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कहानी

गुनाह-बे-लज्जत
रामनगीना मौर्य


"उस दिन बाजार जाते समय पूरे रास्ते भर यही सोचती रही कि घर से निकलते वक्त नल में पानी नहीं आ रहा था। लाइट भी कुछ देर पहले ही चली गई थी। पता नहीं मैंने नल की टोटियाँ बंद की थीं कि नहीं...। कमरे और बरामदे में पंखे और ट्यूबलाइट्स आदि के स्विच बंद किए थे या नहीं...। गैस का नॉब खुला ही तो नहीं छोड़ दिया था...। यहाँ तक कि घर के पिछवाड़े वाले दरवाजे में ताला लगाया भी था या सिर्फ कुंडी ही बंद की थी...। सोचा आपसे कहूँगी तो खाहमखाह परेशान होंगे, मुझ पर नाराज होंगे। डाँटने भी लगेंगे, वो भी बच्चों के सामने ही। आपके झक्की-सनकी दिमाग का तो वैसे भी कुछ पता नहीं चलता, कब क्या कह दें...? किसी के भी सामने बकने-झकने लगते हैं। सो चुप लगा गई। पूरे रास्ते इन्हीं सब उहा-पोह में रही। मन में उलझन बना रहा। बाजार से जो भी सौदा-सुलुफ आदि खरीदना था, कुछ भी ठीक से याद नहीं आ रहा था। उसी उधेड़बुन में ये ध्यान भी नहीं रहा कि खरीदने वाले सामानों की लिस्ट कहाँ रख दी...? जब कुछ भी ध्यान नहीं आया तो याददाश्त के आधार पर ही, और दुकान में चार-पाँच सामान जो भी सामने दिख गए, बस्स उन्हें ही खरीद सकी थी। बाजार से लौट कर देखा तो मेरी सभी आशंकाएँ निर्मूल साबित हुईं। मैं वाकई अपनी जगह सही थी। नल की टोंटियाँ बंद थीं। पंखे-बत्तियों... के सभी स्विच, यहाँ तक कि गैस का नॉब भी बंद था, और पिछवाड़े के दरवाजे पर ताला भी बंद मिला। देखिए जी! अब आगे से हम जब भी घर से बाहर निकलेंगे तो आप भी इन सब बातों का ध्यान रखेंगे। पंखे-बत्तियाँ-नल की टोटियाँ-गैस की नॉब आदि बंद हैं या नहीं...? घर में सभी दरवाजें बंद हैं, ठीक से ताला-वाला लगा दिया गया है या नहीं...? अब मेरी भी तो उमर हो चली न! ...कुछ चीजें आप भी तो याद रखा कीजिए...।"

पत्नी ने अभी पिछले हफ्ते ही तो लगभग चिरौरी की सी मुद्रा में ये सब कहा था मुझसे। अब बीच रास्ते में इस समय मैं यही सोच रहा हूँ कि आज सुबह घर से निकलते वक्त हमने पंखे-बत्तियाँ, गैस का नॉब, और नल की सभी टोंटियाँ, वगैरह, बंद किए थे कि नहीं...? आगे-पीछे के सभी दरवाजों के लॉक आदि ठीक से चेक किए थे या नहीं...? मुझे तो ठीक-ठीक कुछ याद नहीं आ रहा, पर क्या पत्नी को इन सब के बारे में याद दिलाना ठीक रहेगा? मान लीजिए... मैं उन्हें अपनी इन आशंकाओं के बारे में अगर बताऊँ, तो वो भी तो इस बारे में सोच-सोच कर परेशान होंगी। ऐसे में कहीं इस खुशनुमा सफर, उनकी छुट्टियों का मजा ही किरकिरा न हो जाए?

हालाँकि मेरी ये आशंका बे-वजह भी नहीं है। एक-दो बार हमारे साथ ऐसा हो भी चुका है, हम बाजार गए, और जब लौट कर घर आए तो देखा कि किचन के नल की एक टोंटी तो खुली ही रह गईं थीं, ड्राइंग-रूम के पंखे का स्विच, घर से निकलते वक्त बिजली न होने के कारण, उसे 'ऑफ' करने का ध्यान ही नहीं रहा, पंखा चलता हुआ मिला। बाद में हम दोनों पति-पत्नी इस लापरवाही के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण करते, आपस में झल्लाए-गुस्साए भी थे। हालाँकि बात-बहस में हमारी ऐसी भूलों पर यदा-कदा, पत्नी ये जोड़ना भी नहीं भूलती कि... "थोड़ा सा लंबा-कद होने का मतलब ये नहीं कि आप मुझसे ज्यादा अकलवान हैं। आखिर... घर की जिम्मेदारियों के बारे में सोचने की जिम्मेदारी आपकी भी तो बनती है...?"

पत्नी तो अपने बगल वाली सीट पर बैठी महिला संग खूब घुल-मिल कर... चहकते हुए बतियाने में मगन हैं। साफ दिख रहा है कि उनसे बतियाते समय पत्नी के मुख-मंडल पर गजब की आभा बिखरी हुई है। घर में तो हमेशा इनके सिर में मधुरे-मधुरे... अधकपारी ही धरे रहता है। लगता है जैसे इनके मुँह में जुबान ही नहीं है। और यहाँ देखिए... कैसे पचर-पचर बतियाए जा रहीं हैं। आखिर... काफी समय बाद नइहर जाने का उल्लास भी तो इनके मन में होगा? फिर मैं भी तो... ट्रेन में बैठे-बैठे, खिड़की के पार दिखते, रास्ते में पड़ते, सरपट पीछे छूटते घर-कस्बे, बाजार-गाँव, खेत-खलिहान, पेड़-नदी, उस पर बने पुल, नदी किनारे रेती पर गुल्ली-डंडा आदि खेलते बच्चों को देखने में मगन हूँ...।

"उड़ि-उड़ि बऽइठे हलवइय्याऽ दुकनियाँऽ रामाऽ..." डिब्बे में ही बैठे, एक बूढ़े मलंग बाबा अपनी धुन में मगन, ये गाना गाते, संग-संग तानपुरा बजाते यात्रियों का मनोरंजन भी कर रहे हैं। ट्रेन की खिड़की से बाहर, तेजी से पीछे भागते हवाओं संग झूमते पेड़ बड़े ही लुभावने लग रहे हैं।

"वासुदेव जी, आप पूरा नाम क्या लिखते हैं...?"

