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आत्मकथा

मेरी आत्मकथा
चार्ली चैप्लिन

अनुवाद - सूरज प्रकाश


जोसफ कॉनराड ने इस बारे में अपने एक दोस्त को लिखा था कि ज़िंदगी ने उन्हें एक कोने में दुबके उस अंधे चूहे में बदल डाला था जिसे बस, दबोचा जाने वाला हो। ऐसी उपमा से हम लोगों की दयनीय ज़िंदगी को बयान किया जा सकता था। इसके बावजूद हम में से कुछ लोगों की किस्मत अच्छी रही और ऐसे भाग्यशाली लोगो में से मैं भी था।
मैंने बहुत धंधे किये। मैंने अखबार बेचे, प्रिंटर का काम किया, खिलौने बनाए, ग्लास ब्लोअर का काम किया, डॉक्टर के यहाँ काम किया लेकिन इन तरह-तरह के धंधों को करते हुए मैंने सिडनी की तरह इस लक्ष्य से कभी भी निगाह नहीं हटायी कि मुझे अंतत: अभिनेता बनना है, इसलिए अलग-अलग कामों के बीच अपने जूते चमकाता, अपने कपड़ों पर ब्रश फेरता, साफ कॉलर लगाता और स्ट्रैंड के पास बेडफोर्ड स्ट्रीट में ब्लैक मोर थिएटर एजेन्सी में बीच-बीच में चक्कर काटता। मैं तब तक वहाँ चक्कर लगाता रहा जब तक मेरे कपड़ों की हालत ने मुझे वहाँ और जाने से बिलकुल ही रोक नहीं दिया।
जब मैं वहाँ पहली बार गया तो वहाँ पर शानदार कपड़े पहने हुए अभिनेता-अभिनेत्री घेरा बनाए खड़े थे और लम्बी-लम्बी हांक रहे थे।
मैं डर से काँपते हुए दरवाजे के पास, दूर के एक कोने में खड़ा हो गया। मैं हद दर्जे का शर्मीला लड़का था और अपने चिथड़े हो गये सूट और पंजों से फटे जूतों को छुपाने की भरसक कोशिश कर रहा था। अचानक ही भीतर से एक युवा क्लर्क लपकता हुआ बाहर आता, हाय तौबा मचाता और वहाँ जुटे अभिनेताओं को सम्बोधित करते हुए ज़ोर से चिल्लाता,"तुम, तुम, और तुम, तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है।" और ऑफिस गिरजाघर की तरह खाली हो जाता। एक मौके पर मैं अकेला ही वहां खड़ा रह गया था।
जब क्लर्क ने मुझे देखा तो अचानक रुक गया,"क्या चाहिए तुम्हें?"
मुझे लगा, मैं ओलिवर ट्विस्ट की तरह कुछ और मांग रहा होऊं,"क्या आपके पास बच्चों के लिए कोई भूमिका है?"
"क्या तुमने अपना नाम रजिस्टर करवा लिया है?" मैंने सिर हिलाया।
मेरी हैरानी का ठिकाना न रहा जब वह मुझे बगल वाले ऑफिस के भीतर ले गया, मेरा नाम, पता और दूसरे ब्यौरे दर्ज किये और मुझे बताया कि जब भी मेरे लायक कोई काम होगा मुझे खबर कर देगा।
मैं बहुत खुश, इस अहसास के साथ वापिस लौटा कि मैंने अपना कर्त्तव्य निभा दिया है। हालांकि मैं अभी भी मान रहा था कि इसका कोई नतीजा नहीं निकला।
और अब, सिडनी के लौटने के एक महीने के बाद मुझे एक पोस्ट कार्ड मिला। इस पर लिखा था,"क्या आप ब्लैकमोर एजेन्सी, बेडफोर्ड स्ट्रीट, स्ट्रैंड में आयेंगे?"
मैं अपने नये सूट में मिस्टर ब्लैकमोर के ही सामने ले जाया गया। वे मुस्कुरा रहे थे और बहुत प्यार से मिले। मैं यह मानकर चल रहा था कि वे सर्वशक्तिमान होंगे और बारीकी से जांच पड़ताल करेंगे लेकिन वे बहुत ही विनम्र थे और उन्होंने मुझे एक पर्ची दी कि मैं चार्ल्स फ्राहमॅन के कार्यालय में मिस्टर सी ई हैमिल्टन को जाकर दे दूं।
मिस्टर हैमिल्टन ने पर्ची पढ़ी और यह जानकर बहुत खुश और हैरान हुए कि मैं कितना छोटा-सा हूं। दरअसल मैंने अपनी उम्र के बारे में झूठ बोला था कि मैं चौदह बरस का हूं जब कि मेरी उम्र साढ़े बारह बरस की थी। उन्होंने समझाया कि मुझे शारलॉक होम्स में बिली, पेजबॉय की भूमिका करनी है और शरद ऋतु से शुरू होने वाले दौरे में चालीस सप्ताह तक काम करना है।
"इस बीच," मिस्टर हैमिल्टन ने आगे कहा,"एक नये नाटक, जिम, द रोमांस ऑफ अ कॉक्नी" में एक अच्छे लड़के की बहुत ही शानदार भूमिका है। इसे मिस्टर सेंट्सबरी ने लिखा है। ये वही शख्स हैं जो आगामी दौरे में शारलॉक होम्स में प्रमुख भूमिका निभाने जा रहे हैं। जिम नाटक `होम्स' के दौरे से पहले आजमाइश के तौर पर किंग्स्टन में खेला जायेगा। मेरा वेतन दो पाउंड दस शिलिंग प्रति सप्ताह रहेगा और मुझे शारलॉक होम्स के लिए भी इतना ही वेतन मिलेगा।
हालांकि यह राशि मेरे लिए छप्पर फाड़ लॉटरी खुलने जैसी थी फिर भी मैंने यह बात अपने चेहरे पर नहीं झलकने दी। मैंने निम्रता से कहा,"शर्तों के बारे में मैं अपने भाई से सलाह लेना चाहूंगा।"
मिस्टर हैमिल्टर हंसे और लगा कि वे बहुत खुश हुए हैं। इसके बाद उन्होंने सारे ऑफिस को इकट्ठा कर लिया और मेंरी तरफ इशारा करते हुए बोले,"ये हमारा बिली है। क्या ख्याल है इसके बारे में?"
