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बात-चीत

आज मैं अपने पात्रों को बेहतर समझ के साथ देख पाता हूँ
लास्लो क्रस्नाहोरकाई

अनुवाद - राकेश कुमार मिश्र


हंगेरियन लेखक लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई से शर्मिष्ठा और कबीर मोहंती की लंबी बातचीत

(2015 में द मैन बुकर इंटरनेशनल प्राइज से सम्मानित हंगेरियन लेखक लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई समकालीन उपन्यास की दुनिया में एक जरूरी नाम है। सतांतागो (Satantango), द मलान्क्ली ऑफ रेजिस्टेंस (The Melancholy of Resistance), वॉर एंड वॉर (War and War) और एनिमल इन साइड (Animalinside)[जर्मन कलाकार मैक्स नेव्मान द्वारा चित्रित] आदि इनके चर्चित उपन्यास हैं। अँग्रेजी में हुए इनके अनुवाद एनिमल इन साइड (अनुवादक - ओत्तिलिए मुल्ज़ेत) को छोड़कर सारे अनुवाद ब्रिटिश कवि जॉर्ज सिर्तेज ने किए हैं। ये विस्तृत बातचीत जून, 2011 में दो दिनों तक बुडापेस्ट के एक होटल में हुई। लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई इस शहर से बस थोड़ी ही दूरी पर रहते हैं। वो बातचीत के पहले दिन अपनी अनुवादक पत्नी डोर्का के साथ आए। क्रस्‍नाहोरकाई की अँग्रेजी अच्छी है और लगभग उसी तरह से अपने आपको अभिव्यक्त करते हैं जिस तरह से हमारे दौर के कुछ बड़े विदेशी लेखक थोड़ा संकोच के साथ अपनी बात रखते हैं। हो सकता है कि क्रस्‍नाहोरकाई की अँग्रेजी व्याकरण के स्तर पर गलत हो या वाक्य विन्यास के हिसाब से आपको खटके लेकिन उन्होंने इस बातचीत में हमेशा अपने विचारों को पूरे नएपन और गहराई के साथ अभिव्यक्त किया। इस बातचीत के दौरान उनकी पत्नी डोर्का ने कुछ विशेष शब्दों या अभियक्तियों के चुनाव में उनकी मदद की। इस बातचीत के दौरान मैं अपने पति कबीर मोहंती के साथ थी , जो फिल्म निर्माता और विडियो आर्टिस्ट हैं। बातचीत के पहले दिन धूप तेज थी। क्रस्‍नाहोरकाई का चेहरा अंदर की तरफ था जबकी मेरा चेहरा बाहर की तरफ। तो , उन्हें सुनते हुए मैं आसमान को भी देख रही थी और रोशनी धीरे-धीरे फैल रही थी। - शर्मिष्ठा मोहंती)

शर्मिष्ठा मोहंती : क्या आप बुडापेस्ट से हैं?

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : नहीं। बिल्कुल नहीं। असल में मैं बर्लिन को थोड़ा बेहतर तरीके से जानता हूँ। उन दिनों मैं तीस साल का था जब मैंने पश्चिम की तरफ यात्रा की, यानी बर्लिन की तरफ। उन दिनों वो शहर जख्मी लोगों की राजधानी थी। उन दिनों जिम जर्मुस्च (अमेरिकन अभिनेता, निर्देशक और निर्माता) वहीं थे। इसके अलावा डेविड बोवी (ब्रिटिश गीतकार, गायक और अभिनेता), ऐलेन गिन्सबर्ग (प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक और कवि), टॉम वेट्स (अमेरिकन संगीतकार और गायक) जैसे लेखक भी वहाँ मौजूद थे। मैंने वहाँ अच्छा-खासा समय बिताया।

मैं गियुला (Giyula) नाम के एक छोटे से शहर में बड़ा हुआ, जो हंगरी और रोमानिया की सीमा पर स्थित है। मेरी दो किताबें सतांतागो और द मलान्क्ली ऑफ रेजिस्टेंस इसी शहर से प्रभावित है।

शर्मिष्ठा मोहंती : यहाँ की सड़कों पर हंगेरियन को सुनना बहुत दिलचस्प है। किसी भी इंडो-यूरोपियन भाषा से बहुत अलग...

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : पिछले 200 सालों में भाषा के तौर पर हंगेरियन भाषा का बहुत विकास हुआ है। बल्कि यूरोप की दूसरी भाषाओं की तुलना में ये सबसे उत्कृष्ट भाषा है। मैं अपने अनुवादकों के साथ बहुत जुड़कर काम करता हूँ। बेशक, जॉर्ज (George Szirtes) के साथ नहीं। बल्कि जॉर्ज तो कहता है की, "मुझे कोई मदद नहीं चाहिए। मैं खुद ही सारी चीजों को सँभाल लूँगा पर कृपा कर मेरी मदद मत करो"। (हँसी) जब मैं अपने अनुवादकों के साथ काम करता हूँ तो ये देख पाता हूँ कि भाषा के तौर पर हंगेरियन भाषा में कितनी संभावनाएँ मौजूद हैं। अगर फ्रेंच या स्पेनिश में दो संभावनाएँ मौजूद हैं तो हंगेरियन में दस। हेक्सामीटर में लिखी पुरानी ग्रीक कविता को आसानी से हंगेरियन में रखा जा सकता है। यहाँ तक की पेंटामीटर को भी। लेकिन हंगेरियन अपने आप में अकेली भाषा है। इस भाषा में कई अनुवाद हुए हैं और जिसने इसे बहुत संपन्न बनाया है। साथ ही हमें इसकी जरूरत भी है। हंगरी में बीसवीं सदी तक लैटिन का इस्तेमाल होता था, फिर जर्मन का और अब अँग्रेजी का इस्तेमाल होता है। यहाँ बुडापेस्ट में कुछ बेहतरीन लेखक और कवि लगातार अनुवाद करते हैं। उदाहरण के तौर पर शेक्सपियर या कुछ दूसरी जटिल रचनाएँ हंगेरियन भाषा में बहुत आसानी से उतर पाती हैं। अभी हाल ही में हमने हेमलेट का मंचन बुडापेस्ट की जेल में किया। जेल के अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने अब तक के सबसे अच्छे कैदी इस मंचन के माध्यम से देखे। लेकिन वो असल में कैदी नहीं थे। हो सकता है कि वो किसी बुरे शनिवार को किसी के पति हों। उन्होंने प्रेम करने का अपराध किया था। तो, जेल में गिल्ट (ग्लानि) जैसे शब्द को लेकर लोगों की तरफ से बहुत मजबूत प्रतिक्रिया आई। उन्होंने दूसरे शब्दों को लेकर उस तरह से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मुझे लगता है कि शेक्सपियर सबके लिए था। सामंतों, वेश्याओं और भी कई लोगों के लिए... दस साल पहले एक अच्छे कवि ने हेमलेट का अनुवाद किया था।

