी, सिर्फ उसका चेहरा कम सूजा हुआ था और हां, वह काफी जवान भी थी, आकर्षक होती अगर उसका व्यवहार ढीठपने का न होता और उसके तौर-तरीके आपत्तिजनक न होते। अपने पिता की तरह वह भी चर्च नहीं जाती थी। लेकिन मिसेज टेलर ने उन दोनों को धर्म की शरण में लाने की उम्मीद कभी भी नहीं छोड़ी। बेटी अपनी मां की आंखों का तारा थी लेकिन मेरी मां की आंखों का नहीं।
एक दोपहरी को, जब मैं ऊपर वाली मंज़िल पर मिस्टर टेलर को काम करते हुए देख रहा था, मैंने नीचे से मां और मिसेज टेलर के बीच कहा-सुनी की आवाज़ सुनी। मिसेज टेलर बाहर थीं। मुझे नहीं पता कि ये सब कैसे शुरू हुआ लेकिन वे दोनों एक दूसरे पर ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थीं। जब मैं नीचे सीढ़ियों पर पहुंचा तो मां सीढ़ियों के जंगले पर झुकी हुई थी,"तुम अपने आपको समझती क्या हो? औरत जात की लेंड़ी?"
"ओह," बेटी चिल्लायी, "एक ईसाई औरत की जुबान से कितने शानदार फूल झर रहे हैं?"
"चिंता मत करो," मां ने तुरंत जवाब दिया,"ये सब बाइबिल में है। ओल्ड टेस्टामेंट का पांचवां खंड, अट्ठाइसवां अध्याय, सैंतीसवां पद, हां, वहां इसके लिए एक दूसरा शब्द दिया हुआ है। बस, तुम्हें लेंड़ी शब्द ही सूट करेगा।"
इसके बाद हम अपने पाउनाल टैरेस में वापिस चले आये।


केनिंगटन रोड पर थ्री स्टैग्स बार इस तरह की जगह नहीं थी जहां मेरे पिता अक्सर जाया करते लेकिन एक बार वहां से गुज़रते हुए मुझे पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि अंदर झांक कर देखना चाहिये कि कहीं वे भीतर तो नहीं बैठे हैं। मैंने सैलून का दरवाजा कुछ ही इंच खोला था कि वे वहां बैठे हुए मुझे दिखायी दिये। वे एक कोने में बैठे हुए थे। मैं वापिस लौटने ही वाला था कि उनके चेहरे पर चमक उभरी और उन्होंने मुझे अपने पास आने का इशारा किया। मैं इस तरह के स्वागत से हैरान था, क्योंकि वे कभी भी दिखावे में विश्वास नहीं रखते थे। वे बहुत बीमार लग रहे थे। आंखें उनकी भीतर को धंसी हुई थीं और उनका शरीर सूज कर बहुत बड़ा लग रहा था। उन्होंने अपना एक हाथ नेपोलियन की तरह अपने वेस्ट कोट में टिका रखा था मानो अपनी सांस की तकलीफ पर काबू पाना चाहते हों। उस शाम वे बेहद बेचैन थे। वे मां और सिडनी के बारे में पूछते रहे और मेरे चलने से पहले उन्होंने मुझे अपनी बांहों में भरा और पहली बार मुझे चूमा। यही वह आखिरी बार था जब मैंने उन्हें जीवित देखा।
तीन सप्ताह के बाद उन्हें सेंट थॉमस अस्पताल में ले जाया गया। पिताजी को वहां ले जाने के लिए उन लोगों को पिताजी को शराब पिलानी पड़ी थी। जब पिताजी को पता चला कि वे कहां हैं तो वे बुरी तरह से लड़े झगड़े। लेकिन उनकी हालत मर रहे आदमी जैसी थी। वे मर रहे थे। हालांकि वे अभी भी बहुत जवान थे, मात्र सैंतीस बरस के, वे जलोदर रोग के कारण मर रहे थे। उन लोगों ने पिताजी के घुटने से चार गैलन पानी निकाला था।
मां उन्हें देखने के लिए कई बार गयी और हर मुलाकात के बाद वह और ज्यादा उदास हो जाती। वह बताती कि पिता फिर उसके पास वापिस आ कर अफ्रीका में नये सिरे से ज़िंदगी शुरू करना चाहते हैं। मैं इस तरह की संभावना से ही खिल उठता। मां सिर हिलाती, क्योंकि वह बेहतर जानती थी,"वे ये बात सिर्फ इसलिए कह रहे थे क्योंकि वे अच्छे दिखना चाहते थे।" मां ने बताया था।
एक दिन जब वह अस्पताल से वापिस आयी तो रेवरेंड जॉन मैकनील एवेंजलिस्ट की बात सुन कर बहुत खफा थी। जब मां पिताजी से मिलने गयी थी तो तो वे पिता से कह रहे थे,"देखो, मिस्टर चार्ली, जब भी मैं तुम्हारी तरफ देखता हूं तो मुझे एक पुरानी कहावत ही याद आती है कि जो जैसा बोएगा, वैसा ही काटेगा।"
"मरते हुए आदमी को दिलासा देने के लिए आप कितनी अच्छी वाणी बोल रहे हैं," मां ने पलट कर जवाब दिया था। कुछ ही दिन बाद पिताजी की मृत्यु हो गयी थी।
अस्पताल वाले जानना चाहते थे कि उनका अंतिम संस्कार कौन करेगा। मां के पास तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी इसलिए उसने वैराइटी आर्टिस्ट सहायता निधि का नाम सुझाया। ये थियेटर वालों की एक चैरिटी संस्था थी। इस सुझाव से परिवार के चैप्लिन कुनबे वालों में अच्छा खासा हंगामा मच गया। चैप्लिन परिवार का आदमी खैरात के पैसों से दफनाया जाये, ये बात वे कैसे गवारा कर सकते थे। उस समय पिताजी के एक छोटे भाई अल्बर्ट लंदन में ही थे। वे अफ्रीका से आये हुए थे। उन्होंसने पिताजी को दफनाने का खर्चा उठाने का जिम्मा उठाया।
ताबूत पर सफेद साटन का कफन लपेटा गया था और पिताजी के चेहरे के चारों उसके तरफ डेज़ी के नन्हें नन्हें सफेद फूलों से सजाया गया था। मां का कहना था कि वे इतने सादगी-भरे और मन को छू लेने वाले लग रह थे। मां ने पूछा था कि ये फूल किसने रखवाये हैं। वहां पर मौजूद कर्मचारी ने बताया था कि सुबह सुबह एक औरत एक छोटे-से बच्चे के साथ आयी थी और ये फूल रख गयी थी। वह लुइस थी।
पहली गाड़ी में मां, अंकल अल्बर्ट और मैं थे। टूटिंग तक की यात्रा तनाव पूर्ण थी क्योंकि मां इससे पहले कभी भी अंकल अल्बर्ट से नहीं मिली थी। वह कुछ कुछ ठाठ-बाठ वाले आदमी थे और अभिजात्य संस्कारों वाले शख्स थे। हालांकि वे बहुत विनम्र थे, उनका व्यवहार बर्फ की तरह ठंडा था। उनकी ख्याति एक अमीर आदमी के रूप में थी। ट्रांसवाल में घोड़ों के उनके रैंच थे और बोअर युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार को घोड़े उपलब्ध कराये थे।
सर्विस के दौरान बरसात होने लगी थी। कब्र खोदने वालों ने फटाफट ताबूत पर मिट्टी के लोंदे फेंके। इससे बहुत ही क्रूर किस्म की आवाज हो रही थी। ये भयावह नज़ारा था और कुल मिला कर बेहद डरावना था इसलिए मैं रोने लगा। इसके बाद रिश्तेदारों ने अपने साथ लायी मालाएं और फूल उस पर डाले। मां के पास डालने के लिए कुछ भी नहीं था, इसलिए उसने मेरा बेशकीमती काले बार्डर वाला रुमाल लिया और मेरे कान में फुसफुसायी,"मेरे लाल, ये हम दोनों की तरफ से।" इसके बाद चैप्लिन परिवार रास्ते में एक पब में खाना खाने के लिए रुक गया और उन्होंने भीतर जाने से पहले हमसे बहुत विनम्रता से पूछा कि हमें कहां छोड़ दिया जाये। और हमें घर छोड़ दिया गया था।
जब हम घर पहुंचे तो घर में खाने को एक दाना भी नहीं था। बीफ के थोड़े शोरबे की एक प्लेट रखी थी। मां के पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उसके पास सिर्फ दो पेंस थे जो उसने सिडनी को खाने का इंतज़ाम करने के लिए दे दिये थे। पिताजी की बीमारी के बाद उसने बहुत कम काम हाथ में लिया था इसलिए अब हफ्ता खत्म होने को था और टेलिग्राफ बाय के रूप में सिडनी की सात शिलिंग हफ्ते की पगार पहले ही खत्म हो चुकी थी। अंतिम संस्कार के बाद हमें भूख लगी हुई थी। सौभाग्य से रद्दी वाला बाहर से गुजर कर जा रहा था। मां के पास तेल का एक पुराना स्टोव था जिसे मां ने बहुत संकोच के साथ अधपेनी में बेचा और उस अधपेनी की ब्रेड लायी जिसे हमने उस शोरबे के साथ खाया।