हर कोई बहुत खुश हुआ और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया। क्या हो गया था? ऐसा लगा मानो पूरी दुनिया ही अचानक बदल गयी हो, दुनिया ने मुझे प्यार से अपने सीने से लगा लिया हो और मुझे अपना लिया हो। तब मिस्टर हैमिल्टन ने मुझे सेंट्सबरी के लिए एक पर्ची दी। उनके बारे में बताया कि वे लीसेस्टर स्क्वायर में ग्रीन रूम क्लब में मिलेंगे। और मैं वहाँ से वापिस लौटा, बादलों पर सवार।
ग्रीन रूम क्लब में भी वही बात हुई। मिस्टर सेंट्सबरी ने अपने स्टाफ सदस्यों को मुझे देखने के लिए बुलवाया। वहाँ पर उसी समय मुझे यह कहते हुए सामी की भूमिका थमा दी गई कि उनके नाटक में यह एक महत्त्वपूर्ण चरित्र है। मैं डर के मारे थोड़ा नर्वस था कि कहीं वे उसी समय मुझसे अपना पाठ पढ़ने के लिए न कह दें क्योंकि मैं बिल्कुल भी पढ़ना नहीं जानता था और मैं परेशानी में पड़ जाता। सौभाग्य से उन्होंने मुझे मेरे संवाद घर ले जाने के लिए दे दिए कि मैं फुरसत से उन्हें पढ़ूं क्योंकि वे अगले हफ्ते से पहले रिहर्सल शुरू करने वाले नहीं थे।
मैं खुशी के मारे पागल होता हुआ बस में घर पहुंचा और पूरी शिद्दत से यह महसूस करने लगा कि मेरे साथ क्या हो गया है। मैंने अचानक ही गरीबी की अपनी ज़िंदगी पीछे छोड़ दी थी और अपना बहुत पुराना सपना पूरा करने जा रहा था। ये सपना जिसके बारे में अक्सर मां ने बातें की थीं और उसे मैं पूरा करने जा रहा था। अब मैं अभिनेता होने जा रहा था। ये सब इतना अचानक और अप्रत्याशित रूप से होने जा रहा था। मैं अपनी भूमिका के पन्नों को सहलाता रहा। इस पर नया खाकी लिफाफा था। यह मेरी अब तक की ज़िंदगी का सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज था। बस की यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि मैंने एक बहुत बड़ा किला फतह कर लिया है। अब मैं झोपड़ पट्टी में रहने वाला नामालूम सा छोकरा नहीं था। अब मैं थिएटर का एक खास आदमी होने जा रहा था। मेरा मन किया कि मैं रो पडूं।
जब मैंने सिडनी को बताया कि क्या हो गया है तो उसकी आंखें भर आयीं। वह बिस्तर पर पालथी मारकर बैठ गया और खिड़की से बाहर देखने लगा। वह हिल रहा था। और तब अपना सिर हिलाते हुए उसने गहरी उदासी से कहा,"ये हमारी ज़िंदगी का निर्णायक मोड़ है। काश, आज हमारी माँ यह खुशी बांटने के लिए हमारे साथ होती।"
मैंने उत्साहपूर्वक कहा,"जरा सोचो तो, चालीस सप्ताह तक दो पाउंड और दस शिलिंग। मैंने तो मिस्टर हैमिल्टन से कह दिया है कि तुम्हीं मेरे कारोबारी मामले सम्भालते हो।" इसलिए मैं बेताबी से बोला,"हो सकता है, हमें कुछ ज्यादा भी मिल जाएं। खैर, हम हर वर्ष साठ पाउंड बचा सकते हैं।"
हमने अपने उत्साह के चलते यह गणना भी कर ली और तर्क भी गढ़ लिया कि इतनी बड़ी भूमिका के लिए दो पाउंड और दस शिलिंग की राशि बहुत कम है। सिडनी ने यहाँ तक सोच डाला कि वह जाकर पैसे बढ़वाने की बात करेगा। मैंने कहा कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन हैमिल्टन अड़ गये।
"हम अधिकतम दो पाउंड दस शिलिंग ही दे सकते हैं।" वे बोले। हम इसे पाकर ही खुश थे।


सिडनी ने मुझे मेरी भूमिका पढ़कर सुनाई और मुझे अपनी पंक्तियां याद करने में मेरी मदद की। यह काफी बड़ी भूमिका थी और लगभग पैंतीस पन्नों में लिखी हुई थी। इसे मैंने तीन दिन में ही मुंह ज़बानी याद कर लिया था।
`जिम' की रिहर्सलें ड्ररी लेन थिएटर की ऊपर वाली मंज़िल में हुईं। सिडनी ने मुझे इतने उत्साह के साथ ट्रेनिंग दी थी कि मुझे एक-एक शब्द याद हो गया था। बस, एक शब्द मुझे परेशान कर रहा था। लाइन कुछ इस तरह से थी, "आप अपने आप को समझते क्या हैं मिस्टर पियरपाँट मोरगन?" और मैं कह बैठता,"पुटरपिंट मोरगन।" मिस्टर सेंट्सबरी ने मुझे ये शब्द ज्यों के त्यों रखने दिये। ये शुरुआती रिहर्सलें आँखें खोलने वाली थीं। इन्होंने मेरे सामने तकनीकों की एक नयी दुनिया खोल कर रख दी। मुझे इस बात की कत्तई जानकारी नहीं थी कि स्टेज क्राफ्ट, टायमिंग, विराम, मुड़ने के लिए संकेत, बैठने के लिए संकेत जैसी कई बातें भी होती हैं। लेकिन ये सारी चीज़ें मुझे स्वाभाविक रूप से आ गयीं। बस, मेरी एक ही खामी को मिस्टर सेंट्सबरी ने ठीक किया - बोलते समय मैं सिर बहुत हिलाता था और सांस बहुत रोकता था।
कुछ दृश्यों की रिहर्सल कर लेने के बाद वे हैरान रह गये और मुझसे पूछने लगे कि क्या मैंने पहले कभी अभिनय किया है। कितना संतोषजनक था सेंट्सबरी साहब को और नाटक दूसरे अभिनेताओं को खुश करना! अलबत्ता, मैंने उनका उत्साह इस तरह से स्वीकार किया मानो यह मेरा स्वाभाविक जन्मसिद्ध अधिकार हो।
जिम को किंग्स्टन थिएटर में पहले हफ्ते में और फुलहाम थिएटर में दूसरे हफ्ते में आजमाइश के तौर पर के रूप में खेला जाना था। यह हैनरी ऑर्थर जोन्स के सिल्वर किंग पर आधारित एक मैलोड्रामा था। इसकी कहानी कुछ इस तरह से थी कि एक अभिजात्य व्यक्ति अनिद्रा रोग से पीड़ित है और एक दिन अपने आपको फल बेचने वाली एक युवा लड़की और अखबार बेचने वाले एक लड़के के साथ एक दुछत्ती में रहते हुए पाता है। लड़के सामी की भूमिका मैंने निभानी थी। नैतिक रूप से सब ठीक-ठाक था। लड़की दुछत्ती में एक अलमारी में सोती थी और ड्यूक, उसको हम यही कर पुकारते थे, खाट पर आराम से सोता था और मैं फर्श पर सोता था।
पहले अंक का दृश्य 7 ए डेवरयू कोर्ट, द टेंपल का था। यह एक अमीर वकील जेम्स सीटन गेटलॉक का चेंबर था। बरबाद ड्यूक अपने विरोधी वकील के पास जाता है और अपना भला करने वाली फूल बेचने वाली लड़की, जो बीमार है, की मदद करने के लिए हाथ फैलाता है। इस लड़की ने अनिद्रा के उसके रोग में उसकी मदद की थी।
नोक झोंक में विलेन ड्यूक से कहता है,"दफा हो जाओ। जाओ और भूखे मरो। तुम और तुम्हारी ये रखैल।"
ड्यूक हालांकि कमजोर और मरियल सा है, मेज से कागज़ काटने वाला चाकू उठा लेता है मानो वह विलेन पर हमला कर रहा हो, लेकिन इस तरह से चाकू मेज पर गिरा देता है जैसे उसे मिर्गी का दौरा पड़ा हो और वह विलेन के पैरों के पास बेहोश हो कर गिर जाता है। इस मोड़ पर आकर विलेन की भूतपूर्व पत्नी, जिससे कभी यह पस्त ड्यूक प्रेम किया करता था, कमरे के भीतर आती है। वह भी यह कहते हुए पस्त ड्यूक के लिए हाथ जोड़ती है,"उसकी मेरे साथ नहीं बनी। वह अदालतों में भी कुछ नहीं कर पाया। कम से कम तुम तो उसकी मदद कर सकते हो।"
लेकिन विलेन मना कर देता है। दृश्य चरम उत्तेजना तक जा पहुंचता है। विलेन अपनी भूतपूर्व पत्नी पर निष्ठावान न रहने का आरोप लगाता है और उसे भी छोड़ देता है। सनक में आकर वह कागज़ काटने वाला चाकू उठा लेती है जो पस्त ड्यूक के हाथ से गिरा था और विलेन को मार देती है। विलेन अपनी आराम कुर्सी में गिर कर मर जाता है जबकि ड्यूक अभी भी उसके पैरों के पास बेहोश पड़ा हुआ है। महिला दृश्य से गायब हो जाती है और ड्यूक को जब होश आता है तो वह अपने विरोधी को मरा हुआ पाता है। वह कहता है,"हे भगवान, ये मैंने क्या कर डाला।"
और इस तरह से नाटक चलता रहता है। वह मृतक की जेबों की तलाशी लेता है और उसे एक पर्स मिलता है जिसमें कई पाउंड, हीरे की अंगूठी और आभूषण मिलते हैं। वह ये सारी चीज़ें अपनी जेब के हवाले करता है और जब वह खिड़की रास्ते बाहर निकल रहा है तो मुड़ कर कहता है,"गुड बाय गैटलॉक, आखिर तुमने मेरी मदद कर ही दी।" और परदा गिरता है।
दूसरा दृश्य उस दुछत्ती का था जहाँ ड्यूक रहता था। जब दृश्य खुलता है तो एक अकेला जासूस अलमारी के अंदर तांक-झाँक कर रहा है। मैं सीटी बजाते हुए आता हूँ और जासूस को देखकर रुक जाता हूँ।

अखबारवाला लड़का - अरे आप, क्या आपको नहीं पता कि ये एक महिला का बेडरूम है?
जासूस - क्या? ये अलमारी? जरा इधर तो आना
लड़का - बदतमीज, ढीठ कहीं के!
जासूस - तुमने ये दिखाया। इधर आओ और दरवाजा बंद कर दो।
लड़का - (उसकी तरफ जाते हुए) जरा आराम से। समझे नहीं क्या? उनके अपने ड्राइंग रूम में भोंदुओं के आमंत्रण?