कबीर मोहंती : जॉर्ज के द्वारा किए गए आपकी किताबों का अनुवाद देखकर लगता है की वो ऊर्जा से लबालब हैं, उनमें तात्कालिकता है, हम वर्तमान में खो जाते हैं। कई बार लगता है कि ये हमारे हाथों से फिसल रहा है और फिर ये चला गया। साथ ही ये भी महसूस होता है कि हम इसे अब वापस नहीं ला सकते।

शर्मिष्ठा मोहंती : इस साल दिल्ली में ऑलमोस्ट आइलैंड कॉन्फ्रेंस में खाने के समय वो आपके उपन्यासों के अनुवाद के बारे में बता रहे थे। उन्होंने कहा कि, "आप आखीर तक पहुँच जाते हैं और खुश होते हैं। तभी अचानक से आपको एक नया वाक्य मिलता है जो बीस पन्नों तक चलता रहता है...

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : बिल्कुल। जॉर्ज ने बहुत तकलीफें सही हैं। उसने एक बार कहा भी, "लास्लो, मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूँ, लेकिन तुम्हारी किताब सतांतागो को हाथ में पकड़ते हुए मैं काँप रहा था"। लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? लेकिन उसका अँग्रेजी वाला क्रस्‍नाहोरकाई बहुत अच्छा है। कई बार इसे मैं भी नहीं समझ पाता और ये बहुत अच्छा है। आपको पता होगा की अँग्रेजी कवि रौबर्ट ब्राउनिंग ने एक बार कहा था, "जवानी के दिनों में दो लोग मेरे काम को समझते थे, एक मैं और दूसरा ईश्वर। लेकिन अब मेरे काम को सिर्फ ईश्वर समझता है"।(हँसी)

शर्मिष्ठा मोहंती : एक गद्य लेखक के तौर पर जो चीज मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वो ये कि आप अपने लेखन में लंबे वाक्यों का जिस तरह से इस्तेमाल करते हैं। ये वाक्य हमारे समय के नहीं है और ना ही पुराने हैं। ये कुछ ऐसा है की आप किस तरह से दुनिया को देखते हैं, जो एक दार्शनिक गतिविधि है, सिर्फ साहित्यिक नहीं।

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : आपने सबसे पहले "लंबे वाक्य" के बारे में कहा। मेरे लिए वो सिर्फ लंबे या छोटे वाक्य नहीं है। बल्कि बहुत छोटे या बहुत लंबे वाक्य हैं। बीस साल की उम्र से ही मैं अपने दिमाग के भीतर ही काम करता हूँ। कोई ऐसा लेखक नहीं जो अपने राइटिंग डेस्क पर ही सोचता या लिखता है। ये कभी नहीं होता। ये कुछ ऐसा है कि कोई मेरे भीतर लगातार बोलता रहता है। और दुर्भाग्य से ये कोई अलंकार या मेटाफर नहीं है। मैं अपने दिमाग में उस आवाज से जुड़ने की कोशिश करता हूँ। अगर मैं अपने भीतर उस आवाज या संगीत को समझ पाता हूँ और पीछा करता हूँ तो पंद्रह से बीस पृष्ठ तक लगातार लिखता जाता हूँ। मेरे वाक्यों के लंबे होने का एक कारण ये हो सकता है कि मैं हमेशा उस आवाज के अधिक से अधिक करीब जाता हूँ। अगर आप मुझे कुछ अर्थपूर्ण बता रहे हैं तो इस तरह की स्थिति में आप पूर्ण विराम का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि आपको जरूरत भी नहीं पड़ती। पूर्ण विराम या अर्द्ध विराम सिर्फ औपचारिकताएँ हैं। लंबे वाक्य या छोटे वाक्य सिर्फ नियम हैं। उदाहरण के तौर पर कुर्ताग (Kurtag) के संगीत के बारे में सोचिए। उस संगीत से जुड़े नोटेशन या बॉर्डर्स के बारे में सोचिए। मेलोडी कभी इन सीमाओं में बँध कर नहीं रही। पूर्ण विराम या डॉट कुछ ऐसी ही चीज है। डॉट या पूर्ण विराम मुझे जरूरी लगता है लेकिन मैं उस स्थिति या समय का इंतजार करता हूँ जब ये एकदम से जरूरी हो। मेरे पात्र विराम चिन्हों का इस्तेमाल नहीं करते। गादीस और पिनचौन जैसे लेखक बीना विराम चिन्हों या पूर्ण विराम के ही काम करते थे। मैं ये नहीं कह रहा कि पारंपरिक वाक्य काम नहीं करते। लेकिन वो मेरे लिए काम नहीं करते। फौकनर मुझे कुछ हद तक रूढ़िवादी लेखक लगता है। उसने छोटे वाक्यों का इस्तेमाल किया। तो, उसने उन वाक्यों का इस्तेमाल किया जो उसे जरूरी लगा। जबकि काफ्का के यहाँ पर हर वाक्य एक रहस्य है, इसलिए भी वहाँ पर वाक्य लंबे हैं। तो, इस तरह के वाक्यों के लिए मैं रुकता हूँ और उन वाक्यों के बारे में लंबे समय तक सोचता हूँ।