मां चूंकि पिता की कानूनन विधवा थी इसलिए उसे अगले दिन बताया गया कि वह अस्पताल जा कर उनका सामान वगैरह ले ले। इस सामान में एक काला सूट था जिसमें खून के दाग लगे हुए थे। एक जांघिया था, एक कमीज, एक काली टाई, एक पुराना ड्रेसिंग गाउन, घर पर पहनने की कुछ पुरानी चप्पलें, जिनमें पंजों की तरफ कुछ ठुंसा हुआ था। जब मां ने वह बाहर निकाला तो स्लीपरों में सोने का एक सिक्का बाहर लुढ़क आया। ये भगवान की भेजी हुई सौगात थी।
हफ्तों तक हम अपने बाजू पर काली क्रेप की पट्टी लगाये रहे। शोक का ये संकेत भी मेरे लिए फायदेमंद रहा क्योंकि शनिवार की दोपहर के वक्त जब मैं फूल बेचने के काम धंधे पर निकलता तो मुझे इससे फायदा ही होता। मैंने मां को मना लिया था कि वह मुझे एक शिलिंग उधार दे दे। मैं सीधे ही फूल बाजार गया और नार्सीसस के फूलों के दो बंडल खरीदे और स्कूल से आने के बाद मैं उनके नन्हें-नन्हें बंडल बनाने में जुटा रहा। अगर सब बिक जाते तो मैं सौ प्रतिशत लाभ कमा सकता था। मैं सैलूनों में जाता जहां मैं अपने संभावित ग्राहक तलाशता कहता,"नार्सीसिस मैडम, मिस .. .. नार्सीसिस के फूल मिस।" महिलाएं हमेशा पूछतीं,"कौन था बेटे?" मैं अपनी आवाज फुसफुसाहट के स्तर तक ले आता और बताता,"मेरे पिता।" और वे मुझे टिप देतीं। मां ये देख कर हैरान रह गयी कि मैं सिर्फ दोपहर में काम करके पांच शिलिंग कमा लाया था। एक दिन उसने मुझे झिड़क दिया जब उसने मुझे एक पब से बाहर आते देखा। उस दिन से उसने मेरे फूल बेचने पर पाबंदी लगा दी। उसका ये मानना था कि बार रूम में जा कर इस तरह से फूल बेचना उसकी ईसाईयत को कहीं ठेस लगाता था,"दारू पीने से तुम्हारे पिता मर गये और इस तरह की कमाई से हम पर दुर्भाग्य का ही साया पड़ेगा," उसने कहा। अलबत्ता, उसने सारी कमाई रख ली थी। उसने फिर कभी मुझे फूल बेचने नहीं दिये।


मुझमें धंधा करने की जबरदस्त समझ थी। मैं हमेशा कारोबार करने की नयी-नयी योजनाएं बनाने में उलझा रहता। मैं खाली दुकानों की तरफ देखता, सोचता, इनमें पैसा पीटने का कौन सा धंधा किया जा सकता है। ये सोचना मछली बेचने, चिप्स बेचने से ले कर पंसारी की दुकान खोलने तक होता। हमेशा जो भी योजना बनती, उसमे खाना ज़रूर होता। मुझे बस पूंजी की ही ज़रूरत होती लेकिन पूंजी ही की समस्या थी कि कहां से आये। आखिर मैंने मां से कहा कि वह मेरा स्कूल छुड़वा दे और काम तलाशने दे।
मैंने कई धंधे किये। पहले मैं एक बिसाती की दुकान में ऊपर के काम करने के लिए रखा गया। काम करने के बाद मैं तहखाने में खुशी खुशी बैठा रहता, वहां साबुन, स्टार्च, मोमबत्तियों, मिठाइयों तथा बिस्किटों से घिरा रहता। मैं सारी की सारी मिठाइयां चख कर तब तक देखता रहा जब तक खुद बीमार नहीं पड़ गया।
इसके बाद मैंने थ्रॉगमोर्टन एवेन्यू में हूल एंड किन्स्ले टेलर, बीमा डॉक्टरों के यहां काम किया। ये काम मेरे हिस्से में सिडनी की वज़ह से आया था। उसी ने इस काम के लिए मेरी सिफारिश की थी। मुझे हर हफ्ते के बारह शिलिंग मिलते थे और मुझे रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करना होता था। इसमें डॉक्टरों के चले जाने के बाद दफ्तरों को साफ करने की ड्यूटी भी शामिल थी। रिसेप्शनिस्ट के रूप में मैं बहुत सफल था क्योंकि मैं वहां पर इंतज़ार कर रहे मरीजों का खूब मनोरंजन करता लेकिन जब दफ्तरों की सफाई का नम्बर आता तो मेरा दिल डूबने लगता। इस काम में सिडनी बेहतर था। मैं पेशाब के पॉट साफ करने में बुरा नहीं मानता था, लेकिन दस-दस फुटी खिड़कियों को साफ करना मेरे लिए आकाशगंगा निकालने जैसा था। इसका नतीजा ये हुआ कि दफ्तर गंदे और धूल भरे होते चले गये और एक दिन आया जब मुझे विनम्रतापूर्वक बता दिया गया कि मैं इस काम के लिए बहुत ही छोटा हूं।
जिस वक्त मैंने ये खबर सुनी, मैं अपने आपको संभाल नहीं पाया और रो पड़ा। डॉक्टर किन्स्ले टेलर, जिन्होंने एक बहुत ही अमीर महिला से शादी की थी और उन्हें शादी में लेसेन्स्टर गेट पर बहुत बड़ा मकान मिला हुआ था, ने मुझ पर तरस खाया और मुझसे कहा कि वे मुझे अपने घर में ऊपर के काम के लिए पेजबॉय के रूप में रखवा देंगे। तुरंत ही मेरा दिल बाग बाग हो गया। किसी निजी घर में पेजबॉय, और घर भी कैसा, बहुत खूबसूरत। ये अच्छा काम था। इसका कारण ये था कि मैं घर भर की नौकरानियों का दुलारा बन गया था। वे मुझसे बच्चे की तरह व्यवहार करतीं और रात को बिस्तर पर जाने से पहले गुड नाइट किस देतीं। अगर मेरी किस्मत में लिखा होता तो मैं बटलर बन गया होता। मैडम ने मुझसे कहा कि मैं तहखाने में जा कर उस जगह को साफ करूं जहां पर पैकिंग वाली पेटियों का ढेर लगा हुआ था और कचरे का अम्बार लगा हुआ था जिसे साफ करना, अलग करना और फिर से लगाना था। मेरा ध्यान इस काम से उस वक्त बंट गया जब मेरे हाथ में लगभग आठ फुट लम्बा लोहे का एक पाइप आ गया और मैं उसे बिगुल की तरह बजाने लगा। जिस वक्त मैं उसके मजे ले रहा था, मैडम अवतरित हुईं और मुझे तीन दिन का नोटिस दे दिया गया।
मुझे स्टेशनरी की एक दुकान डब्ल्यू एच स्मिथ एंडरसन में काम करने में बहुत मज़ा आया लेकिन उन्हें जैसे ही पता चला कि मेरी उम्र कम है तो उन्होंने बाहर का रास्ता दिखा दिया। फिर मैं एक दिन के लिए ग्लास ब्लोअर बना। मैंने स्कूल में ग्लास ब्लोइंग के बारे में पढ़ा था और मुझे लगा, ये बहुत ही रोमांचकारी काम होगा। लेकिन गर्मी मेरे सिर पर चढ़ गयी और मुझे बेहोशी की हालत में बाहर लाया गया और रेत की ढेरी पर लिटा दिया गया। यहीं पर इसकी इतिश्री हो गयी। मैं इस इकलौते दिन की पगार लेने भी नहीं गया। इसके बाद मैंने स्ट्रेकर, पिंटर और स्टेशनर्स के यहां काम किया। मैंने वहां पर झूठ बोला कि मैं व्हार्फेडेल पिंटिंग मशीन चला सकता हूं। ये बहुत ही बड़ी मशीन थी। लगभग बीस फुट लम्बी। मैंने इस मशीन को गली से तहखाने में चलते हुए देखा था और मुझे लगा कि इसे चलाना तो बेहद आसान होगा। एक कार्ड पर लिखा था व्हार्फेडेल प्रिंटिंग मशीन के लिए कागज़ चढ़ाने वाला लड़का चाहिये। जब फोरमैन मुझे मशीन के पास लाया तो ये मुझे दैत्याकार सरीखी लगी। इसे चलाने के लिए मुझे पांच फुट ऊंचे एक प्लेटफार्म पर खड़ा होना पड़ा। मुझे लगा मानो मैं एफिल टावर के ऊपर खड़ा हूं।
"मारो इसे," फोरमैन ने कहा।
"क्या मारूं?"