"सी.आर. वासुदेव।"

"सी.आर. माने...?"

"छिंटाई राम...। वासुदेव मेरा 'सर-नेम' है।"

"आप ऐसा करिए, हमारे मोबाइल पर एक ठो 'मिस्स-कॉल' मार दीजिए। हम आपका नंबर सेभ कर लेते हैं।" मेरे सामने वाली सीट पर बैठे दो सज्जनों ने एक-दूसरे का फोन-नंबर लिया।

एक बच्चा, जिसके माथे पर उसकी माँ ने काला डिठौना लगा रखा था, कभी अपनी माँ के कंधे पर तो कभी गोद में आ जाते, खेल रहा है। खेलते-खेलते कभी वो बच्चा अपनी माँ की लटों को, जो चलती ट्रेन में खुली खिड़कियों से लगातार आ रही हवा के झोंको से बार-बार उसके मुँह पर आ जा रहे हैं, उसकी माँ लटों को बार-बार अपने कान के पीछे खोंसती, लेकिन वो मासूम, परंतु चंचल बच्चा, कभी कान के पीछे खुँसे अपनी माँ की लटें, तो कभी उसके कानों से लटकती बालियाँ खींचते, उसे परेशान कर रहा है। महिला भी अपने बच्चे संग खेलती, गुस्साती तो कभी उस संग खुद भी किलकारी मार रही है। माँ-बेटे को इस तरह आपस में खेलते देखना अच्छा लग रहा है। बड़ा ही सुहावना मंजर है। अद्भुत, अवर्णनीय अनुभव है। उम्मीद है कि माँ-बेटे की ये कवायद, ये प्यार-दुलार, मेरे साथ ही, आस-पास बैठे दूसरे लोगों को भी सुखद लग रहा होगा।

थोड़ी देर के लिए मैं भी अपने सभी संशय-वंशय भूल कर उस बच्चे को देखते, अपने बचपन की यादों में कब खो गया... पता ही नहीं चला।

ट्रेन की सीटी की आवाज पर मेरी तंद्रा टूटी।

मेरे दोनों बच्चे, काफी देर तक खिड़की के बगल वाली सीट पर बैठने के लिए लड़ने-झगड़ने, 'ओक्का-बोक्का' खेलने के बाद अब मशगूल हूँ... रास्ते में पड़ने वाले बीच के स्टेशनों के कुछ दूर तक पटरियों के दोनों किनारों पर बसी बस्तियों, दुकानों, उन पर लगी होर्डिंग्स आदि को अपनी ही स्टॉयल में खीसें निपोरते, बोल-बोल कर पढ़ने में... 'किरन प्रोविजन स्टोर... शट-अप से गेट-अप तक... नब्बे दिन में अँग्रेजी सीखिए... अभिलाषा बुटीक... यादव लोहा भंडार... बवासीर-भगंदर का बिला ऑपरेशन गारंटीशुदा इलाज किया जाता है... निःसंतान दंपत्ति मिलें या जवाबी लिफाफे के साथ निम्न पते पर लिखें... राखी बटन सेंटर... महावीर सीमेंट... महाठंडी बियर... ए-टू-जेड पुस्तक भंडार... देखो गधा मुत (वैसे 'म' पर बड़ा ऊ की मात्रा होनी चाहिए थी।) रहा है... हमारे यहाँ शुद्ध देशी घी से बनी मिठाइयाँ मिलती हैं, नक्कालों से सावधान... यहाँ इश्तिहार चिपकाना मना है... मादक पदार्थों का सेवन कर वाहन न चलाएँ... (ध्यान दिलाता चलूँ... इस आखिरी 'स्लोगन' में यद्यपि 'न' शब्द को खरोंच दिया गया था, तथापि पठनीय था।)

बेटे ने अभी-अभी अपनी दीदी से दीवार पर लिखी इबारत... 'यहाँ इश्तिहार चिपकाना मना है।' में आए 'इश्तिहार' शब्द के मायने पूछे हैं। बहन ने अपने छोटे भाई को 'इश्तिहार' शब्द के मायने बताए। बेटे की प्रश्नाकुलताएँ देख कर लगा कि बेटा भी अब प्रश्न करने लगा है, यानि धीरे-धीरे समझदार हो रहा है। बड़ा हो रहा है। ये महसूस करते अच्छा लगा। यानि सभी मगन हैं अपने-अपने तरीके, और यात्रा का भरपूर आनंद भी ले रहे हैं।

ऐसे में दाल-भात में मूसलचंद बनना अच्छी बात नहीं होगी। अपनी आशंकाओं के बारे में पत्नी-बच्चों से कुछ पूछ-ताछ कर, उन्हें बिनावजह ही 'डिस्टर्ब' करना, उन्हें संशय में डालना अच्छा नहीं होगा। पत्नी, लगभग चार साल बाद अपने नइहरे जा रहीं हैं, और फिर बच्चे भी तो जा रहे हैं अपने नाना-नानी के घर। ऐसे में इन्हें टोकना, इनके रंग में भंग डालने के बराबर होगा। यात्रा के दौरान, आखिर... कोई तो निश्चिंत रहे? थोड़ी देर के लिए ही सही?