मैं कल ही एक किताब पढ़ रहा था। किताब का नाम बाद में। उस किताब में एक वाक्य था - "What can be whole only within itself"? ये छोटा नहीं बल्कि लंबा वाक्य है। (लास्लो ने यहाँ पर शर्मिष्ठा मोहंती के उपन्यास न्यू लाइफ (New Life) के भूमिका से इस वाक्य को लिया था)। ये शिल्प या संरचना से ज्यादा एक दार्शनिक सवाल है। आप तो लेखक हैं। आपको पता होगा कि भाषा सिर्फ भाषा नहीं है। भाषा अपने साथ सबकुछ समाहित करती है। दूसरे विश्व युद्ध से ही पश्चिम का साहित्य (अमेरिकन साहित्य को शामिल करते हुए) यथार्थ और रोजमर्रा की जिंदगी से प्रभावित था। लेकिन ये एक भ्रम है। त्रुटि है। वो लोग जो फ्रांस या जर्मनी में इसकी नकल कर रहे थे, वो बिना स्रोत को जाने कर रहे थे। उन्हें खुद नहीं पता था कि वो किन चीजों की नकल कर रहे हैं। हंगेरियन साहित्य सिर्फ दो सौ साल पुराना है। 18वीं सदी में हंगरी में राजनीतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक स्तर पर बड़े आंदोलन हुए। पूरे यूरोप में एक राष्ट्रीय विचारधारा का जन्म हुआ। हंगरी में एक नई और आधुनिक भाषा की जरूरत थी। जो ज्यादा भरोसेमंद हो। इससे पहले सामंतों के द्वारा एक विशेष तरह की लैटिन का उपयोग किया जा रहा था। ठीक इसी समय एक पुरानी भाषा के भीतर से नई भाषा बनाने के लिए कई लेखक और कवि साथ आए। यही वो नई भाषा है जिसका मैं इस्तेमाल करता हूँ। ये भाषा एकदम जवान है, इसलिए मुझे इस भाषा को बदलने का भरपूर मौका है। पश्चिम यूरोप में जो पाठक है, वो ज्यादा रूढ़िवादी है, जो पुरानी परंपराओं से आते हैं या उनसे जुड़े हुए हैं। लेकिन ये बात हंगरी में नहीं है। यहाँ के पाठक नए प्रयोगों के लिए तैयार रहते हैं, शब्दों के नए समूहों के लिए तैयार रहते हैं। यानी हंगरी के पाठक ज्यादा लचीले हैं।

शर्मिष्ठा मोहंती : आपके उपन्यासों से जुडी एक बहुत दिलचस्प बात है। वहाँ हमेशा एक आदमी होता है। जैसे - सतांतागो का डॉक्टर, द मलान्क्ली ऑफ रेजिस्टेंस का संगीत शिक्षक और वार एंड वार का अर्काविस्त ये सारे पात्र शिक्षित और बौद्धिक भी हैं। जबकि दूसरे पात्र कहीं ना कहीं उपेक्षित हैं। और ये भी की आपकी उपस्थिति दोनों तरह के पात्रों में समान रूप से देखने को मिलती है।