मुझे हिचकिचाते देख, वह हँसा,"तो इसका मतलब तुमने व्हार्फेडेल प्रिंटिंग मशीन पर कभी काम नहीं किया है?"
"मुझे बस, एक मौका दीजिये, मैं एकदम तेजी से इसे चलाना सीख जाऊंगा।"
"इसे मारो" का मतलब था उस दैत्य को शुरू करने के लिए लीवर को खींचो। मशीन घूमने, चलने और घुरघुराने लगी। मुझे लगा ये मशीन तो मुझे ही निगल जायेगी। कागज़ बहुत ही बड़े बड़े थे। इतने बड़े कि आसानी से मुझे एक कागज़ में लपेटा जा सकता था। एक बड़े से गत्ते से मैं कागजों को पंखा करता, उन्हें कोनों से उठाता, और ठीक वक्त पर मशीन के जबड़ों में धर देता ताकि वह दैत्य उन्हें निगल जाये, उस पर छापे और दूसरे सिरे पर वापिस उगल दे। पहले दिन तो मैं उसे इतना घबराया हुआ था कि कहीं ये भूखा दैत्य मुझे ही न चबा जाये। इसके बावजूद मुझे बारह शिलिंग हफ्ते की पगार पर नौकरी पर रख लिया गया।


दिन निकलने से पहले, उन ठंडी सुबहों में काम पर निकलने का अपना ही रोमांच था। गलियां शांत और सुनसान होतीं। इक्का दुक्का छायाएं लोखार्ट के टीरूम की मध्यम रौशनी में नाश्ते के लिए आते जाते दिखायी देतीं। ऐसा लगता मानो आप अपने साथ के लोगों के साथ हैं, उस धुंधलके में गरम चाय पीते हुए और आगे मुंह बाये खड़े दिन भर के काम के बावजूद क्षणिक राहत पाते हुए। और फिर प्रिंटिंग का काम इतना उबाऊ भी नहीं था। बस, हफ्ते के आखिर में काम बहुत करना पड़ता, गिलेटिन के उन लम्बे रोलरों पर से स्याही हटाने का काम करना पड़ता। इन रोलरों का वजन सौ पौंड से भी ज्यादा होता। बाकी कुछ मिला कर काम सहन करने योग्य था। अलबत्ता, वहां पर तीन हफ्ते तक काम करने के बाद मुझे इन्फ्लुंजा ने धर दबोख और मां ने ज़िद की कि मैं वापिस स्कूल की राह पकडूं।


सिडनी अब सोलह बरस का हो चला था। एक दिन वह खुश खुश घर आया क्योंकि उसे अफ्रीका जाने वाले एक जहाज में डोनोवन लाइन पैसेंजर बोट पर बिगुल बजाने वाले का काम मिल गया था। उसका काम था खाने वगैरह के लिए बुलाने के लिए बिगुल बजाना। उसने बिगुल बजाना एक्समाउथ ट्रेनिंग कैम्प में सीख लिया था। अब वह सीखना काम आ रहा था। उसे हर महीने दो पाउंड और दो शिलिंग मिलते और सेकेंड क्लास में तीन मेजों पर सर्व करने के लिए टिप अलग से मिलती। उसे जहाज पर जाने से पहले पैंतीस शिलिंग अग्रिम रूप से मिलने वाले थे। तय था वह ये रकम मां को दे कर जाने वाला था। इस सुखद भविष्य के सपने संजोये हम चेस्टर स्ट्रीट में एक नाई की दुकान के ऊपर दो कमरे वाले मकान में आ गये।
अपनी ट्रिप से जब सिडनी पहली बार लौटा तो ये मौका उत्सव की तरह था। क्योंकि उसके पास टिप से कमाये तीन पाउंड से भी ज्यादा की रकम थी और ये चांदी के थे। मुझे याद है वह अपनी जेबों से बिस्तर पर से अपनी दौलत लुढ़काता जा रहा था। ये पैसे इतने ज्यादा लगे मुझे जितने मैंने अपनी ज़िंदगी में नहीं देखे थे और मैं उन पर से अपने हाथ हटा ही नहीं पा रहा था। मैंने उनकी ढेरियां लगायीं, चट्टे लगाये और उनके साथ तब तक खेलता रहा जब मां और सिडनी ने आखिर कह ही दिया कि मैं नदीदा हूं।
क्या तो शान थी। क्या ही मस्ती थी। ये गर्मी के दिन थे और ये हमारे केक और आइसक्रीम खाने का काल था। इनके अलावा और भी कई विलासिताएं राह देख रही थीं। हमने नाश्ते में ब्लोटर, किप्पर, हैड्डाक मछली खायीं और चाय केक का आनंद लिया, और इतवार के दिन बंद और कटलेट खाये।
सिडनी को सर्दी ने जकड़ लिया और वह कई दिन तक बिस्तर पर पड़ा रहा। मां और मैं उसकी तीमारदारी करते रहे। तभी ये हुआ कि हमने खूब छक कर आइसक्रीम खायी। मैं एक बड़े से गिलास में एक पेनी की ले कर आया। मैं ये गिलास इताल्वी आइसक्रीम की दुकान में ले गया था और वह गिलास और एक पेनी देख कर अच्छा खासा चिढ़ा था। दुकानदार ने सुझाव दिया कि अगली बार मैं आऊं तो अपने साथ एक बाथ टब ले कर आऊं। गर्मियों में हमारा प्रिय ड्रिंक होता था शरबत और दूध। खूब झागदार दूध में बुलबुले छोड़ता शरबत, बस पीते ही तबीयत खुश हो जाती।
सिडनी ने हमें अपनी समुद्री यात्रा के बहुत से रोचक किस्से सुनाये। अभी उसने अपनी यात्रा शुरू भी नहीं की थी एक बार उसकी नौकरी पर ही बन आयी। उसने लंच के लिए पहला बिगुल बजाया। बिगुल बजाने की उसकी प्रेक्टिस नहीं रही थी और सारे फौजी खूब हो हल्ला करने लगे। मुख्य स्टीवर्ड भागता हुआ आया,"ऐय तुम क्या कर रहे हो?"