पर बार-बार मेरे मन में ये विचार आलोड़न-बिलोड़न भी हो रहे हैं... 'मान लीजिए... वापस घर लौटने से पहले ही पत्नी ने इन आशंकाओं के बारे में कहीं मुझसे पूछ लिया अगर कि... 'घर से निकलते वक्त आपने, नल की टोटियों, बत्तियों, गैस की नॉब, सभी दरवाजों के ताले आदि ठीक से चेक कर लिए थे या नहीं?, ...यदि नहीं, तो कम-अज-कम घर से निकलते वक्त मुझे ही याद दिला देते?' ...तो मैं उन्हें क्या जवाब दूँगा?

मैं भी कितना बेवकूफ हूँ। मुझे घर से ऐन निकलते वक्त ही इन सब बातों के बारे में क्यों नहीं याद रहा...? अब तो घर से पचासों किलोमीटर दूर निकल आए हैं हम-सब-जन। अब तो चाह कर भी इस संशय का तात्कालिक समाधान संभव नहीं। पत्नी तो बाजमौके कहती भी हैं... "आप भी बुड़बकैऽ रह गए।"

मेरी इन्हीं आदतों की वजह से अब तो गाहे-बगाहे बच्चे भी कहने लगे हैं... "पापा आपको तो एकदम्मैऽ अकल नहीं है, बच्चे के बच्चे ही रह गए? जब अकल बँट रही थी तो आप मम्मी के पीछे, लाइन में क्यों नहीं खड़े हो गए थे? बाँटने वाला शायद कुछ अकल आपको भी दे देता? एही लिए तो दादा जी भी कभी-कभी आपको... 'बुड़बक कहीं का'... कहते रहते हैं।"

बच्चे शायद ठीक ही कहते हैं। आखिर आजकल के बच्चे जो हैं... व्हिच किड्स'...।

पत्नी इतने दिनों बाद अपने नइहर जा रही हैं। मुझे उन्हें किसी प्रकार के धर्म-संकट में डालना उचित नहीं रहेगा। फिर बच्चे भी तो कितने खुश हैं...। हाल-फिलहाल-बहरहाल अब इस मुद्दे पर मुझे ज्यादा मंथन नहीं करना है।

इस खिस्सा-कहानी को तो यहीं समाप्त हो जाना चाहिए। पर ऐसा हो नहीं सका। ईऽ चंचल मन-मयूर भी जाने किन-किन बियाबानों में नाचता-भटकता फिरता रहता है? किसी करवट चैन से बैठना ही नहीं चाहता। रह-रह कर बेकाबू हो रहा है। बड़ी देर से न खुद चैन से बैठ रहा है, न मुझे ही चैन से बैठने दे रहा है।

इस समय पत्नी पूरे उत्साह से लबरेज अपने बगल में बैठी महिला संग बतियाने में मशगूल हैं। दोनों महिलाओं के बीच घर-परिवार-सास-ससुर आदि की निंदा-स्तुति की वार्ता का प्रथम दौर समाप्त हो चुका है। वार्ता के दूसरे चरण में वे अपने-अपने पतियों की नौकरी, केतना तनखाह पाते हैं? केतना लरिका-बच्चा लोग हैं? कउने-कउने किलाऽस माँऽ पढ़ते हैं? आदि-आदि की चर्चा के बाद, अब वे वार्ता के तीसरे चरण में मँहगाई, चुनाव, सरकार गठन आदि खबरों पर चर्चारत हैं।

उनकी आपसी बातें सुन, कभी पढ़ी, कुंभ मेले पर लिखी 'कैलाश गौतम' की कविता 'अमौसा का मेला' की ये कुछ पंक्तियाँ बरबस ही याद आ गईं... "ए ही में चंपा-चमेली भेंटइली, बचपन की दूनों सहेली भेंटइली / ई आपन सुनावें उ आपन सुनावें, दूनों आपन गहना-गदेला गिनावें / असों का बनवलू, असों का गढ़उलू, तू जीजा का फोटो न अब तक पठवलू / न इन्हें रोके न उन्हें रोकें, दूनों अपनी दुल्हा की तारीफ झोंके।"

चूँकि इस प्रकार की बात-बतकहियों में पत्नी के अंदर भरपूर आत्मविश्वास एवं चेहरे पर आई अप्रतिम-आभा का अभूतपूर्व संगम सा दिखने लगता है, अतः ऐसे में उनके आत्मविश्वास एवं चेहरे पर आई इस कांति को मैं असमय ही निस्तेज नहीं करना चाहता, पर क्या करूँ मजबूरी है? ये चंचल मन, मान ही नहीं रहा। अब ज्यादा माथा-पच्ची करने के बजाय उचित होगा कि मैं उन्हें भी, उनके कर्तव्यों की याद दिला ही दूँ, क्योंकि समय रहते याद न दिलाने पर, या बाद में याद आने पर भी तो वो मुझे ही कोसेंगी न?

ट्रेन अभी रेलवे-क्रॉसिंग के पास खड़ी है। यही उपयुक्त अवसर है, और यही समय की पुकार भी। इस समय पत्नी का ध्यान शायद रेलवे-क्रॉसिंग से हट कर थोड़ी दूर पर खड़े उस ट्रक के पीछे लिखे जुमले पर है। जिसे वो बुदबुदाते हुए पढ़ते... हल्के मुस्कुरा भी रहीं हैं... "हँस मत पगली... प्यार हो जाएगा, / फिर ड्राइवर का ध्यान भंग हो जाएगा। सोच कि कितना रिस्की है तेरा यूँ फिस्स-से, हँस देना, / बस्स... इतना समझ ले कि ये ड्राइवर बेरोजगार हो जाएगा।"

फिर भी बेवजह, किसी किसिम का कोई ग्लानिबोध-अपराधबोध क्यों हो...? मुझे समय रहते, अपनी आशंकाओं-संशयों का समाधान कर लेना चाहिए। क्यों न पत्नी से डायरेक्ट मेथड... से ही पूछ लूँ...?