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : अब मैं ये देख पाता हूँ कि उन पात्रों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। पर इन उपन्यासों के नायक ठीक मुझ जैसे नहीं है। इन सभी पात्रों में कहीं ना कहीं मेरे विचार हैं। इन सारे विचारकों या बौद्धिकों के सोचने का तरीका एक ही है। असल में ये वो लोग हैं जो पूरी पृथ्वी पर अकेले हैं। लेकिन इसके साथ ही इनके पास दूसरों से कहीं ज्यादा क्षमता है अपनी स्थिति को अभिव्यक्त करने की। और एक सवाल ये भी की इन पात्रों का पूरी दुनिया से क्या संबंध है? आज मैं अपने उपन्यासों के पात्रों को ज्यादा बेहतर समझ के साथ देख पाता हूँ। बल्कि ज्यादा सहानुभूति के साथ उन पात्रों से जुड़ पाता हूँ। मुझे लगता है सतांतागो का डॉक्टर, पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र इनसान है जो इनसानों से जुड़ी समस्याओं को सबसे अच्छी तरह से अभिव्यक्त कर पाता है। द मलान्क्ली ऑफ रेजिस्टेंस का संगीत शिक्षक अपने आप में एक विरोधाभास है। उसकी असली कहानी ये नहीं है कि वो इस दुनिया के बारे में क्या निर्णय लेता है बल्कि उसकी समस्या ये है कि वो जवान वलुसका की सुंदरता के पीछे पागल है। जबकी बहुत देर हो चुकी है। असल त्रासदी ये है। शायद यही समस्या है किसी भी बौद्धिक या कलाकार के साथ। हमें ये लगता है कि हमें इस दुनिया को कुछ दिखाना चाहिए, लेकिन असल में हमारा काम कुछ और है। ये कुछ ऐसा है की हम किसी नदी के किनारे चुपचाप बैठ जाएँ और उसकी आवाज को सुनें। नदी के सतह को देखें और ये भी देखें की किस तरह से प्रकाश सतह पर फैलता है। कोई बड़ा राजनीतिक निर्णय या इस दुनिया से जुड़े छोटे या बड़े निर्णय लेने से ज्यादा जरूरी है ये काम। खास तौर से, ये जरूरी है की मैं अपनी पत्नी, अपने दोस्तों और अपने करीबी लोगों को समझने की कोशिश करूँ। उस स्थिति में रहूँ जहाँ मैं उन सभी को कुछ दे पाऊँ। जो कि मेरी तरफ से हो। हम इस दुनिया के बारे में निर्णय तब लेते हैं जब हम जवान होते हैं लेकिन जिस उम्र में मैं हूँ उसमें एक ही काम हो सकता है कि मैं इस दुनिया को पूरी सहानुभूति के साथ देखूँ। सहानुभूति मेरी उम्र के हिसाब से सबसे उचित प्रतिक्रिया हो सकती है। मनुष्यों को होने वाले अनुभव कभी नहीं बदलते। जवानी, बुढ़ापा और फिर एक दिन मृत्यु। ये सबकुछ सदियों के बाद भी नहीं बदला है। ये सारी चीजें ज्यों का त्यों हैं। इसके अलावा एक और बात। हमेशा जिज्ञासु बने रहें। मैं बहुत जिज्ञासु हूँ। ठीक इस समय मैं बहुत उत्साही हूँ क्योंकि कुछ सप्ताह पहले मैंने पानी की बूँद की बनवाट के बारे में पढ़ना और जानना शुरू किया है। पानी की बूँद की बनवाट को जानने के लिए फिजिक्स, मैथमेटिक्स, ज्योमेट्री - इन सभी को पढ़ना शुरू किया। अचानक से मैंने पाया कि पानी की बूँद आधुनिक भौतिकशास्त्र के सामने अब भी सबसे बड़ी समस्या है। मैंने एक बड़े वैज्ञानिक से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा की, "लास्लो, ये हमारे लिए सबसे मुश्किल सवाल है"। मैं अपने बनारस की यात्रा के बारे में लिखना चाहता था क्योंकि मैं वहाँ पर पहले कभी नहीं गया था। फिर मैंने कुछ लिखा। पर मेरे सोचने का मुख्य बिंदु गंगा के पानी की एक बूँद ही था। उसके बाद से मेरी दिलचस्पी इसमें बढ़ गई की पानी की एक बूँद किस तरह से दिखती है। कई महीनों तक मैंने सिर्फ इसी सवाल के बारे में सोचा क्योंकि किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था। ठीक एक सप्ताह पहले मैंने अपने फिजिसिस्ट दोस्त से दुबारा मिला तो उन्होंने कहा, "मुझे अकेला छोड़ दो"। उन्होंने मुझे बताया की वैज्ञानिक जैसा कि समझ पा रहे हैं कि पूरा ब्रह्मांड ही अब अन्थ्रोपोमोर्फिक (मानवाकृतीय) है। पिछले पाँच सालों में ये साफ हुआ है कि प्रकृति के विभिन्न तत्वों के बीच में कई संबंध हैं। इन सभी चीजों को पढ़ने और सुनने के बाद मैंने बुद्ध के बारे में सोचना शुरू किया। लगा कि मुझे ये भी जानने की कोशिश करनी होगी कि उन्होंने अपनी मगधी भाषा में क्या कहा है? मैं पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकता। पीड़ा मेरे लिए सबसे बड़ा और जरूरी शब्द है। आधुनिक भौतिकीशास्त्र और बुद्ध के विचारों में मैं कई तरह के जुड़ाव देखता हूँ। शायद बुद्ध ने पीड़ा को सामान्य लोगों की तरह ना देखा हो लेकिन पीड़ा का उनके लिए कोई दूसरा अर्थ भी रहा हो। जैसे कि अगर मैं सामने रखे ग्लास को छूता हूँ तो मेरा इसे हिलाते ही इसे पीड़ा होती है, पानी के अणु एक नया समूह बनाते हैं। मैं इसका साधारणीकरण कर रहा हूँ क्योंकि मैं अँग्रेजी में बोल रहा हूँ...

शर्मिष्ठा मोहंती : क्या आप कह रहे है कि बुद्ध चीजों के आपसी संबंधों के बारे में बात कर रहे थे?

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : हाँ। मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ इसे समझने की। आप ये उम्मीद नहीं कर सकते कि कोई विद्यार्थी ठीक वैसा ही बोले या समझे जो उसके शिक्षक ने कहा है। हमें लेखन की संस्कृति को बढ़ावा देना ही होगा। लेकिन उसमें भी गलत समझ की संभावना है। ये भी एक सच है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि सच यथार्थ के पीछे छिपी कोई चीज नहीं है। जैसे कि बहते हुए पानी में एक खास रोचकता और सुंदरता होती है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ये प्रवाह ही सच्चाई है। हमारे यहाँ पर कई दार्शनिक, लेखक और कवि हुए हैं जिनके बहुत अलग विचार रहे है लेकिन हमारी अब तक की संस्कृति का इतिहास, गलतफहमी का इतिहास है। इसके हजारों उदाहरण है। शायद ये पूरे विश्व भर में लागू होता है। हम भ्रामक इतिहास के स्तर पर संपन्न हुए हैं। हेराक्लितस (Heraclitus) का ये कथन कि हम किसी नदी में दुबारा कदम नहीं रखते। लेकिन इसकी कितनी भ्रामक व्याख्याएँ हुई हैं। ये वाक्य एक बड़े समूह का हिस्सा है, जो एक जटिल संदर्भ से जुड़ा हुआ है। पूरा यूरोप इस तरह की जटिलता से भरा हुआ है। यूरोप किसी खतरनाक अँधेरे कमरे की तरह है। हमें हर हाल में आगे बढ़ना होता है भले ही कितनी भी खतरनाक बाधाएँ हों और भले ही दूर-दूर तक रोशनी ना दिखे। बुद्ध ने कहा है कि हमारे समझने के लिए कुछ भी नहीं है। इस तरह से कुछ मूलभूत चीजें कभी नहीं बदलती। मैं यहाँ पर मृत्यु के बारे में बात नहीं कर रहा बल्कि मृत्यु के डर के बारे में बात कर रहा हूँ।