"सॉरी सर, मेरे होंठ अभी बिगुल पर सेट नहीं हुए हैं।"
"ठीक है, ठीक है, जल्दी से अपने होंठ सेट कर लो नहीं तो जहाज चलने से पहले ही तुम्हें तट पर ही उतार देना पड़ेगा।"
खाने के दौरान किचन के बाहर सब वेटरों की लम्बी लम्बी कतारें लग जातीं जो अपने अपने आर्डर का सामान ले रहे होते। जब तक सिडनी का नम्बर आता, वह अपना आर्डर ही भूल चुका होता और उसे एक बार फिर लाइन के आखिर में खड़ा होना पड़ता। सिडनी ने बताया कि पहले कुछ दिन तो ये हालत रही कि बाकी सब तो अपनी स्वीट डिश खा रहे होते और उसकी मेज पर अभी भी सूप ही सर्व हो रहा होता।
सिडनी तब तक घर पर रहा जब तक सारे पैसे खत्म नहीं हो गये। अलबत्ता, उसे दूसरी ट्रिप के लिए भी बुक कर लिया गया। उसे कम्पनी से एक बार फिर पैंतीस शिलिंग अग्रिम रूप से मिले जो उसने मां को दे दिये। लेकिन ये रकम ज्यादा दिन नहीं चली। तीन ही हफ्ते बाद हम बर्तनों की तली में झांक रहे थे। सिडनी के वापिस आने में अभी भी तीन हफ्ते बाकी थे। मां हालांकि अभी भी अपनी सिलाई मशीन पर काम कर ही रही थी, जो कुछ वह कमा रही थी, हम दोनों के लिए काफी नहीं था। नतीजा ये हुआ कि हम एक बार फिर पाउनाल हॉल लौट आये।
लेकिन मैं कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लिया करता था। मां के पास पुराने कपड़ों का एक ढेर लगा हुआ था। एक दिन शनिवार की सुबह थी। मैंने मां को सुझाव दिया कि क्यों न मैं कोशिश करूं और बाज़ार में जा कर इन्हें बेच आऊं। मां इस बात को ले कर थोड़ी परेशान हो गयी। उसका कहना था कि ये सब किसी काम के नहीं हैं। इसके बावजूद मैंने एक पुरानी चादर में कपड़ों की पोटली बांधी और नेविंगटन बट्ट की ओर चल पड़ा। वहां जा कर मैंने अपना माल असबाब फुटपाथ पर फैलाया और गटर पर खड़े हो कर आवाजें लगानी शुरू कर दीं। मेरी दुकानदारी बहुत ही दयनीय हालत में थी."देखिये साहेबान, मेहरबान, कदरदान," मैंने एक पुरानी कमीज हाथ में उठायी और बोलना शुरू किया,"बोलिये साहेबान क्या देते हैं इसका? एक शिलिंग, छ: पेंस, चार पेंस दो पेंस।" मैं उसे एक पेनी में भी न बेच पाया। लोग-बाग आते, खड़े होते, हैरानी से देखते, और हँसते हुए चले जाते। मैं परेशान होना शुरू हो गया। सामने की जवाहरात की दुकान की खिड़की से वहां के मालिकों ने मुझे देखना शुरू कर दिया। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार, गेलिस की एक जोड़ी जो इतनी खराब नहीं लग रही थी, मैं छ: पेंस में बेचने में सफल हो ही गया। लेकिन मुझे वहां पर खड़े हुए जितनी देर होती जा रही थी, मैं उतना ही बेचैन होता जा रहा था। थोड़ी देर बाद उस जवाहरात की दुकान में से एक महाशय आये और भारी रूसी लहजे में मुझसे पूछने लगे कि मैं इस धंधे में कब से हूं। उसके विनम्र चेहरे के बावजूद मैंने ताड़ लिया कि उसके बात करने के लहजे में मज़ाक उड़ाने का सा भाव था। मैंने उसे बताया कि बस अभी शुरू ही किया है। वह धीरे धीरे अपनी दुकान पर लौट गया और, खींसे निपोरते अपने दो भागीदारों के पास लौट गया और फिर से वे दुकान की खिड़की में से मुझे देखने लगे। अब बहुत हो गया था। मैंने अपनी दुकानदारी समेटी और घर वापिस लौट आया। मैंने मां को बताया कि मैंने छ: पेंस में गेटर्स बेचे हैं तो वह हिकारत से बोली, अच्छे भले थे वो तो, उसे ज्यादा पैसों में बेचा जा सकता था।
ये एक ऐसा वक्त था जब हम किराया देने के बारे में ज्यादा माथा पच्ची नहीं करते थे। हमने आसान तरीका ये अपनाया कि जब किराया वसूल करने वाला आता तो सारा दिन गायब ही रहते। हमारे सामान की कीमत ही क्या थी? दो कौड़ी। उसे कहीं और ढो कर ले जाने में ज्यादा पैसे लगते। अलबत्ता, हमारी मंजिल एक बार फिर 3 पाउनाल टेरेस थी।
उसी समय मुझे एक ऐसे बूढ़े आदमी और उसके बेटे के बारे में पता चला जो केनिंगटन रोड के पिछवाड़े की तरफ एक घुड़साल में काम करते थे। वे खिलौने बनाने वाले घुमंतु लोग थे और ग्लासगो से आये थे। वे लोग खिलौने बनाते थे और शहर दर शहर घूमते हुए उन्हें बेचते थे। वे बंधन मुक्त थे और उन पर कोई जिम्मेवारी नहीं थी, इसलिए मैं उनसे ईर्ष्या करता था। उनके धंधे के लिए बहुत ही कम पूंजी की ज़रूरत थी। एक शिलिंग की मामूली रकम लगा कर वे धंधा शुरू कर सकते थे। वे जूतों के डिब्बे इकट्ठे करते। कोई भी दुकानदार खुशी खुशी ये डिब्बे उन्हें दे देता। फिर वे अंगूरों की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाला बुरादा जुटाते। ये भी उन्हें सेंत मेंत में मिल जाता। उन्हें शुरुआत में जिन मदों के लिए पूंजी लगानी पड़ती, वे थीं, एक पेनी की गोंद, एक पेनी के क्रिस्मस वाली रंगीन पन्नियां, और दो पेनी के रंगीन झालर के गोले। एक शिलिंग की पूंजी से वे सात दर्जन नावें बना लेते और एक एक नाव एक एक पेनी की बिकती। नाव के दोनों तरफ के हिस्से जूतों के डिब्बों में से काट लिये जाते, और उन्हें गत्ते के तले के साथ सी दिया जाता। साफ सतह पर गोंद फेर दिया जाता और फिर उस पर कॉर्क का बुरादा छिड़क दिया जाता। मस्तूलों को रंगीन झालरों से सजा दिया जाता और सबसे ऊपर वसले मस्तूल, नाव के आगे और पीछे वाले हिस्से पर और पाल फैलाने के डंडों के आखिरी सिरे पर लाल, पीले और नीले झंडे लगा दिये जाते। सौ या उससे भी अधिक इस तरह की रंगीन पन्नियों वाली नावें ग्राहकों को आकर्षित करतीं और इन्हें आसानी से बेचा जा सकता था।
हमारे परिचय का नतीजा ये हुआ कि मैं नावें बनाने में उनकी मदद करने लगा और जल्दी ही मैं उनके हुनर से वाकिफ हो गया। जब वे लोग हमारा पड़ोस छोड़ कर गये तो मैं खुद उनके धंधे में उतर गया। छ: पेंस की मामूली सी पूंजी और कार्ड बोर्ड काटने से हाथों में हुए छालों के साथ मैं एक ही हफ्ते में तीन दर्जन नावें बनाने में कामयाब हो गया था।
लेकिन हमारी परछत्ती पर इतनी जगह नहीं थी कि मां के काम और मेरे धंधे के लिए जगह हो पाती। इसके अलावा मां की शिकायत थी कि उसे उबलते हुए गोंद की बू से उबकाई आती है और ये भी था कि गोंद का डिब्बा हर समय उसके सीये जाने वाले कपड़ों के लिए मुसीबत बन रहा था। संयोग से, सारे घर भर में ये कपड़े बिखरे ही रहते। अब चूंकि मेरा योगदान मां के योगदान की तुलना में मामूली ही था, मेरी कला को तिलांजलि दे दी गयी।
इन दिनों हम अपने नाना से बहुत कम मिले थे। पिछले एक बरस से उनकी सेहत ठीक नहीं चल रही थी। उनके हाथ गठिया की वजह से सूज गये थे और इस कारण वे जूते गांठने का अपना धंधा नहीं कर पाते थे। पहले के वक्त में जब भी उनसे बन पड़ता, वे एकाध सिक्का दे कर मां की मदद कर दिया करते थे। कभी कभी वे हमारे लिए खाना भी बना दिया करते। वे ओट के आटे और प्याज को दूध में उबाल कर और उस पर नमक और काली मिर्च बुरक कर शानदार दलिये जैसा व्यंजन बनाया करते थे। सर्दी की रातों में ठंड का मुकाबला करने के लिए ये हमारा सबसे बढ़िया खाना होता।
जब मैं बच्चा था तो मैं नाना को हमेशा खरदिमाग और खड़ूस बूढ़ा समझा करता था जो मुझे हर वक्त किसी न किसी बात के लिए टोकते ही रहते थे। कभी व्याकरण के लिए तो कभी तमीज के लिए। इन छोटी-मोटी मुठभेड़ों के कारण ही मैंने उन्हें नापसंद करना शुरू कर दिया था। अब वे अस्पताल में अपने जोड़ों के दर्द की वजह से पड़े हुए थे और मां उन्हें रोज़ देखने के लिए अस्पताल जाती। अस्पताल की ये विजिटें बहुत फायदे की होतीं क्योंकि वह अक्सर थैला भर ताज़े अंडे ले कर वापिस आती। ये हमारी मुफ़लिसी के दिनों में विलासिता की तरह होते। जब वह खुद न जा पाती तो मुझे भेज देती। मुझे ये देख कर हमेशा बहुत हैरानी होती जब मैं नाना को बहुत ज्यादा सहमत और मेरे आने से खुश पाता। वे नर्सों में खासे लोकप्रिय थे। बाद की ज़िंदगी में उन्होंने मुझे बताया था कि वे नर्सों के साथ चुहलबाजी करते और उन्हें बताते कि जोड़ों के दर्द के बावज़ूद उनकी सारी मशीनरी काम से बेकार नहीं हुई है। इस तरह की अश्लील चुहलबाजी नर्सों को खुश कर देती। जब उनके जोड़ों का दर्द काबू में रहता तो वे जा कर रसोई में काम करते, और इस तरह से हमारे पास अंडे आते। विजिट वाले दिनों में वे आम तौर पर अपने बिस्तर पर ही होते और अपने बिस्तर के पास वाले केबिनेट से चुपके से अंडों का एक बड़ा-सा थैला थमा देते, जिसे मैं चलने से पहले नाविकों वाली अपनी बनियान में छुपा लेता।