"तुमने कुछ कहा क्या मुझसे...?"

"नही तो...! आपके कान बज रहे होंगे शायद...।" पत्नी, जो ऐसे किसी अवांछित- अप्रासंगिक प्रश्न के लिए तैयार नहीं थीं, ने अचकचाते-अनमने ढंग से मेरी ओर देखते कहा।

"वही तो... तुमने कुछ कहा भी नहीं, पर मुझे लगा कि जैसे तुमने मुझसे कुछ कहा हो... जबकि तुमने तो कुछ कहा ही नहीं... पर मुझे ऐसा क्यों लगा...?"

"हाँ... वही तो...! बिना मेरे कुछ कहे ही आपको सुनाई भी दे गया। क्या पता आपके कान बज रहे हों..., पर आप तो कहते हैं कि आपको अब कुछ-कुछ कम सुनाई देने लगा है। दफ्तर में भी कलीग्स या बॉस की बातें ठीक से सुन नहीं पाते, अउर हाँ... परसों दोपहर में ही तो जब मैंने आपसे कहा कि... "कढ़ी-चावल बना है... खाएँगे?' तो आपने सुना... 'गाड़ी की चाभी कहाँ ले जाएँगे...?' अगर सुनाई कम देता है तो सामने वाले के 'लिप-मूवमेंट' पर भी तनिक... ध्यान दे दिया कीजिए, ताकि सामने वाले की बातें यदि ठीक से सुनाई न दी हों, तो कम-अज-कम... कहने का आशय ही समझ में आ जाए? लेकिन... ये क्या कि बिना कुछ कहे भी अब आपको सुनाई देने लगा?"

"ऐसी बात नहीं है... अभी पिछले हफ्ते ही तो डॉक्टर को दिखाया हूँ? ऑडियो-टेस्ट में उन्होंने सब ठीक बताते, कहा था कि ज्यादा परेशानी-वरेशानी लगे, तो अप्वाइंटमेंट लेकर आ जाइएगा, कुछ टेस्ट-वेस्ट करेंगे, और हाँ... ये भी कहा था कि जरूरत हुई तो सुनने वाली मशीन-वशीन भी लगा देंगे।"

"लगता है... पिछली बार आपने अपना कान ठीक से चेक नहीं करवाया था। इस बार मैं भी आपके साथ चलूँगी। ऐसा लगता है... शायद, आप डॉक्टर साहब को अपनी समस्या ठीक से समझा नहीं पाए? इतना तो आप भी जानते होंगे कि किसी के सामने अपनी बात रखना भी एक ठो कला है...? किसी से अपनी बात कहते समय आपकी बॉडी-लैंग्वेज, आपके चेहरे का हाव-भाव, हाथों का कुशल संचालन, सामने वाले से बराबर 'आई-कॉन्टेक्ट' रखना, तन कर बैठना या खड़े रहना आदि ही आपकी सजगता दर्शाती है, और ये भी कि आपकी बातें कितनी गंभीर हैं, ये भी तय करती हैं। आपके पास सचमुच अकल नहीं है। आखिर... साइंस-साइड अउर ऑर्ट-साइड की पढ़ाई में फरक तो रहेगा ही न!"

"ठीक है, तुम बड़ी अकलवान हो न! तो एनांऽपारी तुम भी चलना मेरे साथ, डॉक्टर साहब के पास, अउर बतिया लेना, अपने हिसाब से? बड़ी आईं, 'आई-कॉन्टेक्ट, बॉडी-लैंग्वेज, हाव-भाव... बात करने की ऑर्ट-साइंस... समझने-समझाने वाली?"

"बकवास मत करिए। ट्रेन में बैठे हैं, घर में नहीं हैं। चार लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे...? डॉक्टर साहब के पास चलने में हम्मैंऽ कउनों आपत्ति नहीं है, पर आप एतनाऽ बुझे-बुझे से, नरभसियाऽये से क्यों दिख रहे हैं...? आपके चेहरे पर बाराऽ क्यों बजे हैं...? जबकि इस समय तो शाम के पौने चार बज रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे कहीं खोये हुए हैं... या कुछ भूले हुए हैं, जिसे बार-बार याद करने की कोशिश कर रहे हों। लगता है... हमारे नइहर जाने की वजह से आप ज्यादा 'खुश... 'नहीं हैं..., कहीं इसी वजह से तो नहीं उड़ गया है आपके चेहरे का रंग? खो गई है आपके चेहरे की लालिमा... हरीतिमा... नीलिमा?"

"अऽरे नहीं भई... ऐसी कोई बात नहीं है... अचानक कुछ जरूरी काम याद आ गया था, समझ में नहीं आ रहा कि वो काम क्या था। मैंने किसको सौंपा था...। कहीं मेरे स्तर पर ही तो 'पेंडिंग' नहीं है।" इस तरह पैंतरा बदलते, निकश अपनी ही स्टॉयल, मैंने... पत्नी को बहलाने की कोशिश की।

"ऐसा करिए... जब तक आपको वो काम याद आए, आप ये अखबार पढ़िए। इसमें आपके मतलब की खबर छपी है। आपके एक पसंदीदा साहित्यकार का इंटरव्यू भी छपा है। इन्हें पढ़िए... और उनके सुविचारों से भरपूर लाभ उठाइए।" ये बहुमूल्य सुझाव देते पत्नी ने साथ लाया अखबार, बैग में से निकाल कर मुझे थमाते, अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।