जासूस - मैं एक जासूस हूँ।
लड़का - अरे पुलिस वाला ...तब तो हो गई मेरी छुट्टी।
जासूस - मैं तुम्हें कोई नुक्सा न नहीं पहुंचाऊंगा। मैं तो थोड़ी-जानकारी चाहता हूँ जिससे किसी गरीब की मदद हो जाए।
लड़का - किसी की मदद? यदि यहाँ किसी का भला होता है तो वह कम से कम किसी पुलिस वाले के हाथों तो नहीं ही होगा।
जासूस - ज्यादा मूरख मत बनो। क्या मैंने तुझसे ये कहा है कि मैं कभी फौज में था।
लड़का - बिना किसी बात के शुक्रिया। मैं आपके जूते देख सकता हूँ।
जासूस - यहाँ कौन रहता है?
लड़का - ड्यूक
जासूस - वो तो ठीक है, लेकिन उसका असली नाम क्या है?
लड़का - मुझे नहीं पता। लेकिन वह इसी नाम से जाना जाता है। वैसे आप मुझे इस बात के लिए मार भी सकते हैं कि मुझे इसका मतलब नहीं मालूम।
जासूस - और वो देखने में कैसा लगता है?
लड़का - कागज की तरह पतला, सफेद बाल, दाढ़ी सफाचट, टॉपहैट और एक आँख वाला चश्मा पहनता है। और हां!! वह आपको उसी चश्मे से देखता है।
जासूस - और जिम, - ये कौन है?
लड़का - वह आदमी? आपका मतलब लड़की?
जासूस - तो यह वही लड़की है जो -
लड़का - (उसे टोकते हुए) जो अलमारी में सोती है। यहाँ ये कमरा हमारा है, मेरा और ड्यूक का वगैरह। वगैरह ...

और भी बहुत कुछ था मेरी भूमिका में और मेरा यकीन मानिये, दर्शकों को इसमें बहुत मज़ा आया। मेरा ख्याल है इसका कारण यह रहा होगा कि मैं अपनी उम्र से बहुत छोटा दिखता था। मैं जो भी लाइन बोलता, उस पर ठहाके लगते। सिर्फ मंच पर किए जाने वाले काम मुझे परेशान करते। स्टेज पर सचमुच की चाय बनाना। मैं हमेशा भ्रम में पड़ जाता कि पहले पॉट में गरम पानी डालना है या चाय की पत्ती। इसकी तुलना में स्टेज पर कुछ भी काम करने के बजाय लाइनें बोलना हमेशा आसान होता।
जिम नाटक सफल नहीं रहा था। समीक्षकों ने उस नाटक पर बहुत बेदर्दी से कलम चलायी। इसके बावजूद मेरा ज़िक्र अनुकूल ढंग से किया गया। एक समीक्षा जो मुझे हमारी ही कम्पनी के मिस्टर चार्ल्स रॉक ने दिखायी थी, बहुत ही अच्छी थी। वे एक पुराने एडाल्फी अभिनेता थे और उनका बहुत नाम था। और मैंने अपने अधिकतर दृश्य उनके साथ ही किये थे। "...नौजवान," उन्होंने गंभीरता से कहा था," जब तुम ये सब पढ़ो तो ये चीज़ें तुम्हारे दिमाग पर सवार नहीं हो जानी चाहिये।" और विनम्रता और सौम्यता पर मुझे भाषण पिलाने के बाद लंदन ट्रापिकल टाइम्स में से मुझे ये समीक्षा पढ़ कर सुनायी। मुझे समीक्षा का एक-एक शब्द याद है।
नाटक के बारे में हिकारत से लिखने के बाद अखबार ने लिखा: "लेकिन एक आशा जगाने वाली बात भी है। सामी की भूमिका, अखबार बेचने वाला छोकरा, लंदन की गलियों का एक स्मार्ट अरब, जिसने काफी हद तक का नाटक में हास्य की कमी पूरी की है। बेशक ये भूमिका घिसी-पिटी और पुराने ढब की है फिर भी, मास्टर चार्ली चैप्लिन ने सामी के रोल को काफी हद तक रोचक बना दिया है। एक शानदार और मेहनती बाल कलाकार, मैंने हालांकि इस बच्चे के बारे में पहले कभी पहले नहीं सुना है फिर भी हमें निकट भविष्य में इस बच्चे के बारे में बहुत कुछ बेहतर सुनने को मिलेगा, मुझे ऐसी उम्मीद है।" सिडनी ने इसकी एक दर्जन प्रतियां खरीद लीं।
`जिम' के दो सप्ताह तक चलने के बाद हमने शरलॉक होम्स का पूर्वाभ्यास शुरू किया। इस वक्त के दौरान सिडनी और मैं अभी भी पाउनॉल टैरेस पर ही रह रहे थे। इसका कारण यह था कि आर्थिक रूप में अभी भी हम अपने पैरा तले की ज़मीन के बारे में बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं थे।
पूर्वाभ्यास के दौरान सिडनी और मैं मां से मिलने के लिए केन हिल गये। पहले तो नर्सों ने हमें यही बताया कि हम मां से नहीं मिल पायेंगे क्योंकि मां की तबीयत ठीक नहीं है। फिर वे सिडनी को एक तरफ ले गयीं और उससे फुसफुसा कर बात करने लगीं, लेकिन मैंने सिडनी की बात सुन ली थी,"नहीं, मुझे नहीं लगता वह देख पायेगा।" तब वह मेरी तरफ मुड़ कर उदासी से बोला था,"तुम मां को पागलखाने में नहीं देखना चाहोगे?"
"नहीं नहीं, मैं ये बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा।" मैंने तड़प कर कहा।
लेकिन सिडनी मां से मिला और मां ने उसे पहचान लिया और वह सचेत हो गयी। कुछ ही पलों के बाद नर्स ने आ कर मुझे बताया कि अब मां बेहतर है और क्या मैं उसे देखना चाहूंगा। तब हम दोनों पागलखाने वाले कमरे में गये और वहाँ जा कर बैठ गये। इससे पहले कि हम जाते, वह मुझे एक तरफ ले कर गयी और मेरे कान में फुसफुसायी,"हिम्मत मत हारना, नहीं तो वे लोग तुम्हें यहीं रख सकते हैं।" मां फिर से अपनी सेहत वापिस पाने से पहले पूरे अट्ठारह महीने केन हिल में रही। मैं जब दौरे पर था तो सिडनी नियमित रूप से जा कर उससे मिलता रहा।


मिस्टर एच ए सेंट्सबरी जो टूर पर होम्स का पार्ट कर रहे थे, स्ट्रैंड मैग्जीन में छपने वाले चित्रों की हू ब हू प्रतिकृति थे। उनका लम्बोतरा संवेदनशील चेहरा था, और माथे पर प्रेरणा देते से भाव थे। जितने भी कलाकार होम्स की भूमिका अदा किया करते थे, उनमें से सेंट्सबरी को बेहतरीन समझा जाता था। उन्हें विलियम गिलेट, मूल होम्स और नाटक के लेखक से भी अच्छा माना जाता था।
मेरे पहले टूर के दौरान मैनेजमेंट ने तय किया कि मैं मिस्टर और मिसेज ग्रीन के साथ रहूं। मिस्टर ग्रीन हमारी कम्पनी के बढ़ई थे और मिसेज ग्रीन वार्डरोब संभालती थीं। ये व्यवस्था बहुत शानदान नहीं कही जा सकती थी। ऊपर से मिस्टर और मिसेज ग्रीन कभी-कभार पीते-वीते थे। इसके अलावा, मै अक्सर उसी वक्त खाना नहीं खाता था जब वे खाया करते। जो वे खाया करते वह मैं नहीं खाता। मुझे यकीन है, मेरा ग्रीन दम्पत्ति के साथ रहना मेरे लिये उतना तकलीफदेह नहीं था, जितना उनके लिए था। इसलिए तीन हफ्ते तक एक साथ रहने के बाद हमने आपसी रज़ामंदी से अलग होने का फैसला कर लिया। और चूंकि मैं इतना छोटा था कि किसी और कलाकार के साथ नहीं रह सकता था, मैं अकेला ही रहने लगा। मैं अजनबी शहरों में अकेले रहता, पिछवाड़े के कमरों में अकेले रहता, और शाम के शो के वक्त से पहले शायद ही किसी साथी कलाकार से मिलता-जुलता। जब मैं अपने आप से बात करता तो मुझे सिर्फ अपनी ही आवाज़ सुनायी देती। अक्सर मैं सैलूनों में चला जाता जहाँ हमारी कम्पनी के साथी इकट्ठे होते। और उन्हें बिलियर्ड्स खेलते देखता। लेकिन मैं हमेशा पाता कि मेरी मौजूदगी से उनकी बातचीत में बाधा ही आ खड़ी होती है और वे इस बात को मुझे जतलाने में कोई शर्म भी महसूस न करते। इसलिए उनकी किसी ऐसी-वैसी बात पर मुस्कुरा भी दूँ तो उनकी भौंहे तन जाती थीं।
मैं अकेला होता चला गया। रविवारों की रात को उत्तरी शहरों में पहुंचना, अंधियारी मुख्य गली में से गुजरते हुए गिरजा घर की घंटियों की उदास टुनटुनाहट सुनना। ये सारी बातें मेरे अकेलेपन में कुछ भी न जोड़ पाती। सप्ताह के अंत की छुट्टियों के दिनों में मैं स्थानीय बाजार खंगालता, और अपनी खरीदारी करता, राशन-पानी खरीदता, मांस खरीदता जिसे मकान मालकिन पका कर दे देती। कई बार मुझे खाने और रहने की सुविधा मिल जाती और मैं तब रसोई में बैठ कर परिवार के साथ ही खाता। मुझे वह व्यवस्था अच्छी लगती क्योंकि उत्तरी इंगलैंड के रसोईघर साफ-सुथरे और भरे पूरे होते, वहां पॉलिश किए हुए फायरग्रेट होते और नीली भट्टियाँ होतीं। मकान मालकिन का ब्रेड सेंकना, और ठंडे अंधियारे दिन में से निकल कर लंकाशायर रसोई की जलती आग की लाल लौ के दायरे में आना हमेशा अच्छा लगता। वहाँ बिना सिंकी डबलरोटियों के डिब्बे भट्टी के आस-पास पार बिखरे होते, तब परिवार के साथ चाय के लिए बैठना, भट्टी से अभी-अभी निकली गरमा-गरम डबलरोटी की सोंधी-सोंधी महक, उस पर लगाया गया ताज़ा मक्खन...मैं गंभीर महानता ओढ़े इनका आनंद उठाता।