हम कई-कई हफ्ते अंडों पर ही गुज़ार देते। उनका कुछ न कुछ बना ही लेते। उबले हुए, तले हुए या उनका कस्टर्ड ही बना लेते। बेशक नाना इस बात का विश्वास दिलाते कि सारी नर्सें उनकी दोस्त हैं और कमोबेश जानती हैं कि क्या कुछ चल रहा है, अस्पताल के वार्ड से उन अंडों के साथ बाहर निकलते समय हमेशा मुझे खटका लगा रहता। कभी लगता कि मैं मोम से चिकने फर्श पर फिसल कर गिर पड़ूंगा या मेरा फूला हुआ पेट पकड़ में आ जायेगा। इस बात की हैरानी होती थी कि जब भी मैं अस्पताल से बाहर आने को होता, सारी की सारी नर्सें वहां से गायब हो जातीं। हमारे लिये ये बहुत ही दु:खद दिन था जब नाना को अपने जोड़ों के दर्द से आराम आ गया और उन्हें अस्पताल छोड़ना पड़ा।
अब छ: सप्ताह बीतने को आये थे और सिडनी अब तक नहीं लौटा था। शुरू-शुरू में तो मां इससे इतनी चिंता में नहीं पड़ी लेकिन एक और हफ्ते की देरी के बाद मां ने डोनोवन एंड कैसल लाइन नाम के जहाज के दफ्तर को लिखा तो वहां से ये खबर मिली कि उसे जोड़ों के दर्द के इलाज के लिए केप टाउन के तट पर जहाज से उतार दिया गया है। इस खबर से मां चिंता में पड़ गयी और इससे उसकी सेहत पर बुरा असर पड़ा। अभी भी वह सिलाई मशीन पर काम कर रही थी और मैं भी इस मामले में किस्मत वाला था कि मुझे स्कूल के बाद एक परिवार में नृत्य के लैसन देने का काम मिल गया था और मुझे हफ्ते के पांच शिलिंग मिल जाया करते थे।
लगभग इन्हीं दिनों मैक्कार्थी परिवार केनिंगटन रोड पर रहने आया। मिसेज मैक्कार्थी आयरिश कामेडियन रही थीं और मां की सहेली थीं। उनकी शादी एक सर्टिफाइड एकांउटेंट वाल्टर मैक्कार्थी से हुई थी। लेकिन जब मां को मज़बूरन स्टेज छोड़ देना पड़ा तो हम लोगों की मैक्कार्थी परिवार से मिलने-जुलने की संभावना ही नहीं रही और अब वे सात बरस के बाद एक बार फिर मिल रहे थे। अब वे लोग केनिंगटन रोड के खास इलाके में वाल्कॉट मैन्सन में रहने के लिए आ गये थे।
उनका बेटा वैली मैक्कार्थी और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। जब हम छोटे थे तो बड़े लोगों की नकल किया करते थे मानो हम रंगारंग कार्यक्रम के कलाकार हों। हम काल्पनिक सिगार पीते, अपनी कल्पना की घोड़ी वाली बग्घी में सैर करते, और अपने माता-पिता का खूब मनोरंजन किया करते थे।
अब चूंकि मैक्कार्थी परिवार वाल्कॉट मैन्सन में रहने के लिए आ गया था, मां उनसे मिलने शायद ही कभी गयी हो लेकिन मैंने और वैली ने पक्की दोस्ती कर ली थी। स्कूल से वापिस लौटते ही मैं भाग कर मां के पास यह पूछने के लिए जाता कि मेरे लायक कोई काम तो नहीं है, फिर मैक्कार्थी परिवार के यहां भागा-भागा पहुंच जाता। हम वाल्कॉट मैन्सन के पिछवाड़े थियेटर खेलते। मैं चूंकि निर्देशक बनता इसलिए मैं हमेशा खलनायक वाले पात्र अपने लिए रखता। मैं अपने आप ही ये जानता था कि खलनायक का पात्र नायक की तुलना में ज्यादा रंगीन होता है। हम वैली के खाने के समय तक खेलते रहते। आम तौर पर मुझे भी बुलवा लिया जाता। खाने के समय के आस-पास मैंने अपने आप को उपलब्ध कराने के अचूक खुशामदी तरीके खोज निकाले थे। अलबत्ता, ऐसे मौके भी आते जब मेरी सारी तिकड़में काम न आतीं और मैं संकोच के साथ घर लौट आता। मां मुझे देख कर हमेशा खुश होती और मेरे खाने के लिए कुछ न कुछ बना देती। कभी शोरबे में तली हुई ब्रेड या नाना के यहां से जुटाये गये अंडों का कोई पकवान और एक कप चाय। वह मुझे कुछ न कुछ पढ़ कर सुनाती या हम दोनों एक साथ खिड़की पर बैठ जाते और वह नीचे सड़क पर जा रहे राहगीरों के बारे में मज़ेदार बातें करके मेरा दिल बहलाती। उनके बारे में वह किस्से गढ़ कर सुनाती। यदि कोई आदमी खुशमिजाज, फिरकी जैसी चाल के साथ जा रहा होता तो मां कहता,"देखो जा रहे हैं श्रीमान हेपांडस्कौच, बेचारे शर्त लगाने की जगह जा रहे हैं। अगर आज उनकी किस्मत ने साथ दिया तो वह अपनी गर्लफ्रेंड के लिए दो सीटों वाली पुरानी साइकिल खरीदेंगे।"
जब कोई आदमी धीमी गति से कदम गिनते हुए गुजरता तो मां का किस्सा होता,"देखो बेचारे को, घर जा रहा है और उसे पता है आज खाने में उसे फिर से वही कद्दू मिलने वाला है। वह कद्दू से नफरत करता है।"
कोई अपनी ऐंठ में ही चला जा रहा होता तो मां कहती,"देखो, ये सभ्य समाज के सज्जन जा रहे हैं। लेकिन फिलहाल तो वे अपनी पैंट में हो गये छेद की वजह से खासे परेशान हैं।"
इसके बाद एक और आदमी तेज-तेज चाल से लपकता हुआ गुज़र जाता,"उस भले आदमी ने अभी अभी ईनो की खुराक ली है और . ....।" और इस तरह से किस्से चलते रहते और हम हँस-हँस कर दोहरे हो जाते।
एक और सप्ताह बीतने को आया था लेकिन अभी भी सिडनी का कोई समाचार नहीं मिला था। अगर मैं और छोटा होता और मां की चिंता के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता तो मैं महसूस कर सकता था कि उसके दिल पर क्या गुज़र रही थी। मैंने तब इस बात को देखा होता कि वह कई दिनों से खिड़की की सिल पर ही बैठी बाहर देखती रहती थी। उसने कई दिन से कमरे को साफ तक नहीं किया था और बेहद शांत होती चली गयी थी। मैं शायद तब भी चिंता में पड़ा होता जब कमीज़ें बनाने वाली फर्म ने उसके काम में मीन-मेख निकालनी शुरू कर दी थी और उसे और काम देना बंद कर दिया था और जब वे बकाया किस्तों की अदायगी न होने के कारण सिलाई मशीन ही उठा कर ले गये और जब नृत्य के पाठ से होने वाली मेरी पांच शिलिंग की कमाई भी अचानक बंद हो गयी तो शायद इस सबके बीच मैंने इस बात पर ध्यान दिया हो कि मां लगातार उदासीन और किंकर्तव्यविमूढ़ बनी रही थी।
अचानक मिसेज मैक्कार्थी की मृत्यु हो गयी। वे कुछ अरसे से बीमार चल रही थीं। उनकी हालत खराब होती चली गयी और अचानक वे गुज़र गयी थीं। तत्काल ही मेरे दिमाग में ख्यालों ने हमला बोल दिया। कितना अच्छा होता अगर मिस्टर मैक्कार्थी मां से विवाह कर लेते। वैली और मैं तो अच्छे दोस्त थे ही। इसके अलावा, ये मां की समस्याओं का आदर्श हल भी होता।
संस्कार के तुरंत बाद मैंने मां से इस बात बारे में बात की,"अब तुम इसे अपनी दिनचर्या बना लो मां कि अक्सर मिस्टर मैक्कार्थी से मिल लिया करो। मैं शर्त बद कर कह सकता हूं कि वे तुमसे शादी कर लेंगे।"
मां कमजोरी से मुस्कुरायी,"उस बेचारे को एक मौका तो दो," मां ने जवाब दिया।
"मां, अगर तुम ढंग से तैयार हो जाया करो और अपने आपको आकर्षक बना लो, जैसा तुम पहले हुआ करती थी तो वे जरूर तुम्हें पसंद कर लेंगे। लेकिन तुम तो अपनी तरफ से कोई कोशिश ही नहीं करती, बस, इस गंदे कमरे में पसरी बैठी रहती हो और वाहियात नज़र आती हो।"
बेचारी मां, मैं अपने इन शब्दों पर कितना अफ़सोस करता हूं। मैं इस बात को कभी सोच ही नहीं पाया कि वह खाना पूरा न मिलने के कारण कमज़ोर थी। इसके बावजूद अगले दिन, पता नहीं उसमें कहां से इतनी ताकत आ गयी, उसने सारा कमरा साफ-सूफ कर दिया। स्कूल में गर्मियों की छुट्टियां शुरू हो गयी थीं। इसलिए मैंने सोचा, मैक्कार्थी परिवार के यहां थोड़ा पहले ही चला जाऊं। अपने उस मनहूस दड़बे से बाहर निकलने का कोई तो बहाना चाहिये ही था। उन्होंने मुझे लंच तक रुकने का न्यौता दिया था। लेकिन मुझे ऐसा आभास हो रहा था कि मुझे मां के पास वापिस लौट जाना चाहिये। जब मैं पाउनाल टैरेस वापिस पहुंचा तो पड़ोस के कुछ बच्चों ने मुझे गेट के पास ही रोक लिया,"तुम्हारी मां पागल हो गयी है, एक छोटी सी लड़की ने कहा।
ये शब्द तमाचे की तरह मेरे मुंह पर आ लगे।
"क्या मतलब है तुम्हारा?" मैं घिघियाया।
"ये सच है," दूसरी ने बताया।
"वो सारे घरों के दरवाजे खटखटाती फिर रही थी और हाथ में कोयले के टुकड़े ले कर बांटती फिर रही थी कि ये बच्चों के लिए जन्मदिन का उपहार है। चाहो तो तुम मेरी मां से भी पूछ सकते हो।"
और कुछ सुने बिना मैं रास्ते से दौड़ा, खुले दरवाजे से घर के भीतर गया, फलांगता हुआ सीढ़ियां चढ़ा और अपने कमरे का दरवाजा खोला। एक पल के लिए अपनी सांस पर काबू पाने के लिए मैं थमा और मां को गहरी नज़र से देखने लगा। ये गरमी की दोपहरी थी और माहौल घुटा-घुटा सा और दबाव महसूस कराने वाला था। मां हमेशा की तरह खिड़की पर बैठी हुई थी। वह धीमे से मुड़ी और उसने मेरी तरफ देखा। उसका चेहरा पीला और पीड़ा से ऐंठा हुआ लग रहा था।
"मां," मैं लगभग चिल्ला उठा।
"क्या हुआ?" मां ने निर्विकार भाव से पूछा।
तब मैं दौड़ कर गया और अपने घुटनों के बल गिरा और उसकी गोद में अपना मुंह छुपा लिया। ज़ोर से मेरी रुलाई फूट पड़ी।
"रुको, रुको, बेटे," वह हौले से मेरा सिर सहलाते हुए बोली,"क्या हो गया मेरे बच्चे?"
"तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है," मैं सुबकते हुए चिल्लाया।
वह मुझे आश्वस्त करते हुए बोली,"मैं तो बिल्कुल चंगी हूं।"
वह बहुत ज्यादा खोयी-खोयी और ख्यालों में डूबी रही थी।
"नहीं,नहीं, वे सब बता रहे हैं कि तुम सब घरों में फिरती रही थी और.. .. और ..." मैं अपना वाक्य पूरा नहीं कर पाया, लेकिन सुबकता रहा।
"मैं सिडनी को तलाश कर रही थी," वह कमज़ोरी से बोली,"वे उसे मुझसे दूर रखे हुए हैं।"
तब मुझे पता चला कि जो कुछ बच्चे बता रहे थे, वह सही था।
"ओह मां, इस तरह की बातें मत करो। नहीं, नहीं," मैं सुबकने लगा,"मैं तुम्हारे लिए डॉक्टर बुलवाता हूं।"
वह मेरा सिर सहलाते हुए बोलती रही,"मैक्कार्थी जी को मालूम है कि वह कहां है और वे उसे मुझे दूर रखे हुए हैं।"
"मम्मी, मम्मी, मुझे जरा डाक्टर को बुलवा लेने दो," मैं चिल्लाया। मैं उठा और सीधे दरवाजे की तरफ लपका।
मां ने दर्दभरी निगाहों से मेरी तरफ देखा और पूछा,"कहां जा रहे हो?"
"डॉक्टर को लिवाने। मुझे ज्यादा देर नहीं लगेगी।"
मां ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन मेरी तरफ चिंतातुर निगाहों से देखती रही। मैं तेजी से लपक कर नीचे गया और मकान मालकिन के पास पहुंचा।
"मुझे तुरंत डॉक्टर को बुलवाना पड़ेगा। मां की हालत ठीक नहीं है।"
"हमने पहले ही डॉक्टर को बुलवा लिया है।" मकान मालकिन ने बताया।


खैराती डॉक्टर बूढ़ा और चिड़चिड़ा था। मकान मालकिन की दास्तान सुन लेने के बाद, जो कमोबेश बच्चों के बताये किस्से जैसी ही थी, उसने मां की सरसरी तौर पर जांच की।
"पागल . . . इसे आप अस्पताल भिजवाइये," कहा उसने।
डॉक्टर ने एक पर्ची लिखी। दूसरी बातों के अलावा इसमें ये लिखा था कि वह कुपोषण की मरीज थी। डॉक्टर ने इसका मतलब मुझे ये बताया कि उसे पूरी खुराक नहीं मिलती रही है।
मकान मालकिन ने मुझे दिलासा देते हुए कहा,"ठीक हो जायेगी बेटा, और उसे वहां खाना भी ठीक तरह से मिलेगा।"
मकान मालकिन ने मां के कपड़े-लत्ते जमा करने में मेरी मदद की और उसे कपड़े पहनाये। मां एक बच्चे की तरह सारी बातें मानती रही। वह इतनी कमज़ोर थी कि उसकी इच्छा शक्ति ने मानो उसका साथ छोड़ दिया हो। जब हम घर से चले तो पास-पड़ोस के बच्चे और पड़ोसी मजमा लगाये गेट के पास खड़े थे और इस अनहोनी को देख रहे थे।
अस्पताल लगभग एक मील दूर था। जब हम वहां के लिए चल रहे थे तो मां कमज़ोरी के कारण किसी शराबी औरत की तरह लड़खड़ा कर चल रही थी और दायें-बायें झूम रही थी। मैं उसे किसी तरह संभाले हुए था। उस दोपहरी में धूप का तीखापन हमें अपनी गरीबी का अहसास बेदर्दी से करवा रहा था। जो लोग हमारे आस पास से गुज़र कर जा रहे थे जरूर सोच रहे होंगे कि मां ने पी रखी है, लेकिन मेरे लिए वे सपने में अजगरों की तरह थे। वह बिल्कुल भी नहीं बोली लेकिन शायद वह जानती थी कि उसे कहां ले जाया जा रहा है और उसे वहां पहुंचने की चिंता भी थी। रास्ते में मैंने उसे आश्वस्त करने की कोशिश की और वह मुस्कुरायी भी। लेकिन यह मुस्कुराहट बेहद कमज़ोर थी।
आखिरकार जब हम अस्पताल में पहुंचे तो एक युवा डॉक्टर ने मां को अपनी देखभाल में ले लिया। नोट को पढ़ने के बाद उसने दयालुता से कहा,"ठीक है मिसेज चैप्लिन, आप इधर से आइये।"
मां ने चुपचाप उसकी बात मान ली। लेकिन जब नर्सें उसे ले जाने लगीं तो वह अचानक मुड़ी और दर्द भरी निगारहों से मुझे देखने लगी। उसे पता चल गया था कि वह मुझे छोड़ कर जा रही है।
"मां, मैं कल आऊंगा," मैंने कमज़ोर उत्साह से कहा।
जब वे उसे ले जा रहे थे तो वह पीछे मुड़ मुड कर मेरी तरफ चिंतातुर निगाहों से देख रही थी। जब वह जा चुकी तो डाक्टर ने मुझसे कहा,"अब तुम्हा रा क्या होगा, मेरे नौजवान दोस्त?"