शर्मिष्ठा मोहंती : ये मानसिकता उच्च शिक्षित वर्ग में भी है। ऐसे ढेर सारे पश्चिम के विद्वान है जो उपनिषद के दर्शन के बारे में बात करते हैं और मोक्ष के बारे में भी। यहाँ तक कि एक विद्वान ने ये भी कहा है कि भारतीयों में इस दुनिया और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने की इच्छा इसलिए दिखती है क्योंकि वहाँ हमेशा से उष्ण वातावरण रहा है और शुरू से ही बीमारी, गर्मी और मृत्यु का बोलबाला रहा है।

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : (हँसी) शायद आप नहीं जानती। मुझे लगता है कि जानने जैसा या समझने जैसा कुछ है ही नहीं। ये मेरा काम नहीं है। पूरा ब्रह्मांड एक रहस्य है। लावोत्से ने कहा है कि वो काम करो जो पत्थर, नदी या फूल करते हैं। हर बड़े चिंतक ने हमें ये समझाने की कोशिश की है कि कुछ भी अस्तित्व में नहीं और ना ही कोई अंतिम सत्य है। अगर आप किसी कार दुर्घटना के बारे में बात करें तो किसी को ये बताना मुश्किल होगा कि किस तरह से कई सारी घटनाएँ मिलकर उस घटना का कारण बनीं। अगर हम रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी एक घटना को ठीक से नहीं बता पाते तो हम पूरे ब्रह्मांड से जुड़े बड़े सवालों के बारे में इतनी आसानी से कैसे सोच सकते हैं? अच्छा हो कि हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन से शुरू करें, जैसे की डोर्का की आँखें, जो कि बहुत रहस्यमय है। या आपकी आँखें। जेन मत के अनुसार हमें कुछ समझने की जरूरत नहीं है। लेकिन सिर्फ यही काफी नहीं। ये थोड़ा सा सिनिकल है। बुद्ध ने जो कहा है वो ज्यादा मददगार है। जेन चिंतकों का ये कहना की जब तुम अन्याय, गरीबी या मृत्यु के भय से पीड़ित हो तो शांत हो जावो। सबकुछ भूल जावो। इसका मतलब क्या है? हमारे लेखन में भी एक जिम्मेदारी होती है। हम एक पतली रेखा खींचते है। जीवन की कई सारी चीजों को लेकर हम लाचार होते हैं, चाहे वो कला, संस्कृति या विज्ञान से जुड़े हों। पिछले दस सालों में मैंने पूरी कोशिश की है कि मैं अच्छा लिखूँ। हर एक वाक्य को अच्छी तरह से लिखने की कोशिश की है। लेकिन सिर्फ यही काफी नहीं है। मैं अच्छी किताबें लिखता हूँ। आप भी अच्छी किताबें लिखती हैं, होमर ने भी लिखा, लेकिन सबकुछ जैसे का तैसा है। वहीं का वहीं। इसलिए मैं अपने आपको थोड़ा असहज, अशांत और बेचैन महसूस करता हूँ। खैर, हम लोगों ने काफी बातें कर ली...

शर्मिष्ठा मोहंती : बिल्कुल...

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : क्या हमें खाने के लिए चलना चाहिए?

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(हमारी बातचीत का दूसरा दिन। हम सुबह मिले। इस बार हम होटल के कोर्टगार्ड कैफे में मिले और पेड़ों के नीचे बैठे। तेज धूप निकली थी लेकिन जल्द ही बारिश होने लगी। हम एक बड़े से छाते के नीचे बैठे और अपनी बातचीत को जारी रखा। उनकी पत्नी डोर्का व्यस्त थीं और बातचीत के दूसरे दिन नहीं आईं। दूसरे दिन लास्लो अपने साथ हंगेरियन-अँग्रेजी शब्दकोश लेकर आए। - शर्मिष्ठा मोहंती)

शर्मिष्ठा मोहंती : आपने अपने उपन्यासों में एक खास भविष्य घोषणा (apocalyptic) की बात की है। लेकिन मुझे आपकी किताबों से एक खास विश्वास मिला है। सिर्फ धार्मिक विश्वास नहीं बल्कि हमेशा बने रहने वाला विश्वास।

