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कविता

सबन के ऊपर ही ठाढ़ो रहिबे के जोग
भूषण


सबन के ऊपर ही ठाढ़ो रहिबे के जोग,
ताहि खरो कियो छ-हजारिन के नियरे।
जानि गैर मिसिल गुसीले गुसा धारि उर,
कीन्हों न सलाम, न बचन बोलर सियरे।
भूषण भनत महाबीर बलकन लाग्यौ,
सारी पातसाही के उड़ाय गए जियरे।
तमक तें लाल मुख सिवा को निरखि भए,
स्याम मुख नौरंग, सिपाह मुख पियरे।।


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हिंदी समय में भूषण की रचनाएँ