मैं प्रदेशों में छह महीने तक रहा। इस बीच सिडनी को थियेटर में ही काम तलाशने में बहुत कम सफलता मिली थी इसलिए अब वह कलाकार बनने की अपनी महत्त्वाकांक्षा को त्याग कर स्ट्रैंड में कोल होल में एक बार में काम के लिए आवेदन करने पर मजबूर हो गया। एक सौ पचास आवेदकों में से यह नौकरी उसे मिली थी। लेकिन मानो एक तरह से यह उसका पहले की स्थिति से पतन था।
वह मुझे नियमित रूप से लिखा करता और मां के बारे में मुझे समाचार देता रहता। लेकिन मैं शायद ही उसके खतों के जवाब देता। इसका एक कारण था कि मुझसे वर्तनी की गलतियाँ बहुत होतीं। उसके एक खत ने तो मुझे इतनी गहराई से छुआ और इसकी वजह से मैं उसके और नजदीक आ गया। उसने मुझे उसके खतों का जवाब न देने के कारण फटकार लगायी और याद दिलाया था कि हम कैसे-कैसे दिन एक साथ देख कर यहाँ तक पहुँचे हैं और इस बात से हमें कम से कम एक दूसरों के और करीब होना चाहिए।
सिडनी ने लिखा,".. मां की बीमारी के बाद हम दोनों के पास एक दूसरे के अलावा और कौन बचे हैं। तुम नियमित रूप से लिखा करो और मुझे बताओ कि मेरा एक भाई भी है।"
उसका पत्र इतना अधिक भावपूर्ण था कि मैंने तुरंत ही उसका जवाब दे दिया। अब मैं सिडनी को दूसरे ही आलोक में देख रहा था। उसके पत्र ने भ्रातृत्व के प्यार का ऐसा अटूट बंधन बांधा जो मेरी पूरी ज़िंदगी मेरे साथ बना रहा।
मैं अकेले रहने का आदी हो चुका था। लेकिन मैं बातचीत करने से इतना विमुख होता चला गया कि जब कम्पनी का कोई साथी मुझसे मिलता तो मैं बहुत ज्यादा परेशानी में पड़ जाता। मैं अपने आपको फटाफट इस बात के लिए तैयार ही न कर पाता कि हाजिर जवाबी से, समझदारी से किसी बात का जवाब दे सकूं। लोग-बाग मुझे छोड़ कर चले जाते। मुझे पक्का यकीन है कि मेरी बुद्धि के प्रति घबड़ाकर चिंतातुर हो कर ही मुझसे विदा लेते। अब उदाहरण के लिए, मिस ग्रेटा हॉन को ही लें। वे हमारी प्रमुख अभिनेत्री थीं। खूबसूरत, आकर्षक और दयालुता की साक्षात प्रतिमा, लेकिन जब मैंने उन्हें सड़क पार कर अपनी तरफ आते देखता तो मैं तेजी से मुड़ कर या तो एक दुकान की खिड़की में देखने लगता या उससे मिलने से बचने के लिए किसी दूसरी ही गली में सरक जाता।
मैंने अपने-आप की परवाह करनी छोड़ दी और अपनी आदतों में लापरवाह होता चला गया। जब मैं कम्पनी के साथ यात्रा कर रहा होता तो रेलवे स्टेशन पहुंचने में मुझे हमेशा देर हो जाती। आखिरी पलों में पहुँचता और मेरी हालत अस्त-व्यस्त होती, मैंने कॉलर भी न लगाया होता, और मुझे हमेशा इस बात के लिए फटकार सुननी पड़ती।
मैंने अपने साथ के लिए एक खरगोश खरीद लिया और मैं जहाँ भी रहता, उसे छुपा कर अपने कमरे में ले जाता और मकान मालकिन को इस बात की हवा भी न लग पाती। ये एक छोटा-सा प्यारा-सा जीव था जो बेशक इधर-उधर मुंह नहीं मारता था। इसकी फर इतनी सफेद और साफ थी कि यह बात किसी की ध्यान में भी नहीं आती थी कि इसकी गंध कितनी तीखी हो सकती है। मैं इसे अपने बिस्तर के नीचे एक लकड़ी के पिंजरे में छुपा कर रखता। मकान मालकिन खुशी-खुशी मेरे कमरे में मेरा नाश्ता ले कर आती, तभी उसे इस महक का पता चलता, तब वह कमरे से परेशान और भ्रमित हो कर चली जाती, उसके कमरे से बाहर जाते ही मैं अपने खरगोश को आज़ाद कर देता और वह सारे कमरे में फुदकता फिरता।
बहुत पहले ही मैंने अपने खरगोश को इस बात की ट्रेनिंग दे दी थी कि ज्यों ही वह दरवाजे पर खटखट सुने, पलट कर अपनी पेटी में चला जाये। अगर मकान मालकिन को मेरे इस रहस्य का पता चल भी जाये तो मैं अपने खरगोश को ट्रिक करके दिखाने को कह कर उसका दिल जीत लेता और वह फिर हमें पूरा हफ़्ता रहने के लिए इजाजत दे देती।
लेकिन टोनीपेंडी, वेल्स में, मैंने अपनी ट्रिक दिखायी तो मकान मालकिन रहस्यमय ढंग से मुस्कुरायी लेकिन उसने कोई राय जाहिर नहीं की, लेकिन उस रात जब मैं थियेटर से लौटा तो मेरा प्रिय पालतू खरगोश जा चुका था। जब मैंने उसके बारे में पूछताछ की तो मकान मालकिन ने सिर्फ अपना सिर हिला दिया,"कहीं भाग-वाग गया होगा या उसे ज़रूर किसी ने चुरा लिया होगा।" उसने बड़ी चतुराई से अपने-आप ही समस्या को सुलझा लिया था।
टोनीपेंडी से हम ऐब्बी वेल के खदानों वाले शहर में पहुँचे जहाँ हमें तीन रातों के लिए रुकना था। और मैं इस बात के लिए शुक्रगुजार था कि हमें सिर्फ तीन दिन ही रुकना था क्योंकि ऐब्बीवेल एक सीलन-भरी जगह थी जो उन दिनों गंदा-सा शहर हुआ करता था, भयानक, एक जैसे मकानों की एक के बाद एक कतार, हर घर में चार छोटे कमरे थे जिनमें तेल की कुप्पियाँ जलतीं। कंपनी के ज्यादातर लोग एक छोटे-से होटल में ठहरे। सौभाग्य से मुझे एक खदानकर्मी के घर में सामने की तरफ वाला कमरा मिल गया। कमरा बेशक छोटा था लेकिन ये साफ और आरामदायक था। रात को जब मैं नाटक से वापिस लौटता तो कमरे में आग के पास ही मेरा खाना रख दिया जाता जहाँ वह गरम रहता।
मकान मालकिन लम्बी, खूबसूरत-सी औरत थी जिसके आस-पास त्रासदी का एक आवरण लिपटा हुआ था। वह सुबह मेरे कमरे में राश्ता ले कर आती और शायद ही कभी एक-आध शब्द बोलती। मैंने नोट किया कि उसकी रसोई का दरवाजा हमेशा ही बंद रहता। जब भी मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत होती, मुझे दरवाजा खटखटाना पड़ता और दरवाजा एकाध इंच ही खोला जाता।
दूसरी रात जब मैं रात का खाना खा रहा था तो उसका पति आया। वह लगभग अपनी पत्नी की उम्र का रहा होगा। उस शाम वह थियेटर गया हुआ था और उसे हमारा नाटक अच्छा लगा था। बातचीत करते समय वह खड़ा ही रहा। उसने हाथ में एक जलती मोमबत्ती पकड़ी हुई थी और वह सोने के लिए जाने की तैयारी में था। वह बात करते समय थोड़ा रुका मानो कुछ कहना चाह रहा हो."...सुनो, मेरे पास कुछ ऐसा है जो मुझे लगता है, तुम्हारे काम काज में कहीं फिट हो सकता है। कभी मानव मेंढक देखा है? लो इस मोमबत्ती को पकड़ो और मैं लैम्प पकड़ता हूँ।"
वह मुझे रसोई घर तक ले कर गया और लैम्प को ड्रेसर पर रख दिया। ड्रेसर पर ऊपर से नीचे तक अलमारी के दरवाजों के पल्लों की जगह पर परदा लगा हुआ था। "...ऐ गिल्बर्ट, जरा बाहर तो निकलो।" उसने परदे सरकाते हुए कहा।
एक आधा आदमी जिसके पैर नहीं थे, सामान्य आकार से बड़ा सिर, लाल बाल, चपटा-सा माथा, बीमार-सा सफेद चेहरा, धँसी हुई नाक, बड़ा-सा मुँह और मजबूत कंधे और बाहें, ड्रेसर के नीचे से निकल कर आया। उसने फलानेल का जांघिया पहना हुआ था। जांघिये के कपड़े को जाँघों तक काट दिया गया था। वहाँ उसके दस मोटे, ठूँठ जैसे पंजे नज़र आ रहे थे। इस डरावने प्राणी की उम्र बीस से चालीस के बीच कुछ भी हो सकती थी।
"ऐ, ... हे गिल्बर्ट, जरा कूद के दिखाओ।" पिता ने कहा और दीन-हीन आदमी ने अपने आपको थोड़ा नीचे किया और लगभग मेरे सिर की ऊँचाई तक अपनी बाहें ऊपर उछाल दीं।
"...क्या ख्याल है? सर्कस के लिए यह फिट रहेगा? मानव मेंढक?"