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : इस बारे में कुछ भी कहना आसान नहीं। आपको पता होगा कि थॉमस बर्न्हार्ड (प्रसिद्ध जर्मन कवि और लेखक) ने एक जगह कहा है कि, "अगर किसी हवाई जहाज की दुर्घटना होता है तो हर मिनट हवाई जहाज पर अविश्वास करने वालों की संख्या बढ़ती है"। मुझे लगता है कि जिंदगी का आखिरी पड़ाव मृत्यु नहीं बल्कि मृत्यु का डर है। मैंने ढेर सारे दोस्तों, रिश्तेदारों और अपनी भाषा के वरिष्ठ लेखकों को खोया है। उनके पास जिंदगी के आखिरी दौर में जीवन को लेकर नफरत या डर था। वो जिंदगी जीने में अपनी दिलचस्पी खो चुके थे। मैं इस बात को अच्छी तरह से समझ पाया हूँ कि किसी चीज में विश्वास करने का क्या मतलब होता है। चीन और जापान में मुझे सबसे पहले गूढ़ (transcendental) अनुभव हुए। लेकिन ये सवाल मेरे लिए बहुत जरूरी है। ये सारे अनुभव होने के बाद मैं बहुत द्वंद्व में था। तो, अब क्या होगा? लेकिन मुझे जवाब अब तक नहीं मिला। मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में अब भी कुछ पवित्र और पाक लोग हैं। इन लोगों में मेरा विश्वास भी है। लेकिन इन लोगों के विश्वास में मेरा विश्वास नहीं है। मैं सिर्फ लोगों में विश्वास कर सकता हूँ। ये मेरी स्थिति है। मेरा काम इतना है कि उन लोगों को समझने की कोशिश करना जो किसी चीज में विश्वास करते हैं। अपने आप में ये एक बड़ा काम है। उन लोगों को देखते हुए मैं ये गहराई तक महसूस करता हूँ कि मैं भी किसी चीज में विश्वास कर सकता हूँ बल्कि उन लोगों के साथ एक जुड़ाव महसूस करता हूँ।

शर्मिष्ठा मोहंती : मुझे बर्न्हार्ड के लेखन में बहुत अंधकार दिखता है।

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : असल में बर्न्हार्ड ने इस दुनिया से बहुत नफरत की। जो कि मैंने कभी नहीं किया। कभी-कभी थोड़ा कर भी लेता हूँ। (हँसी) आज ही के दिन को देखिए। लगातार बारिश हो रही है। चारों तरफ हरियाली है। ढेर सारे प्यारे लोग हमारे आस-पास में हैं। असल में मैं बर्न्हार्ड को जानता था। उनके दादा एक पाक किस्म के आदमी थे। लेकिन बर्न्हार्ड का इस दुनिया से नफरत करना एक तरह से खुद को सुरक्षित रखने का तरीका था। वो भीतर से मजबूत नहीं थे। वो इस हद तक संवेदनशील थे कि उन्हें इस दुनिया से सीधे संपर्क में आने का खतरा लगा रहता था, जिसमें वो खुद को बचा नहीं पाते थे। इसलिए वो इस दुनिया से नफरत करते थे। जवानी के दिनों में वे बहुत बीमार रहे थे। उन्हें फेफड़े की बीमारी थी। लेकिन ऐसे ढेर सारे लोग होते हैं जिन्हें बीमारियाँ होती हैं। ये फेफड़े की बीमारी भी बहुत रोमांटिक बीमारी है। जर्मन साहित्य की दुनिया में इसे एक पवित्र बीमारी माना गया है। एक ऐसी बीमारी जो हमेशा महान या प्रतिभावान लोगों को हुई है। बर्न्हार्ड को मैं बहुत पसंद करता था। लेकिन मुझे हमेशा अपने इस भावना को छुपाना पड़ा। अगर उन्हें पता चल जाता कि मैं उन्हें इस हद तक पसंद करता हूँ तो वो गुस्सा करते। इस तरह की भावना उनके लिए बहुत बेवकूफाना होती। एक और बात, उनकी आत्मा में कभी विश्वास नहीं था। उन्होंने कभी लोगों पर विश्वास नहीं किया। उन्हें फेफड़े की नहीं बल्की अविश्वास की बीमारी थी। आपने ठीक कहा कि मेरा अपना काम बहुत अलग है। बर्न्हार्ड मुख्यतः कवि थे लेखक नहीं। एक कवि हमेशा खुद के साथ काम करता है। मैं लेखक हूँ इसलिए पूरे ब्रह्मांड के साथ मेरा संबंध है।

शर्मिष्ठा मोहंती/कबीर मोहंती : हम लोग कल शाम को इसी संदर्भ में बात कर रहे थे, लगभग इन्हीं शब्दों में।

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : दो महाद्वीप, यूरोप और भारत, किस हद तक एक दूसरे के करीब हैं ये सुनकर मुझे अच्छा लग रहा है। गद्य लेखन अपने आप में खुद से बाहर आने की एक संभावना है। (हँसी) इस दुनिया में मेरे अलावा ढेर सारे दिलचस्प लोग हैं। मैं ये नहीं कह रहा की मैं दिलचस्प नहीं हूँ पर दूसरे लोग मुझसे ज्यादा दिलचस्प हैं। मेरे पास गरीबी का एक लंबा अनुभव है। तीस साल का होने पर मैंने खुद को परिपक्व पाया। फिर एक दिन वो भी दिन आया जब खुद में मेरी दिलचस्पी कम होनी लगी। उन्हीं दिनों अंकल जोसेफ में मेरी दिलचस्पी अचानक से बढ़ गई। और कुछ दूसरी मानवीय परिस्थितियों ने मुझे गहरे तक उदास किया। और फिर अचानक से मेरे दिमाग में स्पष्टता आई कि इन चीजों के बारे में लिखना है। इसमें समय लगा। धीरे-धीरे मैंने अपने काम को समझा। मुझे वो उपन्यास पसंद नहीं जिसका लेखक के वजूद से सीधा संबंध नहीं होता। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। लेकिन ये कवियों के साथ कुछ अलग होता है।

एक कवि हमारे सामने खुली आत्मा की तरह होता है। अगर मुझे किसी चीज को गहराई तक महसूस करना है तो किसी कवि को पढ़ता हूँ। मैं गद्य और पद्य को बाँटने वाली लकीर को अच्छी तरह से देख पाता हूँ।