अब तक मैं यतीनखानों के स्कूलों की बहुत रोटियां तोड़ चुका था इसलिए मैंने लापरवाही से जवाब दिया,"मैं अपनी आंटी के यहां रह लूंगा।"
जब मैं अस्पताल से घर की तरफ वापिस लौट रहा था मैं सिर्फ सुन्न कर देने वाली उदासी ही महसूस कर पा रहा था। इसके बावजूद मैं राहत महसूस कर रहा था। क्योंकि मैं जानता था कि अस्पताल में मां की बेहतर देखभाल हो पायेगी बजाये घर के अंधेरे में बैठे रहने के जहां खाने को एक दाना भी नहीं हैं लेकिन जब वे लोग उसे ले जा रहे थे जो जिस तरह से उसने दिल चीर देने वाली निगाह से मुझे देखा था, वह मैं कभी भी भूल नहीं पाऊंगा। मैंने उसके सभी सहन करने के तरीकों के बारे में सोचा, उसकी चाल के बारे में सोचा, उसके दुलार और उसके प्यार के बारे में सोचा, और मैंने उस कृष काया के बारे में सोचा जो थकी हारी नीचे आती थी और अपने ही ख्यालों में खोयी रहती थी और मुझे अपनी तरफ लपकते हुए आते देखते ही जिसके चेहरे पर रौनक आ जाती थी। किस तरह से वह एकदम बदल जाती थी और जब मैं उसके लिफाफे की तलाशी लेने लगता था जिसमें वह मेरे और सिडनी के लिए अच्छी अच्छी च़ाजें लाती थी तो उसके चेहरे के भाव कितने अच्छे हो जाते थे और वह मुस्कुराने लगती थी। यहां तक कि उस सुबह भी उसने मेरे लिए कैंडी बचा कर रखी थी और जिस वक्त मैं उसकी गोद में रो रहा था, उसने मुझे कैंडी दी थी।
मैं सीधा घर वापिस नहीं गया। मैं जा ही नहीं सका। मैं नेविंगटन बट्स मार्केट की तरफ मुड़ गया और दोपहर ढलने तक दुकानों की खिड़कियों में देखता रहा। जब मैं अपनी परछत्ती पर वापिस लौटा तो वह हद दरजे तक खाली-खाली लग रही थी। एक कुर्सी पर पानी का टब रखा हुआ था। पानी से आधा भरा हुआ। मेरी दो कमीजें और एक बनियान उसमें भिगोने के लिए रखे हुए थे। मैंने तलाशना शुरू किया। घर में खाने को कुछ भी नहीं था। अल्मारी में सिर्फ चाय की पत्ती का आधा भरा पैकेट रखा हुआ था। मेंटलपीस पर मां का पर्स रखा हुआ था जिसमें मुझे तीन पेनी के सिक्के और गिरवी वाली दुकान की कई पर्चियां मिलीं। मेज के कोने पर वही कैंडी रखी हुई थी जो उसने मुझे सुबह दी थी। जब मैं अपने आपको संभाल नहीं पाया और फूट फूट कर रोया।
भावनात्मक रूप से मैं चुक गया था। उस रात मैं गहरी नींद सोया। सुबह मैं जागा तो कमरे का खालीपन भांय भांय कर रहा था। फर्श पर बढ़ती आती सूर्य की किरणें जैसे मां की गैर मौजूदगी का अहसास करवा रही थीं। बाद में मकान मालकिन आयी और बताने लगी कि मैं वहां पर तब तक रह सकता हूं जब तब वह कमरा किराये पर नहीं दे देती और अगर मुझे खाने की ज़रूरत हो तो मुझे कहने भर की देर होगी। मैंने उसका आभार माना और उसे बताया कि जब सिडनी वापिस आयेगा तो उसके सारे कर्जे उतार देगा। लेकिन मैं इतना शरमा रहा था कि खाने के लिए कह ही नहीं पाया।
हालांकि मैंने मां से वायदा किया था कि अगले दिन उससे मिलने जाऊंगा लेकिन मैं नहीं गया। मैं जा ही नहीं पाया। जाने का मतलब उसे और विचलित करना होता। लेकिन मकान मालकिन डॉक्टर से मिली। डॉक्टर ने उसे बताया कि मां को पहले ही केन हिल पागल खाने में ले जाया जा चुका है। इस उदासी भरी खबर ने मेरी आत्मा पर से बोझ हटा दिया क्योंकि केन हिल पागलखाना वहां से बीस मील दूर था और वहां तक जाने का मेरे पास कोई जरिया नहीं था। सिडनी जल्दी ही लौटने वाला था और तब हम दोनों उसे देखने जा पाते। पहले कुछ दिन तक तो मैं न अपने किसी परिचित से मिला और न ही किसी से बात ही की।


मैं सुबह सुबह ही घर से निकल जाता और सारा दिन मारा मारा फिरता। मैं कहीं न कहीं से खाने का जुगाड़ कर ही लेता। इसके अलावा, एक आध बार का खाना गोल कर जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। एक सुबह जब मैं चुपके से सरक कर बाहर जा रहा था तो मकान मालकिन की निगाह मुझ पर पड़ गयी और उसने पूछा कि क्या मैंने नाश्ता किया है।
मैंने सिर हिलाया, वह मुझे अपने साथ ले गयी,"तब चलो मेरे साथ," उसने अपनी भारी आवाज में कहा।
मैं मैक्कार्थी परिवार से दूर दूर ही रहा क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि उन्हें मां के बारे में पता चले। मैं किसी भगोड़े सैनिक की तरह सबकी निगाहों से बचता ही रहा।


मां को गये एक सप्ताह बीत चुका था और मैंने राम भरोसे रहने की आदत डाल ली थी जिस पर न तो अफसोस किया जा सकता था और न ही उसे आनंददायक ही कहा जा सकता था। मेरी सबसे बड़ी चिंता मकान मालकिन थी क्योंकि अगर सिडनी वापिस न आया तो देर सबेर वह मेरे बारे में सुधारगृह वालों को बता ही देगी और मुझे एक बार फिर हैनवेल स्कूल में भेज दिया जायेगा, इसलिए मैं उसके सामने पड़ने से कतरा रहा था और कई बार तो बाहर ही सो जाता।
मैं लकड़ी चीरने वाले कुछ लोगों से जा टकराया जो केनिंगटन रोड के पिछवाड़े की तरफ एक घुड़साल में काम करते थे। ये सड़क छाप से दिखने वाले लोग थे जो एक अंधेरे से भरे दालान में काम करते थे और फुसफुसा कर बातें करते, सारा दिन लकड़ियां चीरते और कुल्हाड़ी से उनकी फांकें तैयार करते। बाद में वे उनके आधी आधी पेनी के बंडल बना देते। मैं उनके खुले दरवाजे के आस पास मंडराता रहता और उन्हें काम करते हुए देखता। उनके पास एक फुट का लकड़ी का गुटका होता। वे उसकी पतली पतली फांकें बनाते और फिर से इन फांकों को तीलियों में बदल डालते। वे इतनी तेजी से लकड़ियां चीरते कि मैं हैरान हो कर देखता ही रह जाता। मुझे उनका ये काम बेहद आकर्षित करता। जल्द ही मैं उनकी मदद करने लगा। वे अपने लिए लकड़ी के लट्ठे इमारतें गिराने वाले ठेकेदारों से लाते और उन्हें ढो कर शेड तक लाते, उनके चट्टे बना कर रखते। इस काम में पूरा एक दिन लग जाता। फिर वे एक दिन लकड़ियां चीरने का काम करते और उससे अगले दिन उसकी तीलियां बनाते। शुक्रवार और शनिवार वे जलावन की लकड़ियां बेचने के लिए निकलते लेकिन बेचने के काम में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। शेड में काम करना कहीं ज्यादा रोमांचक लगता था।
वे लोग तीस और चालीस बरस की उम्र के बीच के शालीन, शांत लोग थे हालांकि वे बरताव बड़ी उम्र के लोगों का करते और लगते भी ज्यादा उम्र के थे। बॉस (जैसा कि हम उसे कहा करते थे) मधुमेह की वजह से लाल नाक वाला था। उसके ऊपर के दांत झड़ गये थे, बस एक ही दांत लटकता रहता लेकिन फिर भी न जाने क्यों उसके चेहरे में अपनेपन का अहसास होता था। अच्छा लगता था वह। वह अजीब तरीके से हँसता जिससे उसका इकलौता दांत दिखायी देने लगता। जब चाय के लिए एक और कप की ज़रूरत होती तो वह दूध का टिन उठाता, उसे धोता, पोंछता और कहता,"क्या ख्याल है इसके बारे में?"
दूसरा आदमी हालांकि सहमत लगता, शांत, सूजे से चेहरे वाला, मोटे होंठों वाला, व्यक्ति था। वह बहुत धीरे धीरे बोलता, एक बजे के करीब बॉस मेरी तरफ देखता,"ऐय क्या तुमने कभी चीज़ की पपड़ी से बना अधपके मांस का स्वाद लिया है?"