मैं इतना भयभीत हो गया था कि जवाब ही न दे सका। अलबत्ता, मैंने उन्हें कई सर्कसों के नाम पते बताये जहाँ वे इस बारे में लिख सकते थे।
वे इस बात पर अड़े रहे कि ये लिजलिजा प्राणी और भी उछल कूद, कलाबाजियाँ और कूद फाँद दिखाये। उसे आराम कुर्सी के हत्थे पर हाथों के बल खड़ा किया गया, कुदाया गया। जब उसने अपने ये सब करतब बंद किये तो मैंने यह जतलाया कि ये वाकई उत्साह जनक है और इन ट्रिक्स पर उसे बधाई दी।
कमरे से बाहर निकलने से पहले मैंने उससे कहा ..."गुड नाइट गिल्बर्ट," तो कूँए में से आती सी, जबान दबा कर उसे बेचारे ने जवाब दिया," ...गुड नाइट।"
उस रात कई बार मैं उठा और अपने बंद दरवाजे को अच्छी तरह देखा-भाला। अगली सुबह मकान मालकिन खुश मिजाज़ नजर आयी और उसके चेहरे पर संवाद करने जैसे भाव थे। "मेरा ख्याल है, तुमने कल रात गिल्बर्ट को देखा है," कहा उसने, "हां, ये ज़रूर है कि जब हम थिएटर के लोगों को घर में रखते हैं तो वह ड्रेसर के नीचे ही सोता है।"
तब यह वाहियात ख्याल मेरे मन में आया कि मैं गिल्बर्ट के बिस्तर में ही सोता रहा हूँ।... "हाँ," मैंने जवाब दिया और उसके सर्कस में जाने की संभावनाओं पर नपे-तुले शब्दों में ही बात करता रहा।
मकान मालकिन ने सिर हिलाया,"...हम अक्सर इस बारे में सोचते रहे हैं।"
मेरा उत्साह - या इसे जो भी नाम दे दें - मकान मालकिन को खुश करता जा रहा था। वहाँ से चलने से पहले मैं रसोई में गिल्बर्ट को बाय-बाय कहने गया। सहज रहने की कोशिश करते हुए मैंने उसका बड़ा-सा फैला हुआ हाथ अपने हाथ में लिया और उसने हौले से मेरा हाथ दबाया।


चालीस हफ्तों तक अलग-अलग प्रदेशों में प्रदर्शन करने के बाद हम लंदन लौटे। अब हमें आस-पास के उपनगरों में आठ हफ्ते तक प्रदर्शन करने थे। शरलॉक होम्स, जो सदाबहार सफलता के झँडे गाड़ता था, पहले टूर के होने के बाद तीन हफ्ते बाद दूसरे टूर से शुरू होने वाला था।
अब सिडनी और मैंने तय किया कि पाउनाल टेरेस वाला अपना कमरा छोड़ दें और केनिंगटन रोड पर किसी ज्यादा इज़्ज़तदार जगह में जा कर रहें। हम अब सांपों की तरह अपनी केंचुल को उतार फेंक देना चाहते थे। अपने अतीत को धो पोंछ देना चाहते थे।
मैंने होम्स के अगले दौरे के दौरान सिडनी को एक छोटी-सी भूमिका दिये जाने के बारे में मैनेजमेंट से बात की। और उसे काम मिल भी गया। एक हफ्ते के पैंतीस शिलिंग। अब हम अपने दौरे पर साथ एक साथ थे।
सिडनी हर हफ्ते मां को खत लिखता था और हमारे दूसरे दौरे के आखिरी दिनों में हमें केन हिल पागल खाने से एक पत्र मिला कि अब हमारी मां की सेहत बिलकुल ठीक है। यह निश्चित ही एक बेहतर खबर थी। हमने फटाफट अस्पताल से मां को डिस्चार्ज कराने के इंतज़ाम किये और इस बात की तैयारियाँ कीं कि वह हमारे पास ही रीडिंग शहर में पहुँच जाये। इस मौके का जश्न मनाने के लिए हमने एक स्पेशल डीलक्स अपार्टमेंट लिया जिसमें दो बेडरूम थे, एक ड्राइंगरूम था जिसमें पियानो रखा हुआ था। हमने मां का बेडरूम फूलों से सजा दिया और एक शानदार डिनर का इंतजाम किया।
सिडनी और मैं स्टेशन पर मां का इंतज़ार करते रहे। हम तनाव में भी थे और खुश भी। लेकिन मैं इस बात को सोच-सोच कर परेशान हुआ जा रहा था कि अब वह कैसे हमारी ज़िंदगी में फिर से फ़िट हो पायेगी, इस बात को जानते हुए कि उन दिनों की वह आत्मीय घड़ियां फिर से नहीं जी जा सकेंगी।
आखिरकार ट्रेन आ पहुँची। सवारियाँ जैसे-जैसे डिब्बों में से निकल कर आ रही थीं, हम उत्तेजना और अनिश्चितता से उनके चेहरे देख रहे थे। और आखिर में वह नज़र आयी। मुस्कुराती हुई और चुपचाप धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ती हुई। जब हम उससे मिलने के लिए आगे बढ़े तो उसने ज्यादा भाव प्रदर्शित नहीं किये लेकिन वात्सल्य के साथ हमें प्यार किया। तय था वह अपने आपको एडजस्ट करने के भीषण दौर से गुज़र रही थी। टैक्सी से अपने कमरों तक की उस छोटी-सी यात्रा में हमने हज़ारों बातें की, मतलब की और बेमतलब की।
मां को अपार्टमेंट और उसके बेडरूम के फूल दिखा देने के तात्कालिक उत्साह के बाद हम अपने आपको ड्राइंगरूम में एक दूसरे के सामने खाली-खाली बैठा पा रहे थे। हमारी सांस फूल रही थी। धूप भरा दिन था और हमारा अपार्टमेंट एक शांत गली में था। लेकिन अब इसकी शांति बेचैन कर रही थी। हालांकि मैं खुश होना चाहता था लेकिन पता नहीं क्यों, मैं अपने-आपको एक तरह के दिल डूबने वाले के भाव से लड़ता हुआ पा रहा था। बेचारी मां, उसने खुश और संतुष्ट रहने के लिए ज़िंदगी से कितना कम चाहा था, मुझे अपने तकलीफ़ भरे अतीत की याद दिला रही थी ...वह दुनिया की आखिरी औरत थी जिसने मुझे इस तरह से प्रभावित किया होगा। लेकिन मैंने अपनी तरफ़ से इन भावनाओं को छुपाने की भरपूर कोशिश की। उसकी उम्र थोड़ी बढ़ गयी थी और वज़न भी बढ़ गया था। मैं हमेशा इस बात पर गर्व किया करता था कि हमारी मां कितनी शानदार दिखती है और ढंग से पहनी ओढ़ती है, और मैं चाहता था कि मैं अपनी कम्पनी को उसके बेहतरीन रूप में दिखाऊं। लेकिन अब वह अनाकर्षक दिख रही थी। मां ने ज़रूर मेरी शंका के ताड़ लिया होगा तभी तो उसने मेरी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखा।
झिझकते हुए मैंने मां के बालों की लट का ठीक किया,"...मेरी कम्पनी से मिलने से पहले," मैं मुस्कुराया,"मैं चाहता हूँ कि तुम अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में होवो।"
हमें एक दूसरे से एडजस्ट हाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। और मेरी हताशा उड़न छू हो गयी। अब हम उस आत्मीयता के दायरे से बाहर आ चुके थे जो वह तब जानती थी जब हम बच्चे थे और तब वह उस बात को हम बच्चों से बेहतर जानती थी। और यह बात हमें और भी प्यारी बना रही थी। हमारे टूर के दौरान वह खरीदारी करती, सौदा सुलुफ लाती, घर पर फल वगैरह ले आती, खाने-पीने के लिए कुछ न कुछ अच्छी चीज़ें ले आती और थोड़े से फल तो जरूर ही खरीद कर लाती। हम अतीत में कितने भी गरीब क्यों न रहे हों, शनिवारों की रात के वक्त खरीदारी करते समय हम हमेशा पेनी भर के फूल खरीदने का जुगाड़ तो कर ही लिया करते थे। अक्सर वह शांत और अपने आप में गुमसुम रहती और उसका ये अलगाव मुझे उदास कर जाता। वह हमारे साथ मां की तरह पेश आने के बजाये मेहमानों की तरह पेश आती।