शर्मिष्ठा मोहंती : मेरे हिसाब से आप हमारे समय के कुछ महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। मैंने महत्वपूर्ण शब्द का उपयोग बहुत सावधानी और सोच-समझ कर किया है। इतनी गहराई, कथन की क्षमता और भाषा की उत्कृष्टता जो कई बार कविता की तरह लगती है। साथ ही एक दार्शनिक गहराई भी। ये सारी विशेषताएँ किसी एक लेखक में मिलना बहुत मुश्किल है।

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : लेकिन मुझे इससे दिक्कत होती है। इसके कारण मैं खुद को बहुत अकेला पाता हूँ।

शर्मिष्ठा मोहंती : बेशक, मैं ये समझ सकती हूँ।

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : पर मैं अकेला नहीं हूँ। अकेलापन मेरी समस्या नहीं है। हो सकता है की सतांतागो लिखने के दौरान खुद को रोमांटिक महसूस किया हो। लेकिन अब नहीं। ये गद्य लेखन का एक हिस्सा है। गद्य लेखक के तौर पर ये मेरी जिम्मेदारी है कि मैं इस दुनिया का एक संपूर्ण चित्र प्रस्तुत कर सकूँ। मुझे अपनी इच्छाओं के बारे में बात करते हुए डर नहीं लगता। ये मेरी इच्छा है की मैं इस दुनिया का एक संपूर्ण चित्र खीच सकूँ। लेकिन इस सवाल का एक दूसरा हिस्सा भी है। मेरे लिए सबसे खतरनाक स्थिति वो है जब ये लगे कि मैंने कुछ समझ लिया है। कुछ पाने के लिए आपको किसी खजाने को खोजने की जरूरत नहीं है। बस आपको लगातार खोजना है। सोचना है। और ये छोटा काम नहीं है। मैं कई बड़े सवालों को लेकर अब भी स्पष्ट नहीं हूँ। लेकिन ये मेरा काम नहीं है। मैं उपन्यासकार हूँ, दार्शनिक नहीं। पिछले कुछ सालों से मैं थोड़ा अलग तरीके से लिख रहा हूँ। अपने शुरुआती उपन्यासों में खास तौर से साल 2000 तक मैंने ये कोशिश की है कि जिंदगी का कोई रूप दिखा पाऊँ। उसके बाद मैंने ये महसूस किया और पता नहीं ये कहाँ तक ठीक है, अब मैं चीजों को संपूर्णता में देख पाता हूँ। सवालों और जवाबों के बजाए मेरी दिलचस्पी इसमें ज्यादा है कि मैं संशय की स्थिति में बना रहूँ। पिछले पाँच सालों से मेरा मुख्य काम यही रहा है कि मैं खुद को संशय की स्थिति में रखूँ। किसी अंतिम निर्णय पर पहुँचने के बजाय अपने सवालों और जवाबों पर संशय करूँ। मुझे यात्राएँ पसंद हैं। गलियों से गुजरना पसंद है। और ये सबकुछ करते हुए मेरे भीतर संशय ही रहता है। एक ऐसी क्षमता जिसमें मैं अपने दिमाग और जिंदगी को नियंत्रण में रखता हूँ। संशय की क्षमता अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण है। हम सभी बारिश को देखते हैं पर मेरी दिलचस्पी इसमें है कि बारिश असल में है क्या? या कोई बूँद किस तरह से दिखती है? क्या हमें कोई जवाब मिला? नहीं, हमें अब तक नहीं पता। अंतिम समाधान यही है कि उस संशय के द्वीप पर ही रहा जाए।

मैं उस द्वीप पर बहुत आसानी से रह पाता हूँ। ऑलमोस्ट आइलैंड। (हँसी) लगभग एक द्वीप। एक ऐसा द्वीप जो किसी दूसरे द्वीप से बहुत कम जुड़ा हुआ है।

शर्मिष्ठा मोहंती : पूर्व के देशों में आपकी विशेष रुचि है। खास तौर से चीन और जापान में। पूर्व या पूर्व के देशों को आप खुद अपने लेखन में किस तरह से देखते हैं?