ससुराल पहुँचने में अभी काफी देर है। पर मेरे मन में चल रहे आलोड़न-बिलोड़न का कुछ समाधान नहीं सूझ रहा। चाहता तो नहीं था, पत्नी से अपनी आशंकाओं का जिक्र करना। पर क्या करूँ... मेरा मन अनंत... पल-भर स्थिर भी तो नहीं रह पा रहा। अब इस व्यग्र हो रहे मन को झूठ-मूठ की दिलासा दिलाना ठीक नहीं। ज्यादा सोच-विचार भी ठीक नहीं। आगे बढ़कर मुझे पत्नी से पूछ ही लेना चाहिए..., यह गुनाह-बे-लज्जत ही सही...।

"बड़ी देर से एक ठो आशंका मन में रह-रह कर उठ रही है, तुम कुछ सुनो तो कहूँ...?"

"ऊँ... हूँ कहिए-कहिए सुन रही हूँ...।" पत्नी, जो उस समय सीट से पीठ टिकाए हल्के ऊँघ रहीं थीं, ने अनमने से कहा।

"आज घर से निकलते वक्त, पंखे, बत्तियाँ, नल की टोंटियाँ, गैस का नॉब, सभी दरवाजों के ताले आदि चेक करने के लिए मैं तुम्हें याद नहीं दिला सका। मुझे भी इनके बारे में याद नहीं रहा। अब इतनी दूर निकल आए हैं, तो याद आया। निकलने से पहले तुमने इन सबको ठीक से चेक तो कर लिया था न...?" कोई लाग-लपेट बतियाने के बजाय मैं सीधे ही प्वाइंट पर आ गया।

"घर से निकलते वक्त वो 'काम वाली बाई' दिख गई थी। कहीं उसी के खयालों में तो नहीं खो गए थे आप...? जो भूल गए मुझे इन सब की याद दिलाना...?" पत्नी ने अपनी सीट पर ही बैठे-बैठे लगभग नाइंटी डिग्री पर घूमते, थोड़े तैश भरे लहजे और व्यंग्यात्मक सुर में पूछा।

"अऽरे नहीं भई... तुम्हें तो मेरी हर बात पर ही मजाक सूझता है।"

"लेकिन मैंने गौर किया था। घर से निकलते वक्त आप उसकी ओर कनखियों देख जरूर रहे थे।"

"हाँ मैं उसकी तरफ देख रहा था, पर अगर तुम्हें कोई दुविधा थी तो मुझे उसी समय टोकना चाहिए था?"

"मैंने तो आपको इसलिए नहीं टोका कि देख लेने दूँ, जी भर के, काहे से कि आज के बाद तो, आप एक हफ्ते के लिए 'ऑउट-ऑफ-स्टेशन' जा रहे हैं। एक हफ्ते तक तो आपको उसके दर्शन ही दुर्लभ हो जाएँगे।"

"मैं उसकी तरफ कनखियों देख जरूर रहा था, पर उसे नहीं उसके बच्चे को, जो मुँह में एक 'कैंडी' डाले चूस रहा था। कितना मासूम लग रहा था? उसे कैंडी चूसते देख मुझे यक-ब-यक अपना बचपन याद आ गया। बचपन में लेमनचूस चूसने वाले दिनों की याद आ गई। बचपन में गाँव में दोस्तों संग गुनगुनाते इस गीत... 'एक बार अऽउरी तऽनी अऽइते बचपनवांऽ'... की याद आ गई थी।"

"अच्छा तो आप उस बच्चे की मासूमियत से इस कदर मुतअस्सर थे कि घर से निकलते वक्त, आप अपने बचपन की यादों में खो गए...?"

"नेचॅुरली'... पर... बस्स थोड़ी देर के लिए ही।"

"गजब का फ्लैशबैक वाला सेंस पाया है आपने भी! क्षण में अतीत में, क्षण में भविष्य में, और अगले ही क्षण एहर-ओहर से टहल-घूम कर, आपका दिमाग वर्तमान में वापस भी आ जाता है...? एतनाऽ क्विकॅली... कैसे आप ये सब डिसीजन ले लेते हैं? एही से तो सगरो खेल बिगड़ गया। न बचपन की यादों में खोते, न एह उमर में पछताते। तभ्भी तो कहूँ कि आपका फ्यूज काऽहे उड़ा हुआ है? पर आधा रस्ता पार करने के बाद आपको ये दिव्यज्ञान कैसे हुआ?

"तुम्हें बचपना सूझ रहा है...? पर ये गाना तो तुमने भी सुना होगा... "बचपन हर गम से बेगाऽना होता है... " ये बचपना नहीं है।"

"बिलकुल! ये तो आपका सयानापन है। मैं कहाँ आपसे असहमत हूँ। पर जहाँ तक मेरी जानकारी है, घर से दो-चार दिन के लिए कहीं बाहर निकलते वक्त... टिकट, पैसा, मोबॉयल-चॉर्जर, दवाइयाँ, जरूरी कपड़ा लत्ता, पानी की बोतल, आई-कॉर्ड, ए.टी.एम. कॉर्ड आदि जरूरी सामान रख लिए हैं कि नहीं? घर के सभी ताले, घर की सभी बत्तियाँ, गैस की नॉब, नल की टोंटियाँ आदि बंद हैं या नहीं? इत्यादि चीजों के बारे में तसदीक कर लेना चाहिए... न कि बचपन की यादों में खो जाना चाहिए... समझें कि नहीं?"