एक महीने के बाद मां ने लंदन वापिस जाने की इच्छा प्रकट की। वह अब घर बसा लेना चाहती थी ताकि जब हम दौरे से वापिस आयें तो उसके पास हमारे लिए एक घर हो। इसके अलावा, जैसा कि उसने कहा, इस तरह सदा सैरों पर घूमते हुए एक अतिरिक्त किराया देने की तुलना में लंदन में घर ले कर रहना कहीं ज्यादा सस्ता पड़ेगा।
मां ने चेस्टर स्ट्रीट पर नाई की दुकान के ऊपर एक फ्लैट किराये पर ले लिया। यहाँ हम पहले भी रह चुके थे। मां किस्तों पर दस पाउंड का फर्नीचर ले आयी। कमरे हालांकि वर्सेलिस के कमरों जैसे बड़े और शानदार नहीं थे लेकिन मां ने तो कमाल कर दिया और कमरों का काया-कल्प कर दिया। उसने सोने के कमरों को संतरी रंग के क्रेटस् और क्रेटोन से रंग डाला। अब कमरे सजावटी अल्मारियों की तरह दिखने लगे थे। हम दोनों, सिडनी और मैं मिल कर हर हफ्ते चार पाउंड और पांच शिलिंग कमा रहे थे और उसमें से एक पाउंड और पांच शिलिंग मां को भेज देते।
अपने दूसरे दौरे के बाद मैं और सिडनी घर वापिस लौटे और एक हफ्ता मां के साथ रहे। हालांकि हम मां के पास आ कर खुश थे, फिर भी हम मन ही मन फिर से दौरे पर जाने की चाह रखने लगे थे क्योंकि चेस्टर स्ट्रीट के घर में वे सारी सुविधाएं उस तरह की नहीं थीं जिनके मैं अब और सिडनी आदी होने लगे थे। बिला शक मां ने इस बात को ताड़ लिया। जब हमें स्टेशन पर विदा करने के लिए आयी तो वह काफी खुश लग रही थी लेकिन हम दोनों ने सोचा, जब प्लेटफार्म पर खड़ी वह रुमाल हिलाती हमें विदा कर रही थी तो हमें वह चिंतित लगी।
हमारे तीसरे दौरे के दौरान मां ने हमें लिखा कि लुइस, जिसके साथ सिडनी और मैं केनिंगट रोड पर रहे थे, नहीं रही है। मज़ाक ही तो कहा जायेगा कि, उसकी मृत्यु भी लैम्बेथ यतीम घर में ही हुई जिस जगह पर कुछ अरसे तक हमें रखा गया था। वह पिता जी के बाद सिर्फ चार बरस ही जी पायी थी और अपने बच्चे को यतीम छोड़ गयी थी। उस बेचारे को भी उस अनाथालय में ही रखा गया और उसे भी उसी हॉनवेल स्कूल में ही भेजा गया था जहाँ सिडनी और मुझे भेजा गया था।
मां ने लिखा था कि वह बच्चे से मिलने के लिए गयी थी और उसे बताने की कोशिश की थी कि वह कौन है और कि सिडनी और मैं केनिंगटन रोड पर उसके और उसके पापा...मम्मी के साथ रहे थे लेकिन बच्चे को कुछ भी याद नहीं था क्योंकि वह उस समय मात्र चार बरस का ही था। उसे अपने पिता की भी कोई स्मृतियां नहीं थीं। अब वह दस बरस को होने को आया था। उसे लुइस के मायके वाले नाम के साथ रखा गया था और मां जहाँ तक पता लगा पायी थी, उसका कोई रिश्तेदार नहीं था। मां ने लिखा था कि वह खूबसूरत और शांत लड़का निकल आया था। वह शर्मीला और ख्यालों में खोया रहने वाला लड़का था। वह उसके लिए थैला भर मिठाइयां, संतरे और सेब लेकर गयी थी और उससे वायदा किया था कि वह उसके पास नियमित रूप से आती रहेगी और मेरा विश्वास है वह तब तक जाती भी रही होगी जब तक वह खुद बीमार हो कर फिर से केन हिल में वापिस न भेज दी गयी हो।
मां के एक बार फिर पागल हो जाने की खबर सीने में खंजर की तरह लगी। हमें पूरे ब्यौरे कभी नहीं मिल पाये। हमें सिर्फ एक शुष्क सरकारी पर्ची मिली कि वह बेमतलब और असंगत तरीके से गलियों में फिरती हुई पायी गयी थी। हम कुछ भी तो नहीं कर सकते थे सिवाय इसके कि बेचारी मां की किस्मत के लेखे को स्वीकार कर लें। उसके बाद उसका दिमाग फिर कभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ।
वह कई बरस तक केन हिल पागल खाने में ही तब तक एड़ियाँ रगड़ती रही जब तक हम इस लायक नहीं हो गये कि उसे एक प्राइवेट पागल खाने में भर्ती करवा सकें।


कई बार बदकिस्मती के देवता भी अपनी चलाते-चलाते थक जाते हैं और थोड़ी-सी दया माया दिखला देते हैं जैसा कि मां के मामले में हुआ। अपने जीवन के अंतिम सात बरस मां को आराम से, फूलों से घिरे हुए और धूप से घिरे हुए बिताने का मौका मिला। वह अपने बड़े हो गये सपूतों को यश और किस्मत के उस स्तर को भोगते देख सकी जिसकी उसने कभी कल्पना की थी।
शरलॉक होम्स के तीसरे टूर के कारण ही सिडनी और मुझे मां को देखने आने में अच्छा-खासा वक्त लग गया। फ्रॉहमैन कम्पनी के साथ टूर हमेशा के लिए खत्म हो गया। इसके बाद थियेटर रॉयल, ब्लैकबर्न के मालिक मिस्टर हैरी यॉर्क ने फ्रॉहमैन से छोटे शहरों में खेलने के लिए शरलॉक होम्स के अधिकार खरीद लिये। सिडनी और मुझे नयी कम्पनी में रख लिया गया लेकिन अब हमारा वेतन घटा कर पैंतीस शिलिंग प्रति सप्ताह कर दिया गया था।
उत्तरी इंगलैंड के छोटे शहरों में अपेक्षाकृत हल्के स्तर के कम्पनी के साथ नाटक खेलना घुटन पैदा करने वाला और स्तर से नीचे आने जैसा था। इसके बावजूद, इसने मेरे इस विवेक को समृद्ध किया कि जो कम्पनी हम छोड़ कर आये थे और जिसमें काम कर रहे थे उनमें क्या फर्क था। मैं इस तुलना को छुपाने की कोशिश करता लेकिन रिहर्सलों के समय, नये निर्देशक की मदद करने के उत्साह में मैं अक्सर उसे बताने लगता कि ये काम तो फ्रॉहमैन कम्पनी में इस तरह से होता था और फलां काम उस तरह से होता था। वह बेचारा तो मुझसे स्टेज डायरेक्शन, संवादों के संकेतों तथा स्टेज पर होने वाले कामों के बारे में पूछ लिया करता था। लेकिन सच तो यह था कि मैं अपनी इस हरकत से बाकी कलाकारों के साथ खास तौर पर लोकप्रिय नहीं हो पाया था और मुझे बड़बोले के रूप में देखा जाने लगा था। बाद में, नये स्टेज पर अपनी यूनिफार्म में से एक बटन खो देने के कारण मैनेजर ने मुझ पर दस शिलिंग का जुर्माना ठोंक दिया। इस बटन के बारे में वे मुझसे पहले भी कई बार कह चुके थे।
विलियम गिलेट, शरलॉक होम्स के लेखक, क्लारिसा नाम के नाटक में मारियो डोरो को ले कर आये। ये नाटक भी उन्होंने ही लिखा था। समीक्षक नाटक के प्रति और गिलेट की स्पीच के तरीके के प्रति बहुत बेरहम थे, जिसकी वजह से गिलेट साहब को एक पर्दा उठाऊ, कर्टेन रेजर नाटक द' पेनफुल प्रेडिक्टामेंट ऑफ शरलाक होम्स' लिखने पर मजबूर होना पड़ा। इसमें उन्होंने कभी एक शब्द भी नहीं बोला था। नाटक के पात्रों में सिर्फ तीन ही लोग थे, एक पगली, खुद होम्स और उनका पेज बॉय। जब मुझे मिस्टर पोस्टेंट, गिलेट के प्रबंधक से एक तार मिला तो मुझे लगा, मेरे लिए स्वर्ग से खास संदेश आ गया है। मुझसे पूछा गया था कि क्या मैं लंदन आ कर कर्टेन रेजर में विलियम गिलेट महोदय के साथ बिली की भूमिका अदा करना चाहूँगा?