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : मैं चीन गया क्योंकि मैं उन दिनों भारत नहीं जा सकता था। पुराने गणितज्ञों, दार्शनिकों ने मुझे हमेशा से भारत जाने के लिए प्रेरित किया। एक गैर-मानव के चित्रण ने मुझे हमेशा भारत की तरफ आकर्षित किया। पर चीन ने उस तरह से आकर्षित नहीं किया। और जापान के बारे में ये की जापान की संस्कृति बहुत दिलचस्प है। मैं हमेशा से उन जगहों पर जाना चाहता था जहाँ नागार्जुन जैसे दार्शनिक रहे हैं। जहाँ कई ज्योतिष के आचार्य और धर्म के प्रथम चिंतक रहे हैं। ये सबकुछ जानने के लिए कि मैं वहाँ हूँ जहाँ ये सारे लोग रह चुके हैं। सिर्फ ये जानने के लिए कि मैं वहाँ हूँ जहाँ बुद्ध रह चुके हैं। एक दुर्घटना के तहत 1990 में मैं मंगोलिया पहुँच गया। लेकिन वहाँ पहुँचने के बजाय मैं अमेरिका या पश्चिमी यूरोप जाना चाहता था। लेकिन मंगोलिया को देखना कुछ ऐसा रहा जिसकी पूरी पृथ्वी पर कल्पना करना मुश्किल है। वो बहुत अलग था। मंगोलिया पूर्वी यूरोप से कहीं ज्यादा कम्युनिस्ट शासन से प्रभावित रहा है। उन दिनों मंगोलिया में बहुत खराब समय चल रहा था। हर तरफ नाक फाड़ने वाली बदबू थी। हर चीज के भीतर एक गंध होती है, चाहे वो चाय हो या पानी। मैं उस समय का मानचित्र देख रहा था और तब मैंने निर्णय लिया कि मुझे चीन के पूर्वी हिस्से में जाना है। मैं और मेरे दोस्त ट्रेन से गोबी रेगिस्तान को पार करते हुए बीजिंग पहुँचे। बीजिंग में मैं गुयला के एक लड़के से मिला। मैं एक सम्राज्य का हिस्सा था लेकिन सबकुछ नहीं देख पा रहा था। मैं और मेरे दोस्त के लिए इतिहास का मतलब बहुत अलग था। एक ऐसा इतिहास जो किसी सीधी लकीर पर नहीं चलता। इस अनुभव ने मुझे मदहोश कर दिया। हम दोनों कान्टों और हॉग-कौंग गए। उस दौरान मैंने चीन के बारे में अच्छा-खासा पढ़ा। बुरी चीजें भी। उन्हें भी जानना जरूरी था। उसके बाद फिर कई बार चीन गया। अभी कुछ साल पहले ही मैं जापान गया था। जापान में मेरे एक दोस्त हैं जिन्होंने एक फेलोशिप शुरू की थी। और वो लगातार इसके बारे में बात करते थे। वो फेलोशिप मेरे लिए किसी सपने जैसा था, कुछ-कुछ भ्रम की तरह। क्या ये वाकई में सच है? मेरे दोस्त लगातार जापानी संस्कृति और राजनीति पर बात करते थे। मैं उनसे लगातार फोन पर पूछता था - वहाँ की सड़कों पर आपको क्या दिखता है? वहाँ के लोग किस तरह से दिखते हैं? वहाँ पर आपको किस तरह के रंग दिखते हैं? मेरे दोस्त ने कहा कि मुझे इस फेलोशिप के लिए आवेदन करना चाहिए। मैंने फेलोशिप के लिए आवेदन-पत्र भर दिया, ये कहते हुए कि मेरी विशेषज्ञता भविष्य-रहस्य उद्घाटन अध्ययन (Apocalypse Studies) में है। और मुझे फेलोशिप मिल भी गई।

जब मैं वहाँ गया तो उन्होंने मुझे बताया कि मेरी विशेषज्ञता ही मुझे फेलोशिप दिए जाने का सबसे बड़ा कारण है। मैं हँस नहीं सकता था क्योंकि जापान में आपको अपनी भावनाओं को छिपाना पड़ता है। अपने पहले दौरे के दौरान क्योटो में मैंने एक नोहा परंपरा के गुरु के साथ लंबा समय बिताया। वो एक निहायत पाक आदमी थे। उनका परिवार और कुछ दूसरे लोग उनके शिष्य थे। जापान ने मुझे बहुत प्रभावित किया। जापान में मैंने 200 से ज्यादा मंदिर देखे। हर मंदिर में सुंदर बगीचे और चित्र थे। सबसे बड़ी बात जापान का अपना संपूर्णता का सौंदर्यशास्त्र है जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। अपूर्णता और संपूर्णता के बीच में एक खाली जगह है और वो जगह पागलपन की है। पागलपन की ये जगह बहुत दिलचस्प है। चीन की तरह जापान में रहते हुए भी मैंने जापान के बारे में बहुत कुछ पढ़ा। फिर मैं जापान कई बार गया।

शर्मिष्ठा मोहंती : आज के समय में आप उपन्यास विधा को किस तरह से देखते हैं? क्या आपको लगता है कि अब ये एक थकी हुई विधा है?

लास्‍लो क्रस्‍नाहोरकाई : साहित्य की पुरानी विधाएँ संकट में नहीं है। असल में हम संकट में हैं। साहित्य की सारी पुरानी विधाएँ अद्भुत हैं। प्राचीन ग्रीक के इतिहास और साहित्य को देखें तो वहाँ आपको कलाकार, कवि, नाटककार, दार्शनिक सब एक साथ मिलेंगे। उन्होंने कई अद्भुत विधाओं का इस्तेमाल किया। ये विधाएँ कभी संकट में नहीं रहीं। 5वीं सदी के बाद लोगों में एक गिरावट आने लगी। हेक्सामीटर अब भी दिलचस्प है। 5वीं सदी से 21वीं सदी तक। पर अब हम उतने दिलचस्प नहीं हैं। हमने नई विधाएँ इसलिए खोजी क्योंकि हम संकट में हैं। उपन्यास एक जरूरी विधा है बल्कि क्लासिक उपन्यास भी। लेकिन फ्लौबेर के समय से ही एक खास तरह का संकट देखने को मिलता है। 19वीं सदी के अंत में ये संकट और बढ़ गया। अब हम पुराने तरीके से लिखने की अपनी योग्यता को खो चुके हैं। अब हमें नयापन पसंद है। हम मानव जीवन को अभिव्यक्त करने के लिए नई विधाएँ और नई संभावनाओं को खोज रहे हैं।

(क्रस्‍नाहोरकाई के फ्रेंच अनुवादक आ चुके थे। उन्हें लास्लो के किसी उपन्यास पर काम करने के लिए मिलना था। क्रस्‍नाहोरकाई ने अंतिम वाक्य के रूप में कहा ,"तात्कालिक विदाई के बाद शायद फिर कभी मिलना हो ")

(साभार: almost island - monsoon 2012 इस बातचीत को मूल अँग्रेजी में इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है:

http://www.almostisland.com/monsoon_2012/pdf/an_island_of_doubt.pdf)


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हिंदी समय में लास्लो क्रस्नाहोरकाई की रचनाएँ