"अब बूझ-बुझौव्वल छोड़ो, और ये सोचो कि फिलवक्त समाधान क्या है... मेरी इन शंकाओं-आशंकाओं का...?" पत्नी को विषय की गहराई में जाते देख या बहस को गुरू-गंभीर होते देख, मैंने पुनः 'टू-द-प्वॉइंट' बात करने में ही भलाई समझी।

"अऽरे मेरे बुद्धू महराज... घर से निकल जाने के बाद, स्टेशन पर आने पर, ये सब बातें तो मेरे भी जेहन में आईं थीं, पर क्या करती...? ये सोच कर चुप लगा गई कि आपसे जिक्र करूँगी तो आप मुझे ही दोषी ठहराते, मुझ पर गुस्साने-झल्लाने लगेंगे। नाहक ही ऊलजलूल बातें सोचने-विचारने लगेंगे, और फिर मैं सफर का मजा भी तो किरकिरा नहीं करना चाहती थी।"

"यानि तुम्हें भी मेरी ही तरह फिक्र थी...?

"हाँ पर... जिन चीजों पर हमारा अख्तियार नहीं, उनके बारे में खाहमखाह सोच कर क्या परेशान होना...? वैसे इस बात की तसदीक तो आपको बहुत पहले कर लेनी चाहिए थी। जब घर से निकल रहे थे तभी, न कि इस समय। अब इन सब फिजूल बातों पर ज्यादा ध्यान देने से फायदा भी क्या, सिवाय दिमाग में टेंशन बढ़ाने के। अब खुद को किन्हीं ऊलजलूल सवालों के जंजाल में उलझाने के बजाय, ट्रेन में बैठे, बोलते-बतियाते, हँसते-खिलखिलाते या कुछ उन शांत, निर्विकार चेहरों को ही देखिए। उनकी मनःस्थिति ही समझिए। नहीं कुछ तो उनकी बॉडी-लैंग्वेज से ही उनकी मनोदशा का अंदाजा लगाइए कि कौन-कौन... किस-किस धुन में है। क्या कुछ चल रहा है उनके अंतर्मन में। आप तो खुद को इन सबका विषेशज्ञ मानते हैं।" पत्नी ने इशारों-इशारों में ही, डिब्बे में बैठे, बाकी दूसरे यात्रियों की ओर मुखातिब होते, मेरा मार्ग-दर्शन करना चाहा।

"लेकिन ये तो एक तरह से रिस्क लेने के बराबर है...?"

"आप ही तो कहते हैं न!... कभी-कभी हमें रिस्क भी लेना चाहिए। बोले तो 'कैलकुलेटर-रिस्क'। हमें अपने 'कंफर्ट-जोन' से भी बाहर निकलना चाहिए। वैसे भी अब तो थोड़ी देर में हमारा स्टेशन भी आने वाला है। बच्चे अपनी नानी के घर पहुँचने वाले हैं। अब ये सब बातें सोच-वोच कर, इन्हें याद कर अपना मूड क्यों खराब कर रहे हैं? निश्चिंत रहिए। किसी भी प्रकार की शंका-आशंका में बेवजह ही अपनी छुट्टियों का मजा खराब मत करिए।"

"फिर भी... तुम्हें तो पता है न! ...'लीक छाँड़ि तीनों चलें, शायर, सिंह, सपूत।' आखिर लिखने-पढ़ने वालों की जमात से हूँ। चिंतन करना स्वाभाविक जो है।"

"हाँ-हाँ... बड़काऽ भारी लिख्खाऽड़ के खानदान से तो बिलाँग करते ही हैं आप...। फिर भी... विर भी कुछ नहीं। ये चिंतन नहीं है, चिंता है। 'संशयात्मा विनश्यति' ... अब आप अपने दिमाग में रत्ती-भर भी कोई आशंका-वाशंका मत पालिए। निशाखातिर रहिए, अउर ज्यादा सेंटी भी मत होइए। अब वो किताब, जो आप सफर में या कहीं जाते-आते, टाइम-पास करने, चित फरियाने वास्ते, अपने बैग में रखे रहते हैं, उसे निकालिए, और पढ़िए। देखिए, उहाँऽ सामने वाली सीट अब खाली भी हो गई है। उसी पर गोड़ फैला कर चौड़े से लेटिए, और जब-तक ये ट्रेन स्टेशन पर पहुँचे, तब-तक के लिए आप किताबों की अपनी दुनिया में खो जाइए। हाँ पर... ध्यान रखिएगा, ऐसा न हो कि ईऽ सब अकबास-बकवास सोचने के चक्कर में मूल मुद्दे से ही आपका ध्यान भटक जाए?"

"अब ये मूल मुद्दा किस बला का नाम है?"

"अऽरे... भई, घर से निकलते वक्त मैंने आपको समझाया था न! स्टेशन पर उतरते ही आपको पाव-भर नहीं, बल्कि एक किलो बर्फी खरीदना है... ठीक से याद है नाऽ...! याद है, पिछली बार आपने बेइज्जती करवा दिया था।"

"अब भला मैं ये कैसे भूल सकता हूँ? आखिर... मैं भी तो किसी से मिलने अपने ससुरारी जा रहा हूँ?"

"किससे...? अऽरे हलोऽ... किसी खामखयाली... अउर भ्रम-व्रम में मत रहिएगा... मेरे 'देवदास जी'...? पिछले साल ही आपके 'पारो जी'...? की शादी-वादी भी हो चुकी है, और आपसे सटकर, आपके बिलकुल बगल में ही बैठी ये माधुरी, तो वैसे भी आपका पीछा, सात-जनम तक नहीं छोड़ने वाली।"

"ये नाकिस और मनहूस सी खबर भी, तुम्हें मुझे बीच रास्ते में ही देना था...? घर से जब हम निकल रहे थे, तो उस वक्त भी तो बता सकती थी?"