मैं पेसोपेश के मारे कांपने लगा। मेरी चिंता ये थी कि क्या मेरी कम्पनी वाले इतने कम समय के नोटिस पर प्रदेशों में मेरी जगह कोई दूसरा बिली खोज लेंगे। मैं कई दिन तक उहापोह वाले रहस्य में डूबता-इतराता रहा। अलबत्ता, उन्हें दूसरा बिली मिल गया।
लंदन में वापिस लौट कर वेस्ट एंड में नाटक करने के अनुभव को मैं सिर्फ अपने पुनर्जागरण के रूप में ही बयान कर सकता हूँ। मेरा दिमाग प्रत्येक घटना के रोमांच के साथ चकर-घिन्नी सा घूम रहा था। शाम के वक्त ड्यूक के यॉर्क थियेटर में पहुँचना और स्टेज मैनेजर मिस्टर पोस्टेंट से मिलना, जो मुझे मिस्टर गिलेट के ड्रेसिंग रूप में लिवा ले गये, और जब मेरा उनसे परिचय करवा दिया गया तो उनका मुझसे पूछा,"...क्या तुम मेरे साथ शरलॉक होम्स में काम करना चाहोगे?"
और मेरा उत्साह के मारे नर्वस हो जाना, ..."ओह ज़रूर, मिस्टर गिलेट, ज़रूर ज़रूर...।" और अगली सुबह रिहर्सल के लिए स्टेज पर इंतज़ार करना और पहली बार मारियो डोरो को देखना। वे निहायत खूबसूरत सफेद रंग की गर्मी की पोशाक पहने हुए थीं। सुबह के वक्त इतनी खूबसूरत किसी महिला को देख लेने का अचानक झटका! वे दो पहिये की एक बग्घी में आयी थीं और उन्होंने पाया कि उनकी पोशाक पर कहीं स्याही का एक धब्बा लग गया है। वे नाटक की प्रापर्टी वाले से पूछना चाह रही थीं कि कहीं कुछ होगा इस दाग से छुटकारा पाने के लिए तो जब उस आदमी ने इस बारे में शक जाहिर किया तो उनके चेहरे पर खीझ के इतने शानदार भाव आये,"ओह, लेकिन क्या ये इतना वाहियात नहीं है?"
वे बला की सुंदर थीं। मैं उनसे खफ़ा हो गया। में उनके नाज़ुक, कलियों से खिलते हेंठों से नाराज़ हो गया, उनके एक जैसे सफेद दांतों से नाराज़ हो गया, उनकी मदमस्त ठुड्डी ने मुझे खफ़ा कर दिया, उनके लहराते बाल, और उनकी गहरी भूरी आँखों ने मुझे नाराज़ कर दिया। मैं उनके नाराज़ होने की अदा पर नाराज़ हुआ और उस आकर्षण पर खफ़ा हुआ जो उन्होंने इस बात को पूछते समय दिखाया था। इस पूछताछ के दौरान मैं उनके और प्रापर्टी वाले के बस एकदम पास ही खड़ा हुआ था, पर वे मेरी उपस्थिति से पूरी तरह अनजान थीं। हालांकि मैं उनके पास ही, उनकी खूबसूरती से ठगा और मंत्र बिद्ध सा खड़ा था। मैं हाल ही में सोलह बरस का हुआ था और इस अचानक चकाचौंध के सानिध्य ने मेरा यह पक्का इरादा सामने ला दिया कि मैं इससे अभिभूत नहीं होऊँगा। लेकिन हे भगवान! वे इतनी खूबसूरत थीं। ये पहली ही नज़र में प्यार था।
द' पेनफुल प्रेडिक्टामेंट ऑफ शरलॉक होम्स' में आइरीन वानब्रुग नाम की एक बहुत ही उत्कृष्ट अभिनेत्री ने पगली की भूमिका की थी और नाटक में बोलने का सारा काम वही करती थीं जबकि होम्स चुपचाप बैठे रहते और सुनते। ये समीक्षकों पर करारा तमाचा था। मेरी हिस्से में शुरुआती लाइनें थी, मैं होम्स के अपार्टमेंट मे जा घुसता हूँ और दरवाजा थामता हूँ जबकि बाहर से पगली दरवाजा लगातार पीट रही है और जब मैं उत्साह में भर कर होम्स को ये समझाना चाहता हूँ कि क्या हो रहा है, पगली धड़धड़ाती हुई अंदर आती है। लगातार बीस मिनट तक वह किसी ऐसे मामले के बारे में आँय बाँय बकती रहती है जिसके बारे में वह चाहती है कि होम्स हाथ में ले लें। चोरी छुपे होम्स एक पर्ची लिखते है और घंटी बजाते हैं और वह पर्ची मुझे थमा देते हैं। बाद में दो हट्टे कट्टे आदमी आ कर उस पगली को लिवा ले जाते हैं। मैं तथा होम्स अकेले रह जाते हैं। मैं कहता हूँ,"... आप ठीक कहते हैं सर, यह सही पागल खाना था।"
समीक्षकों को लतीफा अच्छा लगा लेकिन क्लारीसा नाटक जो गिलेट ने मैरी डोरो के लिए लिखा था, फ्लॉप गया। हालांकि उन्होंने मैरी की खूबसूरती के गुणगान किये थे लेकिन उन्होंने लिखा कि यही काफी नहीं मदोन्मत्त नाटक को बांधे रखने के लिए। इसलिए गिलेट ने उस सीजन का बाकी वक्त शरलॉक होम्स को फिर से नये सिरे से पेश करके गुज़ारा। मुझे इस नाटक में फिर से बिली की भूमिका के लिए रख लिया गया।
विख्यात विलियम्स गिलेट के साथ काम करने के अति उत्साह में मैं अपने काम की शर्तों वगैरह के बारे में बात करना ही भूल गया। सप्ताह खत्म होने पर मिस्टर पोस्टेंट मेरे पास आये और मुझे वेतन का लिफाफा देते हुए शर्मिंदा होते हुए कहने लगे,"...मैं तुम्हें ये राशि देते हुए वाकई शर्मिंदा हूँ लेकिन फ्रॉहमैन के दफ्तर में मुझे यही बताया गया था कि मुझे तुम्हें उतनी ही राशि देनी है जितनी पहले तुम हमसे लेते रहे थे।...दो पाउंड और दस शिलिंग।" मुझे ये राशि पा कर सुखद आश्चर्य हुआ।
होम्स की रिहर्सलों के दौरान, मैं मेरी डोरो से फिर मिला...वह पहले से भी ज्यादा खूबसूरत नजर आ रही थीं। मेरे इस संकल्प के बावजूद कि मैं उनकी खूबसूरती के जाल में नही फँसूंगा, मैं उनके मौन प्यार के निराशाजनक सागर में और गहरे धंसता चला गया। मैं इस कमज़ोरी से नफ़रत करता था और अपने चरित्र की कमज़ोरी के कारण खुद से खफ़ा था। ये एक तरफा प्यार का मामला था। मैं उनसे प्यार भी करता था और नफ़रत भी करता था। इतना ही नहीं, वह बला की खूबसूरत और भव्य थी।
होम्स में वे एलिस फॉकनर की भूमिका निभाती थीं। लेकिन नाटक के दौरान हम कभी भी नहीं मिले। अलबत्ता, मैं सीढ़ियों पर उनका इंतज़ार करता और वे जब गुज़र कर जातीं तो गुड मार्निंग कह दिया करता। वे जवाब में खुश होकर गुड मार्निंग कहतीं और यही था जो हम दोनों के बीच हो पाया।