"हमने इसे कई बार खाया है," मैं जवाब देता।
तब ठहाके लगाते हुए और खींसे निपोरते हुए वह मुझे दो पेंस देता और मैं ऐश की राशन की दुकान पर जाता, ये कोने पर चाय की दुकान थी। वह मुझे पसंद करता था और मेरे पैसों पर हमेशा ढेर सारी चीजें दे दिया करता। मैं वहां से एक पेनी की चीज़ की पपड़ी लेता, और एक पेनी की बेड। चीज़ को धो लेने और उसकी पपड़ियां बना लेने के बाद हम उसमें पानी मिलाते, थोड़ा नमक और काली मिर्च डालते, कई बार बॉस उसमें थोड़ी सी सूअर की चर्बी और कतरे हुए प्याज भी छोड़ देता और ये सारी चीजें मिल कर चाय के कैन के साथ बहुत ही पेट भर कर खाने वाला मामला हो जाता।
हालांकि मैं कभी पैसों के लिए पूछता नहीं था, हफ्ता बीतने पर बॉस ने मुझे छ: पेंस दिये। ये मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। जो, जिसका चेहरा फूला हुआ था, को मिर्गी के दौरे पड़ते। तब बॉस उसे होश में लाने के लिए उसकी नाक के नीचे खाकी कागज जला कर उसे सुंघाता। कई बार तो उसके मुंह से झाग निकलने शुरू हो जाते और वह अपनी जीभ काटने लगता। जब वह होश में आता तो बेहद दयनीय और शर्मिंदा लगता।
लकड़हारे सुबह सात बजे से लेकर रात के सात बजे तक काम करते रहते। कई बार उसके बाद भी। जब वे शेड में ताला लगा कर घर की तरफ रवाना होते, मैं हमेशा उदास हो जाया करता। एक दिन बॉस ने तय किया कि वह हम सबको ट्रीट देगा और साउथ म्यूजिक हॉल में दो पेनी की गेलरी सीटों पर शो दिखायेगा। मैं और जो पहले ही हाथ मुंह धो चुके थे और बॉस का इंतजार कर रहे थे। मैं बेहद रोमांचित था क्योंकि उस हफ्ते फ्रेड कार्नो की कॉमेडी अर्ली बर्ड्स (इस कम्पनी में मैं कई बरस बाद शामिल हुआ) चल रहा था। जो घुड़साल की दीवार के सहारे खड़ा हुआ था और मैं उसके सामने उत्साहित और रोमांचित खड़ा हुआ था। तभी अचानक जो ने बहुत तेज आवाज़ में चीख मारी और उसे दौरा पड़ा और वह उसी में दीवार के सहारे ही नीचे गिर गया। जो होना था, वह कुछ ज्यादा ही था। जब जो को होश आया तो बॉस चाहते थे कि वे वहीं रुक कर उसकी देखभाल करें लेकिन जो ने जिद की कि वह एकदम ठीक है और हम दोनों उसके बगैर चले जायें। वह सुबह तक एकदम चंगा हो जायेगा।
स्कूल की धमकी एक ऐसी दानव था जिसने कभी भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। बीच बीच में लकड़ी चीरने वाले मुझसे स्कूल के बारे में सवाल पूछ लेते। जब छुट्टियां खत्म हो गयीं तो वे थोड़े से बेचैने हो गये। अब मैं साढ़े चार बजे तक, यानी स्कूल के छूटने के वक्त तक गलियों में मारा मारा फिरता, लेकिन ये बहुत मुश्किल काम था। बेमतलब गलियों में फिरते रहना और साढ़े चार बजे तक इंतज़ार करना जब मैं अपनी राहत की जगह पर और लकड़ी चीरने वालों के पास लौट सकता।
एक रात जब मैं चुपके से सोने के लिए अपने बिस्तर में सरक रहा था, मकान मालकिन मुझसे मिलने के लिए आयी। वह बेचारी मेरी राह देखती बैठी थी। वह बहुत उत्तेजित थी। उसने मुझे एक तार थमाया जिस पर लिखा था,"कल सुबह दस बजे वाटरलू स्टेशन पर पहुंचूंगा। प्यार, सिडनी।
जिस वक्त मैं उससे स्टेशन पर मिला तो मेरी हालत वाकई खराब थी। मेरे कपड़े गंदे और फटे हुए थे और मेरी कैप में से धागे इस तरह से लटके हुए थे मानो किसी लड़की के स्कर्ट के नीचे झालरें लटकती नज़र आती हैं। मैंने लकड़ी चीरने वालों के यहां ही मुंह धो लिया था और इस तरह से मैं तीसरी मंज़िल तक दो डोल पानी के भर कर ले जाने और मकान मालकिन की रसोई के आगे से गुज़रने की जहमत उठाने से बच गया था। जब मैं सिडनी से मिला तो मेरे कानों और गर्दन के आस पास रात की गंदगी और मैल की परत दिखायी दे रही थी।
मेरी तरफ देखते हुए सिडनी ने पूछा,"क्या हुआ है?"
मैंने सीधे ही खबर नहीं दी। थोड़ा वक्त लिया,"मां पागल हो गयी है और हमें उसे अस्पताल भेजना पड़ा।"
उसका चेहरा चिंता से घिर गया लेकिन उसने अपने आप पर काबू पा लिया,"तो तुम कहां रह रहे हो इस वक्त?"
"वहीं पाउनाल टैरेस"
वह अपना सामान देखने के लिए मुड़ा। उसने एक हाथ गाड़ी का आर्डर दिया और जब कुलियों ने उस पर उसके सामान के चट्टे लगाये तो सबसे ऊपर केलों की एक गेल भी थी।
"ये हमारे हैं क्या?" मैं बेसब्री से पूछा।
उसने सिर हिलाया,"अभी ये कच्चे हैं। इनके तैयार होने में हमें एकाध दिन का इंतज़ार करना पड़ेगा।"
घर आते समय रास्ते में उसने मां के बारे में सवाल पूछने शुरू कर दिये। मैं इतने उत्साह में था कि सारी बातें सिलसिलेवार बता ही नहीं पाया लेकिन उसे सारे सूत्र मिल गये थे। तब उसने बताया कि वह बीमार हो गया था और उसे केप टाउन में उतार कर अस्पताल में ही छोड़ दिया गया था। और कि वापसी की यात्रा में उसने बीस पाउंड कमा लिये थे। ये पैसे वह मां को दे कर जाना चाहता था। उसने ये पैसे सैनिकों के लिए जूए और लाटरी के इंतजाम करके कमाये थे।
उसने मुझे अपनी योजनाओं के बारे में बताया। वह अब अपनी समुद्री यात्राएं छोड़ देने का इरादा रखता था और अभिनेता बनना चाहता था। उसने बताया कि ये पैसे हमारे लिए बीस हफ्तों के लिए काफी होंगे और तब तक उसे थियेटर में कोई न कोई काम मिल ही जायेगा।
जब हम टैक्सी में केलों की गेल के साथ घर पहुंचे तो पड़ोसियों और मकान मालकिन पर इसका बहुत अच्छा असर पड़ा। मकान मालकिन ने सिडनी को मां के बारे में बताया लेकिन सारे डरावने ब्यौरे नहीं बताये।
उसी दिन सिडनी शॉपिंग के लिए गया और मेरे लिए नये कपड़े खरीदे। और उसी रात पूरी सज धज के साथ हम दोनों साउथ म्यूजिकल हॉल के स्टाल में जा पहुंचे। नाटक के दौरान सिडनी लगातार कहता रहा,"जरा सोचो तो, मां के लिए इस सब का क्या मतलब होता।"
उसी हफ्ते हम मां को देखने के लिए केन हिल गये। जिस वक्त हम विजिटिंग रूम में बैठे हुए थे, वहां बैठ कर इंतज़ार करना बहुत कठिन काम लग रहा था। मुझे याद है कि चाभी घूमने की आवाज़ आयी थी और मां चल कर आ रही थी। वह पीली नज़र आ रही थी। उसके होंठ नीले पड़ गये थे। हालांकि उसने हमें पहचान लिया था, उसमें उत्साह नहीं था और उसकी पुरानी जीवन शक्ति जा चुकी थी। उसके साथ एक नर्स आयी थी। बातूनी और भली महिला। वह खड़ी हो कर बात करना चाह रही थी। कहने लगी,"आप लोग बहुत ही गलत वक्त पर आये हैं। आज आपकी मां की हालत बहुत अच्छी नहीं है। नहीं क्या?" उसने मां की तरफ देखा।
मां विनम्रता से मुसकुरायी मानो उसके जाने की राह देख रही हो।
नर्स ने आगे कहा,"अगली बार जब मां की हालत अच्छी हो तुम लोग ज़रूर आना।"
आखिरकार वह चली गयी और हमें अकेला छोड़ दिया गया। हालांकि सिडनी ने मां का मूड बेहतर करने की कोशिश की और उसे अपनी किस्म।त के चमकने और पैसा कमाने और इतने अरसे तक बाहर रहने के बारे में किस्से बताता रहा, वह बैठी सिर्फ सुनती रही और सिर हिलाती रही। वह अपने ही ख्यालों में गुम लग रही थी। मैंने मां को बताया कि वह जल्दी ही चंगी हो जायेगी। "हां बेशक," मां ने मायूसी से कहा,"काश उस दोपहर तुमने मुझे एक कप चाय दे दी होती तो मैं एकदम ठीक हो जाती।"
बाद में डॉक्टर ने सिडनी को बताया कि कम खुराक मिलने की वजह से मां के दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ा है और उसे ठीक ठाक इलाज की ज़रूरत है और कि हालांकि उसे बीच बीच में बातें याद आती हैं, पूरी तरह से ठीक होने मे उसे कई महीने लगेंगे।
लेकिन मैं कई दिन तक मां के इस जुमले से मुक्त नहीं हो सका कि "काश उस दोपहर तुमने मुझे एक कप चाय दे दी होती तो मैं एकदम ठीक हो जाती।"

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