"ये इस कर... ताकि कोई मनो-मालिन्य न हो। पूरे रास्ते आपके दिमाग में कोई फितूर सा खयाल न सूझे। आपका ध्यान भी न अटके-भटके। पूरे समय आप सजग रहें।"

"ये सजगता किस बात के लिए?"

"आने वाली चुनौतियों से लड़ने, मुसीबतों का सामना करने वास्ते, अपने कर्तव्यों और दायित्वों के प्रति सजगता भी तो रखनी चाहिए न?"

"अब ये चुनौतियाँ-मुसीबतें-कर्तव्यों-दायित्वों... का क्या चक्कर है? क्या ऐसा नहीं लग रहा कि आज तुम कुछ ज्यादा ही बूझ-बुझौव्वल वाली, और साहित्यिक-भाषा में बतिया रही हो?"

"तो क्या सगरौऽ साहित्यिकी का ठीकाऽ आप ही ने ले रक्खा है? अऽरे ग्रेजुएशन में हमनें भी साहित्य पढ़ रक्खा है।"

"मतलब हमारे खानदान के हाथों में साहित्य पूरी तरह सुरक्षित है? मुझे कोई आशंका नहीं पालनी चाहिए?"

"बिलकुल नहीं! ...मैंने कहा न, आप निशाखातिर रहिए, और हाँ... फौरी चिंता जिस बात की है, उससे भी निश्चिंत हो जाइए।"

"लेकिन आशंका तो आशंका ही होती है।"

"फिर तो आपने वो कहावत जरूर सुनी होगी?"

"कौन सी कहावत?"

"यही कि... शंका का इलाज तो हकीम लुकमान साहब के पास भी नहीं था। अब ये मत पूछने लगिएगा कि ये जनाब कौन थे?"

"कौन थे?"

"मैंने सिर्फ लोगों को कहते सुना है। इनके बारे में मुझे कोई विशिष्ट जानकारी नहीं है। वैसे, आप जैसे ज्यादा, पढ़े-लिखों के साथ यही तो दिक्कत है, न खुद चैन से कहीं बैठेंगे... न दूसरों को ही चैन से बैठने देंगे। कोई-न-कोई बात लेकर, हमेशा ही कॅन्फ्यूज रहते हैं। उ कहावत है न!... "जैक ऑफ ऑल ट्रेड, मॉस्टर ऑफ नॅन"... करेंगे बड़ी-बड़ी बातें, आता-जाता कुछ नहीं... चले हैं बुद्धि लड़ाने। तब से देख-सुन रही हूँ... बेमतलब का झुट्ठैं एक ठो टेंशन लिए, माऽठाऽ मार रहे हैं?"

"तुम्म्... हमारे कहने का आशय समझने की कोशिश काऽहे नहीं करती?"

"अऽरे, तो क्या एतनाऽ बरिस से हम आपको समझ ही नहीं पाए होंगे? आपके इस चिरकुट-चिंतन के बारे में तो दैवोऽ न जान पाएँगे, हम तो इस पावन धराधाम के सिर्फ अदने से प्राणी भर हैं। अउर हाँ... ससुराऽरी जाकर रसेदार सब्जियों के लिए बच्चों की तरह जिद्द मत करने लगिएगा... जैसे कि यहाँ करते हैं।"

"क्यों...?"

"क्यों कि हमारे नइहरे में सभी को सूखी सब्जी ही पसंद है।"

"तभी तो...?"

"मतलब...?"

"छोड़ो... तुम नहीं समझोगी?"

"तो समझाइए न! आप तो समझाने वाली विद्या के मर्मज्ञ हैं, विषय-विषेशज्ञ भी हैं।"

"छोड़ो... फिर कभी सही... क्या रक्खा है इन रसेदार... सूखी-सब्जियों में।"

"पापा उधर देखिए... आप वाली...?" बेटे ने यक-ब-यक हमारी इस गूढ़ होती परिचर्चा को भंग करते, हमारा ध्यान डॉयवर्ट किया। ट्रेन में बैठे-बैठे ही सामने गलियारे से जाते एक आदमी की ओर उसने इशारा किया। बेटे के मुँह से ये मृदु-वचन सुन कर मेरे साथ पत्नी ने भी, कौतुहलवश उधर देखते उससे पूछा... "ये पापा वाली कौन...?"

मैं भी उत्सुक था।

"अऽरे वोऽ... लंबे वाले अंकल जी, जो थोड़ा झुक कर भी चल रहे हैं, चेकदार शर्ट पहने हुए हैं, ऐसी ही एक शर्ट पापा के पास भी हैं न...! मम्मी...?"

"अऽरे हाँ... बिलकुल ऐसी ही है।"

"अऽरे भक्क बुड़बक कहीं काऽ...?" उस तरफ देखने के बाद, अपने लरजिशपन से उबरते, मैंने बेटे पर बनावटी गुस्सा दिखाया।

पत्नी ने बेटे को प्यार से डाँटते हुए चूमा। मम्मी संग पापा... यानि मैंने भी इत्मिनान की साँस ली। पत्नी और बेटे की बात पर मेरे चेहरे पर भी जाहिरन तौर... मुस्कुराहट तैर गई।

पत्नी ने उपरोक्तानुसार अपनी बातें कहते, आश्वस्त करते, अपने चेहरे पर ऐसा निश्चिंत-भाव प्रगट किया, मानों उन्हें मेरी शंकाओं-आशंकाओं के बारे में सब कुछ पहले से ही पता था, तभी तो वो निश्चिंत थीं, और मैं लगभग ढाई सौ किलोमीटर की इस यात्रा में पूरे रास्ते-भर जाने क्या-क्या सोचता रहा...? जाने क्या-क्या उल्टे-सीधे विचार मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते रहे। जाहिर है... पत्नी ने मेरी आशंकाओं को एक झटके में तो नहीं... परंतु दो-तीन लटके-झटके बतियाते, निर्मूल करने का पूरा प्रयास किया था।