होम्स ने हाथों-हाथ सफलता के झंडे गाड़ दिये। नाटक जब चल रहा था तो रानी एलेक्जेंड्रा भी देखने आयीं। उनके साथ रॉयल बॉक्स में ग्रीस के राजा और प्रिंस क्रिश्चियन भी बैठे थे। प्रिंस महोदय राजा जी को जबरदस्ती नाटक समझाये जा रहे थे और ऐसे अत्यंत तनाव भरे और अशांत पलों में जब होम्स और मैं स्टेज पर अकेले होते हैं, पूरे थियेटर में गूँजती-सी एक आवाज़ सुनाई दी,"...मुझे मत बताओ, मुझे मत बताओ।"
डिऑन बाउसीकाल्ट का दफ्तर भी ड्यूक ऑफ यॉर्क थियेटर में ही था और आते-जाते वे मेरे सिर पर प्यार भरी चपत लगा दिया करते। हाल केन भी ऐसा ही करते। वे अक्सर गिलेट से मिलने बैक स्टेज में आ जाया करते। एक मौके पर तो मुझे लॉर्ड किचनर से मुस्कुराहट का भी सम्मान मिला।
जब शरलॉक होम्स चल रहा था, उन्हीं दिनों सर हेनरी इर्विंग का देहांत हो गया और मुझे वेस्टमिन्स्टर ऐब्बी में उनके अंतिम संस्कार में जाने का मौका मिला। मैं चूँकि वेस्ट एंड का एक्टर था इसलिए मुझे विशेष पास मिला और मैं इस बात से बेहद खुश हुआ। अंतिम संस्कार के वक्त मैं शांत लेविस वालर और डॉ. वाल्फोर्ड बोडी के बीच बैठा। लेविस उन दिनों लंदन के रोमांटिक अभिनेताओं के बेताज़ बादशाह थे और डॉक्टर बोडी की ख्याति रक्तरहित सर्जरी के कारण थी। उन पर मैंने बाद में एक रंगारंग कार्यक्रम में उनके पात्र का स्वांग किया था। वालर मौके की नज़ाकत के अनुरूप खूबसूरत तरीके से कपड़े पहने हुए थे और गर्दन अकड़ाये, सीधे बैठे वे न दायें देख रहे थे और न बायें। लेकिन डॉक्टर बोडी, बस इस कोशिश में कि वे हेनरी के ताबूत को नीचे अब उतारे जाते समय बेहतर तरीके से देख पायें, ड्यूक की छाती से उचक उचक कर देखते रहे। जबकि वालर साहब को अच्छी खासी कोफ्त हो रही थी। मैंने कुछ भी देखने की कोशिश ही छोड़ दी और मेरे आगे जो लोग बैठे हुए थे, सिर्फ उन्हीं की पीठ की तरफ देखता रहा।
शारलॉक होम्स के बंद होने से दो सप्ताह पहले मिस्टर बाउसीकॉल्ट ने विख्यात मिस्टर और मिसेज कैंडल के नाम मुझे इस बात की संभावना के साथ एक परिचय पत्र दिया कि शायद मुझे उनके नये नाटक में कोई भूमिका मिल जाये। वे सेंट जेम्स थियेटर में अपने सफल नाटक के शो खत्म कर रहे थे। मिलने के लिए सवेरे दस बजे का समय तय हुआ। मैडम कैंडल मुझे फोयर में मिलने वाली थीं। वे बीस मिनट देरी से आयीं। आखिरकार, गली में एक आकृति उभरी। ये मिसेज कैंडल थीं। लम्बी तगड़ी, अभिमानी मोहतरमा। उन्होंने यह कहते हुए मेरा अभिवादन किया,"ओह, तो तुम हो, छोकरे से!! हम जल्द ही प्रदेशों की तरफ एक नया नाटक ले कर जा रहे हैं। मैं चाहूंगी कि तुम हमें अपनी भूमिका पढ़ कर सुनाओ। लेकिन फिलहाल तो हम बहुत ही व्यस्त हैं। इसलिए तुम कल सुबह इसी वक्त यहां आ रहे हो!!"
"माफ करना मैडम," मैंने ठंडेपन के साथ जवाब दिया, "लेकिन मैं शहर से बाहर कोई भी काम स्वीकार नहीं कर सकता।" इसके साथ ही मैंने अपना हैट ऊपर किया, फोयर से बाहर आया, वहां से गुज़रती एक टैक्सी रुकवायी और - मैं दस महीने तक बेकार रहा था।
जिस रात ड्यूक ऑफ यार्क थियेटर में शारलॉक होम्स का अंतिम शो हुआ, और मैरी डोरो को अमेरिका वापिस लौटना था, मैं अकेला ही बाहर निकल गया और शराब पी कर बुरी तरह से धुत्त हो गया। दो या तीन बरस बाद फिलेडाल्फिया में मैंने उन्हें दोबारा देखा। उन्होंने उस नये थियेटर का समर्पण किया था जिसमें मैं कार्नो कॉमेडी कम्पनी में अभिनय कर रहा था। वे अभी भी पहले की ही तरह खूबसूरत थीं। मैं विंग्स में अपना कॉमेडी का मेक अप किये हुए उन्हें देखता रहा था। वे भाषण दे रही थीं। मैं इतना अधिक शरमा रहा था कि आगे बढ़ कर उन्हें अपने बारे में बता ही नहीं पाया था।
लंदन में होम्स के समापन पर प्रदेशों में काम करने वाली कम्पनी के नाटक भी समाप्त हो चले थे और इस तरह से सिडनी और मैं, दोनों ही बिना काम के थे। सिडनी ने अलबत्ता, नया काम तलाशने में कोई वक्त नहीं गंवाया। नाटकों से संबंधित एक अखबार ऐरा में एक विज्ञापन देख कर वह सड़क छाप कॉमेडी करने वाली चार्ली मैनान की कम्पनी में शामिल हो गया। उन दिनों इस तरह की बहुत सारी कम्पनियां हुआ करती थीं जो हॉलों के चक्कर लगाती फिरती थीं। चार्ली बाल्डविन की बैंक क्लर्कस, जो बोगानी की लुनैटिक बेकर्स और बोइसेटे ट्रुप, ये सब के सब मूक अभिनय करते थे। हालांकि ये लोग प्रहसन कॉमेडी करते थे, उनमें साथ साथ बजाया जाने वाला संगीत होता था और ये बहुत लोकप्रिय हुआ करते थे। सबसे उत्कृष्ट कम्पनी कार्नो साहब की थी जिनके पास कॉमेडियों का खजाना था। इन सबको बर्ड्स कहा जाता था। ये होते थे, जेल बर्ड, अर्ली बर्ड्स, ममिंग बर्ड्स। इन तीन स्केचों से कार्नो साहब ने तीस से भी ज्यादा कम्पनियों का थियेटर का ताम झाम खड़ा कर लिया था। इनमें क्रिसमस पेंटोमाइम और खूब ताम झाम वाले संगीत कार्यक्रम होते। कार्नो साहब के इन्हीं नाटकों की देन थी कि वहां से फ्रेड किचन, जॉर्ज ग्रेव्स, हैरी वैल्डन, बिल रीव्ज़, चार्ली बैल और दूसरे कई महान कलाकार और कॉमेडियन सामने आये।
ये उसी वक्त की बात है जब सिडनी मेनान ट्रुप के साथ काम कर रहा था और उसे फ्रेड कार्नो ने देखा और चार पाउंड प्रति सप्ताह के वेतन पर रख लिया। चूंकि मैं सिडनी से चार बरस छोटा था, इसलिए मैं किसी भी थियेटर के काम के लिए न तो बड़ों में गिना जाता और न ही छोटों में ही, लेकिन मैंने अपने लंदन के दिनों में किये गये काम से कुछ पैसे बचा कर रखे थे, और जिस वक्त सिडनी प्रदेशों में काम करता घूम रहा था, मैं लंदन में ही रहा और पूल के खेल खेलता रहा।


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