"अब क्या सोचने लगे...?" मुझे पुनः ध्यानमग्न देख पत्नी ने सवाल दागा।

"कुछ नहीं...?" मैंने पत्नी के इस संक्षिप्त सवाल का लगभग अचकचाते हुए उत्तर दिया।

"चिंता छोड़िए। मस्त रहिए। चलिए इसी बहाने आपका बौद्धिक-परीक्षण भी हो जाएगा। कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही सही। आप तो लिखने-पढ़ने-गढ़ने वाले बुद्धिजीवी ठहरे। ये अलग बात है कि खुद आपको ही, अपनी इस दुर्लभ, काबिलियत पर शंका सी बनी रहती है। कहीं ये आपके ज्यादा पढ़ने-लिखने गढ़ने का सॉइड-इफेक्ट तो नहीं?"

"तुम भी न! हमेशा ही मजाक के मूड में रहती हो।"

"अऽरे नहीं भई... मैं तो सीरियॅस हूँ! अउर हाँ... फिर ये तो आपके लिए खुशखबरी सरीखे भी है।"

"वो कैसे...?"

"आपको हमेशा ही शिकायत रहती थीं न! कि आपको अपने ससुराल में बड़ी बोरियत होती है। साले-सालियों की शादी-वादी हो चुकने के बाद, अब आपसे बोलने-बतियाने वाला कोई हम-उम्र... भी वहाँ नहीं है...? फिर तो इस बार आपके लिए अच्छा-खासा मसाला है।"

"मसाला माने...?"

"देखिए... लिखना आपका प्रिय शगल है न? कहिए हाँ... तो फिर जितने दिन ससुराल में रहिएगा, बोर होने के बजाय अपनी इस अद्भुत-यात्रा वृत्तांत...। एवं इस दौरान हुए अपने विशिष्ट-अनुभवों को ही लिखिएगा। रफ कीजिएगा। हो सकेगा तो, उसे दो-चार बार पढ़ते... काटते-कूटते-फाड़ते-फूड़ते... फेयर भी कर लीजिएगा। वैसे भी आप अपनी किसी रचना का ड्रॉफ्ट, आठ-दस बार में ही फॉयनल कर पाते हैं। हालाँकि तभ्भौंऽ उससे आप असंतुष्ट ही रहते हैं। इससे आपका समय कट जाएगा, और हमारी हफ्ते-भर की छुट्टियाँ भी खुशी-खुशी बीत जाएँगी।"

"शायद तुम ठीक कह रही हो...।"

"अच्छा अब ज्यादा सोच-विचार कर, अपना और मेरा भी मगज मत खराब करिए। आपकी जिस काम में मास्टरी है, वही करिए।"

"मेरा भी यही मानना है... शायद, जीवन में कुछ प्रश्नों को अनुत्तरित ही रहने देना चाहिए। हमें अपने मन में उठ रहे हर सवालों के जवाब जानने के बजाय, जिज्ञासाओं, प्रश्नों को यूँ ही मन में अनवरत उठते रहते या अनुत्तरित सा छोड़ देते, उनका समाधान वक्त पर छोड़ देना चाहिए। क्या पता मन को शांत रखने के लिए यही श्रेष्ठ उपाय हो?" अपने सामने खुले अखबार में छपे, साहित्यकार महोदय के इंटरव्यू को पढ़ते, ऐसी दुविधापूर्ण स्थिति में उनकी कही गई बातों की ओर मैंने पत्नी का ध्यान आकृष्ट करना चाहा।

"साहित्यकार महोदय ने आगे ये भी कहा है कि बहुत सी चीजों पर आपका वश नहीं होता। हम चीजों को जितना ही पकड़ने की कोशिश करते हैं, वो हमारे हाथों से उतनी ही तेजी से फिसलती चली जातीं हैं। हमारा अख्तियार, न अतीत पर था, न भविष्य पर होगा। अख्तियार है, तो सिर्फ वर्तमान पर।"

"आप भी न! कभ्भौंऽ-कभ्भौंऽ एतनाऽ समझदारी वाली बातें करने लगते हैं कि आपको समझना ही टेढ़ी खीर हो जाता है। हम भी कन्फ्यूज हो जाते हैं। वैसे हमें कभी-कभी कन्फ्यूजन का लुत्फ उठाना भी चाहिए।" कहते पत्नी ने अपनी खास स्टॉयल, में फिस्स देना... हँसते-हँसते ही, बेटे को मोबॉयल पर काफी देर से गेम खेलते देख, मोबॉयल की बैटरी पूरी तरह से डिस्चॉर्ज होने के डर से, उसे डाँटने में व्यस्त हो गईं। पत्नी की हँसी खास... इसलिए है कि हँसते वक्त उनकी दंत-पंक्तियाँ बिलकुल माधुरी... (पत्नी का नाम है भई!) का सा लुक देतीं हैं... तिस पर ओंठलाली...? तो रूप-माधुर्य-लावण्यता का अनूठा संगम है ही।

वैसे अपनी जान में तो पत्नी ने मुझे आश्वस्त करने का पूरा-पूरा प्रयास किया था। पर क्या सचमुच... निश्चिंत हो गया हूँ मैं...?

मैं तो ये भी नहीं तय कर पा रहा हूँ कि खुद को आश्वस्त करने के फेर में, अपनी आशंकाओं के बारे में चर्चा करके, जाने-अनजाने मैंने पत्नी को भी तो आशंका में नहीं डाल दिया...? खाहमखाह ही मैंने उनकी सुखद-यात्रा का कबाड़ा तो नहीं कर दिया...?


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